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(E-BOOK) Pattern of rural employment in Bundelkhand Region

(E-BOOK) Pattern of rural employment in Bundelkhand Region

Title : Pattern of rural employment in Bundelkhand Region

Research Author : Agarwal, Pushpa

Language : English

Contents :

CONTENTS
Certificate I
Perface II
Acknowledgement IV
List of Tables VII
Contents XIII
Map  
Chapter I  
Economic and Social Profile of Jhansi 1
Chapter II  
Review of Employement Programme in Five Year Plans. 42
Chapter III  
Methodology of Study. 77
Chapter IV  
Economic Conditions of Rural Labour. 95
Chapter V  
Existing Pattern of Employment in Rural Sector. 172
Chapter VI  
legislative Provisions for Agricultural Labour. 217
Chapter VII  
Organising the Agricultural workers. 245
Chapter VIII  
Summary and Conclusions. 265
Appendices  
1.List of Villages 273
2.Questionnaire 277
3.Bibliography 282


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(E-BOOK) बुंदेलखंड के दुर्ग एक एतिहासिक अध्ययन, Forts of Bundelkhand : A Historical Study

(E-BOOK) बुंदेलखंड के दुर्ग : एक एतिहासिक अध्ययन, Forts of Bundelkhand : A Historical Study

Title : Forts of Bundelkhand : A Historical Study

Research Author : Ramsajivan

Language : Hindi

Contents (अनुक्रमणिका):

अध्याय शीर्षक पृष्ठ संख्या
प्रथम बुन्देलखण्ड़ का संक्षिप्त परिचय एंव उनसे जुड़ी राजनीतिक घटनाये 1-132
दूसरा बुन्देलखण्ड की केन्द्रीय प्रशासनिक एंव सुरक्षा व्यवस्था में दुर्गो का महत्व 133-268
तृतीय दुर्गो में उपलब्ध वास्तुशिल्प का वर्गीकरण और विश्लेषण 269-300
चतुर्थ बुन्देलखण्ड़ के महत्वपूर्ण दुर्ग 301-358
पंचम उपसंहार  359-384
  ग्रन्थ सूची 385-394


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महाराजा छत्रसाल मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (Maharaja Chhatrasal Memorial Research Institute)

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महाराजा छत्रसाल मेमोरियल रिसर्च इंस्टीट्यूट (Maharaja Chhatrasal Memorial Research Institute)

 प्राचीन सनातन परंपरा "परहित सरस धर्म नहीं भाई" का अनुसरण करते हुए भारत मे कभी भी महापुरुषों द्वारा किसी भी महान कार्य का श्रेय लेने की परंपरा नहीं रही । यही कारण है कि भारत मे इतिहास लिखने की परंपरा भी बहुत प्राचीन नहीं है । इसी वजह

बुन्देली भाषा शब्दाबली का संग्रह - Bundeli Language Vocabulary Collection

बुन्देली भाषा शब्दाबली का संग्रह - Bundeli Language Vocabulary Collection

बुन्देली शब्दाबली का संग्रह: शब्दकोश बनाने हेतु एक प्रयास :

Drought Triggers Large-Scale Migration In MP Bundelkhand (Via HT)

Drought Triggers Large-Scale Migration In MP Bundelkhand (Via HT)

Drought in Madhya Pradesh’s Bundelkhand has triggered large scale migration as rabi sowing has come down by almost half this year and there is not enough employment opportunities available locally.

Half of the 18 districts in Madhya Pradesh that are reeling under a drought because of weak a monsoon are located in Bundelkhand, where deputy director agriculture AK Nema said rabi sowing was 50 to 60% less in main districts --- Chhatarpur and Tikamgarh districts --- as compared to last year.

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - परिशिष्ट प्रमुख संदर्भ-ग्रंथ (Parishisht Pramukh Sandarbh Granth)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

परिशिष्ट प्रमुख संदर्भ-ग्रंथ (Parishisht Pramukh Sandarbh Granth)

इतिहास-ग्रंथ (हस्तलिखित)

