History of Bundelkhand Ponds And Water Management - बुन्देलखण्ड के तालाबों एवं जल प्रबन्धन का इतिहास : बुन्देलखण्ड के घोंघे प्यासे क्यों (Bundelkhand ke Ghonghe pyase kyo)

History of Bundelkhand Ponds And Water Management - बुन्देलखण्ड के तालाबों एवं जल प्रबन्धन का इतिहास

बुन्देलखण्ड के घोंघे प्यासे क्यों (Bundelkhand ke Ghonghe pyase kyo)

बुन्देलखण्ड जनपद विशेषकर दक्षिणी-पूर्वी बुन्देलखण्ड की भूमि पहाड़ी, पठारी, ढालू, ऊँची-नीची, पथरीली, ककरीली रांकड़, शुष्क वनों से भरपूर है। इस भूभाग की भूमि पर बरसाती जल ठहरता ही नहीं है, जिस कारण बुन्देलखण्ड में पानी की कमी सदैव बनी रहती है। 8वीं सदी के पूर्व बेतवा-केन नदियों के मध्य का दक्षिणी पूर्वी बुन्देलखण्ड मात्र चरवाही पशुपालन वाला ही क्षेत्र था, क्योंकि इस क्षेत्र में पानी का सदैव अभाव रहा। न लोगों को पीने को पानी था न जननिस्तार को। पानी केवल चार माह के बरसाती चौमासे में और चार माह के जड़कारे (ठण्डी) के मौसमों में नालों, नालियों एवं नदियों में, नदियों के भरकों, डबरों में प्राप्त होता था। ग्रीष्म ऋतु में पानी नदियों के डबरों, भरकों में जहाँ-कहीं ही मिलता था, क्योंकि इस क्षेत्र की नदियाँ पठारी, पहाड़ी शुष्क हैं, जिनमें पानी पठारों से आता है और वेग से घरघराता, गर्जन करता चट्टानों से टकराता क्षेत्र से बाहर निकल जाता रहा है। पशुपालक चरवाही समूह नालों-नदियों के तटवर्ती उन क्षेत्रों में जहाँ नदियों की दहारों, डबरों में पानी भरा मिलता था, वहीं टपरे बगर बाड़े बनाकर अस्थायी बस्तियाँ बसाकर ठहर जाते थे। टौरियों, पहाड़ियों पर मवेशी चराते थे। 

जब डबरों का पानी समाप्त होने को होता तो चरवाहे नीचे, ऊपर घुमन्तु जीवन काटते हुए जिन्दगी बिताते थे। गाय, बैल, भैंस गधे, बकरी, गाड़रें लिये घुमक्कड़ी जिन्दगी बिताते हुए भी वे नदियों के किनारों की पहाड़ी समतल पटारों में धान, उर्द, तिल्ली, लठारा, कोदों, समां, सवांई, पसाई, जबां, मसरी, चना की थोड़ी-थोड़ी खेती कर लेते थे। जंगलों में रहते हुए, वनोपज का संग्रहण भी कर लेते थे जिसमें महुआ, गुली, अचार, तैंदू एवं गौंद गाद कंडौ, लाख इत्यादि इकट्ठा करते अपनी गुजर-बसर करते रहते थे। वनोपज पर वनवासी जातियाँ पूर्ण रूपेण निर्भर थी। महुआ, बेर अचार गुलगुट, छीताफल (सरीफा), समां सवांई, पसाई धान पर ही उनका जीवन चलता था। वनवासी वनों में स्थायी रूप से बसे थे। 

इनमें सौंर, गौंड़, कौंदर, राजगौड़ प्रमुख थे। विशेष रूप से दक्षिणी बुन्देलखण्ड क्षेत्र जो बेतवा नदी से केन, सोनार, नर्मदा के मध्य का पहाड़ी टोरियाऊ ढालू ऊँचा-नीचा पठारी शुष्क भूभाग अधिक अविकसित जंगली पिछड़ा क्षेत्र था। पानी नहीं था, सो रोटी-रोजी का पक्का स्थायी प्रबन्ध नहीं था। लोग पानी, रोटी एवं रोजगार की तलाश में, पहाड़ियों दर पहाड़ियों और नदियों के तटवर्ती भूभागों में भटकते घूमते-फिरते रहते थे। कबीलों, जातीय समूहों में बसते थे एवं घूमते थे। वे निर्भीक होकर रहते थे तथा आपस में कबीला समूह लड़ भी जाते थे, जरायम पेशा भी अपना लेते थे। आपस में पशुओं की चोरी, बकरियों, गाड़रों की चोरी अधिक होती थी क्योंकि लोगों के पास पशुधन ही तो था।

