बुन्देलखण्ड के भीषण सूखे एवं अकाल पर दोहे by 'चेतन' नितिन खरे


बुन्देलखण्ड के भीषण सूखे एवं अकाल पर दोहे by 'चेतन' नितिन खरे


नदी नाल सूखे पड़े, सूखे पनघट ताल ।।
भीषण सूखे ने किया, लोगों को कंगाल ।।

गली ख़ोर सूनी पड़ीं, सूने पड़े मकान ।
सूने सूने खेत सब, सूने सब खलिहान ।।

सूखे ने सबको किया, है इतना मजबूर ।
गाँवों के मालिक बने, शहरों के मज़दूर ।।

कैसे बीतेगा वहाँ, सूखे का ये साल ।
पानी बिन होने लगे, जीव जंतु बेहाल ।।

कहने को तो दे दिए, रुपय आपने लाख ।
काम वहाँ पर अब तलक, दिखा नही है ख़ाक ।।

ऊपर से भेजी गयी, राहत कई करोड़ ।
सम्भव है शायद मिले, अब सूखे का तोड़ ।।

पढ़ा आज अख़बार में, बहुत बड़ा अनुदान ।
पहुँचेगा दिन सात में, दिल्ली से ऐलान ।।

मोदी जी ने तो दिए, दिल्ली से निर्देश ।
सभी किसानों के हरो, फ़ौरन ही सब क्लेश ।।

आप ज़रा अखिलेश जी, राखो इतना ध्यान ।
सूखा राहत राशि को, लूटें ना शैतान ।।

सुने किसानों के वचन, हुए बहुत हम दंग |
लेखपाल कानूनगो, करते उनको तंग ||

नेता जी कैसे करें, उनकी आज तलाश |
गुम होतीं जो फाइलें, जा बाबू के पास ||

अखबारों में हो गये, वह तो मालामाल |
किन्तु मिलेगा कब उन्हें, ये है बड़ा सवाल ||

कवि- 'चेतन' नितिन खरे
सिचौरा, महोबा, बुन्देलखण्ड

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