बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - प्रबन्ध और मुक्तक काव्य की दृष्टि से रासो काव्यों की समीक्षा (Review of Raso Kaviyana in terms of arrangement and liberating poetry)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

प्रबन्ध और मुक्तक काव्य की दृष्टि से रासो काव्यों की समीक्षा (Review of Raso Kaviyana in terms of arrangement and liberating poetry)

श्रव्यकाव्य के अन्तर्गत पद्य को प्रबन्ध और मुक्तक दो भागों में विभाजित किया गया है। प्रबन्ध काव्य को महाकाव्य और खण्ड काव्य दो भागों में बाँटा गया है तथा मुक्तक काव्य के भी पाठ्य और प्रगीत दो भाग किये गये। "प्रबंध में पूर्वां पर का तारतम्य होता है। मुक्तक में इस तारतम्य का अभाव होता है।' प्रबंध में छंद कथानक के साथएक सूत्रता स्थापित करते चलते हैं, तथा छनद अपने स्थान से हटा देने पर कथावस्तु का क्रम टूट जाता है परन्तु मुक्तक काव्य में प्रत्येक छन्द अपने आप में स्वतन्त्र एवं पूर्ण अर्थ व्यक्त करता है। छन्द एक दूसरे के साथ जुड़कर किसी कथानक की रचना नहीं करते। ""मुक्तक छंद पारस्परिक बन्धन से मुक्त होते हैं, वे स्वतः पूर्ण होते हैं।''

महाकाव्य का स्वरुप

महाकाव्य का क्षेत्र विस्तृत होता है। महाकाव्य में जीवन की समग्र रुप से अभिव्यक्ति की जाती है। व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन के साथ-साथ उसमें जातीय जीवन की भी समग्र रुप में अभिव्यक्ति होती है। बाबू गुलाबराय के अनुसार महाकाव्य के शास्रीय लक्षण निम्न प्रकार हैं-

यह सर्गों में बँधा हुआ होता है।

इसमें एक नायक रहता है जो देवता या उत्तम वंश का धीरोदात्त गुणों से समन्वित पुरुष होता है। उसमें एक वंश के बहुत से राजा भी हो सकते हैं जैसे कि रघुवंश में।

शृंगार, वीर और शान्त रसों में से कोई एक रस अंगी रुप से रहता है, नाटक की सब संधियाँ होती हैं।

इसका वृतान्त इतिहास प्रसिद्ध होता है या सज्जनाश्रित।

इसमें मंगलाचरण और वस्तु निर्देश होता है।

कहीं-कहीं दुष्टों की निन्दा और सज्जनों का गुण कीर्तन रहता है जैसे-कि रामचरित मानस में।

एक सर्ग में एक ही छन्द रहता है और अन्त में बदल जाता है। यह नियम शिथिल भी हो सकता है- जैसे कि राम चन्द्रिका में प्रवाह के लिए छद की एकता वांछनीय है। सर्ग के अंत में अगले सर्ग की सूचना रहती है। कम से कम आठ सर्ग होने आवश्यक हैं।

इसमें संध्या, सूयर्, चन्द्रमा, रात्रि प्रदोष, अन्धकार, दिन, प्रातःकाल, मघ्याह्म, आखेट, पर्वत, त्र्तु, वन, समुद्र, संग्राम, यात्रा, अभ्युदय आदि विषयों का वर्णन रहता है।''

खण्ड काव्य का स्वरुप

जीवन की किसी घटना विशेष को लेकर लिखा गया काव्य खण्ड काव्य है। "खण्ड काव्य' शब्द से ही स्पष्ट होता है कि इसमें मानव जीवन की किसी एक ही घटना की प्रधानता रहती है। जिसमें चरित नायक का जीवन सम्पूर्ण रुप में कवि को प्रभावित नहीं करता। कवि चरित नायक के जीवन की किसी सर्वोत्कृष्ट घटना से प्रभावित होकर जीवन के उस खण्ड विशेष का अपने काव्य में पूर्णतया उद्घाटन करता है।