7वीं-8वीं सदी में चन्द्रब्रम्ह के वंशज चन्देल राजाओं का उद्भव महोबा में हुआ जिन्होंने अपने दक्षिणी, मध्य एवं पूर्वी राज्य की पहाड़ी, पठारी, जंगली, पथरीली, ढालू, रांकड़ भूमि के विकास की योजना सुनिश्चित कर बरसाती धरातलीय जल नीची ढालू भूमि पर, पहाड़ों, टौरियों की पटारों में, खन्दकों खंदियों, दर्रों में, पत्थर मिट्टी के लम्बे, चौड़े, ऊँचे सुदृढ़ बाँध बनवाकर तालाबों में बरसाती धरातलीय चल जल ठहरा दिया था। उन चन्देली तालाबों से पानी बाहर निकालने का कोई सलूस, ओनों (जल निकास द्वार) नहीं रखा जाता था, ताकि तालाबों में संग्रहीत धरातलीय पानी जनहिताय तालाबों में सदा भरा रहे और लोगों को पानी के अभाव का संकट न हो। यदि तालाबों में क्षमता से अधिक पानी भरता था तो तालाबों के बाँधों के बाजुओं-छोड़ों के दोनों ओर पहाड़ी भूमि काटकर 10:7 के अनुपात में पांखियाँ, उबेला बना दिए गए थे कि तालाब का अतिरिक्त पानी, बाँधों को क्षति पहुँचाए बिना, तालाबों के दोनों बाजुओं में कृषि योग्य समतल भूमि में, टरैटों में घुमाकर चला दिया जाता था। तालाबों के दोनों ओर टरेटे बनें, पृष्ठ भाग में बाँधों के पीछे पानी बहते रहने के कारण बहारूं बन गई थी। तालाबों में घुमन्तु धरातलीय चल जल ठहरा तो लोगों का घुमन्तु चरागाही चल जीवन भी पानी के आश्रय से तालाबों के पास ठहर गया था। चन्देल नरेशों के पश्चातवर्ती बुन्देला राजाओं ने भी जनहिताय जल प्रबन्धन कार्य जारी रखा था।

चन्देलों-बुन्देलों ने, गौंड़ राजाओं और मराठाओं, अंग्रेजों ने इस जल अभाव ग्रस्त बुन्देलखण्ड क्षेत्र में कुल मिलाकर 4000 से अधिक तालाबों का निर्माण कराया था। तालाबों का जल जन-निस्तार के लिये एवं थोड़ी-थोड़ी कृषि सिंचाई के लिये था, तो मनुष्यों के पीने के लिये बावड़ी, बेरे, पगवाही और कुएँ ग्रामों के पास तालाबों के बाँधों के पीछे, पहाड़, पहाड़ियों की तलहटी में, ग्रामों सड़क मार्गों से संलग्न खुदवा दिए थे, कि जिससे न ग्रामजन पानी को परेशान हों, न कोई पैदल यात्री न व्यापारी, टांड़े वाले पानी को परेशान हो सके। चन्देल राजाओं ने पहाड़ों में, गुफा मन्दिर बनवाए थे, जिनमें कुंड कटवा दिए गए थे। ऐसे गुफा मन्दिरों में पहाड़ों का जल धीरे-धीरे निरन्तर झिरता हुआ गुफा कुंडों को भरता रहता रहा है, जिसका उपयोग लोग आदिकाल से करते रहे हैं। दमोह जिलान्तर्गत हटा तहसील का एक प्राचीन ग्राम सिलापुरी है, जिसके पहाड़ में एक विशाल गुफा है जिसमें संलग्न पहाड़ी झरने का बड़ा जलस्रोत है। कहा जाता है कि गौंड रानी दुर्गावती की गौंड सेना इस सिलापुरी गुफा में पड़ी रहती थी और जल का अभाव कभी नहीं हुआ। 

