बुन्देलखण्ड राज्य बनाओ - किसान बचाओ

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बुन्देलखण्ड राज्य बनाओ - किसान बचाओ


बुन्देलखण्ड के किसानों के घरों में अन्न का एक दाना तक नहीं है फिर भी हमारा भारत कृषि प्रधान देश है। हालात यह है कि रोटी कमाने के लिए बहुतायत किसान अपना परम्परागत काम छोड़कर मजदूर बनने के लिए अपना गांव छोड़कर जा रहे हैं। लगातार खराब मौसम की मार ने बुन्देलखण्ड में अकाल जैसे हालात पैदा कर किसानों की कमर तोड़ दी है। बुन्देलखण्ड की 86%आबादी कृषि पर निर्भर है या कहे कृषि ही पेट पालने का एक मात्र साधन है। परन्तु आज बुन्देलखण्ड के किसानों में घोर निराशा व्याप्त है और यहां का अधिकांश किसान खेती से नाता तोड़ रहा है। लाचारी, बेकारी, गरीबी एवं बीमारी से त्रस्त किसान कृषि को छोड़कर अपने श्रम को दूसरे काम में लगाना चाहता है। क्योंकि कृषि पिछले कई वर्षों में पेट की आग बुझाने में सहायक सिद्ध नहीं हुई है। इसलिए आज लाखों किसान बुन्देलखण्ड से पलायन कर मजदूरी करने चले गए हैं।अगर इसी रफ्तार से किसान खेती से मुंह मोङते गये तो जरा सोचिए हमारे खाने का प्रबन्ध भी पराश्रित हो जायेगा । और बुन्देलखण्ड की पूरी धरती बंजर हो जायेगी ।

प्राकृतिक आपदाओं के रूप में सूखा, अतिवृष्टि, ओलावृष्टि व मौसम की बेरूखी की मार झेल रहे किसानों की समस्यायें दिनोंदिन महामारी की तरह बढती जा रही है। बुन्देलखण्ड में अकाल पङ गया है। बुन्देलखण्ड में अधिकतर लोगों ने अपने पालतू जानवरों को खूंटो से हमेशा हमेशा के लिए मुक्त कर दिया है। ये भारी तादाद में अन्ना जानवर किसानों की रातों की नींद हराम कर रहे हैं।

यहां का शत प्रतिशत किसान सरकारी व सूदखोरों के कर्ज से बहुत ज्यादा परेशान हैं। जिन किसानों की सहन शक्ति व हिम्मत जबाब दे जाती है वे आत्महत्या का रास्ता अख्तियार कर लेते हैं। पिछले 2 दशक से भी कम समय में पूरे बुन्देलखण्ड में कर्ज, गरीबी व भुखमरी से जूझ रहे 25000 किसानों ने मौत को गले लगा लिया। ज्यादातर आत्महत्याएं सदमे के कारण फांसी लगाकर व कुछ जहरीला पदार्थ खाने की है। जिन परिवारों के मुखिया किसान ने आत्महत्या की, वे परिवार बहुत तंगहाली में व बदहाली के साथ साथ कुपोषण में जी रहे हैं। इनके बच्चों को शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण की दूर दूर तक कोई व्यवस्था नहीं है। ऐसे किसानों के परिवार अपनी बेटियों की शादियां नहीं कर पा रहे हैं, शादियां टूट रही हैं। किसानों का अंतिम संस्कार या तेरहवीं करने के लिए साहूकार भी कर्ज देने से कतराने लगे हैं।

आज देश आजादी के 70 सावन देखने के करीब है और हमारे कृषि प्रधान देश में एक इलाका ऐसा भी है जहां किसान भूख, प्यास, कर्ज व मर्ज से जूझकर आत्महत्याएं कर रहे हैं। इस इलाके में महज 35 हजार से 1.5 डेढ़ लाख रूपये के बीच सरकारी कर्ज में दबे अधिकांश किसानों को जान देनी पङ रही है। वहीं देश के 30 बङे कारोबारी घराने सरकारी बैंकों का लाखों करोड़ रुपये डकारकर ऐशो-आराम का जीवन जी रहे हैं। यही कारोबारी चुनाव के समय में हमारे देश की राजनीतिक पार्टियों को चन्दा देने का कार्य करते हैं और चुनाव बाद सत्ता में आयी पार्टी इन कारोबारी घरानों का करोड़ों का टैक्स माफ कर ,ये भ्रष्ट राजनेता देश को खोखला करने की गंदी राजनीति करते हैं।