प्रबन्धात्मकता महाकाव्य एवं खण्ड काव्य दोनों में ही रहती है परंतु खण्ड काव्य के कथासूत्र में जीवन की अनेकरुपता नहीं होती। इसलिए इसका कथानक कहानी की भाँति शीघ्रतापूर्वक अन्त की ओर जाता है। महाकाव्य प्रमुख कथा केसाथ अन्य अनेक प्रासंगिक कथायें भी जुड़ी रहती हैं इसलिए इसका कथानक उपन्यास की भाँति धीरे-धीरे फलागम की ओर अग्रसर होता है। खण्डाकाव्य में केवल एक प्रमुख कथा रहती है, प्रासंगिक कथाओं को इसमें स्थान नहीं मिलने पाता है।

ऊपर महाकाव्य और खण्डकाव्य के स्वरुप का विवेचन किया गया। इसके आधार पर जब हम विवेच्य रासो काव्यों को परखते हैं तो इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि ये सभी रासो काव्य खण्ड काव्य हैं। सभी रासो ग्रन्थों की कथावस्तु की समीक्षा खण्डकाव्य के आधार पर आगे की जा रही है।

६दलपति राव रायसा' में दतिया नरेश दलपतिराव के किशारोवस्था से लेकर मृत्यु तक के जीवन काल का वर्णन है। दलपतिराव ने मुगलों के अधीन रहकर मुगल शासकों का पक्ष लेकर युद्ध किए हैं इसलिए दपलतिराव रायसा का कथानक दो कथा सूत्रों के साथ जुड़ा हुआ है। एक प्रमुख कथा काव्य नाकय "दलपति राव' के जीवन से सम्बन्धित है। दूसरी कथा मुगल शासकों के घ्ज्ञराने से सम्बन्धित है। कवि का प्रमुख उद्देश्य महाराज दलपति राव की वरी उपलब्धियों का वण्रन करना रहा है। "दलपति राव रायसा' में बीजापुर, गोलकुण्डा, अदौनी, जिन्जी तथा जाजऊ आदि स्थानों पर हुए युद्धों का वर्णन किया गया है। अलग-अलग घटनायें किसी निश्चित कथनक का निर्माण भले ही न करती हों, परनतु इससे कवि के उद्देश्य की पूर्ति अवश्य हुई है। कवि का एकमात्र उद्देश्य दलपतिराव के जीवन काल की सभी प्रमुख युद्ध की घटनाओं का वर्णन करना था, इसलिये किसी एक कथासूत्र का गठन नहीं हो सका। फिर दलपतिराव मुगल सत्ता के अधीन थे, अतः जहां जहां मुगल सेना के अभियान हुए, वहां वहां दलपति राव को युद्ध करने के लिये जाना पड़ा था, इस कारण भी घअना बहुलता स्वाभाविक है।

"दलपति राव रायसा' एक ६खण्ड काव्य' है। महाकाव्य की तरह न तो यह सर्गबद्ध है और न संध्या, सूर्य चन्द्रमा, रात्रि, प्रदोष, अन्धकार, दिन, प्रातः काल, मध्याह्म, आखेट, पर्वत, ॠतु, वन, समुद्र, संग्राम, यात्रा, अभ्युदय आदि विषयों का वर्णन ही किया गया है। पर इसका नायक क्षत्रीय कुलोद्भूत धीरोदात्त है। "दलपति राव रायसा' की कथावस्तु इतिहास प्रसिद्ध है। इसमें दलपति राव रायसा' की कथावस्तु इतिहास प्रस्द्धि है। इसमें दलपति राव के सम्पूर्ण जीवन का वर्णन न होकर केवल कुछ घटनाओं का ही वण्रन है इसलिये "दलपति राव रायसा'एक खण्ड काव्य रचना है। इसमें अनेक घटनाओं के जुड़े रहते हुए भी प्रबन्धात्मकता का निर्वाह किया गया है। पर यह अवश्य है कि वस्तुओं और नामों तथा जातियों लम्बी-लम्बी सूचियाँ उपस्थित कर कवि ने कुछ स्थलों पर प्रबन्ध प्रवाह में शिथिलता उपस्थित कर दी है।