गौंड राजाओं ने जो किले बनवाए थे, उनके परकोटों के अन्दर बड़ी विशाल सीढ़ीदार बावड़ियाँ निर्मित कराई थीं, जो सदैव पहाड़ के झिरते स्वच्छ जल से भरी रहा करती थीं चन्देलों से लगायत बुन्देलों, गौंडों एवं अन्य स्थानीय राजाओं ने जन-हितार्थ जल का प्रबन्ध किया था कि लोग तालाबों, कुओं के जल से कृषि सिंचाई कर लेते रहे एवं दैनिक निस्तार भी होता रहता था। स्वातंत्र्योत्तर काल के पूर्व किसान और अन्य व्यवसायी एक निर्धारित मात्रा से अधिक पानी तालाबों से नहीं निकाल पाते थे। पानी केवल पांखी, उबेला और औनों, कुठिया अथवा सलूस-जो तालाबों के भंडारों से कुछ दूर ऊँचे स्थल पर बनाए जाते थे, द्वारा ही निकाला जाता था। कुठिया से पानी बहना बन्द होने से तालाबों के भंडार जल से भरे रहते थे। इस कारण मवेशियों, वन्य प्राणियों एवं मनुष्यों को गर्मी की ऋतु में भी जलाभाव नहीं होता था। परन्तु स्वातंत्र्योत्तर काल में पानी का खर्च बढ़ा है और आमद घट गई है, जिससे जल संकट बढ़ गया है। बुन्देलखण्ड में जल संकट के निम्नांकित कारण हैं-

1. जंगलों का निरन्तर होता विनाश

 पेड़, बादल और पानी खींचकर लाने वाले ऐंटीना होते हैं। जंगल हैं तो पानी बरसेगा। कहा है, “भोजन, पानी और बयार, ये हैं जीवन के आधार। ये है जंगलों और प्रकृति के उपहार।”

स्वतन्त्रता के पहले बुन्देलखण्ड में एक तिहाई भूमि अर्थात 33% भूमि में आवश्यक रूप से संरक्षित वन, अर्द्ध संरक्षित वन और ग्रामों के पास कुल्हाड़ी गिरंट (वन) रखे जाते थे। प्रत्येक टौरिया, पहाड़ी, पहाड़ सघन वनों से ढके, पटे रहा करते थे। खेतों के अलावा किसानों की पड़त भूमि, रूदों, चर्रों, मेड़ों पर पेड़ हुआ करते थे। पथरीली समतल भूमि पर महुओं की मुहालें, बगीचे हुआ करते थे। वर्षा ऋतु में पहाड़ी जंगल बादल, पानी अपनी ओर खींच लाते थे। पहाड़ों पर पानी के बादल घूमते, उतरते, बरसते जाते-आते थे। बादल आते-जाते पहाड़ों पर और क्षेत्र में बरसते थे। पेड़ भूमिक्षरण रोकते और जड़ों से पानी भूमि में पहुँचाकर भूमि को शीतल बनाए रखकर पृथ्वी को गर्म होने से बचाते रहे हैं। जल और जंगल का चोली-दामन का साथ होता है। पेड़ों, जंगलों से जल भी बरसता है और ठण्डी वायु भी प्राप्त होती है। आखिर जल और वायु दोनों मिल कर ही तो जलवायु उर्फ पर्यावरण बनता है। जब जंगल नहीं तो जल और वायु क्यों और कैसे प्राप्त होगी?

2. जल संसाधन नष्ट हो रहे हैं-

प्राचीन चन्देली बुन्देली परम्परागत जल प्रबन्धन संसाधन तालाब, बावड़ियाँ, कुएँ एवं चौपरे, बेरें लगभग 400 से 1000 वर्ष तक के पुराने हो चुके हैं। दीर्घकाल से चले आ रहे इन जल संसाधनों में गौंड़र, गाद, कचरा, मिट्टी, पत्तों, पत्थरों का भराव हो गया है। कुएँ, बावड़ी कचरों से भर गए हैं। उनका पानी गन्दा बदबूदार हो गया है। लोग उनमें मृत पशु तक डाल देते हैं। कुछ नष्ट हो गए और मात्र गड्ढे रह गए हैं। कुछ को लोगों ने अपनी कृषि सिंचाई का साधन बना लिया है। जिन जल संसाधनों पर पूरा नगर, ग्राम निर्भर थे, वे नष्ट हो चुके हैं अथवा उपयोग लायक नहीं रहे हैं।

