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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड में पत्रकारिता की विकास यात्रा (Development journey of journalism in Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड में पत्रकारिता की विकास यात्रा (Development journey of journalism in Bundelkhand)

सन् १८५७ के प्रथम स्वतन्त्रता संग्राम में बुन्देलखण्ड का एक विशेष योगदान रहा। ब्रिटिश शासन ने इसे शक्तिहीन एवं विखण्डित करने की योजना बनाई। जन असंतोष बढ़ता रहा। इसे मुखर करने हेतु समाचार पत्रों का प्रकाशन हैण्ड प्रेस तथा लिथो प्रेस से प्रारम्भ हुआ। साइक्लोस्टाइल मीशीनें भी यत्र-तत्र उपलब्ध थीं। बुन्देलखण्ड का प्रथम समाचार पत्र कहां से व कब छपा अनिर्णीत है। उपलब्ध जानकारी के आधार पर सन् १८७१ ई. में बुन्देलखण्ड अखबार में "विचार वहन' मासिक सागर से प्रकाशित हुआ। इसके सम्पादक श्री नारायण बालकृष्ण - थियोसफी विचारधारा- से प्रभावित थे। सन् १८९४ ई. में साप्ताहिक पंच झांसी से प्रकाशित हुआ। इसी स्थान से सन् १८९६ ई. में "विचार वेदान्त साप्ताहिक' तथा सन् १८९१ ई में "प्रभात' मासिक छपा। श्री अयोध्या प्रसाद ने "संसार दपंण' समाचार-पत्र निकाला।

बीसवीं सदी के प्रारम्भ से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रस का स्वरुप बदलने लगा। नरम दल ब्रिटीश शासन की तुष्टिकरनण की राजनीति के साथ लाजपत राय, श्री बालगंगाधर तिलक तथा श्री विपिन चन्द्र पाल की प्रेरणा से गरम दल प्रभावशाली होने लगा। सन् १९२३ ई. में सागर से "दैनिक प्रकाश' का प्रकाशन भगवान प्रिर्जिंन्टग प्रेस से प्रारम्भ हुआ। इसके सम्पादक मास्टर बलदेव प्रसादजी थे तथा संस्थापक एवं प्रकाशक श्री प्रेमनारायण शर्मा थे। मुख्य शीर्ष में निम्न पंक्तियां थीं।

"देश दशा दर्शन देता, यह मनोभाव नित करे विकास।
राष्ट्रप्रेम, स्वतंत्र मानव हित, पढिये दैनिक पत्र प्रकाश।'

लगभग १०० अंक प्रकाशित होने के बाद पत्र हो गया। हिन्दी पत्रकारिता के क्षेत्र में अग्रगण्य योगदान कोटरा - जालौन - निवासी बाबू मूलचन्द्र अग्रवाल का है। इन्होंने सन् १९११ ई. में कलकत्ता से "दैनिक विश्वामित्र' का प्रकाशन प्रारम्भ किया। यह पत्र विज्ञापन के आधार पर बम्बई, पटना एवं कानपुर से प्रकाशित हुआ। सम्पादकाचार्य श्री अम्बिका प्रसाद वाजपेयी "लिखित समाचार पत्रों के इतिहास' के अनुसार सन् १९१२ ई. कोंच से "सत्यप्रकाश' मासिक प्रकाशित हुआ। अगले वर्ष "भाष्कर' का प्रकाशन श्री कृष्णगोपाल शर्मा - चौबे जी - ने प्रारम्भ किया। यह पत्र केवल दो वर्ष चला। इसी वर्ष सुप्रसिद्ध क्रान्तिकारी श्री वृजविहारी मेहरोत्राने "देहाती' का प्रकाशन साप्ताहिक के रुप में प्रकाशित किया। इसके सम्पादक को तीन वर्ष कारावास दण्ड मिला। क्रान्तिकारियों के जमावड़ा में वृजविहारी मेहरोत्रा के साथ श्री सुरेश चन्द्र भट्टाचार्य तथा चन्दीबाबू भी हो गए। इन्होंने क्रान्तिकारी आन्दोलन के विस्तार हेतु हस्तलिपि से साप्ताहिक "उद्बोधन' पत्र सन् १९१७ ई. में निकाला जो गोपनीय ढंग से वितरित होता था। सन् १९१८ ई. पं. कृष्णगोपाल शर्मा ने कोंच एवं उरई से साप्ताहिक "उत्साह' का प्रकाशन प्रारम्भ किया। इसके सम्पादक पं. रामेश्वर प्रसाद शर्मा थे। सन् १९२१ ई. में यह पत्र बन्द हो गया। सन् १९२० ई. में बाबू वृजबिहारी मेहरोत्रा ने साप्ताहिक "लोकमत' चन्दी बाबू के सहयोग से निकाला। यह पत्र भी दो वर्ष चला।

सन. १९२० ई. में पन्ना से अनियतिकालिक "पन्ना गजट' छपा। सन् १९२३ ई. में श्री देवेन्द्रनाथ मुखर्जी के सम्पादन में साप्ताहिक पत्र "उदय' प्रकाशित हुआ। भाई अब्दुल गनी ने सांम्प्रदायिक एकतावर्धन हेतु "समालोचक' पत्र निकाला। "उदय' तथा "समालोचक' ने गांधी जी के असहयोग आन्दोलन का समर्थन किया। जातीय पत्रों का अभ्युदय सन् १९१८-१९ ई. के बाद प्रारम्भ हो गया। कोंच के श्री बाबूराम गुप्त ने मासिक पत्र "वैश्य शुभचिंतक' निकाला। मऊरानीपुर - झांसी - से "जुझौतिया प्रभा' तथा झांसी से "सना हितकारी' मासिक पत्र निकले। सन् १९२१ ई. में मोठ - झांसी - "नाई मित्र' पत्रिका निकली। श्री गोविन्द प्रसाद शिलाकारी ने सन् १९२२ में सागर से "भृगु' पत्रिका का सम्पादन किया। जैन समाज ने सागर से "गोलपुर जैन' का प्रकाशन किया। सन् १९२३ ई. में वैद्य नाथूराम शर्मा ने "गृहहस्थ जीवन' तथा कुलपहाड़ - हमीरपुर - से "वैद्य कल्पद्रुम' पत्रिका निकाली। सन् १९१४ में दमोह नगर से मासिक "मोहनी' पत्रिका प्रकाशित हुई। सन् १९२४ ई. में श्री नन्द किशोर वर्मा ने "लोकमान्य' केसरी प्रेस बांदा से प्रकाशित कराया, इसके मालिक मास्टर नारायण प्रसाद थे। श्री बालाप्रसाद वर्मा ने "स्वाधीन' जनजागृति हेतु निकाला। सन् १९२२ में झांसी से "झांसी समाचार' तथा सन् १९२४ ई. में कोंच - जालौन - से श्री बाबूराम गुप्त ने साप्ताहिक "निर्भय' पत्र निकाला। इसके सहयोगी श्री गयाप्रसाद गुप्त "रसाल' थे। पं. मन्नीलाल पाण्डेय ने साप्ताहिक "भारतीय लोकमत' उरई से निकाला जो दस वर्ष तक लगातार छपता रहा।

सन् १९२० ई. में सागर से आठ किमी. पश्चिम "रतौना' ग्राम में अंग्रेजों ने कसाईखाना खोलने का पट्टा कलकत्ता की डेवनपोर्ट कम्पनी को प्रदान किया। १४०० पशु काटने का उन्हें लाइसेन्स मिला। इसी प्रकार का एक कसाईखाना दमोह में भी स्वीकृत हुआ था। इनको बन्द कराने का बीड़ा समाचार पत्रों ने उठाया। साप्ताहिक प९ "कर्मवीर' जबलपुर के सम्पादक पं. माखनलाल चतुर्वेदी, "वन्देमातरम्' के सम्पादक लाल लाजपतराय, उर्दू के समचार पत्र "ताज' के सम्पादक श्री ताजुद्दीन तथा "श्री शारदा' ने आवाज बुलन्द की। पं. मदनमोहन मालवीय, श्री केशवराम चन्द्र खण्डेकर - सागर - स्वामी कृष्णानन्द आदि के संघर्षों से विवश होकर सरकार को कसाईखाना बन्द करना पड़ा। यह पत्राकारिता की महान विजय थी।

चौरी-चौरा हत्याकाण्ड से दु:खी होकर असहयोग आन्दोलन समाप्त हो गया। साइमन कमीशन की वापिसी "नमक कानून का उल्लघन' इन सबका समाचार पत्रों ने सहयोग देकर प्रचार किया। सन् १९३० ई. में पन्ना से श्री वियोगी हरि ने "पतित पावन' साप्ताहिक पत्र निकाला। सन् १९३२ ई. में श्री भगवानदास "बालेन्दु' के निदेर्शन में श्री रामगोपाल गुप्त - मादहा - श्री श्याम बिहाबीर चौबे तथा मास्टर नारायण प्रसाद - बांदा - ने मिलकर "बुन्देलखण्ड केसरी' निकाला, जिसमें जोशीले गीत, राष्ट्रीय समाचार पत्रों की समीक्षा आदि निकलती थी। अधिकतर यह अखबार साइक्लोस्टाइल से छपता था, किन्तु पता नहीं चलता था कि कब ओर कहां से छपता है। इसका वितरण कौन् व किस प्रकार करता है। इसका प्रकाशन उरई से भी होने लगा। सम्पादक पं. रामेश्वर प्रसाद शर्मा, श्री मन्नीलाल जी गुरुदेव आदि थे। पुलिस ने गुरुदेव तथा दीवान घत्रुघ्न आदि को प्रताड़ित किया किन्तु कोई जानकारी नहीं मिली। सन् १९३१ में "गहोई मित्र' झांसी से प्रकाशित हुआ। स्वाधीन प्रेस झांसी से जुलाई १९६२ ई. में "ग्राम सुधारक' पत्रिका छपने लगी। इसके सम्पादक श्री शरदाचरण तथा प्रकाशक श्री अयोध्या प्रसाद शर्मा थे। सागर से सन् १९३८ ई. में श्री अब्दुल गनी ने "देहाती दुनिया' तथा केसरी प्रेस बांदा से साप्ताहिक "मुखिया' का प्रकाशन मास्टर नारायण प्रसाद ने प्रारम्भ किया। इसके सम्पादक श्री देवदत्त शास्री "विरक्त' तथा सह सम्पादक श्री राजाराम श्रीवास्त एडवोकेट थे। इसका मुख्य शीर्ष मानस की पंक्ति 

मुखिया मुख सो चाहिए, खान पान को एक।
पाले पोपे सकल अंग, तुलसी सहित विवेक।।

सन् १९४० ई. में उरई से मासिक पत्र "आनन्द' छपा इसके सम्पादक श्री कैलाश नाथ प्रियदर्शी थे। सन् १९३८६ ई. में श्री गयाप्रसाद गुप्त "रसाल' ने साप्ताहिक "वीरेन्द्र' निकाला जो कालान्तर में लखनऊ से छपने लगा। सन् १९३७ ई. में पं. गोविन्द नारायण तिवारी ने उरई से साप्ताहिक "दर्शक' का प्रकाशन किया। कालान्तर में यह कोच से श्री गया प्रसाद "रसाल' द्वारा प्रकाशित होने लगा। श्री वीरभद्र तिवारी - सहयोगी श्री चन्द्रशेखर आजाद - ने साप्ताहिक पत्र "प्रहरी' निकाला। कोंच से ही सन् १९४४ ई. में हमीरपुर से साप्ताहिक "पुकार' का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। इसके सम्पादक श्री परमेश्वरी दयाल निगम थे। आगे चलकर यह पत्र सन्त श्री मेहरबाबा का मुख्य प्रचारक बन गया। झांसी से "देशी राज्य' प्रकाशित हुआ जिसमें बुन्देलखण्ड के रियासतों के राजाओं तथा सामन्तों के अत्याचार की विशद घटनाएं प्रकाशित होती थी। सन् १९४१ ई. में आचार्य प्रभाकर ने साप्ताहिक "जीवन' निकाला जो भारतीय संस्कृति का परम् प्रचारक था।

वीरेन्द्र केशव परिषद टीकमगढ़ की स्थापना १५ अप्रैल सन् १९३० ई. में महाराज वीर सिंह जूदेव के संरक्षण में हुई। इसके तत्वावधान में पाक्षिक "मधुकर' का प्रकाशन पं. बनारसीदास चतुर्वेदी के सम्पादकत्व में १ अक्टूबर १९४० ई. में बुन्देलखण्ड के लोक साहित्य एवं कला के विकास हेतु प्रारम्भ हुआ। इसकी लागत प्रति अंग रुपये १३ आती थी। यह देशी कागज में छपता था, इसका मूल्य मात्र दो रुपए था। मधुकर ने अनेक विशेषांकों के साथ "बुन्देलखण्ड प्रान्त निर्माण' विशेषांक जनवरी १९४३ ई. में निकाला। इस पत्र के सहयोगी सम्पादक साहित्यकार श्री यशपाल जैन भी थे। सन् १९४४-४५ में इसका प्रकाशन बन्द हो गया किन्तु इसका प्रदेय ऐतिहासिक रहा। सन् १९४३ ई. में दतिया से श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने "विजय' मासिक तथा पन्ना से सन् १९४५ में डॉक्टर हरिराम मिश्र ने मासिक "विन्ध्य भूमि' का प्रकाशन प्रारम्भ किया। सागर से सन् १९४६ ई. में श्री ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी ने साप्ताहिक "विन्ध्य केसरी', श्री रामकृष्ण पाण्डेय ने "पराक्रम' तथा दतिया से श्री जर्नादन प्रसाद पाण्डेय ने "किसान पंचायत' प्रकाशित किया।