प्रारम्भ से अन्त तक के सभी युद्धों में विजय श्री दलपतिराब के साथ ही लगी है चाहे दलपति राव ने युद्ध अपने पिता शुभकर्ण के साथ दक्षिण में किशोरावस्था में हीं क्यों न लड़ा हो-"लरौ सुदख्खिन देस में, प्रथम दूध के दनत' रायसे में कई स्थानों पर कवि ने दलपति राव के विजय प्रापत करने का उल्लेख इस प्रकार किया है-

"तहाँ सूर दलपत सुजित्यै'
अ    अ
"जीत सूद दलपत अकेलों।'
अ    अ
"जितौ श्री दलपत सुसूरं।'

जाजऊ का अन्तिम युद्ध शाह आलम, बहादुरशाह और आजमशाह के मध्य लडद्या गया उत्तराधिकार का युद्ध था, जिसमें दलपति राव ने आजमशाह का पक्ष लेकर युद्ध किया था। इसी युद्ध में इन्हें एक घातक घाव लगा तथा श्रीहरि मोहनलाल श्रीवास्तव के लेखानुसार कुछ समय पीछे इनका देहावसान हुआ। परन्तु रायसे के द्वारा इस बात की पुष्टि नहीं होती। रायसे में दलपति राव का वीरगति प्राप्त करना ही लिखा है। कवि द्वारा दिये गये प्रमाण इस प्रकार है-

"आंगे आजम साह के कटौं दल्लपत रावा'
अ    अ    अ
"राउ कटौ सुन खेत मैं सकल प्रजा बिलखाया'
अ    अ    अ
"जाजमऊ कुरखेत में, तिहि दिन कट नृप नाथा'

जाजऊ में ही दलपति राव की दाहक्रिया आदि भी की गई थी। रायसे के अनुसार इसका विवरण इस प्रकार हे-

"चल जाजमऊ मध्य सु आय सब्#े,
जहं चंदन वेस चिता रचियं।।'
तथा-
"कटै राव के संग जै, और सबै सामंत।
उत्तम चिताबनाय कै, दीनै दाह तुरन्त।।'

अत- यह स्पष्ट है कि जाजऊ की लड़ाई में दलपति राव को वीरगति प्राप्त हुई थी।

उपर्युक्त विवरण के अनुसार "दलपतिराव रायसा' प्रबन्धात्मकता से युक्त एक खण्डकाव्य रचना है।

""करहिया कौ रायसौ'' गुलाब कवि की छोटी सी खण्डकाव्य कृति है।

इसमें कवि ने अपने आश्रयदाता करहिया के पमारो और भरतपुराधीर जवाहर सिंह के मध्य हुए एक युद्ध का वर्णन किया है। डॉ. टीकमसिंह ने ""करहिया कौ रायसौ'' को खण्ड काव्य बतलाते हुए निम्न प्रकार अपना मत व्यक्त किया है- ""गुलाब कवि के "करहिया कौ रायसौ' नामक छोटे से खण्डकाव्य में करहिया-प्रदेश के परमारों का वर्णन करने से युद्ध के उत्तम वर्णन के तो काव्य में दर्शन हो जाते हैं, पर इससे कथानक की गति मंद अवश्य पड़ गई है।' यद्यपि गुलाब कवि को प्रबन्ध निबार्ह में सफलता प्राप्त हुई है तथापि परम्परा युक्त वर्णनों के मोह में पड़कर इन्होंने नामों आदि का बार-बार उललेख कर कथा प्रवाह में बाधा उपस्थिति की है। ""करहिया कौ रायसा'' का कथानक बहुत छोटा है। सरस्वती और गणेश की स्तुति के पश्चात् कवि ने आश्रयदाताओं की प्रशंसा की है तथा इसके पश्चात द्ध का वर्णन किया है, जिसमें अतिशयोक्तिपूवर्ंक करहिया के पमारों की विजय का वर्णन किया है। इसमें केवल एक ही मुख्य कथा ऐतिहासिक घटना प्रधान है। प्रांगिक कथा को कहीं स्थान नहीं मिलने पाया है। सूक्ष्म कथानक के कारण कथावस्तु वेगपूर्वक अन्विति की ओर अग्रसर होती हुई समाप्त होती है।