पुराने तालाब पुखरियों के रूप में रह गए हैं। जिन तालाबों के बाँधों पर बस्तियाँ बसी हुई हैं और प्राचीन काल में बस्ती के लोग ही तालाबों को सुरक्षित किए रहते थे, जल को शुद्ध बनाए रखते थे, तालाबों में गन्दगी नहीं फैलाते थे, घरों का कूड़ा-कचरा तालाबों में नहीं डालते थे। स्वातंत्र्योत्तर काल में स्वतन्त्रता पाकर जनता अपना नैतिक दायित्व भूल गई और खुली छूट पाकर उन्होंने तालाबों में कूड़ा-कचरा डालकर भरना प्रारम्भ कर दिया तथा तालाबों में घर-मकान, बेड़ा (बगर) बनाने लगे हैं। तालाब छोटे हो रहे हैं, गन्दगी से भर रहे हैं। कुएँ, बावड़ियाँ कचरों से भर दिए। तालाब, कुएँ, बावड़ियाँ ग्रामवासियों के जीवनदाता ‘अमृत कुंड’ हैं। जिन्हें नागरिक ही नष्ट कर रहे हैं। जब जलस्रोत नष्ट हो रहे हो तो जल संकट तो होगा ही।

3. सरोवरों की मरम्मत, दुरुस्ती जरूरी है-

बुन्देलखण्ड में लगभग सभी तालाब प्राचीन पुराने हैं। प्राचीन काल में तालाबों के बाँधों, जल एवं भराव क्षेत्र की सुरक्षा, दुरुस्ती एवं रख-रखाव का दायित्व जनता का ही होता था। तालाबों के फीडिंग एरिया (धरातलीय जल आवक क्षेत्र) में कृषि नहीं होने दी जाती थी। फीडिंग एरिया में पेड़-पौधे रखे जाते थे। वह चरौखर क्षेत्र होता था। चरौखर में मवेशी चरते थे और दोपहर में तालाबों में पानी पीकर लौटकर चरागाहों में जाकर पेड़ों के नीचे ‘गौठान-बैठान’ (नियत स्थल) पर बैठकर सुस्ताया करते थे। आराम किया करते थे। फीडिंग एरिया में खेती होने से, जुते हुए खेतों की मिट्टी जल प्रवाह के साथ सिमिट-सिमिटकर तालाबों के भंडारों में जमा होती रहकर उन्हें भरती रहती हुई, उथला बना देती है। उनकी गहराई कम हो जाती है, जिससे तालाबों में जल का संग्रहण कम हो जाता है और पानी पांखियों, उबेलों से निकल कर बाहर बह जाता है। तालाबों की जल भराव क्षमता कम हो जाने से, पानी जल्दी सूख जाता है और ग्रीष्म ऋतु आते-आते, बुन्देलखण्ड में जल संकट आने लगता है।


बुन्देलखण्ड में भूमि के अन्दर ग्रेनाइट पत्थर की चट्टानें चादर की तरह अथवा आड़ी-तिरछी खड़ी-बिछी पड़ी हुई हैं जिनमें भूगर्भीय जलस्रोत होते ही नहीं हैं। जिस कारण यहाँ के व्यक्ति बरसाती संग्रहीत धरातलीय जल पर ही निर्भर रहते रहे हैं। फिर वह चाहे तालाबों में संग्रहीत किया हुआ जल हो अथवा कुँओं, बावड़ियों में झिरन, रिसन वाला जल हो। किसी प्रकार, यदि प्राप्त संग्रहीत जल बर्बाद न हो तो एक वर्ष तक का काम चल जाता है। तालाबों के बाँधों पर पेड़-झाड़ियाँ पैदा हो गई हैं। पेड़ों की जड़ों ने बाँधों की मिट्टी में दरारें पैदा कर दी हैं। आगे-पीछे की पत्थर की पैरियों को अपने स्थान से विचलित कर दिया है। कुछ पैरियाँ भराव क्षेत्र में आगे की आगे और कुछ पीछे की पीछे खिसककर गिर गई हैं। पैरियों के विचलन से एवं पेड़ों-झाड़ियों की जड़ों से बनी दरारों में से बरसाती धरातलीय जल प्रविष्ट होकर बाँधों को कमजोर कर देते हैं, दरारें पैदा कर देते हैं। दरारों में से तालाबों का पानी रिस-रिसकर पीछे निकल जाता है। जल भराव के दबाव तक पानी बाहर निकल जाता है। तालाब पानी से खाली हो जाते हैं। अस्तु, तालाबों की गाद गौंड़र, तालाबों की सीमा से बाहर निकलवाना बहुत आवश्यक है। जब तालाबों का गहरीकरण हो जाएगा तो जल संग्रहण क्षमता बढ़ जाएगी। गहरीकरण के साथ ही बाँधों की साफ-सफाई, मरम्मत, रिसनबन्दी, पैरियों की भराई, पेड़ों-झाड़ियों की कटाई प्रतिवर्ष होते रहने से तालाबों की रिसन-झिरन बन्द होगी। जब तालाबों का जल व्यर्थ में बाहर न निकल सकेगा तो जल का भराव सदा बना रहेगा। नया-पुराना पानी मिलता रहेगा। जल संकट नहीं बढ़ेगा।