पत्रों की ग्राहक संख्या कम होने के कारण अधिकांश समचार पत्रों को आर्थिक संकट झेलना पड़ता था। इन पत्रों ने - साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक - स्थानीय रचनाकारों को पर्याप्त प्रोत्साहन प्रदान किया। स्थानीय महत्व के ऐतिहासक स्मारक, पर्यटन स्थल, लोकगीत आदि सार्वजनिक प्रकाश में आए। इन सबका योगदान स्मरणीय है।

स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद पत्रकारिता शनै:-शनै: प्रगति पथ पर अग्रसर हुई। श्री मन्नीलाल श्रीवास्तव के सम्पादन में साप्ताहिक "दिग्विजय' का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। श्री शंभूदयाल "शशांक' ने साप्ताहिक "लोकमत' को प्रकाशित किया जो १९५८ तक प्रकाशित होता रहा। काल्पी के श्री मन्नीलाल अग्रवाल द्वारा सम्पादित "जयहिन्द' तथा श्री चन्द्रभान विद्यार्थी द्वारा "लोकसेवा' का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ। सन् १९४९ ई. में पं. बेनीमाधव तिवारी ने साप्ताहिक "हलचल' छापा जो सन् १९५२ तक चला। इसका पुनर्प्रकाशन पं. तुलसीराम त्रिपाठी ने प्रारम्भ किया जो सन् १९७९ तक छपता रहा। सन् १९५० ई. में श्री शिवानन्द "बुन्देला' तथा श्री विष्णुदत्त शर्मा द्वारासाप्ताहिक "बुन्देला' का प्रकाशन प्रारम्भ हुआ, जिसने ३० वर्ष की दीर्घायु प्राप्त की। इस पत्र ने जनपदीय साहित्य को पर्याप्त प्रोत्साह प्रदान किया। सन् १९५८ ई. में काल्पी से श्री प्रकाश जैतली ने "संगठन' का प्रकाशन शुरु किया।

बांदा में भी क्रान्तिकारी आन्दोलन का प्रभाव व्यापक था। सन् १९२९-३० ई. में साइक्लोस्टाइल मशीन से "सत्याग्रही' गुप्त रुप से छपता था। इसके सम्पादक सर्व श्री गोकुल भाई तथा रामगोपाल गुप्त थे। इसका मूल्य मात्र एक पैसा था। पं. गोदीन शर्मा ने इसी समय "लोकमान्य' तथा "बुन्देलखण्ड केसरी' सम्पादित कर "केसरी प्रेस' बांदा से छपाया। सन् १९४० में प्रकाशित साप्ताहिक "मुखिया' का प्रकाशन चार वर्ष तक हुआ। श्री रामनाथ गुप्त ने "कान्यकुब्ज वैश्य हितकारी' मासिक पत्रिका निकाली। उर्दू का अखबर श्री रहीम बख्श मुख्त्यार द्वारा लीथो प्रेस में छपा। श्री परमेश्वरी दयाल खरे ने "दुखिया किसान' निकाला तथा अपने प्रेस में छापा। सन् १९५२ ई. में कु. आनन्द सिंह एडवोकेट ने "सत्याग्रही' एवं "दिवाकर' पाक्षिक पत्र निकाले। यह पत्र सत्याग्राही प्रेस में छपते थे। सन् १९५३ ई. में मास्टर नारायण प्रसाद ने अपना पुराना अखबार साप्ताहिक "केसरी' प्रकाशित किया। इसका मुख्य वाक्य था। "क्लैब्यम् मा स्मगमः'। इसके सम्पादक सर्व श्री कैलाश माधव निगम तथा रमेश चन्द्र श्रीवास्तव थे। यह पत्र स्वतन्त्रत विचारों का एवं निर्भीक था। यह पत्र दो वर्ष तक छपा। जिला नियोजन कार्यालय बांदा की ओर से "बांदा पंच' केसरी प्रेस बांदा से छपने लगा। तमन्ना बांदवी ने साप्ताहिक "चित्रकूट सामाचार' छापा। श्री राधाकृष्ण बुन्देली ने "बांदा समाचार' प्रकाशित किया। अनेक पत्र छपे और बन्द हुए।

झांसी में क्रान्ति का शंखनाद फूंकने के लिए श्री रघुनाथ विनायक घुलेकर ने सन् १९२० ई. में "उत्साह' पत्र निकाला। उन्हें कई बार जमानते देनी पड़ी। उन्होंने "दैनिक मातृभूमि' तथा अंग्रेजी में "फ्री इण्डिया' कानपुर से प्रकाशित कराया जो चार वर्ष तक चला। पं. कृष्ण गोपाल शर्मा ने "बुन्देलखण्ड केसरी', साप्ताहिक "क्रान्तिकारी' का सम्पादन किया तथा "श्रमजीवी' और "उत्साह' साप्ताहिक पत्र निकाले। विवेक कटु आलोचक और स्पष्ट वक्ता थे। श्री बेनी प्रसाद श्रीवास्तव ने "दिग्दर्शन', साप्ताहिक "फ्री थिंकर' तथा "बुन्देलखण्ड साप्ताहिक' निकाला। ये स्वतंत्र विचारक थे। मुहम्मद शेर खां ने "हिन्द केसरी' साप्ताहिक निकाला। मि. ऐबट ने "झांसी न्यूज' सरकार के समर्थन में छापा। श्री लखपत राय शर्मा ने "देशी राज्य' साप्ताहिक निकाला जो सन् १९४६ से १९५४ तक छपता रहा। आपने "शहीद' व "जनक्रान्ति' भी छपाए। श्री श्रवण प्रसाद मिश्र ने "प्रजा मित्र' पाक्षिक सन् १९४० में निकाला। जो कालान्तर में दैनिक हो गया। वर्तमान में "दैनिक जागरण' के रुप में मार्च सन् १९४२ ई. से श्री राजेन्द्र गुप्त के सम्पादन में प्रकाशित हो रहा है और अर्द्धशती पूर्ण कर चुका है।

उरई में दैनिक पत्रों की परम्परा सन् १९६० में प्रारम्भ हुई पं. यज्ञदत्त त्रिपाठी ने "दैनिक कृष्णा' तथा श्री जगत्नारायण त्रिपाठी ने "बहेलिया' निकाला। ये सब अल्पजीवी रहे। नियमित दैनिक की परम्परा का श्रीगणेश सन् १९७१ ई. में "दैनिक कर्मयुग प्रकाश' द्वारा हुआ। इसके प्रधान सम्पादक श्री रमेश चन्द्र गुप्त थे। इसी नाम से बांदा से भी दैनिक पत्र का प्रकाशन हो रहा है। श्री शम्भूदयाल "शशांक' ने उरई से प्रकाशित "दैनिक जन उत्साह' का सम्पादन किया। बुन्देलखण्ड पत्रकारिता विशेषांक "उड़ान' प्रकाशित किया। श्री जगदीश प्रसाद द्विवेदी ने दिल्ली से "लोकराज' साप्ताहिक का "बुन्देलखण्ड अंक' २४ मई सन् १९६० ई. को छापा। इसके सम्पादक श्री जयराम शर्मा तथा प्रकाशक श्री मन्नू लाल द्विवेदी थे।

पत्रकारिता के इतिहास में श्री कृष्ण बल्देव वर्मा - काल्पी - पितामह के रुप में पूज्य हैं। सन् १९०१ ई. में प्रसिद्ध मासिक पत्रिका "सरस्वती' में "बुन्देलखण्ड पर्यटन' विशेषांक का सम्पादन किया था। "विशाल भारत' में बुन्देलखण्ड विषयक लेख लिखे थे। श्री वृजमोहन वर्मा - जन्म सन् १९०० ई. काल्पी - ने हास्य व्यंग प्रधान "औघड़' का सम्पादन तथा "विशाल भारत' - कलकत्ता - "साहित्य सौरभ' में प्रकाशित हुए हैं। कोटरा में जन्मे श्री मूलचन्द्र अग्रवाल प्रकाशकों के पितामह हैं। इन्होंने सन् १९११ ई. में दैनिक "विश्वमित्र' तथा "एडवांस' - कलकत्ता - से प्रकाशित किया। इसी श्रृंखला में कालपी में जन्म जागरण समूह के संस्थापक सर्व श्री जयचन्द गुप्त, पूरनचन्द्र गुप्त, गुरुदेव गुप्त तथा जगदीश नारायण रुसिया हैं। यह समूह उ.प्र. तथा म.प्र. का प्रमुख अखबार प्रकाशक हैं। अंतराष्ट्रीय स्तरीय एवं श्रमजीवी पत्रकारिता में ख्यातिप्राप्त श्री जगदीश प्रसाद चतुर्वेदी जगम्मनपुर - जालौन - के मूल निवासी हैं। श्री पन्नालाल श्रीवास्तव - जन्म सन् १९१३ ई. दमोह - ने पत्रकारिता पर एक पुस्तक लिखी तथा "लीडर', "अमृत बाजार पत्रिका', "नार्दन इण्डिया पत्रिका' के सह सम्पादक के रुप में प्रशंसनीय कार्य किया है। श्री बनारसीदास चतुर्वेदी का योगदान बुन्देलखण्ड पत्रकारिता के क्षेत्र में अविस्मरणीय है।

ढारे अभिषेक अंबु मात्र रविजा स्वरुप, रेवा रहि जाके पद पंकज को चूमि है।
उर पे धसान, बेतवा को लासै हार टोंस, चम्बल भुजान भुजबंधन को छूमि है।
प्रातः यह अभिनन्दनीय, पातक निकन्दनीय, वन्दनीय विश्व में बुन्देल भूमि है।
विन्ध्य जैसो अचल न चित्रकूट जैसो कूट, दूसरी दूनी में छवि शीतल अनन्द है।
बेतवा धसान रेवा जमुना पहुज तुल्य सरिता दिखावे नहिं उमगी अनंत ते।
धरती बुन्देल सी धरा न और ठौर कहूं, कर विश्वास देखौ करणी स्वछंद ते।
कर मनुहार देखौ तारन हजारन ते, जांच देखौ सूरज ते पूछ देखौ चंदा ते। 

 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - खेती के औजार (Farming tools )

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

खेती के औजार (Farming tools )

हल

यहाँ पर साधारण हल से काम लिया जाता है। यह और से सभी प्रकार की फसलों की जुताई का काम लिया जाता है।

बख या पटेला

लकड़ी के एक मोटे कुंदे में, लोहे की एक बजभर लंबी पट्टी लगाकर तथा उसमें एक बंब जोड़कर "बखर' बनाया जाता है। इसका काम खेत की घास को उखाड़ने में लिया जाता है।

पहटा

यह तीन या चार गज लंबी मोटी, लकड़ी की घरनी या कड़ी होती है। इसके दोनों सिरों पर रस्सियाँ बाँध कर उनमें बैल जोतते हैं। इससे खेत को बराबर करने तथा मिट्टी को महीन करते हैं।

खुर्पा

इसका प्रयोग मामूली घास- पात को काटने और भूमि को गाड़ने में किया जाता है।

हँसिया

इसका प्रयोग घास तथा फसल काटने में किया जाता है।

नारी या नाख

बाँस की एक पोली नली से बनाई जाने वाले, इस औजार से खेतों में बील बोया जाता है। इसका प्रयोग हल में बाँध करके किया जाता है। इसके द्वारा एक- एक या दो- दो दाना बीज डालना आसान होता है।

फावड़ा

इसका प्रयोग खेतों की क्यारियों को दुरस्त करने के लिए किया जाता है।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेलखण्ड क्षेत्र की नाप-तौल प्रणाली (Measurement system of Bundelkhand Area )

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुंदेलखण्ड क्षेत्र की नाप-तौल प्रणाली (Measurement system of Bundelkhand Area )

बुँदेलखण्ड में प्रायः नाप कर गल्ले का लेन- देन किया जाता था। सेर, मन से नहीं तौला जाता था। नाप से ही भाव होता और बिकता था। इसके साथ- साथ तौल का भी व्यवहार होने लगा। शहरों में और बाजारों में गल्ला तौल का ही लेन- देन होने लगा। यहाँ के गाँव वाले नाप का ही प्रयोग किया करते थे।

नाप :

नाप के लिए विभिन्न पैमानों का प्रयोग किया जाता था। कुछ का विवरण निम्नलिखित है :-

पाली या पहोली

यह लकड़ी या बाँस की कमटी की गोल बाल्टी सी बनी होती है। इसमें भर कर मापा हुआ अनाज विभिन्न स्थानों में से १४ टकाभर निकलता था। प्रायः पैमाने लकड़ी या बाँस के बने होते थे। कहीं- कहीं पीतल के भी पैमाने देखने को मिले हैं। इन पैमानों का हिसाब निम्नलिखित हैं :-

१. ४ पोली १ चौरी
२. २ चौरी १ चौथिया
३. २ चौथिया    १ अद्धा
४. २ अध्दे    १ पैला
५. २ पैला    १ पैली
६. २ पैला    १ माना
७. ८ माना    १ मानी या गौन

कैया

यह मिट्टी की एक डबुलिया किया कुल्हड़ होता है, जिससे दूध, तेल आदि द्रव पदार्थ नापे जाते हैं।

पौसेरिया

मिट्टी का कुल्हड़, जिसमें पाव सेर के लगभग तेल, घी, दूध आदि आता है।

तौल :

झांसी का सेर

यह ८९ कलदार मानी ३३ ३/४ टका बाला शाही के बराबर था और उस समय चलता था।

पक्का या कलेक्टरी सेर

यह ८० कल्दार या ३१ टका बालाशाही भर होता था।

अट्ठाइसा सेर

यह अट्ठाइसा टका बालाशाही, यानी ८२ कल्दार भर होता है। इससे आटा, दाल और चावल तौले जाते हैं।

पच्चीसा सेर

यह पच्चीस टका बालाशाही अथवा ६६११ उ कल्दार भर होता है। इससे घी, महुवा, तंबाकू, नमक, गुड़ आदि तौलते थे।

चौबीसा सेर

यह २४ टका बालाशाही अथवा ६४ कल्दार भर होता है। इससे पच्चीसा के समान वस्तुएँ या केवल घी तौला जाता है।