""शत्रुजीत रायसा'' में महाराजा शत्रुजीत सिंह के जीवन की एक अंतिम महत्वपूर्ण घटना का चित्रण किया गया है। घटना विशेष का ही उद्घाटन करने के फलस्वरुप ""शत्रुजीत रायसा'' एक खण्डकाव्य रचना है। ""शत्रुजीत रासौ'' की घटना यद्यपि छोटी ही है, परन्तु कवि के वर्णन विशदता के द्वारा एक लम्बे चौड़ कथानक की सृष्टि कर दी है।

महाराजा शत्रुजीतसिंह क्षत्रिय कुलोत्पन्न धीरोदात्त नायक है। शत्रुजीत रायसा का कथानक इतिहास प्रसिद्ध घअना पर आधारित है। रायसे में सर्ग विभाजन नहीं किया गया है। जल्दी जल्दी छन्द परिवर्तन द्वारा कवि ने सरसता और प्रवाह को पुष्ट किया है। शत्रुजीत रायसेमें कवि का लक्ष्य महाराजा शत्रुजीतसिंह की विजय का वर्णन करना है। ग्वालियर नरेश महादजी सिंधिया की विधवा बाइयों को महाराज शत्रुजीत सिंह ने सेंवढ़ा के किले में आश्रय दिया था, जिससे रुष्ट होकर सिंधिया महाराजा दौलतराव ने शत्रुजीतसिंह पर आक्रमण करने के लिये अंबाजी इंगले के नेतृत्व में एक विशाल सेना भेजी थी, पहली ही मुठभेड़ में अम्बाजी ने दतिया नदेश के बल वैभाव की थाह लेली और ग्वालियर नरेश के पास और अधिक सेना भेजने हेतु सूचना पहुँचाई। सहायतार्थ फ्रान्सीसी सेना नायक पीरु सहित चार पल्टनें भेजी गई। दूसरी बार की मुठभेड़ में भयंकर युद्ध के पश्चात अनिर्णीत ही युद्ध रोकर दोनों पक्षों ने अपनी अगली योजनाओं पर विचार किया। यहाँ महाराज शत्रुजीत सिंह की विजय का लक्ष्य ""प्राप्त्याशा'' में संदिग्ध हो गया। दतिया नरेश की सेना के जग्गो, लकवा तथा खींची दुरजन साल ने सम्मिलित रुप में मोर्चा जमाया। उधर पीरु ने चार पल्टनों सात सौ तुर्क सवार तथा पाँच हजार अन्य सेना के साथ कूचकर चम्बल पार कर भिण्ड होते हुए इन्दुरखी नामक स्थान पर डेरा डाला। अम्बाजी इंगलें तथा पीरु की सम्मिलित सेना का सामना करने के लिये महाराजा शत्रुजीत स्वयं तैयार हुये परन्तु उनके सलाहकारों ने युद्ध का उनके लिए यह उचित अवसर न बताकर उन्हें युद्ध में जाने से रोक दिया। यहाँ शत्रुजीत रासो के कथानक में चौथा मोड़ है। महाराजा शत्रुजीत की विजय योजना में फिर एक व्याधात उत्पन्न हो गया। युद्धस्थल में ही विश्राम, शौच, स्नान, ध्यान, पूजापाठ आदि की क्रियाओं के द्वारा युद्ध की योजनाओं को बिलम्बित किया गया है। पीरु ने सिंध नदी के किनारे बरा गिरवासा ग्राम के कछार में मोर्चा जमाया तथा यहीं पर महाराजा शत्रुजीत सिंह से निणा#्रयक युद्ध हुआ। महाराजा शत्रुजीत सिंह विजयी तो हुए परंतु घातक घाव लगने से उनकी मृत्यु हो गई थी।

उपर्युक्त विवरण से ""शत्रुजीत रासौ'' की प्रबंधात्मकता पर अच्दा प्रकाश पड़ता है। कवि को कथासूत्र के निर्वाह में पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई है।

"श्रीधर' कवि का "पारीछत रायसा' एक प्रबंध रचना है। इसके नायक दतिया नरेश पारीछत हैं। इस रायसे में एक छोटी सी घटना पर आधारित युद्ध का वर्णन किया गया है। दतिया नरेश के आश्रित कवि ने अपने चरितनायक के बल वैभव और वीरता का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन किया है। महाराज पारीछत उच्च क्षत्रिय कुल में उत्पन्न धीरोदात्त नायक है।