4. तालाबों की हदबन्दी (सीमांकन) होनी चाहिए-

बुन्देलखण्ड में जो तालाब नगरों में, ग्रामों में एवं जंगलों में बने थे, उनमें से अधिकांश तालाब लोगों ने कचरा डाल-डालकर भर दिए हैं। कचरे से भराव क्षेत्र भरकर भूमि समतल कर उसमें बेड़ा, टपरें और बगर (मवेशी घर) बना लिये हैं। तालाबों में ग्रामों के अराजक, प्रभावशाली मनचले लोग खेती करने लगे हैं। वर्षा ऋतु में तालाबों की भूमि के बेजा कब्जाधारी मनचले अराजक, खेतों में पानी न भर सके, इसलिए जल फीडर नालों-नालियों को दूसरी ओर मोड़ देते अथवा तोड़-फोड़कर यत्र-तत्र अन्य खेतों की ओर पानी का बहाव कर देते ताकि तालाब पूरा न भर सके। यदि फीडर्स गहरे एवं अधिक जल लाने वाले हैं तो ऐसे बड़े फीडर्स वाले तालाबों के बाँधों को किसी किनारे से फोड़ देते हैं। तालाब न भरने और जल संकट बना रहने का यह बड़ा कारण है। इसका है कि सभी तालाबों की हदबन्दी कर उनका गहरीकरण हो, बाँधों की मरम्मत हो। गहरीकरण से जो मिट्टी निकले वह सीमा (हद) पर डाली जाए, जिससे लोग तालाबों की भूमि पर अतिक्रमण न कर सकें।

5. नगर-ग्राम का गन्दा पानी तालाबों में छोड़ना प्रतिबन्धित हो-

लोग नगरों एवं ग्रामों के गन्दे पानी को नाले-नालियाँ, तालाबों में मिला देते हैं, जिनके द्वारा तालाबों में गन्दगी जमा होती रहती है। जबकि तालाब जन निस्तारी होते हैं उनमें स्नान किया जाता है। तालाब का पानी पूजा में, शिवजी, देवी जी के जलार्ध (ढारने) में, दाल चावल धोने और कहीं-कहीं भोजन पकाने एवं पानी पीने के उपयोग में लिया जाता है। इस कारण जरूरी है कि तालाबों में गन्दे नाले डाले जाने पर रोक हो। इसके लिये नगरपालिकाओं एवं ग्राम पंचायतों को जागरूक किया जावे।

6. तालाबों के जल की चोरी एवं बर्बादी पर नियन्त्रण हो

- बुन्देलखण्ड के सभी तालाब निस्तारी तालाब रहे हैं, कृषि के लिये पानी पाँखियों से सैंडर-सन्न (छोटी नहरें) बनाकर ही खेतों तक ले जाया करते थे। परन्तु स्वातंत्र्योत्तर काल में वोट की राजनीति की ओट में राजनैतिक दलों के नेताओं, मन्त्रियों की शह पाकर, उनके अराजक बाहुबली तालाबों में डीजल पम्प, विद्युत पम्प रखकर, दूर-दूर तक सिंचाई हेतु जल ले जाने लगे हैं, जिस कारण तालाब ग्रीष्म ऋतु आने से पहले ही सूख जाने लगे हैं। वोटों की राजनीति के चलते सिंचाई विभाग, पुलिस और राजस्व विभागों के कर्मचारी, अपने नुकसान होने की आशंका वस उदासीन बन कर पानी की चोरी पर अनदेखी कर देते हैं।