बीसा सेर

इसको महाराज छत्रसाल ने चलाया था। इससे आटा, दाल आदि तौला जाता था। यह बीस टका बालाशाही के बराबर होता है। वर्तमान काल में भी यह चलता है।

अठरैया सेर

यह १८ टका भर होता था। इससे शक्कर, मेवा, धातु, पीतल आदि को तौला जाता था। 

सुरैया सेर

यह सोरा टका भर होता था, इससे मिठाई तौली जाती थी।

तैरेया सेर

यह तेरह टका भर होता था। इससे रुई की पौनी तौली जाती थी।

बरैया सेर

यह बारह टका सेर भर होता था। इससे रुई तौली जाती थी।

गिरैया सेर

या ११ टका भर होता था। इससे सूत तौला जाता था। 

"एक टका' दो पैसे यानी, आधा आने को कहते हैं। बालूशाही में भी दो पैसे को एक टका कहा जाता था।

तौल के लिए केवल बालाशाही दो पैसे का भर एक टका कहलाता था और उसी के हिसाब से यहाँ के विभिन्न सेर चला करते थे। वर्तमान काल में भी सवा सेर और डेढ़ सेर चलाते हैं। आध सेर, पाव भर, छटांक और आधी छटांक आज भी चलाए जाते हैं। भूमि के नाप के लिए प्रायः यहाँ १ बीघे का व्यवहार होता था। देशी बीघा को छत्रसाली कहा जाता था। यह पैमायशी बीघे से प्रायः डेवढ़ा होता है। इसका प्रचलन बुँदेलखण्ड के बुँदेला महाराज छत्रसाल ने चलाया था। राजा छत्रसाल का सारा माली इंतजाम, इसी से चलाया जाता था। इसमें जरीब के स्थान पर डोरी से काम लिया जाता था। डोरी प्रायः १०० हाथ की होती थी।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड का आर्थिक और औद्योगिक विकास (Bundelkhand's economic and industrial development)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड का आर्थिक और औद्योगिक विकास (Bundelkhand's economic and industrial development)

आर्थिक पिछड़ेपन का दृष्टि से जो स्थान भारत के मानचित्र में उत्तर प्रदेश तथा मध्य प्रदेश का है, वही स्थिति झांसी तथा सागर सम्भाग के जनपदों के दतिया-ग्वालियर सहित है। यहां पर विकास की एक सीढ़ी चढ़ना दुभर है। बुन्देलखण्ड का प्रत्येक ग्राम भूख और आत्महत्याओं की करुण कहानियों से भरा है। प्रतिदिन सम्भाग में १५ बुन्देलखण्डी स्री-पुरुषों सल्फास खाकर आत्महत्या कर लेते हैं। इनमें से झांसी तथा ललितपुर में ३५९ व्यक्ति प्रतिमास आत्महत्या कर लेते हैं। झांसी जनपद में इनमें से १६८ व्यक्तियों ने आत्महत्या की ७३ व्यक्तिभूख से पीड़ित होकर परलोकगामी बने। झांसी में १२० तथा ललितपुर में १३३ की आयु मात्र १५-१६ वर्ष थी। कुंठा, निराशा, अवसाद ने उनके संघर्ष की शक्ति क्षीण कर दी और वेभयंकर कदम उठा बैठै।

बुन्देलखण्ड के विकास पर पानी की कमी और भूमि अनुपजाऊ दो तरफा प्रहार करते हैं। औद्योगिक विकास शून्य है। नौकरी की प्राप्ति तो एक सपना है, फलतः देहातों से निगर्मन दर अत्यधिक ३९ प्रतिशत है जबकि सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश में यह मात्र ११ प्रतिशत है। इस प्रदेश के निवासियों के पास ५-१० एकड़ जमीन है किन्तु दो वक्त का भोजन पाने में असमर्थ हैं। उद्योग विकसित हुए और सिमट गए- कताई मिलें बन्द हो रही हैं। विकास प्राधिकरण झांसी में स्थापित किया गया और सन् १९९७ में बन्द कर दी गई और ३००० श्रमिक जीविकाविहीन हो गए। बांदा जनपद में भी कताई मिल बन्द हो गई है और श्रमिक बेरोजगार हो गए हैं।

सड़कों का नितान्त अभाव है, विद्युत आपूर्ति सीमित होने के साथ'साथ व्यवधान-प्रधान भी है। १००००० व्यक्तियों में कारखानों में कार्यरत श्रमिकों की संख्या १.६ प्रतिशत है जबकि उत्तर प्रदेश में ८.३ प्रतिशत है। उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश की सरकार जन प्रतिनिधियों की अनाक्रमणता के कारण निष्क्रिय एवं उपेक्षा की नीति अपनाए हुए है। बुन्देलखण्ड के निवासी इसे अपनी नियति न मानकर अब संघर्षशील हो रहे हैं।

बुन्देलखण्ड का भौगोलिक क्षेत्र लगभग ७०००० वर्ग किमी. है। जोकि सांस्कृतिक इकाई के रुप् में उकेरती है। यह वर्तमान हरियाणा पंजाब तथा हिमाचल से अधिक है। इसमें उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के १३ जनपद तथा समीपवर्ती भू-भाग है जो यमुना और नर्मदा नदी से आबद्ध हैं। बुन्देलखण्ड में इतने संसाधन है कि वह अपने बहुमुखी उत्थान की आर्थिक व्यवस्था स्वत- कर सकता है। आवश्यकता है तो केवल संसाधनों की उचित खोज व समुचित विकास की।

खनिज सम्पदा

बुन्देलखण्ड खनिज सम्पदा रहित है, यह एक उपेक्षाजनित मि धारणा है। सन् १९०६ ई. में ई. ब्रेडिनवर्ग के उपरांत सन् १९५० ई० में इस क्षेत्र का संवेक्षण कार्य प्रारम्भ हुआ जिसके परिणाम संतोषजनक प्राप्त हो रहे हैं।

लगभग ५००० वर्षों से पन्ना क्षेत्र हीरा उत्पादन के लिए विश्व-विख्यात है। अब यहां हिनौता, मझगवां तथा छतरपुर जनपद के अंगोर नामक स्थान में भी हीरा प्राप्त होने की संभावना है। उत्पादन क्षेत्र विस्तृत हुआ है। लगभग ४०००० कैरेट हीरा निकाला जा चुका है और १४००००० कैरेट के भण्डार शेष है। नई खदानों में से इतना ही प्राप्त होने की संभावना हैं। सन् १९६८ ई० में नेशनल मिनरल डेवलमेन्ट कॉर्पोरेशन पन्ना द्वारा यांत्रिक प्रक्रिया से ६२ मीटर गहरी खुदाइ की जा चुकी है। छिछली खदानें विस्तृत भूखण्ड में फैली हुई हैं। पन्ना में वार्षिक उत्पादन २६००० कैरेट हीरा है, जिससे २ करोड़ रुपये की रॉयल्टी प्रान्तीय सरकार को प्राप्त होती है। संभावित खदानों से आय-वृद्धि की संभावना अधिक है।

बुन्देलखण्ड में वास्तु पत्थर के अक्षय भण्डार हैं। बालू का पत्थर आदि काल से अपने सुहावने रंगों, एक समान कणों नियमित संस्करण, सुगम सुकरणीयता तथा चिरस्थायित्व के लिए समूचे उत्तर भारत में वास्तु पत्थर के रुप में प्रसिद्ध है। ग्रेनाइट पत्थर अपनी गठन, कठोरता, अक्षयता तथा सुन्दरता के कारण अलंकरण पत्थर के रुप में प्रसिद्ध है। विदेशों में जर्मनी, जापान, इटली में इसकी बड़ी मांग है। निर्माण कार्यों में प्रयुक्त होने वाली रेत के यहां असीम भण्डार हैं। कांच उद्योग में प्रयोग होने वाली बालू के निक्षेप इतने बड़े हैं कि सम्पूर्ण भारत की मांग ८० प्रतिशत यहीं से पूरी हो सकती है। अनेक स्थानों में सिलिका की मात्रा ९९.२ प्रतिशत है। कूड़ियों और प्यालियों के निर्माण में गोरा पत्थर कई स्थानों में प्रचुर मात्रा में मिलता है। इसका प्रयोग मृत्तिकाशिल्प तथा दुर्गलनीय ईटों के उद्योगों में होता है। इसके ज्ञात निक्षेपों का आंकलन ४३ लाख टन किया गया है। अन्य भण्डारों का सर्वेक्षण शेष है। बाहुल्यता में पाई जाने वाली ७० किमी. से अधिक लम्बी उत्तर पूर्व-दक्षिण पश्चिम संरेखित स्फटिक शैल भित्तियों से इनका अनुवांशिक संबंध है। अभी हाल में बांदा जनपद और उनके समीपस्थ क्षेत्रों में एल्यूमीनियम अयस्क बॉक्साइट के बृहद भण्डार का पता चला है। यह निक्षेप प्रति वर्ष एक लाख टन एल्यूमीनियम उत्पादन की क्षमात वाले कारखाने को कम से कम ३५ वर्षों तक अयस्क प्रदान कर सकता है। छतरपुर जनपद में चूने के पत्थर प्रचुर भण्डार हैं, अन्य स्थानों में सर्वेक्षण शेष है। बांदा जनपद में झोंका भट्टी के उपयुक्त गालक श्रेणी के डोलोमाइट का आंकलित निकाय लगभग ६० करोड़ टन से अधिक है। मृतिका शिल्प की उपयुक्त सफेद चिकनी मिट्टी के बृहद भण्डार है। ज्ञातव्य निक्षेपों का आकलन ५ लाख टन से अधिक है। बांदा जनपद के लखनपुर खण्ड में यह २ लाख टन से अधिक है। बुन्देलखण्ड में पाए जाने वाले खनिजों में फोस्फोराइट, गैरिक जिप्सम, ग्लैकोनाइट, लौह अयस्क, अल्प मूल्य रत्न आदि हैं। संभावित खनिजों कीसूची में तांबा, सीसा, निकिल, टिन, टंगस्टन, चांदी, सोना आदि हैं। बुन्देलखण्ड के एक बड़े भू-भाग चौरई में ग्रेनाइट चट्टानें पाई जाती हैं। यह चट्टानें अधिकतर रेडियोधर्मी यूरेनियत युक्त होती हैं तथा इसकी मात्रा ३० ग्राम प्रति टन तक हो सकती है। ललितपुर में हुए सर्वेक्षण के द्वारा इस संभावना को बल मिला है।

सीसा अयस्क, - गैलिना - टीकमगढ़ जिले में बन्धा बहादुरपुर तथा दतिया जनपद में पए जाते हैं। टीकमगढ़ जिले में ग्रेनाइट पॉलिकिंशग का कारखाना स्थापित किया जा सकता है। विदेशों में मिरर पॉलिश हेतु बहुत मांग है। दतिया, टीकमगढ़, छतरपुर जिले में पायरोंफायलाइट, - पोतनी माटी - औद्योगिक दृष्टि से उपयोगी है। एस्वेस्टेस तथा निकिल की प्राप्ति सागर जनपद में है। लौह अयस्क टीकमगढ़, छतरपुर, सागर जिले में प्राप्त हैं। ताम्र अयस्क के भण्डार छतरपुर, बॉक्साइट के भण्डार पन्ना, सागर तथा मणि पत्थर दतिया में प्राप्त हैं।

लौह अयस्क के भण्डार मानिकपुर - कर्बी-, बेरवार - बेरार - ललितपुर में अनुमानतः १० करोड़ टन खनिज के हैं। इसमें ३५ से ६७ प्रतिशत लौह प्राप्त हैं जो स्पंज आयरन हेतु उपयोगी है। सोनरई - ललितपुर - में ४०० मीटर से १००० मी. लम्बे तथा १ से ३ मीटर मोटे ताम्र अयस्क भण्डार हैं, जिनमें ०.५ प्रतिशत तांबा है। शीशे के बालू, बरगढ़ - कर्वी - में अनुमानतः ५ करोड़ टन है जो विभिन्न स्तरीय है। नरैनी - बांदा में स्वर्ण की प्राप्ति २ ग्राम प्रति टन है। बॉक्साइट भण्डार बांदा में ८३ टन अनुमानित है। 

जल संसाधन

चम्बल, सिन्ध पहुज, बेतवा, केन, धसान, पयस्वनी आदि उद्गम स्रोत होते हुए भी विन्ध्य शैल समूह को जलविहीन माना० जाता है। जल आपूर्ति बुन्देलखण्ड की अत्यन्त जटिल समस्या हैं। वर्षा ॠतु में विप्लवी बाढ़, जान औश्र माल की भीषण हानि करती हैं। वही जल ग्रीष्म में विपत्ति का कारण बन जाता है। सूखा पड़ जाने पर दुर्भिक्ष मनुष्य और घरेलू पशुओं की मृत्यु का कारण बन जाता है। यह स्थिति दैवीय प्रकोप नहीं, मानवीय उपेक्षा का एक ज्वलन्त उदाहरण है। पर्यावरणीय निम्नीकरण द्वारा उत्पन्न पारिस्थितक असुतंलन तथा उपलब्ध जल संसाधन के विकास में उदासीनता ही वर्तमान जलाभाव का मुख्य कारण है। बुन्देलखण्ड में औसतन ७०००० लाख टन घन मीटर पानी प्रति वर्ष वृष्टि द्वारा उपलब्ध होता है। दुर्भाग्य का विषय है कि इसका अधिकांश भाग तेज प्रवाह के साथ निकल जाता है और जो भाग भूमिगत हो जाता है उसके बारे में किसान को जानकारी नहीं होती। बुन्देलखण्ड की भूमि की उर्वरता विलक्षण है, मौसम की अनियमितता ही प्रायः उत्वादन में अवरोध करके दुर्भिक्ष की स्थिति उत्पन्न करता है। सूखा एवं दुर्भिक्ष यहां के नियमित अतिथि है। यहां जल की कमी नहीं वरन् व्यवस्था की अनियमितता है जो मुख्यतः उपेक्षाजनित है।

