(Article) अस्तित्व खोता जा रहा है संडे

अस्तित्व खोता जा रहा है संडे

 

संडे का जन्म 18 वी शताब्दी के अंत का माना जाता है। अंग्रेज  गुलाम भारत के मजदूरों से हफ्ते के *सातों दिन* काम लेते थे और इतनी मेहनत करवाते थे कि वह घर जाते, खाना खाते और सो जाते थे । *वर्ष के लगभग 365 दिन इन मजदूरों की किस्मत जैसे लिख सी गई थी* कि इनका काम मजदूरी करना और खाना खाना था। इन्हें एक दिन का आराम मिले और वह दिन अपने परिवार,रिश्ते,नातेदारों के साथ बिता सकें यह उनकी एक बड़ी आवश्यकता थी। साथ ही उस दिन आराम करके वे बाकी दिनों की थकान भी दूर हो सकें। 

हफ्ते के किसी *एक दिन छुट्टी* की मांग को लेकर नारायण मेघाजी लोखंडे द्वारा अंग्रेजों के लिये इस आशय का प्रस्ताव भेजा । इसके साथ ही मजदूरों ने लोखंडे जी के साथ मिलकर छोटे मोटे आन्दोलन शुरु किये ।शुरुआत में तो यह आंदोलन अपना असर नहीं छोड़ सका ।लेकिंन धीरे धीरे एक दिन छुट्टी की मांग को लेकर आंदोलन तेज हुए और कई वर्षों तक लगातार आंदोलन चले।माना जाता है कि 1890 में *अंग्रेजों ने सप्ताह में एक दिन छुट्टी के प्रस्ताव को मंजूरी दी।*

और पहली बार दस जून को रविवार की छुट्टी घोषित हुई और यहीं से भारत में संडे को अवकाश दिन माना जाता है ।संडे यानि रविवार का काम करने वाले मजदूरों की जिंदगी में  एक अलग सा महत्व हो गया। अंग्रेजों की गुलामी में काम करने वाले मजदूर हफ्ते में एक दिन की छुट्टी पाकर एक दिन के लिये अपने आप को अंग्रेजो से स्वतंत्र सा मानकर इस दिन खुद को अपनी सीमाओं में रहकर कुछ भी करने के लिये स्वतंत्र थे।  इस दिन ये मजदूर मजदूर न होकर किसी के पति ,किसी की पत्नी ,माँ ,बाप,बेटा,बेटी,दादा,दादी,चाचा,चाची आदि होते थे । इस दिन उंगलियां मिलकर मुट्ठी का रूप ले लेती थीं।यह दिन अब एक ख़ास दिन हो गया था ।इस दिन ज्यादा से ज्यादा समय मजदूर अपने परिवार को देते थे, अपने परिवार के साथ रहते थे आपस में एक दुसरे का सुख दुख बांटते थे । यहीं से रिश्तेदारों में एकजुटता भी आने लगी थी। जहां लोग वर्षो अपने रिश्तेदारों से नहीं मिल पाते थे रविवार की छुट्टी से ये सब होने लगा । वहीं इसमें बचे कुछ समय में मुहल्ले या गांव के लोग आपस में मिलने लगे ,इकट्ठे होने लगे। लोगों के बीच प्रेम बढ़ने लगा । इसके साथ ही गुपचुप गुपचुप इसी बहाने अंग्रेजों से मुक्त होने की योजनाऐं भी बनने लगी । लोग मिलने लगे और धीरे धीरे सप्ताह के सातों दिनों में रविवार का कद बढ़ गया ।रविवार अपने चरम पर आ गया था ।धीरे धीरे लोगों ने इसे अपनी जिंदगी का एक अहम हिस्सा बना लिया ।