"पारीछत रायसा'' के कथानक में दतिया और टीकमगढ़ राज्यों के सीमावर्ती गाँ बाघाअ में हुए युद्ध की एक घटना वर्णित है। युद्ध की घटना साधारण ही थी, परन्तु कवि ने कुछ बढ़ा चढ़ा कर वर्णन किया है। श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव के अनुसार-"श्रीधर के इस "पारीछत रायसा' में नरेश के सम्पूर्ण शासनकाल का चित्र तो नहीं है- उनके शासन-काल की एक महत्वपूर्ण घटना बाघाइट का घेरा कुछ विस्तार से वर्णित हुई है।' इस प्रकार "पारीछत रायसा' एक खण्ड काव्य है। टीकमगढ़ राज्य की ओर से बाघाइट के प्रबन्धक दीवान गन्धर्वसिंह ने गर्वपूर्वक दतिया राज्य के सीमावर्ती ग्राम पुतरी खेरा में आग लगवा दी थी और तरीचर गाँव टीकमगढ़ राज्य में मिला लिया, जो दतिया राज्य का एक गाँव थाफ महाराज पादीछत को इसकी सूचना मिलने पर उन्होंने दीवान दिलीपसिंह के नेतृत्व में एक सेना गन्धर्व सिंह को दण्ड देने के लिये भेजी। दतिया की सेना उनाव, बड़े गाँव आदि स्थानों पर पड़ाव करती हुई बेतवा को नौहट घाट पर पारकर बाघाइट के समीप पहुँची। दोनों ओर की सेनाओं में एक हल्की सी मुठभेड़ हुई फिर एक जोरादार आक्रमण में दतिया की सेना ने दीवान गन्धर्व सिंह की सेना की पराजित किया। बाघाइट में आग लगा दी गई विजय श्री महाराज पारीछत को प्रापत हुई। कथानक के प्रवाह में सर्वत्र सरल गतिमयता तो दिखाई देती है, परन्तु सरदारों के नामों और जातियों की लम्बी-लम्बी सूचियाँ प्रस्तुत करके कवि ने कथा प्रवाह में बाधा उत्पन्न की है। फिर भी कहा जा सकता है कि श्रीधर को प्रबन्ध निर्वा में पर्यापत सफलता मिली है। इस रायसे के कथानक को सर्गों में विभाजित नहीं किया गया। काव्य नायकके जीवन काल की किसी घटना विशेष का चित्रण हीहोने के कारण ऐसे काव्य आकार में इतने संक्षिप्त होते हैं, जितना कि किसी महाकाव्य का एक सर्गा अतः उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि "श्रीधर' कवि द्वारा लिखित "पादीछत रायसा' प्रबंध प्रवाह से युक्त एक खण्डकाव्य रचना है।

