बुन्देलखण्ड से भगवान श्री राम का नाता


बुन्देलखण्ड से भगवान श्री राम का नाता


मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् श्री राम का जितना नाता अयोध्या से है , उतना ही नाता उनका बुंदेलखंड से भी है । बुंदेलखंड की पावन धरा चित्रकूट में उन्होंने अपना वनवास काल बिताया । और दैत्यों के संहार के लिए उन्होंने पन्ना के सारंग धाम में उन्होंने दैत्यों के सर्वनाश के लिए धनुष उठाया था । बुंदेलखंड के ही गोस्वामी तुलसी दास ने राम चरित्र मानस लिख कर उनकी भक्ति की गंगा प्रवाहित कर दी । उसी बुंदेलखंड के छतरपुर शहर से भगवान् श्री राम जन्मोत्सव की परम्परा 2005 से एक अनोखे अंदाज में शुरू हुई । छतरपुर से शुरू हुई ये परम्परा अब सारे बुंदेलखंड इलाके और देश के अनेक इलाकों में फ़ैल गई है | यहाँ एसा लगने लगता है की वास्तव में क्या भगवान् श्री राम फिर से जन्म ले रहे हें , उनके जन्म के बाद लोगों के उत्साह और उम्मंग को देखकर यही लगता है जेसे भगवान् ने ही अवतार ले लिया हो |

चैत्र शुक्ल नवमी का दिन हिन्दू धर्मावलंबियों के लिए एक ख़ास दिन होता है । इसी दिन त्रेता युग में अयोध्या के रघुकुल शिरोमणि महाराज दशरथ एवं महारानी कौशल्या के यहाँ भगवान् श्री राम ने पुत्र के रूप में जन्म लिया था। पुत्र रूप में मर्यादा परुषोत्तम श्रीराम को पाकर माता कौशल्या अभिभूत हो ग‌ईं थी । अयोध्या सहित सारे देश में राम नवमी का ये त्यौहार परम्परागत ढंग से मनाया जाता है ,पर बुंदेलखंड में राम जन्मोत्सव एक अनोखे अंदाज में मनाया जाने लगा है |

भगवान् श्री राम के जन्मोत्सव पर छतरपुर शहर को धार्मिक स्थल की तरह सजाया जाता है| जगह जगह केसरिया पताकाएं लगाईं जाती हें , नगर में वंदन वार बाँधी जाती हें , लाइट की व्यवस्था , जगह जगह श्री राम के कट-आउट लगाए जाते हें , नगर के मुख्य गांधी चौक बाजार में राम दरबार सजाया जाता है | छत्रशाल चौराहा , बस स्टैंड पर विशेष सजवाट की जाती है । इस बार छत्रशाल चौक पर राम भक्त हनुमान का दरबार सजाया गया है । यहां के राम चरित्र मानस मैदान में राम जन्म के बाद जब श्रद्धा से सराबोर लोग केसरिया पताकाएं लेकर निकलते हैं , आगे भगवान् श्री गणेश का रथ चलता है , इसके बाद देवी देवताओं की झांकियां , ठीक वेसे ही जैसे राम जन्म को देखने आये देवताओं आगमन अयोध्या में हुआ था | फर्क इतना था वो त्रेता युग की बात थी और ये कलयुग की बात है जहाँ उनके प्रतीक को ही मान कर मानव माँ संतोष कर लेता है | सारे नगर वासी सड़कों पर निकल कर अपनी ख़ुशी का इजहार करते हें और राम जन्मोत्सव के इस भव्य समारोह में भाग लेते हें | इस समारोह को देखने के लिए अब दूर -दूर से लोग भी आने लगे हें | छतरपुर में यह आयोजन तो पिछले दो सौ सालों से हो रहा था । ., किन्तु पिछले 11 सालों में इसे एक अनोखी भव्यता और दिव्यता मिली , जिसका असर ये हुआ की यह शोभा यात्रा अब छतरपुर नगर वा जिले के कस्बों ,के अलावा ,आसपास के पन्ना ,टीकमगढ़ ,सागर , महोबा सहित बुंदेलखंड इलाकों और उनके कस्बो में में भी इसी भव्यता से निकलने लगी है |

