(Article) विंध्य - बुन्देलखण्ड क्षेत्र को भविष्य मे पष्चाताप के लिये तैयार रहना होगा!

विंध्य - बुन्देलखण्ड क्षेत्र को भविष्य मे पष्चाताप के लिये तैयार रहना होगा !
 
वैसे तो पूरे देष का बुरा हाल है पर विंध्यक्षेत्र तथा बुन्देलखण्ड मे हर साल प्रकृति दिखा रही है कि हम गलत रास्ते पर हैं जिसे सही मानकर हम आगे बढ़ते ही जा रहे हैं। विकास के नाम पर जो रास्ता हमने चुना है वह हमे कहॉं ले जा रहा है इस तरफ देखने,  सोचने तथा समझने का न तो समाज के पास और न ही सरकारों के पास अवसर है और न धैर्य । 
 
मौसम अनिष्चित होता जा रहा है , जाड़ा, गर्मी , बरसात जो अभी पॉंच दषक पहले तक अपने निष्चित रंग और ढंग से आते थे ,तापक्रम मे बहुत उतार चढ़ाव नही रहता था , वर्षा की स्थिति: एक साल कम तथा दूसरे साल सामान्य या अधिक होना एक सदी से क्रमबद्ध चल रहा था । सूखे पडते थे पर बीस-पचीस सालों मे कहीं एक  या दो बार । 
 
फिर इन कुछ दषकों मे ऐसा क्या हुआ कि सब कुछ  अस्तव्यस्त और मनुष्य ही नही अपितु सभी जीवधारियों का जीवन पूरी तरह त्रस्त हो गया। स्थिति यह है कि जंगल , नदी,, पर्वत , जमीन , गांव , किसान, मजदूर, जंगली और पालतू जानवर सभी पर संकट के बादल मंड़रा रहे हैं । आज यहॉं सब ओर विनाष की झलक दिख रही है। जंगलों का सफाया, ग्रेनाइट, फर्सी  और चूना-पत्थरों तथा हीरा की विस्तृत खदानें, नदियों की गहन गहराइयों से बालू का दोहन और इस कार्य हेतु देषी तथा विदेषी निवेष की चेष्टा और आमंत्रण, उद्योगों के  विकास के नाम पर अनियंत्रित उत्खनन , अखबारों मे रोज छपती वैध-अवैध उत्खनन की रिपोर्टें,ं बढ़ती जा रही स्टोन-क्रषर्स की संख्या, ऊँचाई से भी अधिक गहराई तक कटते तथा खुदते हुये पहाड़, बरबाद होते हुये ऐतिहासिक तालाब तथा सरोवर, सूखती और प्रदूषित होती हुई सिंध, पहूज, धसान, बेतवा, केन, और चित्रकूट की मंदाकिनी जैसी पवित्र एवं निर्मल जलवाही नदियाँ, उस पर भी विनाषकारी केन -बेतवा गठजोड आदि को लेकर तथ्यों के साथ खिलवाड़ एवं झूठबयानी और गहराती जल-राजनीति, अभ्यारण्यो में भी वनराजों की हत्या और मौतें , भटकने और कटने के लिये बहिष्कृत अथवा बेची जाने वाली गोमातायें, बैलों को रौंदते हुये ट्रैक्टर्स, साल दर साल घटती हुई जमीन की ताकत, पैदावार मे अनिष्चितता, लुप्त होते हुये कालजयी बीज, रूठते बादल, सपरिवार पलायन के  लिये मजबूर लोग और किसानों की आत्महत्याओं के बढ़तें आंकड़े क्या समाज को या सरकारों को कुछ भी सोचने के लिये बाध्य नही करते । 
 
मौसम तथा पारिस्थितिकी के सर्वनाषी उतार चढ़ाव तथा जीवन के सामने आने वाले गम्भीर संकट को ग्लोबल वार्मिंग की आड़ मे ढकेला जा रहा है । अपने कुकृत्यों , स्वार्थपरक निर्णयों तथा उनसे होने वाले दुष्प्रभावों की ओर ऐसे ऑंख मूंूंदी जा रही है जैसे हम मनुष्य नही  षुतुर्मुर्ग की योनि मे जन्मे हों। 
 