केन्द्रीय सिंचाई एवं विद्युत मन्त्रालय के भौमजल सांख्यकी सन् १९८५ के अनुसार बुन्देलखण्ड में १३१०२१ लाख घन मीटर भौम जल प्रतिवर्ष उपलब्ध रहता है। इस विशाल भण्डार में केवल १४३५५ लाख घन मीटर जल का ही उपयोग किया जाता है। शेष ११६६६६ लाख घन मीटर प्रतिवर्ष अछूता ही रह जाता है। पूरी क्षमता का १०.९५ प्रतिशत ही उपयोग में लिया जाता है। विभिन्न जनपदों में ३.२ से ३१.१ ही भौम जल का उपयोग प्रतिवर्ष होता है। न्यूनतम उपयोग दमोह तथा बांदा जपनद में तथा अधिकतम टीकमगढ़ में ३१.१ प्रतिशत होता है। जलोढक का विस्तार बुन्देलखण्ड के उत्तरी भाग में है। इसका क्षेत्रफल लगभग १२९३१ वर्ग किमी. है। गहराई में यह कुछ मीटर से लेकर दो सौ मीटर से अधिक है। यहां पर २ से ३५०० लीटर तक पानी देने वाले क्षमता के नलकूप अनेक स्थानों पर लगाए जा सकते हैं। बांदा, राठ, गोपालपुर, मऊ तथा अतर्रा आदि स्थान इसके उदाहरण है।

ग्रेनेटिक क्षेत्र का विस्तार १४६२८ वर्ग किमी. है। भौम जल अधिकतर शैल संधियों तथा अपाक्षी शैल में रहता है। संधि नमन ८० डिग्री तक हो सकता है, यहां पर ७५० से ११०० ली. प्रति मिनट तक देने वाले क्षमता के कूप यानलकूप सुगमता से लगाए जा सकते हैं। कुछ स्थानों में इससे अधिक क्षमता वाले नलकूपों का निर्माण भी संभव है। भू भौतिकी सर्वेक्षण इसमें सहायक हो सकती हैं।
पठारी क्षेत्र भी बुन्देलखण्ड में प्राप्त है। चित्रकूट क्षेत्र के इसी शैल समूह में गुप्त गोदावरी, हनुमानधारा कोटितीर्थ, देवांगना, बांके-सिद्ध आदि जलस्रोत है। अनुसुइया नामक स्रोत से ग्रीष्मकालीन जलप्रवाह ८४९५० ली. प्रति मिनट है। चित्रकूट जनपद के पाठा क्षेत्र में गत सर्वेक्षण से ज्ञात हुआ कि १५० से लेकर २०० मीटर बालू की तह के नीचे चूने के शैल समूह में अटूट भौम जल का भण्डार है। यहां नलकूपों का निर्माण किया जा सकता है, परंतु दुर्भाग्यपूर्ण है कि स्वतन्त्रता प्राप्ति के ५० वर्ष उपरांत भी यह क्षेत्र उपेक्षित है।
उत्तर प्रदेश एवं मध्य प्रदेश के क्षेत्रों में जल विवाद से बुन्देलखण्ड - उत्तर प्रदेश - की सिंचाई समस्याग्रस्त हो गई है। बुन्देलखण्ड - मध्य प्रदेश - के १५ बांधों में सिल्ट जमा होने से बांधों की जलक्षमता प्रभावित हुई है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र तीस लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फैला है। इनमें से २४ लाख हेक्टेयर कृषि योग्य है। बुन्देलखण्ड - उ.प्र. - में १२ लाख हेक्टेयर क्षेत्र को कमाण्ड करती है। दुर्भाग्यस्वरुप इनमें से मात्र चार लाख हेक्टेयर भूमि को ही सही अर्थ में सींच के लिए पानी दे पाता है। सिंचाई विभाग इसे छः लाख हेक्टेयर बनाने के लिए प्रयासरत है। बेतवा, धसान, केन, जामिनी नदियां मध्य प्रदेश से बहकर आती है। मध्य प्रदेश इन्हें प्रमुखतया अपने क्षेत्र में प्रयोग करना चाहता है। सिल्ट जमा होने के कारण रनगवां बांध के जल भण्डारण की क्षमता ५.४८ टी.एम.सी. से घटकर ३.४६ टी.एम.सी. रह गई है। बुन्देलखण्ड - उ.प्र. को स्वाभाविक रुप् से कम जल मिलेगा। विवादों को निपटाने के लिए मध्यप्रदेश क्षेत्र के परिषद का गठन किया गया, किन्तु २५ वर्षों से सभी मामले लम्बित ही पड़े हैं। मुख्यमंत्री स्तर की बैठकें लाभहीन रही हैं। मं.प्र. सरकार केन नदी पर ग्रेटरगंगऊ बांध का निर्माण करने जा रही है। इसमें २१४ टी.एम.सी. पानी भराव की क्षमता रहेगी। म.प्र. सरकार इसका आधा भाग पानी का मांग कर रही है। उ.प्र. सरकार का हिस्सा कितना होगा अभी भी अनिर्णीत है। आने वाले पांच वर्षो में बुन्देलखण्ड - उ.प्र. का सिंचित भाग ऋसोन्मुख होगा। तालाबों की संख्या एवं क्षेत्रफल में क्रमशः कमी हो रही है। नलकूपों की संख्या कागजी आंकड़ों में बढ़ती रहती है, यथार्थ में नहीं। नलकूपों एवं हैण्डपम्पों में अव्यवस्था का प्रभाव कुओं पर विपरीत पड़ता है, सिंचाई का क्षेत्रफल सिकुड़ रहा है। बोई हुई भूमि में सिंचाई का प्रतिशत बुन्देलखण्ड में ३४.५ प्रतिशत जबकि उ.प्र. में ८४.२ प्रतिशत है।

शक्ति विभव

बढ़ते हुए पानी का आयतन तथा वेग ऊर्जा विभव का घातांक है। बेतवा नदी का प्रभाव ठुकवां बांध पर वर्षा ॠतु में १६८०० घन मी. प्रति सेकेण्ड होता है जो ग्रीष्म में घटकर ०.५६ घनमी. प्रति सेकेण्ड सिकुड़ जाता है। पयस्वनी का प्रभाव वर्षा ॠतु में २१८४ घन मी. प्रति सेकेण्ड, ग्रीष्म में न्यूनतम प्रवाह ०.४२ घन मीटर रह जाता है। यह शक्ति यदि साधित संचित कर उपयोग में लाई जाए तो प्रदेश की भूमि तथा जन का कल्याण हो जाए। बांध, बंधियां तथा बंधी से मृदा अपरदन को रोका जा सकता है और विद्युत उत्पादन के प्रयोग में लाया जा सकता है। इस प्रदेश का विद्युत उत्पादन आन्तरिक उपभोग के लिए पर्याप्त है। राजघाट और घुरवारा बांध के पूरा हो जाने से २०० मेगावाट का उत्पादन होने के साथ लगभग पांच लाख एकड़ भूमिकी सिंचाई का लाभ प्राप्त होगा। इससे प्रदेश की गरीबी, पिछड़ापन हटाने में सहयोग प्राप्त होगा। केन एवं बेतवा नदी को छोड़कर अन्य नदियों का जल बिना उपयोग के यमुना नदी में प्रवाहित हो जाता है। मौदहा, उर्मिल, रोहिणी, जसनाम, सहजाद, सिजारा, बाघेन आदि योजनाओं पर बांध निर्माणाधीन है। बीना में ६०० मेगावाट विद्युत उत्पादन की परियोजना स्वीकृत है।

वन उत्पादन

वन के दो रुप हैं। १. रक्षण २. उत्पादन    प्रथम पर्यावरण रक्षक है, बहाव अवरोधक है, मृदा अपरदनरोधक है, वृष्टि उत्प्रेरक तथा भूमि ताप नियंत्रक है। राष्ट्रीय वन्य नीति के अनुसार ३३ प्रतिशत भू-भाग में वन होना चाहिए। इसके प्रतिकूल बुन्देलखण्ड में केवल ९ प्रतिशत ही वन है। पन्ना दमोह सागर जनपदों में वनों का क्षेत्रफल ३२ प्रतिशत है। उच्च कोटि के सागौन तथा शीशम की लकड़ी की अत्यधिक मांग है। तेन्दू की पत्ती के कारण हजारों परिवारों का भरण-पोषण होता है। बुन्देलखण्ड विकास निगम लाखों रुपये की आय प्राप्त कर रहा है। खैर की लकड़ी से कत्था उद्योग चल रहा है। औषधि निर्माण के लिए कच्चे माल की कमी नहीं है। महुआ खाने तथा तेल निकालने के काम आता है। बेल, आंवला, बहेरा, अमलतास, अरुसा, सपंगंधा,उ गिलोय, गोखरु आदि प्रचुर मात्रा में मिलते हैं। फलों में शरीफा, बेर, चिरौंजी, खजुरिया, करौंदा आदि होते हैं। कई स्थानों पर बबूल की गोंद बड़ी मात्रा में एकत्रित की जाती है, इनके माध्यम से टिम्बर फर्नीचर औषधि, कागज खिलौने, माचिस, सेन्ट आदि का कच्चा माल प्रदान करने में प्रदेश सक्षम है। वन्य प्राणी भी हमारी राष्ट्रीय सम्पदा है। उनकी सुरक्षा भी समय की पुकार है तथा पर्यटन आय में सहायक है। परोक्ष रुप से सूखा तथा बाढ़ को वन सम्बर्धन द्वारा यथासमय नियंत्रित किया जा सकता है। शहद एवं लाख - चपरा - उत्पादन भी लाभप्रद व्यवसाय है।

मत्स्य पालन

बुन्देलखण्ड में तालाबों और नदियों में मत्स्य पालन का व्यवसाय खूब चल रहा है। अपनी पूर्ण क्षमता से बहुत नीचे है, थोड़े सुधार से इनका पालन बढ़ाया जा सकता है। तालाबों में पुराव, विच्छेद के कारण संचय क्षमता कम हो रही है। वायुमण्डलीय तापमान ५० डिग्री से. तक तथा अधिक हो जाने से वाष्पन अधिक होता है। ८ फुट से कम गहरा पानी मत्स्य पालन के लिए प्रतिकूल है। मत्स्य व्यापार के लिए शीत पैकिंग तथा तीव्रगामी यातायात अत्यन्त आवश्यक है। बुन्देलखण्ड में भाकुर, रोहू, मृगाल, कठरोहू पडहिन, झींगा आदि प्रमुख है। माहसीर बहते पानी की मछली बहुतायत से पाई जाती हैं। यहां की झीलों में हिल्सा मत्स्य पालन भी संभव है। बुन्देलखण्ड के २० लाख हेक्टेयर कुल जल में से केवल आठ लाख हेक्टेयर का ही उपयोग किया जा रहा है। इसके समुचित विकास से कई गुना आय प्राप्त की जा सकती है।

पर्यटन

पर्यटन एक सुनियोजित उद्योग है। इसके विकास की बुन्देलखण्ड में अपरिमित संभावनाएं है। यहां अनेकों स्थानों में मिले, महल, भग्नावशेष तथा स्थापत्य कला की अनूठी छवियां हैं। देखें तो बुन्देलखण्ड ऐतिहासिक, धार्मिक, सांस्कृतिक स्मारकों का एक कोषागार है। छतरपुर जनपद में मलहरा के निकट चारों ओर वन से घिरा भीमकुण्ड अत्यन्त रमणीक है। पन्ना के वृहस्पति तथा भैरव कुण्ड दर्शनीय है। महोवा के विजयसागर के अपनी छटा है। केन नदी के रनेह तथा पाण्डव प्रपात पर्यटकों को अकर्षित कर सकते हैं। ओरछा और चित्रकूट तपोभूमि है। कालीं का स्वर्गवाह कुण्ड और भैरव की मूर्ति पर्यटकों को आकर्षित करने में सक्षम है। जैनियों के महत्वपूर्ण तीर्थ सोनागिरि, द्रोणागिरि, देवगढ़ राष्ट्रीय तीर्थ हैं। शिल्प तथा स्थापत्य कला में खजुराहों अन्तर्राष्ट्रीय सांस्कृतिक निधि है। २९ मार्च १९९८ से वर्ष पर्यन्त खजुराहों की सहस्राब्दी मनायी जा रही है। सन् १९८९ ई. में २०५८१५ पर्यटक आए। इनमें से ४२७४८ विदेशी थे। सन् १९९२ ई. में १२३५१७ पर्यटक आए, जिनमें से ३५३३३ विदेशी थे। पर्यटन व्यवसाय वृद्ध् के साथ मंदिरों का संरक्षण भी अत्यन्त आवश्यक है। मुम्बई, बनारस के साथ दिल्ली और कलकता से हवाई यात्र संभव होनी चाहिए। बुन्देलखण्ड में प्रत्येक रुचि के पर्यटक के लिए आकर्षक है। पर्यटन उद्योग को बढ़ाने के लिए प्रचुर सामग्री तथा विभव है। आवश्यक है इसे बहुमुखी बनाने हेतु यातायात, निवास की सुविधाएं अत्यधिक बढ़ाई जाए। झांसी'मिर्जापुर राजमार्ग तथा चित्रकूट-कलीं मार्ग के चौड़ीकरण से पर्यअन उद्योग को लाभ प्राप्त होगा। उपेक्षित ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक स्थानों को पर्यटन मानचित्र में उचित स्थान प्राप्त होना चाहिए। दतिया तथा छतरपुर आदि महलों का उपयोग उत्तम होटल के रुप में किया जा सकता है।