""बाघाइट कौ राइसौ'' में भी दतिया और टीकमगढ़ राज्यों के सीमा विवाद की घटना पर ही आधारित एक संक्षिप्त सा कथनक है। श्रीधर कवि का पारीछत रायसा एवं प्रधान आनन्द सिंह का ""बाघाइट कौ राइसौ'' एक ही घटना और पात्रों पर लिखे गये दो अलग-अलग काव्य हैं। इन दोनों ग्रन्थों में मूलतः एक ही कथानक समाहित होते हुए भी वर्णन की दृष्टि से पर्यापत अन्तर है। बाघाइट को राइसौ के वर्णन बिल्कुल सीधे सादे अतिशयोक्ति रहित हैं। कवि दरबारी चाटुकारिता से अल्प प्रभावित दिखलाई पड़ता है। श्रीधर विशुद्ध प्रशंसा काव्य लिखने वाले, धन, मान, मर्यादा के चाहने वाले राज्याश्रित कवि थे, संभवतः इसी कारण ""पारीछत रायसा'' के सभी वर्णन अतिशयोक्ति से पूर्ण है। गन्धर्वसिंह दीवान, गनेश तथा महेन्द्र महाराजा विक्रमजीत सिंह के परामर्श का विवरण वाघाइट कौ राइसो में कुछ छन्दों में लिखागया है, जबकि पारीछत रायसा में लगभग तीन पृष्ठ में यह बात कही गई है। प्रधान आनन्द सिंह ने मंगलाचरण के पश्चात केवल यह लिखकर आगे की घटना की सूचना दे दी है-"श्री महेन्द्र महाराज ने तरीचर लैबे कौ मनसूबा करौ' इसी बात को पारीछत रायसा में यह साफ लिखा गया है कि दतिया नरेश ने सदैव ओरछा के महेन्द्र महाराज की रक्षा की तथा-"" रज राजतिलक महाराज नें हमको यह उनही दियव।'' अर्थात् दतिया महाराज ने ही विक्रमाजीतसिंह को राजतिलक किया थ। इसी कारण ओरछा नरेश महाराज पारीछत को सम्मान की दृष्टि से देखते थे। दीवान गन्धर्वसिंह के द्वारा पुतरी खेरा ग्राम में आग लगा दी गई तथा तरीचर ग्राम को अपने अधिकार में कर लिया गया था। लल्ला दौवा नाम के प्रबन्धक ने दतिया नरेश के पास इस घटना की सूचना भेजी, जिसके परिणामस्वरुप दतिया नरेश ने बाघाइट को उजाड़ने तथा दीवान गन्धर्व सिंह को दण्ड देने के लिए सेना भेजी। पारीछत रायसा में सैनिकों के सजने एवं सेना प्रयाण का बहुत विस्तृत और अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन है, किंतु बाघाइट कौ राइसौ में सेना तथा युद्ध के सामान का साधारण सा वर्णन किया गया है। सेना के प्रस्थान एवं पड़ाव के स्थानों की केवल सूचना भर कवि ने दे दी है। जबकि पारीछत रायसा में उनाव, बड़े गाँव, नौहट घाट आदि पर सेना के पड़ाव के साथ-साथ (उनाव में) दीवान दिलीप सिंह के स्नान, पूजा, शिकार आदि का भी विस्तृत वर्णन किया गया है।

""बाघाइट कौ राइसौ'' में युद्ध की मारकाट का बहुत सूक्ष्म और साधारण वर्णन किया गया है। कवि ने घटनाओं की संक्षेप में सूचना देते हुए कथानक को समाप्त किया है। अतः स्पष्ट है कि महाराज पारीछत के जीवन की घटना विशेष पर आधारित ""बाघाइट कौ राइसौ'' एक खण्ड काव्य है।

जिस प्रकार "पादीछत रायसा' और "बाघाइट कौ राइसौ' एक ही घटना पर लिखे गये दो काव्य हैं, ठीक उसी प्रकार प्रधान कल्याण सिंह कुड़राकृत "झाँसी कौ राइसौ' तथा मदन मोहन द्विवेदी "मदनेश' कृत "लक्ष्मीबाई रासो की कथावसतु एक ही चरित नायक के जीवन पर लिखे गये दो भिन्न भिन्न काव्य हैं।

वीर काव्यों का नायक किसी स्री पात्र का होना एक विलक्षण सी बात है। पर महारानी लक्ष्मीबाई के चरित्र में वे सभी विशेषतायें थीं, जो एक वीर योद्धा केलिए अपेक्षित थीं। प्रधान कलयाण सिंह कुड़रा तथा "मदनेश' जी द्वारा लिखे गए दोनों रायसे प्रबन्ध परम्परा में आतें हैं। दोनों में ही रानी लक्ष्मीबाई के जीवन की कुछ प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया गया है। अत- ये काव्य ग्रंथ खंड काव्य की कोटि के हैं। कल्याण सिंह कुड़रा कृत "झाँसी कौ रायसौ'' को श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने साहित्यिक प्रबंध बतलाया है। परंतु प्रधान कल्याण सिंह को प्रबन्ध निर्वाह में विशेष सफलता प्राप्त नहीं हुई, क्योंकि ग्रन्थारंभ में इन्होंने पहले गणेश सरस्वती आदि की वंदना के पश्चात् अंग्रेजों के विरुद्ध क्रान्ति की सूचना संकेतात्मक ढंग से दी है और इसको यहीं छोड़कर झाँसी की रानी और नत्थे खाँ प्रसंग समाप्त होता है, वहाँ से फिर कथा सूत्र में विचिछन्नता आ गई है। कवि ने झाँसी, कालपी, कांच तथा ग्वालियर के युद्धों में संक्षिप्त वर्णन प्रस्तुत किये हैं। इन सबकों पढ़कर ऐसा प्रतीत होता है कि कवि द्वारा इस ग्रंथ की रचना टुकड़ों में की गई है। इसी कारण कथा प्रवाह में एक सूत्रता नहीं रहने पाई। फिर भी "झाँसी कौ राइसौ' का कथानक इतिहास प्रसिद्ध घटना पर अधारित है और इसमें यथा समभव प्रबन्ध निर्वा का प्रयास किया गया है।