आल्हा, शिवराम सिंह और जयसिंह अल्हैतों का पाठ
आल्हा, शिवदयाल कमरिया 'शिबू दा', र. का. 19वीं शती का अंतिम चरण
कजरियन कौ मंगादा, संक. रामस्वरूप योगी शास्त्री, पारम्परिक
कजरियन कौ राछरौ, संक. एवं सम्पा. नर्मदाप्रसाद गुप्त, चंदेलकाल
कारसदेव की गाथा, संक. एवं सम्पा. नर्मदाप्रसाद गुप्त, चंदेलकाल
छत्रप्रकास, लाल कवि, छतरपुर, पन्ना की प्रतियाँ, र. का. 1710-21 ई.
छत्रसाल कौ कटक, दान कवि, लिपि-काल, सं. 1875 बि.
जगतराज की दिग्विजय, द्विज हरिकेश, 1722-23 ई.
नीति-निधान, मान कवि, र. का. 1792-1800 ई.
पारीछत कौ कटक, द्विज किशोर, 1842-50 ई., लिपिकाल सं. 1971 वि.
बीर विलास, ज्ञानी जू, र. का. सं. 1758 वि.
बुंदेली लोकगाथाएँ, संक. नर्मदाप्रसाद गुप्त
महोबा रासो, अज्ञात्, कबरई-महोबा-कुलपहाड़ की प्रतियाँ, 1526-40र्इ .
सैरे गीत, संक. रामस्वरूप योगी शास्त्री, पारम्परिक
हरदौल चरित, लाला गणेशप्रसाद, र. का. 1860 ई.
हरदौल जू कौ ख्याल, दसानन्द, 1904 ई.
हरदौल चरित्र, बिहाली लाल, र. का. 1758 ई.

लोकप्रमाण (हस्तलिखित)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - लोकसंस्कृति का व्यापीकरण (Lok Sanskrti ka Vyapeekaran)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

लोकसंस्कृति का व्यापीकरण (Lok Sanskrti ka Vyapeekaran)

लोकसंस्कृति पर कुछ कहने से पहले यह तथ्य ध्यान में रखना जरूरी है कि लोकसंस्कृति एक गम्भीर  िवषय है, क्योंकि वह लोक की अनेक समस्याओं से संबंधित होने से लोक के महत्त्व का है, और कम-से-कम एक लोकतंत्र में उसके प्रति हल्की-फुल्की मुद्रा का कोई औचित्य नहीं है। अक्सर लोकगीतों के आधार पर लोकसंस्कृति के रूप का निर्धारण कर लिया जाता है और कालविशेष की चेतना या किसी भी ऐतिहासिक क्रमबद्धता को अनदेखा करना उचित-सा समझा जाता है। एक लोकगाथा या लोकगीत इस्लाम-युग के पूर्व का है, एक मुगल युग का और एक अंग्रेजों के समय का, तीनों को
एक साथ लेकर लोकादर्शों, रीति-रिवाजों आदि की चर्चा, अभिव्यक्ति की एक सामान्य प्रणाली बन गयी है। इस तरह अब तक लोकसंस्कृति के स्थिर रूपों की कल्पना की गयी है, जिससे किसी भी युग की लोकसंस्कृति का सही रूप प्रकाश में नहीं आ पाया। फल यह हुआ कि न तो लोकसंस्कृति के ऐतिहासिक अनुशीलन का प्रयत्न हुआ और न ही उसकी शक्ति या प्रभाव की प्रामाणिक समीक्षा हो सकी।

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - लोकसंस्कृति का वर्तमान (Lok Sanskirti ka Vartmaan)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

लोकसंस्कृति का वर्तमान (Lok Sanskirti ka Vartmaan)

वर्तमान समाज में लोकमूल्यों और लोकाचारों का संक्रमण कुछ तेजी से हो रहा है। एक तरफ भौतिक मूल्य हावी हो रहे हैं, तो दूसरी तरफ विज्ञानी बौद्धिकता। भौतिकता के प्रभाव की वजह से आध्यात्मिकत ा, नैतिकता और हार्दिकता का महत्त्व कम हुआ है। धर्म, खासतौर से कर्मकाण्डी धर्म से चिपटी संस्कृति के लिए अनास्था का भाव काफी पेला है। इसी वजह से पूजापाठ से जुड़ी लोकसंस्कृति उपेक्षा की शिकार होने लगी है। विज्ञानी विवेक ने उन्हीं भौतिक या लौकिक मूल्यों को स्वीकारा है, जो कसौटी पर खरे उतरे हैं। इसलिए अंधवि·ाासों और अनुपयोगी घिसेपिटे आदर्शों का पानी

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - एक ऐतिहासिक बुढ़वामंगल (Ek Aitihasik Budhava Mangal)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

