(लेख "Article") बुंदेलखंड में मौत की खेती !


बुंदेलखंड में मौत की खेती !


'' पोखर को मैदान बनाया, मरता हुआ किसान बनाया,
शहर बनाए, गांव मिटाए, जंगल और पहाड़ हटाए,
जहर मिले दुकानों में मरना कितना आसान बनाया, ये कैसा हिंदुस्तान बनाया ?''

आप किसान आत्महत्या और सर्वाधिक जल संकट वाले क्षेत्र बुंदेलखंड से रूबरू होंगें।यहां अप्रैल वर्ष 2003 से मार्च 2015 तक 3280 ( करीब चार हजार ) किसान आत्महत्या किए हैं। समय-समय पर इन मुद्दों को किसान आंदोलन, बेमौसम बारिश और ओलों से हलाकान किसान परिवारों ने जिंदा किया है। बुंदेलखंड में फरवरी और मार्च का महीना मौत के मौसम के लिए अनुकूल रहता है। इस बार भी यही हुआ पहले सूखा और फिर हाड़तोड़ मेहनत के बाद तैयार फसल पर ओलों की बारिश इस तरह हुई कि किसान आत्महत्याओं की बयार एक बार फिर बुंदेलखंड में हाहाकार मचा रही है। बीते 2 महीनों में शायद ही कोई दिन ऐसा गया हो जब गांव से निकलती खबर में किसी किसान के आत्महत्या का मामला न आया हो। हां यह अलग बात है कि राज्य और केंद्र की सरकारों ने कभी लिखित रूप में अपनी गर्दन बचाने के लिए यहां किसान आत्महत्या को नहीं माना। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरों के अनुसार वर्ष 2009 में यहां 568, 2010 में 583, 2011 में 519, 2012 में 745, 2013 में 750 और दिसंबर 2014 तक 58 किसान आत्महत्या किए हैं। वहीं वर्ष 2015 अगुवाई ही किसान आत्महत्या के साथ हुई। खबर लिखे जाने तक बुंदेलखंड के 7 जिलों में बीते 3 महीनों में 28 किसान आत्महत्या कर चुके है। मौत की फसल अपनी रफ्तार से पक रही है। लाशों पर आंदोलन और सियासत का माहौल गर्म है मगर उन गांव का हाल जस का तस है जहां संनाटे को चीरती किसान परिवारों की चींखें सिसकियों के साथ हमदर्दी जताने वालों की होड़ में बार-बार शर्मसार होती है। अभी तक बांदा में रबी की फसलों पर 1.70 अरब का बीमा किसानों ने दांव पर लगाया है। जिले की 9 बैंकों ने 39948 किसानों की 51800 हेक्टेयर भूमि का बीमा किया है। बीमा कंपनी मनमने ढंग से सर्वे कर रहीं हैं। अलसी की फसल बीमा से मुक्त रखी गई है। आंकड़ों के मुताबिक बुंदेलखंड में 80.53 फीसदी किसान कर्जदार है। बांदा में कुल बीमा राशि एक अरब 70 करोड़ 90 लाख 62 हजार रुपए है, जिसका प्रीमियम 6 करोड़ 96 लाख 35 हजार 268 रुपए है। अगर इन बैंकों के किसान के्रडिट कार्ड पर किसानों की खेती का क्रेडिट कर्ज में देखा जाए तो 6 अरब रुपए की फसल किसानों ने कर्ज से पैदा की है। जिसे 90 फीसदी मौत के मौसम ने बर्बाद कर दिया है। सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किसानों के लिए मुआवजे की घोषणा करते हुए 200 करोड़ रुपए जारी करने का दावा किया है। तत्कालीन चित्रकूट मंडल आयुक्त पीके सिंह ने जिलाधिकारी बांदा सुरेश कुमार प्रथम के साथ कुछ गांवों में खुद जाकर किसानों के बिगड़े हालात का जायजा लिया। उन्होंने लेखपाल को सख्त हिदायत दी है कि कहीं भी सर्वे करने में लापरवाही न बरती जाए। स्थानीय मीडिया के हल्ले के बाद कुम्भ्करनी नींद से जागी उत्तर प्रदेश की समाजवादी सरकार ने 300 करोड़ रूपये का राहत पॅकेज और 6 अप्रैल को जारी किये जाने का दावा किया है l अब देखना ये है कि बुंदेलखंड समेत प्रदेश के अन्य किसानो को यह फौरी मदद कब तक ,कितनी मिल पाती है ! उधर गांव से छनकर आती हुई खबरें यह भी बताती हैं कि मुख्तयार खाने से जमीनों के नक्शे उड़ा देने वाले लेखपाल किसानों के मुआवजों के लिए सुविधा शुल्क लेने के बाद सर्वे रिपोर्ट लगा रहे है। होली से पहले और होली के बाद तक किसानों की आत्महत्याओं का सिलसिला थमा नहीं। 9 मार्च को जिला जालौन के उरई- आटा थाना के गाँव बम्हौरी निवासी गोटीराम और चमारी गाँव के उमेशपाल ने मौत को गले लगाया। ये मौत की ट्रेन लगातार अपने रफ़्तार से बुन्देलखण्ड में दौड़ रही है |

