बुंदेलखंडी कहावतें - Bundelkhandi Kahawatein

बुंदेलखंडी कहावतें (Bundelkhandi Kahawatein)  

 
​अँसुआ न मसुआ, भैंस कैसे नकुआ ॥ 
 
 
अक्कल पै पथरा पर गये ​॥ 
 
 
अकुलायें खेती,सुस्तायें बंज ॥ 
 
 
अकेली हरदसिया, सबरो गाँव रसिया ॥ 
 
 
अकौआ से हाती नईं बंदत ॥ 
 
 
अटकर की फातियाँ पड़बो ॥ 
 
 
अड़ुआ नातो, पड़ुआ गोत ॥ 
 
 
अत कौ भलौ न बोलनो, अत की भली न चुप्प । 
अत कौ भलौ न बरसबो, अत की भली न धुप्प ॥ 
 
 
 
अनबद खैला ॥ 
 
 
अपनी टेक भँजाइ, बलमा की मूँछ कटाई ॥ 
 
 
अपनी मताई से कोऊ भट्टी नईं कत ॥ 
 
 
अपनूईं गावें, अपनूईं बजावें ॥ 
 
 
अंधरन की लोड़ कीताउं लगे ॥ 
 
 
आग लगे तोरी पोथिन मैं । 
जिउ धरौ मोरो रोटिन में ॥ 
 
 
आदमियन में नौआ, और पंछियन में कौवा ॥ 
 
 
आप मियाँ मांगते, दुवार खड़े दरवेश ॥ 
 
 
Courtesy: श्री कृष्णा नन्द गुप्त (गरौठा, झाँसी) 

 

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