एक ऐतिहासिक बुढ़वामंगल (Ek Aitihasik Budhava Mangal)

सबरे राजा जुरे चरखारी, बुढ़वा मंगल कीन।
पुन सब बैठ जाय गढ़ियन में, पारीछत को मुहरा दीन।।

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - इतिहास और लोकसाक्ष्य (Itihaas Aur Lok Sakshya)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

इतिहास और लोक साक्ष्य (Itihaas Aur Lok Sakshya)

किसी भी अंचल या जनपद का इतिहास उसके निवासियों का इतिहास होता है, उस पर शासन करने वाले राजाओं- महाराजाओं या नवाबों का नहीं। इतिहासकार द्वारा राजा-महाराजा के युद्धों, विदेशी संबंधों, राज्य में किये गये कार्यों, निर्माणों और सुधारों का क्रमबद्ध वर्णन महत्त्वपूर्ण समझा जाता था और उससे ही एक विशिष्ट दृष्टि निर्मित हो जाती थी, जिससे वहाँ की जनता की आर्थिक, धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक स्थिति का विवरण नियंत्रित होता थ

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - ओरछा का एक अखाडा (Orachha ka ek akhada)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

ओरछा का एक अखाडा (Orachha ka ek akhada)

मध्ययुग के ग्रंथों के 'प्रारंभ' की अपनी एक ऐतिहासिक धज है। पहले गणेश और सरस्वती-वंदना, फिर आश्रयदाता और कविवंश-वर्णन। शायद आश्रयदाता को प्रसन्न करने या अपनी पहचान स्थापित करने के लिए। लेकिन इतना ही काफी नहीं है, कभी-कभी कोई कवि अपने ग्रंथ में जाने या अनजाने किसी घटना या वस्तु का ऐसा वर्णन अथवा संकेत छोड़ जाता है, जो इस ग्रंथ के लिए ही नहीं, वरन् इस युग के इतिहास के लिए कीमती धरोहर साबित होता है। इसका एक उदाहरण है-आचार्य केशव की 'कविप्रिया', जिसके शुरू में ही ओरछा के एक अखाड़े का वर्णन 21 छंदों में है। कविवंश वर्णन के पहले। अखिर इस अखाड़े को इतना महत्त्व देने की क्या जरूरत थी ? और वह भी केशव जैसे महाकवि के लिए, जो ओरछा-नरेश महाराज रामसाहि और ओरछा के राजकाज का सारा भार अपने कंधों पर रखनेवाले महाराज इन्द्रजीत के गुरु थे। सवाल उठता है कि ओरछे के इस अखाड़े में कौन-सा ऐसा रहस्य था, जो केशव जैसे कवि के मन पर पूरी तरह छाया रहा।

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - लोकसंस्कृति के संस्थान अखाडे (Lok Sanskirti ke Sansthan Akhade)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

लोकसंस्कृति के संस्थान अखाडे (Lok Sanskirti ke Sansthan Akhade)

सभासिंह की लली, सभासिंह की लली
खनुआखेड़ा न जीत अकोड़ी में डरी
उनकी एकऊ न चली...

अकोड़ी की गढ़ी पर अखाड़े से गुँजते गीत के बोल पन्नानरेश महाराज अमानसिंह को चुभ गए। वे पीड़ा से कराह उठे, पर चुपचाप बैठे रहे। अकोड़ी के राजा उनके बहनोई थे और उन्होंने अमानसिंह को अकोड़ी ठहरने का आमंत्रण भेजा था। इसीलिए वे खनुआखेड़ा की विजय के बाद सेना सहित रुके थे। गढ़ी के नीचे पड़ाव था। सेना जीत की खुशी में मनोरंजन की लालसा से उमग रही थी और गढ़ी के सेवक सारी सुविधाएँ जुटा रहे थे। तभी गीत की टेक फिर एक अनुगूँज छोड़कर गायब हो गई और महाराज अमानसिंह रोष से तमतमा उठे-"अभी पता चलता है कि मैं सभासिंह की लली हूँ या लला। जीता हूँ या हारा।" उन्होंने सेनापति को युद्ध का आदेश दिया और कुछ ही घंटों में भयानक मारकाट मच गई। साले ने बहनोई का सिर काटकर बहिन के आँचल में डाल दिया। ऐसा विचित्र था मध्यकाल का विनोद। लेकिन वे अखाड़े क्या थे, उनका इतिहास जहाँ इतना रोमांचक है, वहाँ उतना ही सांस्कृतिक। मध्ययुग की कलाचेतना का संजीवी।