"मदनेश' कृत 'लक्ष्मीबाई रासो' की कथा को सर्गो में विभाजित किया गया है। इसके प्रारम्भ के आठ सर्ग ही उपलब्ध हैं, जिनमें झाँसी की रानी लक्ष्मी बाई तथा नत्थे खाँ के साथ हुए हुए युद्धों का ही वर्णन किया गया है। इस ग्रन्थ में वीरों, हथियारों, घोड़े, त्यौंहारों, सेना, राजसी वैभव आदि के विस्तृत वर्णन के साथ ही साथ युद्ध की घटनाओं का भी अत्यन्त रोमांचकारी और विशद वर्णन के साथ ही साथ युद्ध की घटनाओं का भी अत्यन्त रोमांचकारी और विशद वर्णन किया है। "मदनेश' जी की घटनाओं के संयोजन और प्रबन्ध निर्वाह में पर्याप्त सफलता प्राप्त हुई है, परन्तु कतिपय स्थानों पर वीरों, हथियारों, जातियों आदि की लम्बी-लम्बी सूचियाँ गिनाने की परम्परा का अनुकरण करके इन्होंने कथ प्रवाह में शिथिलता भी उत्पन्न की है। कुल मिलकार "लक्ष्मीबाई रासौ एक खण्ड काव्य है।
"पारीछत कौ कटक' कुछ कविताओं के रुप में और कुछ फुटकर छंदों के रुप में उपलब्घ हुआ है, जिनमें एक सूक्ष्म सा कथानक टुकड़ों में उपलब्ध होता है। कवि का उद्देश्य किसी कथानक की रचना का नहीं रहा होगा वरन् महाराज पारीछत की सेना, हाथियों आदि का वर्णन करना ही होगा। इसी प्रकार भग्गी दाऊजू "श्याम' द्वारा रचित "झाँसी कौ कटक' कफछ गीतों की एक खण्ड रचना है जिसमें महारानी लक्ष्मीबाई और उनके प्रमुख सरदारों के शौर्य की प्रशंसा तथा नत्थे खाँ के पक्ष के सैनिकों की हीनता का वर्णन किया गया है। "भिलसांय कौ कटक' अपेक्षाकृत कुछ बड़ी रचना है तथा इसमें प्रबन्धात्मकता का निर्वाह किया गया है। इस काव्य ग्रंथ में अजयगढ़ राज्य के दीवान केशरीसिंह और बाघेल वीर रणमत सिंह के मध्य हुए कुटरे के मैदान के एक युद्ध की घटा का वर्णन किया गया है।

छछूंदर रायसा ", "गाडर रायसा' और "घूस रायसा' में कथा प्रवाह है। "छछूंदर रायसा' बहुत छोटी रचना है, फिर भी इससे एक छोटे से कि कथानक का निर्माण होता है।, "गाडर रायसा" और "घूस रायसा' दोनों में ही कथा योजना सुन्दर की गई है। तीनो हास्य रायसे प्रबन्ध रचनाओं की कोटि मं आते हैं। आकार की दृष्टि से छोटे होते हुए भी व्यंग्य की दृष्टि से ये हास्य रायसे बहुत महत्वपूर्ण हैं।

उपयुक्त विवरण के अनुसार यह कहा जा सकता है कि विवेच्य रासो काव्य मूलत- प्रबन्ध रचनायें हैं। इनके कथानक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के आधार पर चुने गये हैं।

 

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Courtesy: इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र

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