जिन तालाबों से नहरों द्वारा सिंचाई की व्यवस्था है वहाँ के दबंग किसान बिना अनुमति तालाबों से सलूस, कुठियाँ एवं औनें खोल कर पानी निकालकर खेतों, टरेंटों की सिंचाई कर लेते हैं तथा रात में चोरी से सिंचाई कर, पानी को नालों और दूसरों के खेतों की ओर बहा देते हैं। तालाबों के पानी का मोल और महत्व किसान भी नहीं समझता, जिसकी रोजी-रोटी तो तालाबों के पानी पर ही निर्भर है।

7. जल संसाधन विभाग, नगरपालिकाओं और पंचायतों की उदासीनता-

बुन्देलखण्ड के नगरों, कस्बों एवं ग्रामों में एक से लगायत 7 तक तालाब हैं। नगरों एवं कस्बों में तो माला तालाब (Chain or Linked Tanks) हैं। माला तालाब एक दूसरे से पांखियों द्वारा जुड़े हुए हैं। जब प्रथम तालाब भर जाता है तो उसका वेशी जल दूसरे संलग्न तालाब में पाँखी से जा पहुँचता है। इस प्रकार प्रथम से सभी तालाब पाँखियों द्वारा जुड़े होने से भरते रहते हैं।

सभी तालाब पुराने हैं जो टूट रहे हैं, मिट रहे हैं। गौंड़र-गबरा, कूड़ा-कचरा भरता रहता है। पाँखियों पर लोगों ने अधिकार जमा लिया है। तालाब लोगों के जन्म-मरण के साथी साधन हैं, जलापूर्ति के स्रोत हैं। राजाशाही युग में वर्षा प्रारम्भ होते ही तालाबों में जल आवक नालियों-नालों एवं जल निकास के उबेलों-पांखियों को चुस्त-दुरुस्त करवा दिया जाता था ताकि पूरा धरातलीय जल तालाबों में आता रहे तथा वेशी जल पाँखियों से बाहर अथवा दूसरे तालाबों में पहुँचता रहे। स्वातंत्र्योत्तर काल में तालाबों की देखरेख, मरम्मत, बरसाती दुरुस्ती में उदासीनता बनाए रखने एवं दुरुस्ती मरम्मत के धन को नाम मात्र की दिखावटी दुरुस्ती में व्यय दिखलाकर विभाग के अधिकारी, कर्मचारी और जनप्रतिनिधि आपस में बन्दर बाँटकर लेते हैं। इस व्यवस्था के निरन्तर चलते रहने से तालाब जैसे जीवनदायी संसाधन मिटते जा रहे हैं, नष्ट होते जा रहे हैं, जिस कारण जल संकट बढ़ने लगा है।

8. लोग प्रजातन्त्र की भावना का अर्थ समझे ही नहीं-

लोग प्रजातन्त्रीय स्वतन्त्रता का एवं प्रजातन्त्र के प्रति नागरिकों के कर्तव्य मानो जानते ही नहीं हैं। वे नहीं समझते कि अपने दायित्वों, कर्तव्यों के पालन, निर्वहन द्वारा ही स्वतन्त्रता का अधिकार प्राप्त किया जाता है। निष्ठापूर्वक दायित्वों, कर्त्वयों के सम्पादन के मार्ग से अधिकार निकलते हैं। राजतन्त्र में अधिकार राजा को थे, प्रजा के खाते में तो केवल कर्तव्य-ही-कर्तव्य हुआ करते थे।