वर्तमान स्थिति:                           
              विकास के नाम पर नगरीकरण और उद्योगों के फैलाव और अनियंत्रित उत्खनन के षिकार पर्वत तथा उनके ऊपर के जंगलों के विनाष ने एक ओर वर्षा को अस्तव्यस्त कर दिया है ,दूसरी ओर मैदानी जंगलों का सफाया भूगत जल के संभरण को पूरी तरह प्रभावित कर रहा है । जो भी वर्षा आज होती है वह बिना विराम जमीन पर की मिट्टी को बहाती हुई नदियों मे अधिक तेजी से चन्द दिनों के लिये भीषण बाढ़ लाती है , बाढ़ का फैलाव अब पहले की तरह खेतों मे उपजाऊ ह्यूमस न विखेर कर कई कई फिट बलुई धूल से भर देता है । इस पूरे क्षेत्र मे कुछ दषको पूर्व बारहमासी प्रवाहित सैकड़ों  नाले तथा उपनदियॉं अब अक्तूबर मे ही सूखने लगती हैं । मध्यम आकार की महत्वपूर्ण नदियॉं भी बंधे पानी के कुंडों मे सीमित हो रही है, प्रवाह बाधित हो रहा है ।  
 
सतही पानी अब ज्यादा समय नही ठहर पाता । उसके सूखने के साथ जिस तरह जमीन के अन्दर का पानी बाहर उलीचा जा रहा हैै परिणामतः भूगर्भ जल लगातार तेजी से नीचे जा रहा है । सैकड़ो वर्षों से गॉंव गॉंव फैले अपने सुदृढ़ कुंओ, बावड़ियों, सारोवरों तथा तालाबों के कारण अपनी विषिष्ट छवि वाला यह क्षेत्र आज बूंद बूंद पानी के लिये संघर्ष कर रहा है । गॉंव हों या नगर सभी स्थानों मे कुंये तथा तालाब मृतप्राय हैं , गर्मियों मे यहॉ पीने के पानी का प्रबन्ध भी मुष्किल हो  रहा है। पानी के साथ ही खेती जुड़ी है । इस क्षेत्र मे कम पानी मे खेती करने की परम्परा रही है , अनेक तरह के परम्परागत अनाज , तिलहन एवं  दलहन के स्थानीय बीज यहॉ उपलब्ध थे जिनके बल पर किसान विषम परिस्थिति मे भी उत्पादन लेते रहे । आज विकास की ऑंधी के तहत षंकरित/आयातित बीजों के लिये एक ओर क्षेत्रीय कालजयी बीजों को समाप्त कर दिया गया , सोयाबीन तथा मेंथा जैसी फसलों ने भोजन के लिये अत्यावष्यक दालों तथा उतम पोषणीयता के श्रोत मोटे अनाजों आदि को परम्परागत स्थानीय फसलों की सूची से हटा दिया  दूसरी ओर पानी की कमी , मिट्टी की उर्वरता, के ह्रास , मौसम की अनिष्चितता और नगरों के पास की उपजाऊ जमीनों का क्षेत्रफल लगातार घटने के कारण खेती पूरी तरह अस्त व्यस्त हो गयी। परिणामतः गरीबों का बड़े नगरों तथा दूसरे राज्यों की ओर पलायन तथा किसानों की आत्महत्या अब कोई आष्चर्यजनक या दुर्लभ समाचार नही रह गया है ।  
 
भावी दिषा
आज जो हो रहा है वह इस सम्पूर्ण क्षेत्र के जंगल’-जल-जमीन को तो  नष्ट करेगा ही , सॉंस लेने के लिये हवा में जरूरी आक्सीजन को भी नही बख्षेगा।  इन सबसे जो लाभान्वित होने वाले हैं ऐसे समाज के चन्द नेता, नौकरषाह, व्यापारी तथा टेक्नोकेट्स तो भविष्य मे दूर जा बसेंगे पर यहॉं का निरीह जनसमाज क्या भविष्य में बिना पानी और शुद्ध वायु ऑक्सीजन जिन्दा रह पायेगा ? क्या रसोई गैस की तरह सरकारें पानी के निःषुल्क ड्रमों  तथा ऑक्सीजन सिलिंडर के माध्यम से उन्हे जिन्दा रखेगी ? क्या इसी के बल पर यहॉं  की भावी सारी पीढ़ियां अपना जीवनयापन करेंगी ? 
 
समस्या यह है कि उपरोक्त स्थिति अविलंब नही बदली तो पूरे समाज के लिये पष्चाताप  करने के अतिरिक्त और कोई विकल्प नही होगा। वैसे तो हमारा समाज पाप करने और गंगा नहा कर उन्हे बहाने और पुण्य कमाने का आदी है ।  समस्या यह है अब गंगा भी उतनी पवित्र नही है कि ये सारे पाप धुल सकें। 
 
 
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संसाधन अध्ययन केन्द्र , छतरपुर म.प्र.

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