अखाड़े का बदलता अर्थ

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - फाग (Faag)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

फाग (Faag)

लोकोत्सब लोक का वह उत्सव है, जो लोक द्वारा लोकहित में आयोजित किया जाता है। सामूहिकता या सामूहिक भागीदारी उसकी पहली शर्त है। समूचा लोक एक विशिष्ट कर्म से गतिशील होकर अद्भुत एकता की बानगी पेश करता है और यह एकता केवल बाहर की नहीं है, वरन् भीतर की भी है। लोकोत्सव केवल उल्लास और आनन्द की अभिव्यक्ति नहीं है, वरन् लोकसंस्कृति का अनूठा संस्थान भी है। उसका उद्भव और विकास लोकसंस्कृति के इतिहास का एक अंग है। एक छोटे से उत्सव से लेकर राष्ट्रीय लोकोत्सव तक की

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - सुअटा या नौरता (Suaata Ya Naurata)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

सुअटा या नौरता (Suaata Ya Naurata)

सुअटा या नौरता कुमारी कन्याओं द्वारा खेला जाने वाला एक अनुष्ठानपरक खेल है, जोकि आ·िान-शुक्ल प्रतिपदा से नौ दिन तक चलता रहता है।इ स आख्यानक खेल का सबसे महत्त्वपूर्ण पात्र 'सुअटा' है, इसीलिए उसका नाम 'सुअटा' पड़ा है। नवरात्रि में खेले जाने के कारण और शक्ति से जुड़े होने से उसे 'नौरता' कहा गया है। पहले आ·िान शुक्ल पूर्णिमा को स्कंदमह नामक उत्सव मनाया जाता था, जिसमें स्कंद की पूजा होती थी, फि

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - दिवारी न्रत्य (Diwari Dance)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

दिवारी (Divaree / Diwari Dance)

दीपावली एक राष्ट्रीय महापर्व है, जिसे पूरा देश उल्लास और उत्साह से मनाता है। अतएव उसके संबंध में लोकप्रचलित मान्यताएँ और रीतियाँ स्थिर-सी हो गयी हैं। लेकिन स्थान-भेद और काल-भेद से उसमें अनेक परिवर्तन सहज-स्वाभाविक हैं। लोक के बदलाव से उसके स्वरूप में भिन्नता आती ही है। फिर दीपावली के प्रति लोकमन और लोकभाव हमेशा एक-सा नहीं रहता। दलिद्दर (अलक्ष्मी) को घर से बाहर निकालने के लिए स्त्रियाँ सूप और होंड़ी बजाती थीं, पर अब यह रीति समा

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - कजरिया (Kajariya)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

कजरिया (Kajariya)

सन् 1182 ई. का सावन अपनी सारी रंगीनी और चहल-पहल के साथ उतरा था। उसे मालूम था कि चंदेलों की राजधानी महोबा में उसकी जितनी अगवानी होती है, उतनी और कहीं नहीं। इसीलिए कारी बदरिया, रिमझिम मेह, दमकन् बिजुरी, सजी-धजी हरयारी, रचनू मेंहदी, नचत-बोलत मोर-पपीरा और तीज-त्यौहार-सब अपने-अपने करतब दिखाने लगे थे। अलमस्त पहाड़ और अलगरजी ताल दुर्ग की तरफ आँखें गड़ाये खड़े थे। शायद सावन की दिखनौसी सौगातों की ललक से।

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास - लोकोत्सव (Lokotsav)

बुंदेलखंड की लोक संस्कृति का इतिहास

लोकोत्सव (Lokotsav)

किसी भी अंचल के लोकोत्सव लोक के वे उत्सव हैं, जो लोक द्वारा लोकहित के लिए आयोजित होते हैं । सामूहिकता उनकी पहली शर्त है । समूचा लोक एक विशेष कर्म से गतिशील होकर अद्भुत एकता का बानगी पेश करता है और यह एकता बाहर और भीतर, दोनों तरफ से होती है । असल में, लोकोत्सव लोकमन के मनोविज्ञान का जीता-जागता उदाहरण है । अनेक व्यक्ति एक ही भावना और एक ही लक्ष्य से संप्रेरित हो कर्म करते हैं, जिसे देखकर और महसूस कर अकेला व्यक्ति या उसका मन सहजतः वही करने ल

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