बुंदेलखंड में कुछ यूँ उलझी किसान की सांसे -

22 मार्च को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी किसानों से मन की बात कर रहे थे और बुंदेलखंड का किसान सियासी प्रवचन से ऊबकर आत्महत्या और आत्मदाह कर रहा था। बानगी के लिए बांदा के पैलानी तहसील के ग्राम नान्दादेव के किसान सिद्ध पाल एवं रामप्रसाद पाल ( सगे भाई ) ने अतिवृष्टि एवं ओलावृष्टि से नष्ट हुई फसल का मुआवजा ना मिलने के चलते मानसिक अवसाद में खुद को बीच चैराहे में आग के हवाले किया था। दोनों का इलाज तिंदवारी विधायक दलजीत सिंह की तरफ से 10 हजार रुपए मदद करने के बाद हो रहा है। हैरत की बात है कि पीड़ित किसान को देखने सरकारी अधिकारी नहीं पहुंचे। इसी क्रम में 22 मार्च को ही बबेरू के बिसंडा क्षेत्र से सिकलोढ़ी गांव में युवा किसान रामनरेश द्विवेदी ने भाई की लाइसेंसी रायफल से खुद को गोली मारकर आत्महत्या कर ली। अफसर और नेताओं की धमाचैकड़ी ने गांव के संनाटे को तोड़ा आत्महत्या से चंद घंटे पहले मृतक किसान को 31 हजार 285 रुपए के बकाए का बिल मिला था। रविवार को दोपहर खेत से मसूर की चैपट फसल देखकर इस किसान ने खुदकुशी कर ली। इस पर 88 हजार रुपए का कर्ज इलाहाबाद यूपी ग्रामीण बैंक पुनाहुर शाखा का बकाया है। इसी तरह 20 मार्च को अतर्रा के महुआ ब्लाक के अनथुआ गांव के 60 वर्षीय किसान रामऔतार कुशवाहा की तबाह फसल के सदमे में दिल का दौरा पड़ने के बाद जिला अस्पताल बांदा में मौत हो गई। यहां यह भी बताते चलें कि देश के प्रधानमंत्री ने उन किसानों को 5 हजार रुपए पेंशन देने की घोषणा शहीद दिवस पर की है जो 60 वर्ष के हो चुके हैं, लेकिन प्रधानमंत्री जी बुंदेलखंड के अधिक्तर किसान तो 60 वर्ष से पहले ही आत्महत्या कर रहे है। प्रवासनामा संवाददाता जब मृतक किसान राम औतार कुशवाहा के घर पहुंचा तो शोक में डूबा परिवार किसान की आत्मा की शांति के लिए गरुण पुराण सुन रहा था। इस किसान की 2 सयानी बेटियां रजनी और विमला ब्याह के लिए बैठी हैं जिनका आसरा उनकी मां सतबंती और भाई की आस पर टिका है। बाँदा के बड़ोखर खुर्द विकासखंड क्षेत्र में केन नदी की तलहटी में बसे करीब एक दर्जन गाँव इस बे-मौसम बारिश की चपेट में आये है। एकलव्य चेतना कृषक क्लब से ताल्लुक रखने वाले छोटापुरवा निवासी सामाजिक कार्यकर्ता इंद्राज मांझी कहते है कि इस दैवीय आपदा की मार से परेशान ग्राम छोटापुरवा,बोधीपुरवा,पहाड़िया,चिलेहटा के बाशिंदों की पूरी सब्जी की बारी उजाड़ चुकी है। इन्ही गाँव की रहवासी ग्रामीण महिला मुन्नी,बिट्टन,जयदेवी,सियादुलारी आदि ने प्रदेश सरकार से खुद को समाजवादी पेंशन से जोड़े जाने की मांग की है।

बुंदेलखंड में इन आत्महत्याओं से किसानो के बच्चे अनाथ हुए ,बेटियों के ब्याह रुके,बेवा पत्नियाँ सामाजिक जीवन से महरूम हुई यहाँ तक की किसान आत्महत्या के लिए किसान की बेटी को बदचलन तक स्थानीय प्रसाशन ने घोषित कर दिया।मूल सवाल ये कि प्राकृतिक रूप में नदी-पहाड़-जंगल से सम्पन्न बुंदेलखंड में ये किसान आत्महत्याए जन्मी क्यों ?