उद्योग

औद्योगिक दृष्टि से बुन्देलखण्ड में बड़े उद्योगों का नितांत अभाव है। डायमण्ड सीमेन्ट वक्र्स नरसिंहगढ़ - दमोह- भारत हैवी इलेक्ट्रिक लिमिटेड झांसी, वैद्यनाथ औषधि निर्माण आदि उल्लेखनीय हैं। मध्यम एवं लघु उद्योग भी अत्यल्प संख्या में है। रानीपुर का टेरीकॉट - वस्र उद्योग - बीड़ी उद्योग आदि रोजगार प्राप्ति के लघु प्रयास हैं। बीना तेल शोधक परियोजना को पर्यावरणीय स्वीकृति प्राप्त हो गई है, जिसमें ६४०० करोड़ की पूजीं लगेगी। ६० लाख टन ली. क्षमता का तेल शोधक संयन्त्र भारत तथा ओमान सरकार के सहयोग से स्थापित होगा। गुजरात के बाड़ीमार्ग से ९४३ किमी. दूर से कच्चा तेल पाइप लाइन से यहां आएगा। जुलाई २००१ ई. तक यह परियोजना चालू हो जाएगी। चमड़ा शोधन कारखाना वृहद स्तर पर स्थापित हो रहा है। नेप्था उत्पादन का कारखाना भी समीप में स्थापित हो रहा है। ललितपुर में सतना तथा महोबा से खजुराहों रेल लाइन की परियोजना को स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है। इसके निर्माण से अनेक उद्योग स्थापित हो सकेंगे। बुन्देलखण्ड की खनिज सम्पत्ति यथा कांच उद्योग तथा अनेक उद्योगों को स्थापित करने में यह प्रदेश समर्थ है।

मण्डीद्वीप - भोपाल - के औद्योगिक अवशिष्ट, डिस्टिलरी तथा चर्म उद्योग का अवशिष्ट बेतवा नदी के जल में प्रवाहित किया जा रहा है। जिसका दुष्प्रभाव करवई एवं समीपस्थ ग्रामों की जनता एवं उनके पशुओं को भोगना पड़ रहा है। १९.५ करोड़ रु. की सफाई योजना अपार्यप्त सिद्ध हो रही है।

कृषि

खेंती परिवार के सदस्यों की उदर पूर्ति तक सीमित न होकर उद्योग का स्वरुप प्राप्त कर रही है। समुचित सिंचाई से दो या तीन फसलों तथा नकदी फसलों - सोयाबीन, गन्ना, पटसन, तिलहन - प्राप्ति के माध्यम बन सकती है। फल तथा मसालों का उत्पादन भी किया जा सकता है। बुन्देलखण - उ.प्र. में प्रति हेक्टेयर २२७ किग्रा. खाद्य का उपयोग किया जाता है, जबकि उ.प्र. में इसकी मात्रा ५६८ किग्रा. है। बुन्देलखण्ड पान के उत्पादन के लिए प्राचीन काल से विख्यात है। देशावरी पान लगभग ५-६ करोड़ रु. का निर्यात होता है, सरकारी आकड़ा दो करोड़ रुपये का है। ललितपुर तथा छतरपुर - म.प्र. जनपद भी पान के उत्पादन के लिए ख्याति प्राप्त है। महोबा में पान प्रयोग और प्रशिक्षण केन्द्र स्थापित है। २८ कतारों के बारजा का ब्यय रु. ७००००/- आता है। उचित संरक्षण से पान निर्यात में वृद्धि हो सकती है।

बुन्देलखण्ड का पिछड़ापन कुछ सीमा तक उ.प्र. और म.प्र. की संयुक्त नीतियों के अभाव के कारण वर्तमान है। प्रसिद्ध तीर्थ चित्रकूट पयस्विनी नदी के इस पार और उस पार के उ.प्र., म.प्र. के विभाजन से अविकसित है। इसी प्रकार ओरछा झांसी के अत्यन्त सन्निकट है। कालीं और खजुराहो भी दोनों सरकारों के संयुक्त नीतियों के अभाव में दुष्प्रभावित है। डाकुओं की समस्या को दोनों सरकारों की सीमा सन्निकटता से प्रश्रय प्राप्त होता है और उनका दमन दुष्कर हो जाता है।
औद्योगिक दृष्टि से इसके पिछड़ेपन का उदाहरण जनपद - उ.प्र. - जिलाख्यक्षों के दिसम्बर १९९८ मास की बैठक में स्पष्ट हुआ। हमीरपुर के जिलाध्यक्ष ने बयान दिया कि ५०० एकड़ उद्योग क्षेत्र में २० लघु उद्योग चल रहे हैं, शेष बीमार हैं। इस सम्मेलन में चमड़ा, सीमेन्ट, पॉटरी तथा चित्रकूट में फिल्म इण्डस्ट्री की संभावनाओं पर विचार किया गया तथा तीस करोड़ रुपये उ.प्र. शासन द्वारा विकास हेतु स्वीकृत किए गए।

बुन्देलखण्ड विकासशील प्रदेश है और विकास की असीमित संभावनाओं को कोख में संजोए हुए है। जीवन की मूलभूत आवश्यकता जल प्राप्ति के संघर्षों में जूझ रहा है। पाठा - चित्रकूट - ऐसा प्रदेश है, जहां समाज अपनी बेटियों को व्याहने में संकोच करता है। जहां नारी अपीन अस्मिता को खोकर गाती है या रोती हैं- "भौरां तेारा पानी गजब करा जाए। गगरी न फूटे खसम मर जाए।' उसे परिवार की प्यास बुझाने हेतु तपती चट्टानों पर चलते हुए एक किमी. से अधिक दूरी से जल लाना होता है। डॉ. सुरेश चन्द्र अवस्थी के अनुसार पाठा क्षेत्र के भूगर्भ में १२ किमी. चौड़ी तथा ११० किमी. लम्बी नदी बहती है, जिसमें से ४०००० गैलन प्रति घण्टे के हिसाब से प्राप्त किया जा सकता है। प्रतिवर्ष पेयजल हेतु ६०-७० करोड़ रुपये का बजट बनता है पर प्रतिफल कुछ नहीं - यह दुर्भाग्य ही है या जीवन के साथ खिलवाड़।

डॉ. भारतेन्दु प्रकाश ने "जल बिच मीन प्यासी' पुस्तिका में जल सम्भरण के आधार पर जनपद सतना को भी विशेषकर मझगवां विकास खण्ड को बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण अंश माना है जो भाषाई और सांस्कृतिक संबंधों से ही नहीं जल प्रवाह व्यवस्था से जुड़ा हुआ है।
कुंवर महावीर सिंह - एम.एल.ए. के अनुसार बुन्देलखण्ड - उ.प्र. का दूसरा नाम सूखा और अकाल क्षेत्र है। सन् १९०६-५१ के बीच २० वर्ष सूखा पड़ा। सन् १९५६-५८ के बीच सिंचित क्षमता मात्र २३.३५ प्रतिशत है। १०० वर्ष पूर्व पारिवारिक सदस्य अपने पुत्र-पुत्रियों को अकाल के समय २-४ जून भोजन के प्राप्ति के बदले बेच देते थे और असहाय होकर आत्महत्या स्वयं कर लेते थे।

आवश्यकता है कि दीर्घावधि की योजनाएं बनाई जाएं, नदियों और नालों में बांध-बन्ध्यिा बनाई जाएं तथा वृक्षारोपण अभियान दृढ़तापूर्वक चलाए जाएं। एक इकाई के रुप में बुन्देलखण्ड अपने वृहद संसाधनों का अपने अनुरुप पूर्णरुपेण विकास करने में सर्वसमर्थ है।

बुन्देलखण्ड - क्षेत्रफल एवं जनसंख्या
१. बांदा - चित्रकूट    ७३२४ वर्ग किमी.    १८.७४ लाख
२. हमीरपुर - महोबा    ७१६५ वर्ग किमी.    १४.६५ लाख
३. झांसी    ५०२४ वर्ग किमी.    १४.२६ लाख
४. ललितपुर    ५०३९ वर्ग किमी.    ७.४५ लाख
५. जालौन    ५५६५ वर्ग किमी.    १२.१७ लाख
६. पन्ना    ७१३५ वर्ग किमी.    ५.९५ लाख
७. छतरपुर    ८६८७ वर्ग किमी.    ९.३५ लाख
८. टीकमगढ़    ५०४८ वर्ग किमी.    ७.८१ लाख
९. दतिया    २०३८ वर्ग किमी.    ३.०७ लाख
१०. दमोह    ७३०६ वर्ग किमी.    ७.३४ लाख
११. सागर    १०२५२ वर्ग किमी.    ११.६५ लाख
संलग्न क्षेत्र लहर - दतिया

तथा अन्य
योग    २२०० वर्ग किमी.    १२.५६ लाख
सन् २००० ई. में जनसंख्या अनुमानतः औद्योगीकरण विकास के उपरान्त दो करोड़ होने की संभावना है।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देली काव्य का ऐतिहासिक संदर्भ (Historical context of Bundelli poetry)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देली काव्य का ऐतिहासिक संदर्भ (Historical context of Bundelli poetry)

छत्रसाल के समय में जहां बुन्देलखण्ड को "इत जमुना उत नर्मदा, इत चम्बल उत टोंस" से जाना जाता है। वहां भौगोलिक दृष्टि जनजीवन, संस्कृति और भाषा के संदर्भ से बुन्देला क्षत्रियों के वैभवकाल से जोड़ा जाता है। बुन्देली इस भू-भाग की सबसे अधिक व्यवहार में आने वाली बोली है। विगत ७०० वर्षों से इसमें पर्याप्त साहित्य सृजन हुआ। बुन्देली कााव्य के विभिन्न साधनाओं, जातियों और आदि का परिचय भी मिलता है। काव्रू का आधार इसीलिए बुन्देलखण्ड की नदियां, पर्वत और उसके वीरों को बनया गया है। विभिन्न प्रवृत्तियों और आन्दोलनों के आधार पर बुन्देलखण्ड काव्य के कुल सात युग माने जा सकते हैं, जिन्हें अध्ययन के सुविधा से निम्न नामों से अभिहित किया गया है।

१. भाषा काव्य आन्दोलन - नवीं शती विक्रमी से तेरहवीं शती तक
२. कथा काव्य काल - तेरहवीं से सोलहवीं शदी विक्रमी तक
३. रीति भक्ति काव्य काल - सत्रहवीं शदी से सत्रहवीं शती विक्रमी तक।
४. सांस्कृतिक उन्मेष काल - सत्रहवीं शती से अट्ठाहरवीं शती विक्रमी तक।
५. श्रृंगार काव्य काल - अट्ठारहवीं शती से उन्नीस सौ पचास विक्रमी तक।
६. स्वतन्त्रता पूर्व आधुनिक - सम्वत् १९५० से २००० विक्रमी तक।
७. अत्याधुनिक काल - सम्वत् २००० से अब तक।

भाषा काव्य आन्दोलन काल : - ९वीं शती विक्रमी से १३वीं शती विक्रमी तक 

छान्दस का संस्कृत में अपभ्रंशी के माध्यम से लोक भाषा में विकसित होना, एक घटना नहीं है, यह समय की आवश्यकता रही है। छान्दस, प्राकृत संस्कृत और अपभ्रंश के समीकरणों पर अनेक विचार दिए गए हैं। छठी शताब्दी में अपभ्रंश का प्रयोग भाषा के रुप में मिलता है। १२वीं शताब्दी तक वह साहित्यिक भाषा सी रही है पर जनपदीय बोलियों से यह भी मुक्त नहीं मानी गयी है। नव्य भारतीय आर्य भाषा का विकास मध्य देशीय शौरसेनी से माना गया है और अपभ्रंश के विकासोन्मुख रुप ग्रहण करते समय अवह की स्थिति मानी गयी। अवह का प्रयोग सबसे पहले अपभ्रंश के लिए हुआ है। अनेक जैन रचनाएं बौद्ध रचनाएं , नाथ पंथियों की रचनाएं आदि समाने आयी है। सिद्धों ने जिस भाषा का प्रयोग किया है वह लोक भाषा अधिक है। हिन्दी का प्रारंभिक नाम भाषा ही कहा गया है।

भाषा के स्वरुप में अनेक परिवर्तन एवं समृद्धियां आयीं। मौखिक परम्परा से भी काव्य सृजन हुआ। यह लोक काव्य तक ही सीमित रहा है। लिखित काव्यों में कथा काव्यों की भरमार रही है। इनमें प्रमुख कृति विष्णुदास लिखित रामायण कथा, महाभारत कथा, रुक्मिणी मंगल, स्वर्गारोहण कथा आदि ऐसी कृतियां है, जिनसे भाषा काव्य की परम्परा पर प्रकाश पड़ता है। भाषा काव्य के प्रारम्भिक चरण में जिस कृति को प्रस्तुत किया गया हैं वह स्थानीयता के प्रभावों से प्रायः मुक्त है। इसलिए किसी भी बोली से प्रारम्भिक रुप से मेल खाती, व्यापक भाषा का स्वरुप प्रस्तुत करती है।

मौखिक परम्परा के महाकाव्य आल्हाखण्ड का वैशिष्ट्य बुन्देली का अपना है। महोवा १२वीं शती तक कला केन्द्र तो 
रहा है जिसकी चर्चा इस प्रबन्ध काव्य में है। इसकी प्रामाणिकता के लिए न तो अन्तःसाक्ष्य ही उपादेय और न बर्हिसाक्ष्य। इतिहास में परमार्देदेव की कथा कुछ दूसरे ही रुप में है परन्तु आल्हा खण्ड का राजा परमाल एक वैभवशाली राजा है, आल्हा और ऊदल उसके सामन्त है। यह प्रबन्ध काव्य समस्त कमजोरियों के बावजूद बुन्देलों जन सामान्य की नीति और कर्तव्य का पाठ सिखाता है। बुन्देलखण्ड के प्रत्येक गांवों में घनघोर वर्षा के दिन आल्हा जमता है।

भरी दुपहरी सरवन गाइये, सोरठ गाइये आधी रात।
आल्हा पवाड़ा वादिन गाइये, जा दिन झड़ी लगे दिन रात।।
 