अभी कुछ समय से अकाल के चलते बुन्देलखण्ड सुर्खियों में है। किसानों के लिए कार्य कर रहे तमाम संगठन व राजनैतिक पार्टियों ने बुन्देलखण्ड के सूखे पर सियासत करने की कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। परन्तु बुन्देलखण्ड के किसानों को मदद पहुंचाने का कोई महत्वपूर्ण या ठोस कदम नहीं उठाया गया। सरकारी उदासीनता व भ्रष्टाचार के चलते मुआवजा व फसल बीमा का बुन्देलखण्ड के किसानों को कभी लाभ नहीं मिलता है।मुआवजे ऊंट के मुंह में जीरा जैसे होते हैं। पैकेज, मुआवजा व खाद्यान्न वितरण फौरी राहत हो सकती है लेकिन स्थायी समाधान नहीं खोजा गया। बुन्देलखण्ड के किसानों के हित में संपूर्ण कर्ज माफी ही बुन्देलखंडियो को संकट के इस दौर से निकाल सकती है ।

स्वराज अभियान के संयोजक योगेन्द्र यादव की रिपोर्ट में बताया गया था कि बुन्देलखण्ड में हर पाँचवा आदमी घास की रोटियां खाने को मजबूर हैं।
जल पुरूष राजेन्द्र सिंह ने बुन्देलखण्ड की पदयात्रा में कहा था कि पानी के लिए दुनिया में जानी जाने वाली धरती बुन्देलखण्ड को आज पानीदार बनाने की आवश्यकता है। जबकि पहले ऐसा कहा जाता था बुन्देलखण्ड की धरती के संबंध में -"बुन्देलो की सुनो कहानी ,बुन्देलो की वाणी में ।
पानीदार यहां का पानी ,आग यहां के पानी में ।।"

बुन्देलखण्ड की धरती लगातार बंजर हो रही है, हजारों हेक्टेयर भूमि बंजर हो चुकी है।
बुन्देलखण्ड क्षेत्र की घोर उपेक्षा के चलते बुन्देलखण्ड के किसानों को समृद्ध बनाने के लिए जरूरी प्रयास कभी नहीं हुए। बुन्देलखण्ड में जल संरक्षण व जल संवर्धन की नीतियां जमीन पर नहीं उतारी गई। सिंचाई की सुविधाओं को बढाने का व हर खेत को पानी उपलब्ध कराने की नीति बुन्देलखण्ड के लिए नहीं बनायी गयी। नदियों के पानी का दोहन बन्द कराकर उसे सिचाई व बुन्देलखण्ड में पेयजल उपलब्ध कराने के लिए काम नहीं हुआ। फलस्वरूप हमारे बुन्देलखण्ड के पानी से दूसरे गैर बुन्देलखण्ड क्षेत्र की सिचाई की जाती है और हमारे खेत व गले दोनों प्यासे रह जाते हैं। खाद, बीज, पानी, बिजली और क्रेडिट कार्ड पाने में हर स्तर पर किसानों को भ्रष्टाचार व परेशानियों से रूबरू होना पड़ता है।
बुन्देलखण्ड के बदलते प्राकृतिक मिजाज एवं सरकारों की घोर उपेक्षा ने बुन्देली किसानों के जीवन को नरक कर दिया है।

आज समय की मांग है कि बुन्देलखण्ड के किसानों को खुद आगे आकर संघर्ष करना होगा अपनी पीड़ा पर आंसू बहाने से अच्छा होगा कि किसानों को अपने अधिकारों व हकों के लिए लङना होगा। बुन्देलखण्ड के किसानो का खुशहाली का रास्ता बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण से ही प्रशस्त हो सकता है। आज किसानों को खुद के विकास के लिए बुन्देलखण्ड राज्य बनाना होगा।

बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण होने पर बुन्देलखण्ड के किसानों को कर्ज मुक्त कराने का काम किया जायेगा। बुन्देलखण्ड की धरती को पानीदार बनाया जायेगा। कृषि का अच्छा मूल्य दिया जाएगा। सिचाई सुविधाओं, कृषि मंडियों की स्थापना, खाद, बीज, फसल बीमा, फसल रखरखाव का उत्तम प्रबन्ध, आवागमन, तकनीकी कृषि व फसल का उत्तम मूल्य दिलाने का प्रबन्ध नये बुन्देलखण्ड राज्य में होगा। बुन्देलखण्ड की बदहाल कृषि व किसानों के सूरतेहाल को सुधारने के लिए एक बहुत बङे समर्पित प्रयास की जरूरत है ऐसा प्रयास बुन्देलखण्ड राज्य निर्माण होने पर ही संभव है।

जब बुन्देलखण्ड का किसान खुशहाल हो जायेगा तो बुन्देलखण्ड प्रदेश व देश की तरक्की में योगदान करेगा। आज बुन्देलखण्ड के हर वर्ग को आगे आकर बुन्देलखण्ड राज्य बनाकर किसानों को बचाना होगा।

जय जय बुन्देलखण्ड।

लेखक -कुँवर विक्रम प्रताप सिंह तोमर
युवा राष्ट्रीय अध्यक्ष,
बुन्देलखण्ड मुक्ति मोर्चा

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