 21 वीं सदी में टेक्नॉलाजी की दुनिया शुरू हुई। टेक्नोलॉजी से फेसबुक,व्हाट्सएप्प, इंस्ट्राग्राम,टिवटर जैसी एप्लिकेशन उपलब्ध कराई ।यह वह समय था जहाँ समाज में व्याप्त भौतिक वस्तुओं का तो विकास होने लगा लेकिन समाज को बनाने वाले लोगों पर भी इसका असर देखा जाने लगा । फेसबुक,व्हाट्सएप्प, इंस्ट्राग्राम,टिवटर का उपयोग समय की बचत करके समाज को आगे ले जाना था लेकिन टेक्नोलॉजी के आने से लोगो को अपनी वुद्धि का उपयोग काम हो गया जिससे लोगो में तनाव खत्म होने लगा ।साथ ही समय की बचत भी होने लगी ।लेकिन 21वी सदी के शुरुवाती दशक में फेसबुक ,व्हाट्सअप ने अपनी पकड़ मजबूत कर ली थी ।और लगातार इनका विकास हुआ । नये नये फीचर्स आये और बच्चों के लेकर वुजुर्ग तक अब इसमें अपना काम छोड़कर इसमें समय दे रहे है । सदी में यह दांव उलटा पड़ने लगा । अपने दिमाग का इस्तेमाल करना बंद कर दिया। लोग पूरी तरह से फेसबुक,व्हाट्सएप्प, इंस्ट्राग्राम,टिवटर पर अपना समय दे रहे है। अन्य टेक्नोलॉजी से  होने वाले कार्य भी अब पूरी तरह से उसी पर निर्भर हो गए है , अगर इलेक्ट्रॉनिक चीज में थोड़ी भी प्रॉब्लम आ जाये तो बड़े से बड़ा काम भी रुका रहेगा। और किसी को थोड़ा भी समय मिला तो वह सोसल मिडिया पर चला जाता है । यहीं से कार्य का भार बढ़ने लगा ... इसकी भरपाई करने के लिये लोगों ने रविवार को भी कार्य करना शुरू कर दिया। देखा जा रहा है कि जितना अधिक कार्य का जिम्मा होगा वह अपने दिमाग को फ्री करने के लिये उतना अधिक सोसल मिडिया पर देगा ,इससे समय की बर्बादी के साथ साथ छुट्टी का पता नही चलता की यह यह समय घर पर देना था कि ऑफिस में । और अगर कोई रविवार को जैसे तैसे कर के घर पर रुक जाए तो वह अपना 100% योगदान सोसल मिडिया पर देने की कोशिस करता है।अब लोगो के लिये रविवार सोमवार से कोई फर्क नही पढता है ।

*आज की स्थिति में अब रविवार भी 'सोमवार' है काम ,ऑफिस,बॉस,बीबी,बच्चे बस ये जिंदगी है।दोस्त से दिल की बात का इजहार नहीं हो पाता। पहले वाला वो रविवार अब नही आता।*

 टेक्नोलॉजी की इस दुनिया में पैसे कमाने के चक्कर में कई क्षेत्र ऐसे भी है जहां पर कई प्रकार के कार्य रविवार को ही  होते है । इस दुनिया में समय ने तो अपनी रफ़्तार पकड़ ली लेकिन समाज इसमें अपना चैन ,नींद, आराम, घर,परिवार ,रिश्तेदार सब कुछ खोता सा जा रहा है ।अब रविवार वो रविवार नहीं रहा जिसका पहले सभी के लिये इन्तजार रहता था । अब *डॉक्टर,वकील,पुलिस ,पत्रकारिता* आदि जैसे ऐसे क्षेत्र है जहाँ कभी कोई रविवार नहीं सब दिन वर्किंग डे हैं। मैं उन मालिकों और अधिकारियों का धन्यवाद करता हूँ जो आज भी रविवार को सन्डे नही बल्कि रविवार के रूप में मानते है और अपनी कंपनियों कार्यालयों की छुट्टी मनाते हैं । देखना होगा की रविवार अपने आप को बचाने के लिये कब तक संघर्ष करता है और अपने अस्तित्व को बचाये रखता है।

 

By: Anurag Gautam, Damoh

 

 

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