एक तरफ सरकारों ने किसान को सरकारी योजनाओ का मातहत बनाया (मुफ्तखोर)वही दूसरी तरफ यहाँ के जल-जंगल-जमीन को बर्बाद करना शुरू किया। उत्तर प्रदेश के सात जिलो वाले बुंदेलखंड में सर्वाधिक किसान आत्महत्या चित्रकूट मंडल के चार जिले बाँदा,महोबा,हमीरपुर,चित्रकूट में हुई। इसकी ही राह पर यहाँ के झाँसी,जालौन(उरई) बढ़ चले। हाल ही में देश के अन्नदाता किसान की अन्य जगहों के साथ बुंदेलखंड में बे-मौसम बारिश,ओलो से तबाही लिख गई। ये प्राकृतिक आपदा थी माना कि इसमे सरकार का कोई दोष नही था लेकिन जो प्राकृतिक संसाधनों का वर्ष भर दोहन यहाँ केंद्र- राज्य सरकार करवा रही है। भू माफिया और खनन माफिया से तमाम पर्यावरणीय कानून को धता बताकर इससे साबित होता है की सरकारे खुद किसान को आत्महत्या करने पर मजबूर कर रही है। ध्यान रहे लाशो पर शासन नही चला करते. मै आपका सादर ध्यान बुंदेलखंड में किसानो की आत्महत्या के मूल कारण पर केन्द्रित करवा रहा हूँ. इस आशय से कि मेरा- आपका और देश का ये बुंदेलखंड किसान आत्महत्या की कोख न बने।

आत्महत्या को क्यों मजबूर है किसान ?

जमीन के मुद्दे को तो यह कहकर सम्पन्न करना अच्छा होगा कि पर किसी पत्रकार, प्रोफेसर, नेता, वैज्ञानिक, अफसर अथवा उद्योगपति की राय उतना महत्व नहीं रखती, जितना कि खुद उन जमीन मालिकों की, जिनकी चिंता आज मुद्दा बन रही है। किंतुु जहां तक प्रश्न है कि किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है ? मेरी राय में इसके उत्तर में सोचना चाहिए कि आत्महत्यायें विदर्भ और बुनदेलखण्ड जैसे इलाके में क्यों हुई ? यह भी सोचना चाहिए कि गुजरात और राजस्थान जैसे देश के सबसे कम पानी और अनावृष्टि वाले राज्यों में किसानो ने कभी आत्महत्या क्यों नहीं की ?

मेरा अनुभव है कि किसानों द्वारा व्यापक आत्महत्यायें वहीं हुईं, जहां जंगल कटे, खनन की अति हुई, चारा नष्ट हुआ और मवेशी घटे। आत्महत्यायें पूरे बुंदेलखण्ड में नहीं हुई। वहां सिर्फ खनन और वन माफिया का शिकार बने बांदा, महोबा और चित्रकूट मेें ही हुई।

जहां भी पर्याप्त मवेशी और पर्याप्त चारा मौजूद हो, वहां किसानों ने व्यापक आत्महत्यायें के उदाहरण कहीं हो, तो बताइये ? जहां किसान, पहले अपनी घरेलु जरूरत की हर संभव फसल बोने के बाद ही कमर्शियल खेती की सोचता हो, वहां कोई आत्महत्या हुई हो, तो बताइये ?

अन्यत्र हुई आत्महत्यायों के विश्लेषण में जायें, तो कारण कई हैं। उत्तर प्रदेश के लालगंज (रायबरेली) और (मिर्जापुर) में हुई किसानों की मौत तो गंगा एक्सप्रेस वे के दौरान भूमि अधिग्रहण की मनमानी की वजह से ही हुए। आत्महत्याओं का एक कारण किसान को तकनीकी और व्यापारिक रूप से सक्षम बनाये बगैर कर्ज और बाजार आधारित खेती को प्रेरित करना भी है। बाजार के डूबने से भी कई इलाके के किसानों ने आत्महत्यायें की। महाराष्ट्र इसका पुख्ता उदाहरण है। जिस देश में कारण किसान को आलू सङक पर फेकना पङे और गन्ने की फसल जलानी पङे, तो किसान आत्महत्या नहीं करेगा, तो क्या करेगा ? कारण, अतिरिक्त उत्पादन होने पर विपणन, भंडारण और प्रसंस्करण की उचित व्यवस्था व समझ न होना है।

कैसे हो किसान, संरक्षित और सक्षम ?