आल्हा भले ही मौखिक परम्परा से आया है, पर बुन्देली भूमि संस्कृति और बोली का प्रथम महाकाव्य है, जगनिक इसके रचयिता है। भाषा काव्य में बुन्देली बोली का उत्तम महाकाव्य स्वीकार किया जाना चाहिए। बुन्देली बोली और उसके साहित्य का समृद्ध इतिहास है और भाषा काव्यकाल में उसकी कोई भी लिखित कृति उपलब्ध नहीं है।

कथा काव्य काल :- १३वीं शती विक्रमी से १६वीं शती विक्रमी तक  

कथा काव्य प्रबन्ध काव्य का ही एक भेद है जिसमें महाकाव्य के विधान की ही हर चीज होती है परन्तु कथा सहज प्रवाह युक्त बिना किसी गम्भीर गहन जीवन दर्शन के होती है। बुन्देलाण्ड में जगनिक के बाद विष्णुदास ही ऐसे कवि हैं जिन्होंने १४वीं शती में दो कथा काव्य महाभारत कथा और रामायण कथा लिखी। इन दोनों कथाओं का आधार कृष्ण कथा और रामकथा है पर उनके निर्वाह की शैली में संस्कृत कथा काव्यों और हिन्दी कथा काव्यों से भिन्नता है। यह बुन्देली के प्रथम ग्रन्थ है। बुन्देली ब्रज की सहोदरा दीर्घकाल तक मानी गयी है। जब तक उसका बुन्देली अस्मिता को बृज से आक्रान्त करने पर भी कोई क्षति नहीं पहुंची। बुन्देली माटी के कवि विष्णुदास की रचनाएं अनेक समय तक अज्ञात रहीं। जब बुन्देली पीठ सागर के प्रकाश में आयी तो उनमें बुन्देली का मार्दव, ओज लालित्य एवं संस्कृति मूर्तिमान दिखे।

कवि ने युग की चेतना को दोनों कथाओं के माध्यम से व्यक्त किया है और तत्कालीन परिस्थितियों पर प्रकाश डाला है। महाभारत की रचना का समय १४३५ ई. और रामायण कथा की रचना १४४३ ई. सिद्ध हो जाती है। भाषा की दृष्टि से विष्णुदास का काव्य अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बुन्देली कवियों ने जन भाषा में काव्य रचनाएं प्रस्तुत की। कथा काव्य शैली में दोहा, सोरठा, चौपाई और छन्दों का प्रयोग अधिक है। यही बाद में भक्ति काव्य की भूमि का कार्य करते हैं।

रीतिभक्ति काव्य काल : - १६वीं शती विक्रमी से १७वीं विक्रमी तक 

समाज में व्याप्त जड़ता उदासी और अकर्मण्यता के स्थान पर भक्ति की ओर प्रवृत्ति मिलती है। बुन्देलखण्ड में भक्ति की उस पावन धार के दर्शन नहीं होते जो बृज प्रदेश में प्रवाहित हुए। यहां सभी प्रकार की उपासनाओं का जोर रहा। गोस्वामी तुलसीदास भी इसी भू-भाग से जुड़े हुये थे। प्रसिद्ध कवि रहीम भी बुन्देलखण्ड की संस्कृति के प्रति श्रद्धावान थेा जो उनकी उक्ति

चित्रकूट में रम रहे रहिमन अवध नरेश।
जा पर विपदा पड़त है सो आवत इहि देश।।

महाकवि बलभद्र मिश्र अत्यन्त प्रतिभाशाली कवि हैं। इनके प्रमुख ग्रन्थों में सिखनख, भाषा-भाष्य, बलभद्री व्याकरण, हनुमानाष्टक टीका गोवर्द्धन सतसई अधिक चर्चित है। इनके समय तक ओरछा, पन्ना, छतरपुर, झांसी, टीकमगढ़, दलिया और सागर केन्द्र के रुप में उभरकर सामने आने लगे। महाकवि केशव के पूर्व महाराज मधुकर शाह, पंडित हरिराम व्यास आदि कवियों ने बुन्देली काव्यधारा में महत्वपूर्ण योगदान किया है। मधुकर शाह "टिकैत' बुन्देलखण्ड की रक्षा में ही प्रसिद्ध हुए। कवि देशभक्त और धर्म प्रवर के रुप में उनका स्मरण अब तक किया जाता है। पंडित हरिराम व्यास मधुकर शाह को दीक्षा देने वाले गुरु, एक संगीतज्ञ, भक्त और साधक के रुप में विख्यात हुए। उनकी रचनाओं में राग माली, व्यास वाणी, राग पर्यायाची आदि में बुन्देली और तथा रीति सावेत का अद्भुत समन्वय मिलता है।

केशवदास (सम्वत १६१२) इस काल के अन्यतम् कवि हैं। इनकी समस्त कवियों का आधार संस्कृत के ग्रंथ हैं पर कवि प्रिया रसिक प्रिया, रामचन्द्रिका, वीरसिंहदेव चरित्र, विज्ञान गीता, रतन वादनी और जहाँगीर रसचन्द्रिका में कवि की व्यापक काव्य भाषा प्रयोगशीलता एवं बुन्देल भूमि की संस्कृति रीति रिवाज भाषागत प्रयोगों से केशव बुन्देली के ही प्रमुख कवि हैं। रीति और भक्ति का समन्वित रुप केशव काव्य में आ#ोपान्त है। रीतिवादी कवि ने कविप्रिया, रसिकप्रिया में रीति तत्व तथा विज्ञान गीता एवं रामचन्द्रिका में भक्ति तत्व को प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रुप में प्रस्तुत किया है। आचार्य कवि केशवदास ने बुन्देली गारी (लोकगीत) को प्रमुखता से अपने काव्य में स्थान दिया और सवैया में इसी गारी'गीता को परिष्कृत रुप में रखा है। रामचन्द्रिका के सारे सम्वाद सवैयों में है ऐसी सम्बाद योजना दुर्लभ है। रामलीलाओं में केशव के संवादों का प्रयोग शताब्दियों से हो रहा है।

प्रवीण राय महाराज इन्द्रजीत सिंह के दरबारमें थी। महाराज इन्द्रजीत स्वयं "धीरज नरेन्द्र' उपनाम से कविता करते थे। पं. गौरीशंकर द्विवेदी ने इनका समय सं. १६२० विक्रमी माना है। इन्हीं के समय में कल्याण मिश्र (विक्रमी सं.) १६३५ कवित्त लेखन में श्रेष्ठ माने गये हैं। ऐसे ही नाम बालकृष्ण मिश्र तथा गदाधर भ के माने गये हैं। बुन्देली के अनेक मुहावरों का प्रयोग बिहारी सतसई में मिलता है। बलभद्र मिश्र के पौत्र श्री शिवलाल मिश्र (सं. १६६०) ने ठेठ बुन्देली के क्रिया पदों का प्रयोग किया है। इसी प्रकार स्वामी अग्रदास की कुण्डलियों में शत-प्रतिशत बुन्देली लोकोक्तियों को आधार बनाकर लोक संदेश दिया है। इसी काव्यधारा में सुन्दर दास का "सुन्दर श्रृंगार' परगणित किया जाता है। रीतिभक्ति काव्य में खेमदास रसिक सुवंश कायस्थ, पोहनदास मिश्र तथा ओरछा के अनेक कवियों का योगदान है। भक्ति काव्य बुन्देलखण्ड में पूरी समग्रता के साथ में आया। यहाँ के राजाओं ने उसे प्रोत्साहन दिया। अनेक रचनाएं आश्रयदाता की इच्छा के अनुसार मिलती है। रीति भक्ति काव्यकाल में प्रस्तुत की गयी प्रतियों में बुन्देली संस्कृति, भाषा और रीति तत्व की अभिव्यक्ति विशेष है। इसी काल के उपरान्त बुन्देली की रचनाओं में ठेठ स्थानीयता का प्रभाव दिखने लगता है।

सांस्कृतिक उन्मेषकाल : - १७वीं विक्रमी से १८वीं विक्रमी

बुन्देलखण्ड में चम्पतराय के बाद छत्रसाल ने स्वातन्त्रय मशाल जलाई। औरंगजेब ने छत्रसाल को जितना दबाया उतना ही वे अधिक उभरते गए। स्वतन्त्र सत्ता स्थापित करने में छत्रसाल ने मुगल अधिकार के सभी शहरों, राज्यों को लूटा। अपनी धाक जमाते हुए एकछत्र राज्य बनाने के उपक्रम में छत्रसाल ने विकट संघर्ष किया। लालकृत 'छत्रप्रकाश' इसी प्रकार के बुन्देलखण्ड राजा का काव्य इतिहास है। लाल कवि और "भूषण' दोनों का लक्ष्य एक ही है। पूरी शताब्दी में सांस्कृतिक क्षेत्रों में जागरुकता का परिचय मिलता है।
रीतिभक्ति की मिश्रित काव्य धारा प्रच्छन्न रुप में प्रवाहित होती रही पर छत्रसाल, अक्षय अनन्य, गोरे "लाल लाल' बख्शी हंसराज, हरिसेवक मिश्र आदि कवियों की रचनाओं का समाज पर अनुकल प्रभाव पड़ा। एक दृष्टि से समाज का चतुर्दिक विकास इस काल में हुआ है। लाल और छत्रसाल जहां हिन्दुत्व और स्वाधीन बुन्देलखण्ड का समर्थन करते हैं तथा पृथक अस्तित्व बनाते हैं। अक्षर अनन्य भक्ति और उपासना के क्षेत्र में निर्गुण काव्य-धारा का समर्थन कबीर की भाँति करते हैं। प्रेममार्गी काव्यधारा में हरिसेवक मिश्र तथा सगुण कृष्ण भक्ति काव्य में बख्शी हंसराज के द्वारा मधुराभक्ति का प्रतिपादन हुआ। राम काव्यधारा में केशव के उपरान्त अनेक कवियों ने काव्य रचना की, पर केशव की तुलना में वे कम ही प्रभाव डाल सकें। इस प्रकार बुन्देलखण्ड के कबीर (अक्षर अनन्य) सूर (बख्शी हंसराज), जायसी (हरिसेवक मिश्र), राष्ट्रीय कवि "लाल' आदि ने चतुर्दिक उन्मेष का संदेश दिया।

कवियों का प्रदेय इस प्रकार है कि बख्तबली महाचार्य ने चम्पतराय के युद्धों का वर्णन किया तो उनके पुत्र भानुभ (१७०१ वि.) ने भी छत्रसाल के युद्धों का वर्णन और राष्ट्रीयता की भावना का प्रसार किया। इन्हीं के दूसरे पुत्र गुलाब भी इसी धारा के कवि थे। "लाल' का प्रदेय इस काल में इसलिए अधिक है कि उन्होंने छत्रसाल को नायक बनाकर उकने समस्त घटनाओं का यथार्थ चित्रण किया है लाल की पंक्तियों को तत्कालीन राजाओं ने धर्मवाक्य के रुप में लिया है। छत्रप्रकाश में युद्धों का धारावाहिक चित्रण करने वाले लाल ने लिखा-

धनि चम्पत के औतरो पंचम श्री छत्रसाल।
जिनकी आज्ञा शीषधरि करि कहानी लाल।।

छत्रसाल स्वयं एक कवि भी रहे हैं। युद्ध कला और काव्यकला का अद्भुत मेल उनमें मिलता है। बुन्देलखण्ड के चरित-नायक बनकर वे महान कार्य में लगे रहे। इनके बाद सं. १७१२ वि. में देवीदास, अक्षर अनन्य (१७०० वि.) के नाम महत्वपूर्ण है। अक्षर अनन्य ने व्यापक काव्यभाषा को अपनाया पर बुन्देली रीतिरिवाज, संस्कृति, उक्तियों और मुहावरों को अपनाकर भक्ति, ज्ञान और वैराग्य की त्रिवेणी प्रवाहित की। उन्होंने कबीर की भाँति मानवधर्म का प्रतिपादन किया और समाज की बुराइयों को दूर करने में योगदान दिया। इसी प्रकार हरिसेवक मिश्र सं. १७२० ने प्रेममार्गी काव्यधारा में "कामरुप कथा' के माधक से एकनिष्ठ प्रेम का संदेश दिया। देशी रियासतों में महाराज उदोतसिंह के आश्रय में कोविदमिश्र ने भाषा में हितोपदेश, रामभूषण मुहूर्त दपंण, नायिका भेद आदि ग्रंथ लिखे। सागर के सुवेश कायस्थ ने हितोपदेश और मित्रमिलाप लिखे। बुन्देली मुहावरों और कविताओं का उत्तम प्रयोग कवि ने अपने ग्रन्थों में किया है। इस समय के शासकों में महाराज उदीतसिंह स्वयं एक कवि रहे हैं।

काल्पी के श्रीपति दतिया के जागीरदार, पृथ्वीसिंह रसनिधि, दतिया के रोहुँड़ा ग्राम के हरिकेश आदि कवियों ने अपने काव्य से जनसमाज को अमूल्य कृतियाँ दी। हरिकेश की ""जगतसिंह दिग्विजय'' बुन्देलखण्ड के इतिहास की महत्वपूर्ण कृति है।

बख्शी हंसराज की तीन रचनाओं-मेहराज चरिॠ सनेहसागर और विरह'विलास में अंतिम दो ऐसी रचनाएँ हैं जिनमें सूर के समान वात्सल्य, विरहवर्णन, मधुराभक्ति और बुन्देली संस्कृति का दर्शन होता है। इसी काल में पद्माकर कवि के पिता मोहनभट्ट, कृष्णकवि सना ओरछा, गोपकवि --रसनिधि के दरबारी कवि-- रुपनारायण मिश्र, खण्डन कायस्थ दतिया, कवीन्द्र ज्ञानी जू, गुमानमिश्र --कविताकाल,-- बोधा कवि का कृतित्व बुन्देली काव्य के इतिहास में अमूल्य मणि टाकता है। 