अतीत के पन्नो को यदि पलटा जाए तो छतरपुर में भगवान् श्री राम के जन्मोत्सव को भव्यता एक क्रिया के प्रतिक्रिया के स्वरूप ही मिली थी । 2005 तक राम जन्मोत्सव में जहां लोग आमांत्रण देने के बावजूद नहीं जुड़ते थे वही 2006 में जन्मोत्सव में सारा शहर उमड़ पड़ा । शुरुआत के कुछेक वर्षो तक भगवान् श्री राम की शोभा यात्रा में नोजवान हथियार लेकर भी निकले । हथियारों का यह प्रदर्शन समाचार की सुर्खिया जरूर बने , पर इसमें आयोजन की मंशा और भव्यता दरकिनार होती रही । उन कुछ वर्षो को दिया जाये तो अब भगवान् श्री राम का जन्मोत्सव समारोह एक सांस्कृतिक स्वरुप ले चुका है । जिसमे शोभा यात्रा के साथ निकलने वाली सर्व समाज की झांकिया , लोक कलाकारों की टोलिया एक अलग ही सांस्कृतिक माहौल निर्मित करती हैं । श्री राम सेवा समिति द्वारा इस आयोजन की सम्पूर्ण व्यवस्था बनाई जाती है जिसमे समाज के हर तबके की भागीदारी होती है ।

पिछली रामनवमी पर छतरपुर की इस भव्य शोभा यात्रा को देखने और समझने के लिए बुंदेलखंड के लोगों के अलावा दिल्ली , भोपाल और इंदौर से भी लोग आये थे । वे भी अपने इलाकों में इसी तर्ज पर भगवान् श्री राम का जन्मोत्सव और शोभा यात्रा निकालने की योजना बनाने की चाहत रखते हैं ।

दरअसल बुंदेलखंड इलाका ऋषि मुनियों की तपो भूमि रहा है । चित्रकूट में भगवान् श्री राम , सीता और लक्षण जी ने अपने वनवास काल का अधिकांश समय बिताया था । यहां के कामद गिरी पर्वत की परिक्रमा कर उन्होंने बुंदेलखंड की धरा को पावन किया था । यहां से जब वे आगे बड़े और पन्ना जिले के सारंग पहाड़ इलाके में पहुंचे थे । जिसे अब सारंग धाम कहते हैं यहाँ भगवान् राम ,सीता जी और लक्ष्मण जी से जुडी कई यादे आज भी हैं । यही वो स्थान भी माना जाता है जहां श्री राम ने दैत्यों के संहार के लिए धनुष उठाया था । पन्ना के सलेहा से दस किमी दूर अगस्त ऋषि आश्रम हैं , उनसे मिलने स्वयं श्री राम गए थे । यहां उन्हें ऋषि ने एक धनुष बाण भेंट किया था यही से वे नासिक की ओर गए थे । यहाँ भगवान् श्री राम की वनवासी वेश में एक मात्र दुर्लभ प्रतिमा विद्यमान है । दक्षिण भारतीय लोगों में अगस्त मुनि की अत्याधिक मान्यता के कारण बड़ी संख्या में दक्षिण भारत से लोग इस दुर्गम स्थल तक आते हैं ।

भगवान् श्री राम और के बुंदेलखंड से इसी जुड़ाव को छतरपुर के लोगों ने एक नया आयाम देकर भक्ति की नव गंगा प्रवाहित की है । श्रद्धा और भक्ति की यह निर्मल धारा निरंतर प्रवाहमान बनी रहे इसके लिए श्री राम सेवा समिति और यहां के लोग जतन कर रहे हैं । सरकार राम पथ गमन को पर्यटन में विकशित करने की बात कर रही है ,। छतरपुर के राम जन्मोत्सव के इस आयोजन को भी यदि राम पथ गमन के साथ जोड़ा जाए तो एक बड़ी उपलब्धि होगी ।

BY: रवीन्द्र व्यास

comments powered by Disqus