प्रजातन्त्र में सभी अधिकार जनता को हैं तो सभी दायित्वों एवं कर्तव्यों के निर्वहन का भार भी उसी पर है। प्रजा राजा भी है। अधिकार उसे ही है तो दायित्वों, कार्यों की देखरेख सुरक्षा के कर्तव्य भी उसे ही निबाहने हैं। वह स्वामी है तो सेवकाई का कर्तव्य भी उसे करना है। हाँ, सुरक्षा कार्य सम्पादन के दाम उसे मिलेंगे। बेगार में जनता से कोई कार्य नहीं करवाया जा सकता है। इस प्रकार प्रजातन्त्र दायित्वपूर्ण, समझदारी एवं विवेकपूर्वक अपने सभी के हित एवं भलाई के सभी कार्यों को सामूहिक रूप से अपने काम मानते हुए सम्पन्न करने की व्यवस्था का नाम है। तालाबों की सुन्दरता, स्वच्छता बनाए रखना, उनकी मरम्मत, दुरुस्ती, गहरीकरण, फीडिंग एरिया को खुला बनाए रखने हेतु शासकीय अमले एवं अपने निर्वाचित जन प्रतिनिधि पर सतत दबाव बनाये रखना सभी नागरिकों का अधिकार है। तालाब पर सभी ग्रामवासियों की सतत नजर रहे क्योंकि तालाब का पानी सभी ग्रामवासियों की रोजी-रोटी एवं निस्तार का संसाधन होता है।

लेकिन जैसे ही 1947 ई. में स्वतन्त्रता लोगों को मिली और 1950 ई. में लोगों को संवैधानिक अधिकार मिले तो राजा जैसे अधिकार पाकर नागरिक कर्तव्य एवं दायित्वविहीन से हो गए। वे राजा की तरह राज्य सरकार पर आश्रित हो गए कि उनके सुख-साधन के, रोटी-रोजी पानी की सभी व्यवस्थाएँ राज्य सरकार करे। यह बदला हुआ नजरिया जनता को गरीबी एवं भिखारीपन ही देगा। लोगों का अपने विकास के संसाधनों को नष्ट होने से बचाए रखने को जागरूक होना पड़ेगा। जल जनजीवन का प्राण है। प्राण नहीं तो व्यक्ति नहीं। इसलिए हर हालत में तालाबों की सुरक्षा एवं जल प्रबन्धन के लिये प्रत्येक नागरिक का पंचायतवार जागरूक होना अनिवार्य है।

9. नागरिक जल संरक्षण, संग्रहण एवं सदुपयोग का महत्व समझें-

भारतीय संस्कृति में जल संग्रहण एवं संरक्षण का विशेष महत्व बतलाया गया है। जल से जीवन है। जहाँ जल नहीं वहाँ जीव-जीवन नहीं होता। अर्थात जल के बिना सृष्टि की रचना-संरचना भी नहीं होती है। इसलिए सृष्टि को बचाए रखने के लिये जल को बचाए रखना, जल का संग्रहण, संरक्षण प्रत्येक मनुष्य का नैतिक कर्तव्य है। जल एक-एक बूँद से संग्रहीत होता है। एक-एक बूँद जल कीमती है। जल प्राण है, अमृत है। उसे व्यर्थ में बर्बाद नहीं होने देना चाहिए। लोगों को जल के महत्व को समझना चाहिए। कुआँ बावड़ी और तालाबों के जल को व्यर्थ बर्बाद न होने दें। यदि पानी को बर्बाद किया जाता रहा तो जलाभाव के संकट उन्हें ही भुगतने होते हैं।

बुन्देलखण्ड में भूमि के अन्दर ग्रेनाइट पत्थर की चट्टानें चादर की तरह अथवा आड़ी-तिरछी खड़ी-बिछी पड़ी हुई हैं जिनमें भूगर्भीय जलस्रोत होते ही नहीं हैं। जिस कारण यहाँ के व्यक्ति बरसाती संग्रहीत धरातलीय जल पर ही निर्भर रहते रहे हैं। फिर वह चाहे तालाबों में संग्रहीत किया हुआ जल हो अथवा कुँओं, बावड़ियों में झिरन, रिसन वाला जल हो। किसी प्रकार, यदि प्राप्त संग्रहीत जल बर्बाद न हो तो एक वर्ष तक का काम चल जाता है। परन्तु तालाबों का पानी लोग बेरहमी से अपव्यय कर देते हैं जिससे उन्हें जल संकट भुगतना पड़ता है। लोगों में यह भी समझ नहीं है कि जल कोई बनाकर नहीं दे सकता। जो है उसी को सहेजकर रखना होगा। रोटी से ज्यादा जल सहेजने की भावना लोगों को होनी चाहिए।

10. बुन्देलखण्ड में पानी की कमी रहती है फिर भी रबी फसलों के बोने, रकबा बढ़ाने पर जोर-