किसान को आत्महत्या से बचाना है, तो उसकी जमीन, मवेशी और चारे को तो बचाना ही होगा। उसे सक्षम बनाना है, तो पहले उस तक बीज, खाद और तकनीक को वाजिब दाम मे पहुंचाना होगा। भंडारण की पर्यापत व्यवस्था करनी होगी। बाजार की समझ पैदा करनी होगी।

आंकङे बताते हैं कि फल और सब्जियों के मामले में दुनिया का दूसरा सबसे बङा उत्पादक होने के बावजूद, भारत कुपोषित है। यहां कुल उत्पादन की 40 प्रतिशत सब्जियां और फल उपभोक्ता के पास तक पहुंचने से पहले ही सङ अथवा बेकार हो जाते हैं। यह स्थिति उलटनी होगी।

यदि गांवों का औद्योगीकरण ही करना है, तो आज भी शुद्धता और कारीगरी के इलाकाई ब्रांड की तरह ख्याति प्राप्त ग्रामोद्योग क्यों नहीं ? खेती और कारीगरी आधारित ये ब्रांड आज भी बाजार में आकर्षण के केन्द्र है। इसके लिए बाहर से उद्योगपति को गांव आने की जरूरत कहां है ? इस काम के लिए खुद किसानों और कारीगरों को क्यों न सक्षम बनाया जाये ? इसके लिए जमीन का झगङा है ही नहीं।

उद्धाहरण कई हैं-

समूह आधारित सहकारिता को व्यवहार में उतारकर यह किया जा सकता है। भारत में खेती से बागवानी और बागवानी से खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में उतरे किसान समूहों के महाराष्ट्र और शरद पवार का बारामती क्षेत्र, महिलाओं द्वारा खङे किए सेवा बैंक और लिज्जत पापङ तो इसके बङे उदाहरण है। कभी मध्य प्रदेश के जिला रतलाम के एक छोटे से गांव-तितरी को देख आइये। यूं पूरा गांव ही खेती से समृद्धि की कहानी कहता है। खाने वाले अंगूर की खेती से जंगली अंगूर की खेती में आये यहां के मात्र 18 किसानों के समूह द्वारा खङी अम्बी वाइन्स आज विदेशी ब्रांड्स को टक्कर दे रही है। यह गांव आपको बता सकता है कि खेती न छोङने लायक पेशा है और न घाटे वाला।

खेती खुद में एक उद्योग-

सिक्किम में बेबी काॅर्न की खेती और उसकी खरीद तथा प्रसंस्करण हेतु राष्ट्रीय बागवानी मिशन की पहल पर सरकार द्वारा की व्यवस्था को देख आ जाइये, आपको भरोसा हो जायेगा कि खेती, बागवानी, डेयरी, मतस्य आदि अपने आप में एक उद्योग है। इन्हे किसी दूसरे उद्योग के लिए बलिदान करना कम से कम भारत जैसे देश के लिए तो बहुत बङी बेवकूफी होगी। प्रकृति और खेती को विकास का विरोधी मानना भी एक तरह की बेवकूफी ही है।

भूमि अधिग्रहण संशोधनों के विरोध की हकीकत यह है कि यह विरोध न उद्योग का है और न भूमि अधिग्रहण का। विरोध है, जमीन की लूट का, उद्योगपतियों को खेती की जमीन के लालच का। भारत में जिस तरह सरकार के ही बनाये औद्योगिक, पर्यावरणीय मानको तथा कानूनों की परवाह किए बगैर उद्योग चलाये जाते हैं, विरोध इसका है।

आइये, अवरोध दूर करें-

अवरोध दूर करना है और हर चेहरे को खुशी लौटानी है, तो उद्योग और खेती में संतुलन बनाइये। प्रकृति और मानव निर्मित ढांचो में संतुलन बनाइये। आर्थिक विकास को समग्र विकास के करीब ले आइये। यही समाधान है। यह मैं नहीं कह रहा, उन विकसित देशों की अगुवई वाला संयुक्त राष्ट्र संघ जैसा संगठन कह रहा है, जिनका उदाहरण सामने रख भारत सरकार, भारत में भूमि अधिग्रहण संशोधनों की तरफदारी कर रही हैं। अपनी मंजिल, अपनी जरूरत, चाहत, सामथ्र्य और परिस्थितियों को समाने रखकर ही तय करनी चाहिए। अन्य उद्योगों को आगे ले जाने हेतु सरकार तत्पर दिखाई दे रही है, तो फिर अन्नदाता ही क्यों उपेक्षित रहे ? खेती और खेतिहर को अग्रणी होने का मौका देने के लिए भी संकल्प दिखाया जाये। भारत यह करे। हमेशा चलने लायक रास्ता यही है। इसी से मंजिल मिलेगीय वरना् तो भारत विरोधाभासों में ही फंसा रहेगा। यह न सरकार के हक में होगा, न देश के और न देशवासियों के हक में। मोदी जी ने संसद की केंटीन में खाना खाने के बाद देश के किसानों को आशीष दिया - ’’अन्नदाता सुखी भवः’’ जरूरत है कि वह ऐसे इंतजाम करें, ताकि किसान प्रेरित हो सके। कोई कह सके - ’’अन्नदाता अग्रणी भवः’’

By - आशीष सागर / अरुण तिवारी

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