सांस्कृतिक उन्मेष काव्यकाल बुन्देलखण्ड की चतुर्दिक प्रतिभाओं से परिचय ही नहीं करता बल्कि बुन्देलखण्ड के विकास में योग देता है। इसके उपरान्त बुन्देलखण्ड में श्रृंगार काव्य काल आता है। 

श्रृंगार काव्य काल : - १८वीं विक्रमी से १९५० वि. तक

भक्तिकाल की समृद्धि बृजभूमि मानी जाती है तो रीति या श्रृंगार काव्य का पूर्ण उन्मेष बुन्देलभूमि में ही हुआ है। आचार्य कवि केशवदास रीतिकाल के श्रेष्ठतम कवि माने जाते हैं। उनके बाद श्रृंगार की धारा में पद्माकर --सं. १८१०-- खुमानकवि, ठाकुर, दामोदर देव, मंचित, नवलसिंह कायस्थ झाँसी, प्रताप साहि चरखारी, पजनेस पन्ना, गदाधर भट्ट, सरदारकवि ललितपुर, भगवंत कवि पन्ना, ईसुरी, गंगाधरव्यास छतरपुर, ख्यालीराम चरखारी, भगवंत कवि पन्ना, ईसुरी, गंगाधरव्यास छतरपुर, ख्यालीराम चरखारी, आदि कवियों ने बुन्देली की श्रृंगार माधुरी को अनेक प्रकार से संवर्किद्धत किया है।

पद्माकर के आते-आते- बुन्देलखण्ड के वे सौ वर्ष बीत गये जिनसे इस भू-भाग में सांस्कृतिक उन्मेष का प्रवाह आया। छत्रसाल की मृत्यु के बाद समग्र बुन्देलखण्ड छोटी-छोटी इकाइयों में बँट गया। इन सबसे में एक होड़ अवश्य थी पर वह श्रृंगार तक ही सीमित रही। अनेक राजाओं के आश्रय से प्रभावित उनकी समस्त कृतियों में रीतिबद्ध श्रृंगार क्रमशः लोकतत्व से जुड़ता गया। कदाचित् पद्माकर के द्वारा ही श्रृंगार का पिष्टपेषण भी बहुत हो चुका था, अतः वे रचनायें अधिक सुन्दर बन पड़ीं जिनमें लोक जीवन रहा है। इसलिए फाग साहित्य अथवा ॠतुकाव्य अधिक आकर्षक बन पड़े हैं। पद्माकर ने बुन्देली संस्कृति, भाषा और जीवनदर्शन को श्रृंगार रस से समन्वित करके प्रस्तुत किया है। जगत् विनोद, पद्माभरण, प्रबोधपचासा और गंगालहरी कृतियों में उनकी प्रतिभा के दर्शन होते हैं। विरुदावली में वे उतने नहीं जमे जितने लोकतत्व समन्वित काव्य में फाग का एक नमूना पर्याप्त है-

फाग की भौरें अभीरैं लै गहि गोविन्द भीतर गोरी।
आई करी मन की पद्माकर ऊपर नाई अबीर की झोरी।।
छीन पीताम्बर कम्म्र तैं सु बिदा दई मीड़ कपोलन रोरी।
नैन नचाई कहौ मुस्काई, आइयो लला फिर खेलन होरी।।

इसी प्रकार गंगालहरी में "सुधर सो हो तो माँग लेतो और दूजो कहूँ/जातो बन खेती करि, खातो एक हर की' में बुन्देली की अद्भुत छटा है। पद्माकर का अभिधामूलक चित्रण कभी-कभी इतना सतही हो गया है कि वह अश्लीलता के स्तर पर पहुँच जाता है। फाग से पद्माकर ने भी एकाध स्थान पर ऐसा अभिधात्मक प्रयोग कर दिया है। पद्माकर के बाद श्रृंगार काल के कवियों में काव्यादेश देने की क्षमता नहीं रही थी।रुप साहि, दामोदर देव, मंचित ने अलंकार और नायिका भेद को महत्व दिया है तो नवलसिंह कायस्थ के कृतित्व ""रास पंचाध्यायी, आल्हा रामायण, रामचन्द्र विलास, रुपक रामायण'' में कवि और चित्रकार दोनों का समन्वय हुआ है। प्रताप साहि चरखारी, रतनेस वंदीजन के पुत्र माने जाते हैं। नायक-नायिकाओं और व्यंग्य चित्रण में ये पद्माकर के समान प्रतिभाशाली हैं। इनके विम्ब चित्रण के आधार पर इन्हें दूसरा पद्माकर भी कहा जाता है। नरेस, ओरछा नरेश तेजसिंह और सुजानसिंह के आश्रय में रहे हैं। इन्होंने झाँसी की रानी को पूरे इतिहास के साथ चित्रित करने की चेष्टा की है। पजनेरा का कृतित्व एवं व्यक्तित्व उनका "पजनेस प्रकाश' है। ये पूर्णतः बुन्देली के कवि हैं पर ब्रज और फारसी के शब्दों का प्रयोग यथास्थान करते हैं।

पद्माकर के प्रपौत्र गदाधर भट्ट, सरदार कवि, भगवंत कवि, बुन्देलखण्ड के ऐसे कवि हैं जिन्होंने छिटपुट रचनाओं में ही अपनी प्रतिभा दिखाई है।

श्रृंगार काव्य काल के प्रदेय के संबंध में यह कहना अभीष्ट होगा कि मुगलकाल के शासकों के विरोध में छोटे-छोटे देशी राज्य उठ खड़े हुए। रीतिकालीन कवि ने इनके आश्रित रहकर एक शताब्दी तक जीविका कमाई और बहूमूल्य कृतियाँ दी। सांस्कृतिक उन्मेष का सारा कार्य छत्रसाल के मंच से हटते ही प्राय- समाप्त हो गया। श्रृंगार काव्य की चरम सीमा धोर श्रंगार'या यों कहें कि अभिधात्मक काव्य में हुई। कुछ कवियों ने अलबत्ता लक्षण ग्रन्थों का निर्माण किया। पद्माकर, प्रतापसिंह, नवलसिंह, कायस्थ आदि के काव्य में स्वस्थ श्रृंगार सामने आया। समस्त काल का प्रमुख रस श्रृंगार ही रहा पर वीर और शान्त रस को भी अभिव्यक्ति मिली। देश की राजनैतिक स्थिति और अर्थव्यवस्था ने बुन्देलखण्ड के लोगों को भाग्यवादी सामन्ताश्रित अधिक बनाया। भाषा की दृष्टि से निश्चित ही अच्छे प्रयोग हुए। बुन्देली अध्येताओं के लिए अठारहवीं-उन्नीसवीं विक्रमी विशेष महत्व की है क्योंकि इस समय के कवियों का स्थानीय भाषा में ही अपनी अभिव्यक्ति प्रस्तुत करनी पड़ी है।

आधुनिक काल : - वि.सं. १९५० से २००० वि. तक

श्रृंगार काव्य की प्रवृत्तियाँ प्रारंभिक दशकों तक ही सीमित रही है। इसी समय सन् १८५७ की गदर की भूमिका बनी स्वतंत्रता के लिए उत्तरभारत और बुन्देलखंड के वीरों ने अनेक बलिदान दिए। ये बलिदान व्यक्तिगत भूमिका पर होते-होते राष्ट्रीय महत्व के हो गए। झांसी की रानी, नाना साहब, तात्या टोपे, नवाब बांदा आदि ने एक झंडे तले खड़े होकर क्रांति का बाना पहना। उनके अनुयायियों में बख्तबली, मर्दनसिंह जैसे क्रांतिवीरों के नाम लिये जाते हैं। अंग्रेजी शासन धीमे-धीमे स्थापित होता गया और नए प्रांत बने। बुंदेलखण्ड उत्तरप्रदेश और मध्यप्रांत में विभाजित हो गया। संवत् १९०० से १९५ विक्रमी की कृतियों का पूरा लेखा-जोखा तक नहीं मिल पाया क्योंकि क्रांति दबाने के प्रयास में ये कृतियां काल के गर्त में दब गई। कुछ का पता चला जो अब शनै:-शनै: सामने आ रही है।

आधुनिक काल में चार प्रकार के कवि मिलते हैं। प्रथम वर्ग में कवि आते हैं जिन्होंने अतीत के चरित्रों को आधार बनाकर तथा संस्कृति, धर्म, देशभक्तिपरक रचनायें की। द्वितीय वर्ग के कवियों ने आधुनिक चेतना एवं स्वातंत्रयोन्मुख विचारधारा को ठेठ बुन्देली में प्रस्तुत किया। तृतीय वर्ग के कवियों ने स्फुट छंदों में काव्य रचनायें प्रस्तुत की। समस्यापूर्ति इन्हें श्रृंगारकाल से विरासत में मिली। चतुर्थ वर्ग में लोककाव्य शैली अपनाने वाले कवियों ने ग्रामीण जीवन को प्रस्तुत किया।

प्रथम वर्ग के कवियों ने ब्रज और बुन्देली के साथ खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग किया। इन्होंने भले ही मिश्रित भाषा में काव्य लिखा पर उच्चारण से वे कृतियों को बुन्देली में ही पढ़ते हैं।

दूसरे वर्ग के कवियों ने भाषा, लोक संस्कृति, लोक जीवन, लोक विश्वास आदि सभी में बुन्देलखंड की भाषा को जीवित रखा है। तीसरे वर्ग के कवियों में मूलतः खड़ी बोली और ब्रज का प्रयोग अधिक मिलता है। इनमें बुन्देली के शब्द अनायास आ गये हैं। ये बुन्देली संस्कृति और माटी से दूर नहीं जा पाये हैं। चौथे वर्ग के कवियों की रचनायें लोककाव्य की प्राण हैं। इन कवियों ने अधिकांश में दीवारी, फागें, भजन और श्रृंगारिक गीत अधिक लिखे हैं। समस्त कवियों का संक्षिप्त परिचय उनकी प्रवृतियों के आधार पर इस प्रकार है।
मदन मोहन द्विवेदी "मदनेशद' रासो-काव्य परम्परा में ""लक्ष्मीबाई रासो'' जैसी अमूल्य कृति प्रस्तुत करते हैं जो डॉ. भगवानदास माहौर के सानिध्य से प्रकाश में आई। हरनाथ ने व्यापक काव्य भाषा अपनाई, बुन्देली चरित्र देशभक्ति, नीति, श्रृंगार आदि को काव्य का विषय बनाया। डॉक्टर भवानी प्रसाद ने बुन्देली कहावतों, मुहावरों को काव्य में विषय बनाकर अपने विचार दिए। ऐनानन्द ने सिद्धांत सार नामक ग्रन्थ लिखा। सुखराम चौबे गुणाकर, गौरीशंकर शर्मा, गौरीशंकर सुधा जगन्नाथ प्रसाद चतुर्वेदी, पं. जानकी प्रसाद द्विवेदी, शिवसहाय चतुर्वेदी, रामचंद्र भार्गव, घासीराम व्यास आदि अनेक कवियों की कृतियों में बुंदेलखंड की सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक स्थितियों का परिचय मिलता है।

लोक संस्कृति के चित्रकारों में श्रृंगार काव्य काल के अवसान पर ईसुरी, ख्यालीराम और गंगाधर के नाम सामने आये जिन्होंने फाग साहित्य को अत्यधिक समृद्ध बना दिया। उनके बाद रामचरण हयारण मित्र, हरिप्रसाद "हरि', गौरी शंकर द्विवेदी "शंकर', द्वारिकेश, संत बृजेश सुधाकर शुक्ल शास्री, पं. ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी, शंभुदयाल श्रीवास्तव "बृजेश', भैयालाल व्यास, लक्ष्मीनारायण पथिक, चतुर्भुज दीक्षित, रघुनाथ प्रसाद गुरु, रामदयाल श्रीवास्तव आदि अनेक कवियों ने नए विषय, नीति ओर संस्कारों के साथ'साथ बुन्देली माटी और देश का गान किया। ये कवि देश की स्वतंत्रता धारा से पूर्णतः सिक्त एवं अनुप्रमाणित हैं। बुन्देलखंड के प्रदेशों में बंट जाने के बाद बुन्देली संस्कृति, जनजीवन और काव्य धारा में पर्याप्त विलम्ब से योगदान हुआ।

अत्याधुनिक काव्य काल :- सं. २००० वि. से कब तक

विक्रम की २० वीं शताब्दी में बुंदेलखंड में बुन्देली और अन्य प्रदेशों में स्थानीय बोलियों के साहित्य की विपुल राशि दृष्टिगत होती है। सागर वि.वि. बुन्देलीपीठ से डॉ. बलभद्र तिवारी ने बुन्देली काव्य परम्परा के तीन ग्रंथ प्रकाशित किए जो प्राचीन और नवीन काव्य धारा में श्रृंखला का कार्य करते हैं। आधुनिक काव्य-धारा का परिचय बुन्देली काव्य परम्परा भाग २ --आधुनिक काव्य-- में मिलता है। बुन्देली के उन कवियों को इस कृति में स्थान दिया गया है जो सन् १९०० के बाद बुन्देली जनजीवन को ही चित्रित नहीं करते बल्कि राष्ट्रीय एवं सामाजिक परिवेश के प्रति जागरुक हैं। हिंदी साहित्य में द्विवेदी युग की अवसान बेला में पं. रामनरेश त्रिपाठी और विदेशी भाषाविदों ने प्रदेशिक भाषा, संस्कृति और साहित्य पर विशेष ध्यान दिया है।