बुन्देलखण्ड पहाड़ी पथरीला रांकड़ भूक्षेत्र है जिसमें गेहूँ बोने पर सिंचाई को 4-5 पानी देना जरूरी होता है। जबकि गेहूँ लायक पानी होता ही नहीं है। बरसात में जब जितना, जो जहाँ पानी बरसता है, वह धरातलीय जल नीचे ढालू क्षेत्र में बने तालाबों में इकट्ठा हो जाता है; उसी को पीने के प्रयोग में लिया जाता है। आदमियों के दैनिक निस्तार एवं पशुओं के पिलाने में वही जल प्रयोग में लिया जाता है। जो बचता है उसे दो-तीन बार की रबी फसल की सिंचाई में ले लिया जाता है। इस तरह रबी फसल की भरपूर सिंचाई न होने पाने से न तो गेहूँ का उत्पादन भरपूर हो पाता, न लोगों को पीने व निस्तार को पानी पूरा हो पाता है।

इसलिए जरूरी है कि खरीफ की वर्षा ऋतु वाली फसलें मक्का, ज्वार, उर्द, मूँग, धान, कोदों, समां, राली, कुटकी को अधिक बोने को किसानों को प्रोत्साहित किया जाए। रबी की फसल बोने का रकबा कम रखने की फसल किसानों को देकर तालाबों-कुँओं में पानी बचाए रखा जाए। इससे क्षेत्र में अन्नाभाव भी न रहेगा तथा पानी का अधिक संकट भी न गहरा पाएगा। हर हालत में पानी का खर्च कम कर, उसे बचाए रखना जरूरी होगा।

11. नगरों-शहरों के घरेलू खर्च के गन्दे पानी को सदुपयोग में लिया जाए-

वर्तमान युग में अधिकांश लोगों ने पानी की व्यवस्था अपने-अपने घरों में कर ली है। नगरों, शहरों एवं बड़े कस्बों-ग्रामों में जल व्यवस्था लागू हो चुकी है। कुछ लोगों के घरों में ट्यूबवेल, बोरवेल खुद गए हैं। लोगों के घर पानी का खर्चा भी बढ़ गया है। कपड़ों की धुलाई, मकानों की नित्य सफाई, पुछाई एवं नहाने में भी पानी का खर्चा घर-घर बढ़ गया है। प्रातःकाल से घर के नरदा-नालियाँ चालू होते हैं तथा देर रात तक उनसे पानी घर से बाहर बहता हुआ निकलता रहता है। घर-घर से असीमित पानी नित्य व्यर्थ में बहाया जाता है। यदि घरों के गन्दे पानी को पास में एक छोटे से गड्ढे (Pool) में इकट्ठा कर लिया जाता रहे तो वह पशुओं के पीने और सागभाजी के काम में लिया जा सकता है।

12. बुन्देलखण्ड जनपद में बोर वेल खुदाई पर नियन्त्रण हो-

बुन्देलखण्ड की पथरीली, पहाड़ी, ढालू भूमि, जल प्रबन्धन के लिये कुओं एवं तालाबों के निर्माण तक ही उपयुक्त है, न कि बोर वेल खनन के लिये। यहाँ की धरती के अन्दर ग्रेनाइट चट्टानें हैं जिनमें जल रिसाव के स्रोत होते ही नहीं हैं। फिर बोर वेल 100 से 500 फुट गहराई तक खोदे जा रहे हैं जिससे धरती के ऊपरी तल का पानी गहरे बोर वेलों में जा पहुँचता है। इससे कुँए एवं तालाब सूखने लगे हैं तथा धरती के ऊपरी तल का जल नीचे चले जाने से भूमि जलशून्य, नमीशून्य होकर उष्ण हो रही है। पेड़-पौधे सूख रहे हैं। पर्यावरण गर्म हो रहा है। धरातलीय जल पर बुन्देलखण्ड वासियों का जीवन निर्भर है और बोर वेल्स के कारण धरातलीय जल संकट में आ गया है। जरूरी है कि जंगल बचाओ पानी पाओ। धरातलीय जल संग्रहण के साधनों कुँओं, बावड़ियों और तालाबों की मरम्मत संरक्षण एवं प्रबन्धन पर प्रशासन एवं जनता विशेष चौकसी रखे।

प्रत्येक व्यक्ति को यह याद रखना चाहिए-

“रहिमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून।”

Courtesy:  डॉ. काशीप्रसाद त्रिपाठी

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