छायावाद युग के साथ राष्ट्र प्रेम की कविताओं का विशेष उफान आता है। बुन्देलखण्ड के मुन्शी रामाधीन खरे, नरोत्तम दास पाण्डे "मधु' इस भावधारा की रचनायें प्रस्तुत करते हैं। सन् १९२० में जलियांवाला बाग का काण्ड घटित हुआ। अंग्रेज सरकार की नीति के विरोध में घासीराम व्यास, रामनाथ त्रिवेदी, रामनाथ, राव ठाकुरदास, नाथूराम चतुरेश परासर, नन्दराम शर्मा आदि कवियों ने अनेक कविताएँ लिखी है। एक अन्य धारा में गौरीशंकर शर्मा, जानकी प्रसाद द्विवेदी, सुखराम चौबे गुणाकर, रामचन्द्र भार्गव, शिवसहाय चतुर्वेदी, लोकनाथ सिलाकारी, सुधाकर शुक्ल शास्री, ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी जैसे कवि आते हैं जो समाज और संस्कृति के विभिन्न पक्षों पर विचार तो करते ही हैं साथ ही राष्ट्रीय उद्बोधन के गीत भी गाते हैं। अतीत के भारत को वैज्ञानिक दृष्टि से संपन्न करने की चेष्टा में वे खड़ी बोली और बुन्देली दोनों में रचनाएँ प्रस्तुत करते हैं।

इसी समय का लोक साहित्य फाग से अनुप्राणित होकर सामने आता है। इंसुरी, ख्यालीराम, गंगाधर व्यास के सिवा अनेक स्फुट छंद लिखने वाले कवियों ने समसामयिक आंदोलन को अपनी कविताओं में प्रोत्साहित किया है।

एक अन्य वर्ग व्यापक काव्य भाषा अपनाकर भी बुंदेली के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता है। इसमें डॉ. लक्ष्मी प्रसाद "रमा', गौरीशंकर द्विवेदी "शंकर', हरगोविंद गुप्ता, बालमुकुन्द कन्हैया, रामलाल बरानिया "द्विजदीन', गौरीशंकर पंडा, सैय्यद मीर अमीर अली "मीर', नाथूराम प्रेमी एवं उनके सहयोगी के नाम विशेष है। सारतः बुन्देली काव्य के आधुनिक काल में चार प्रकार के कवि मिलते हैं।

१. अतीत के चरित्रों को आधार बनाकर रचनायें लिखने वाले संस्कृति-धर्मी और देशभक्त कवि।
२.    आधुनिक चेतना के बुन्देली में लिखने वाले कवि।
३.    छिटपुट विषयों पर अल्प कृतित्व वाले कवि।
४. लोक काव्य शैली के रचयिता कवि।

समस्त कवियों में आधुनिक काल के पूर्वार्द्ध में जानकी प्रसाद द्विवेदी, शिवसहाय चतुर्वेदी, रामचंद्र भार्गव, हरिप्रसाद हरि, लोकनाथ द्विवेदी सिलाकारी, सन्त ब्रजेश, रामचरण हयारण मित्र, सुधाकर शुक्ल शास्री और ज्वाला प्रसाद ज्योतिषी प्रमुख है। इनकी रचनायें समस्यापूर्ति शैली से प्रारंभ होकर आधुनिक युग की समस्याओं तक केन्द्रित हैं। ये बुन्देलखंड के जन-जीवन का खड़ी बोली और बुन्देली दोनों में चित्रण करते हैं। विशुद्ध बुन्देली में काव्य रचना करने वालों में सन्तोषसिंह, अवधेश, बाबूलाल खरे, माधव शुक्ल, दुर्गेश, गुणसागर, लक्ष्मी प्रसाद गुप्त, नीरज जैन आदि हैं। इनके काव्य में ग्राम्य जीवन, प्राकृतिक सुषमा और देहात की समस्याओं के चित्र आते हैं।

बुंदेली के नये काव्य का प्रतिनिधित्व भैयालाल व्यास "विन्ध्य कोकिल', चतुर्भुज चतुरेश, शर्मनलाल जैन "पथिक', रतिभानु तिवारी तेज 'कंज', भगवान सिंह गौड़, शंभुदयाल श्रीवास्तव "ब्रजेश', रामकृष्ण पांडे, गोरेलाल साहू, महेश कुमार मिश्र "मधुकर', जीजा बुन्देलखंडी, कैलाश मड़वैया, प्रकाश मड़वैया, प्रकाश सक्सेना, लोकेंद्र सिंह "नागर' संतोष सिंह बुन्देला, अयोध्या प्रसाद चौबे, द्वारिका प्रसाद अग्रवाल, केदारनाथ अग्रवाल आदि करते हैं। इन कवियों में समकालीन समाज, संस्कृति और राजनीति के प्रति जागरुकता है। ये जमीन से जुड़े हुए कवि हैं। समकालीन जीवन बोध से संपृक्त जीवन दृष्टि के कारण बुन्देली काव्य में आज नये प्रयोग भी हो रहे हैं।

कुल मिला कर बुन्देली काव्य की एक निश्चित परम्परा है जो पिछले सात सौ वर्षों तक फैली हुई है। हिन्दी की समर्थ बोली का साहित्य इसमें मिलता है। अतः यह कहने में हमें कोई संकोच नहीं कि इसे भाषा का गौरव दिया जा सकता है।

बाल्मीकि तुलसी केशव ने कविता रच दी प्यारी।।
इतै फूल रही आदि काल से काव्य कला की क्यारी।।
राष्ट्रकवि को सुघर लेखनी भाषै रुप निखारै।
वीर भूमि बुन्देलखण्ड खों सगरो देश निहारे।।
चन्द्रसखी भूषण, पद्माकर भाषा के उजियारे।।
लोक रागिनी प्रान ईसुरी बुन्देली के तारे।।
राय प्रवीन वीन कविता की प्यारे बोल उचारे।।

 -रतिभान सिंह "कंज'


प्रेम व्यास, रसिकेन्द्र, गुणाकर, लाल विनीत मीर से कविवर।
काव्य कला कमनीय दिवाकर अमर कर गये नाम।।
प्रांत यह है गुणियों का धाम,
कोविद कृष्णदास, कविकारे, दिग्गज रतनलाल परम नारे।
अम्बुज, काली, नन्द कुमार, नवल सिंह, पजनेश
हुए थे मंचित, द्विज, अवधेश।

३. बुन्देलखण्ड में कवि इसलिए अधिक होते हैं कि यहां का प्रकृति सौन्दर्य अद्वितीय है।

-कृष्ण कान्त मालवीय

वामदेव, सनकादि आदि महाॠषियों की तप स्थली है,
यहीं महाकवि वाल्मीकि, तुलसी की कलम चली है।।
ज्ञानी, वेदव्यास कृष्ण द्वेैपायन कवि कुल केशव,
यहीं बिहारी, पदमाकर, भूषण का बीता वैभव।
जगनिक की वाणी में आल्हा ऊदल का शौर्य समर जागा,
भौभूति कलाधर, वेदव्यास संस्कृत का काव्य भ्रमण जागा।

गोस्वामी तुलसीदास

आचार्य केशवदास

आचार्य पद्माकर

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

वृन्दावनलाल शर्मा

सियारामशरण गुप्त

डॉ. रामकुमार वर्मा

श्री अम्बिका प्रसाद दिव्य

केदारनाथ अग्रवाल

गोस्वामी तुलसीदास

चित्रकूट जनपद में राजापुर नामक कस्बा यमुना नदी के तट पर स्थित है। तुलसी के प्रतितामह राजपुर आये थे। यहाँ 
आत्माराम दुबे नामक प्रतिष्ठित सरयूपारीण ब्राह्मण रहते थे। उनकी धर्मपत्नी का नाम हुलसी था। सम्वत् १५५४ विक्रमी की श्रावण सप्तमी के दिन इसी दम्पति की कोख से अभुक्त मूल नक्षत्र में रामबोला --तुलसीदास-- का जन्म हुआ। माता का देहान्त दूसरे दिन हो गया, चुनिया नामक दासी ने साढ़े पाँच वर्ष तक आयु तक उन्हें पाला। भगवान शंकर की प्रेरणा से रामशैल्य पर रहने वाले श्री अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य श्री नरहर्यानन्द जी ने इस बालक को राम बोला नाम दिया। यज्ञोपवीत संस्कार कर राम मंत्र की दीक्षा दी।

सं. १५८३ वि. जेष्ठ शुक्ल १३ को भरद्वाज गोत्र की सुन्दरी कन्या रत्नावली से उनका विवाह हुआ। पत्नी द्वारा प्रोमाधिक्य धिक्कारे जाने पर गृह त्याग दिया और साधू वेश ग्रहण किया। विभिन्न स्थानों पर भ्रमण करते हुए अयोध्या पहुँचे। चैत्र शुक्ल नौमी --रामजन्त तिथि-- सं. १६३१ वि. में रामचरित मानस की रचना प्रारम्भ की और मार्ग शीर्ष शुक्ल पक्ष में राम विवाह के दिन अर्थात २ वर्ष ७ माह २६ दिन में सातों काण्ड रामचरित मानस के पूर्ण किये। अवधी और ब्रजभाषा में तथा विभिन्न कवित्व शैलियों में उन्होंने दोहावली कवितावली, बरवै रामायण, रामलला नहछू, तथा विनयपत्रिका के पदों की रचना की।

रामचरित मानस ने तत्कालीन हिन्दू जाति के नैराश्य को समाप्त किया। उनमें भक्ति भाव जगाये। शैव और वैष्णव सम्प्रदाय की कटुता को समाप्त कर हिन्दू विचारधारा को उदारमना बनाया। हिन्दुओं को अत्याचार, अनाचार के समाप्ति की किरण दिखाई। गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी साहित्य के श्रेष्ठतम कवि और रचनाकार हैं। सं. १६८० वि. श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार को असीघाट --वाराणसी-- पर राम राम कहते हुए अपना भौतिक शरीर परित्याग किया। उनके ग्रन्थों का अनुवाद भारत की समस्त भाषाओं में तथा विश्व के अनेकानेक भाषाओं में सम्पन्न हो चुका है। गोस्वामी तुलसीदास जी की जीवनी और साहित्य पर अनेकानेक शोध-प्रबन्ध देश और विदेश में प्रस्तुत किये गये हैं। तुलसीदास शोध पीठ अयोध्या तथा चित्रकूट में स्थापित हैं। मध्य प्रदेश शासन "तुलसी पुरस्कार समारोह' आयोजित करती है।

गोस्वामी तुलसीदास सत्य, शील, सौन्दर्य के अप्रतिभ कवि हैं। विनय पत्रिका भक्तों के गले का हार है। गीतावली अपनी संगीतात्मकता के साथ माधुरी एवं सरस प्रसंगों के लिए लोकप्रिय है। रामचरित-मानस लोकमानस का अमर काव्य है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने भारत में ही नहीं विश्व को अपनी महनीयता से प्रभावित कया है तथा भविष्य में भी मानस समाज को सत्प्रेरणा देते रहेंगे।

१.    यह निर्विवाद तथ्य है कि गोस्वामी तुलसीदास भाषा के अप्रतिभ अधिकारी थे। भाषा पर जैसा अधिकार गोस्वामी जी का था वैसा और किसी कवि का नहीं है। -आचार्य रामचन्द्र शुक्ल

२.    नो पोएट इन दी वर्ल्ड हैज एवर वीन टु दि मासेज व्हाट तुलसी दास हैज बीन टु दि पीपुल्स आॅफ दिस लैण्ड।-एडविन ग्रीब्ज

गोस्वामी तुलसीदास की कविता तो कविता है ही नहीं, मैं तो उसे सर्वोत्तम महामंत्र मानता हूँ।

१.    तुलसी गंग दुओ भये सुकविअन के सरदार,
इनके काव्यन में मिली भाषा विविध प्रकार।
२.    परशुराम पर पिता हमारे राजापुर सुख भवन सिधारे।
प्रथम तीर्थ यात्रा महं आये चित्रकूट लखि अति सुख पाये।
परशुराम सोय सुख पाई तहि मरुत सुख स्वप्न दिखाई।
बसहु जाय राजापुर धामा, उत्तर भाग सुभूमि ललामा।
-बाबा रघुवर दास रचित तुलसी चरित

गोस्वामी तुलसीदास का नाम न तो आइन-ए-अकबरी और न समकालीन फारसी इतिहासकारों पर आधारित यूरोपीय लेखकों के ग्रन्थ में मिलेगा, फिर भी वह भारत में अपने समय के सबसे महान पुरुष थे। वह अकबर से भी महान थे क्योंकि उस कवि ने करोड़ों मनुष्यों के हृदय पर अधिकार कर लिया है और यह विजय सम्राट द्वारा युद्ध में प्राप्त किसी भी विजय अथवा उसकी सभी विजयों से कहीं अधिक चिरस्थायी एवं महत्वपूर्ण है।

-वी.ए. स्मिथ

आचार्य केशवदास

पितामह श्री कृष्ण दत्त मिश्र तथा पिता आचार्य काशी नाथ जी ओरछा दरबार के प्रतिष्ठित विद्वान थे। इसी परिवार में केशवदास जी का जन्म बेतवा नदी के तट पर तुंगारण्य --ओरछा-- में रामनवमी तिथि सं. १६१८ वि. में हुआ। ओरछा नरेश महाराज रामसिंह के राजपंडित पद पर प्रतिष्ठित, सभा चतुर एवं वाकपटु थे। महाराज के छोटे भाई इन्द्रजीत सिंह का उन पर गुरुवत आदर भाव था। राजा बीरबल, टोडरमल, अब्दुर्ररहीम खानखाना स्नेही थे। उनके प्रसिद्ध ग्रन्थ रसिक-प्रिया --सं. १६४८ वि.-- कवि प्रिया --सं. १६५८ वि.-- रस-ज्ञान, अलंकार-समीक्षा के श्रेष्ठतम ग्रन्थ हैं। महाकाव्य रामचन्द्रिका में नाटकीय शैली का समावेश कर प्रतिभा तथा मौलिकता का परिचय दिया। वीरसिंहदेव चरित्र, जहांगीर जसचन्द्रिका, रतनबाउनी में तत्कालीन संस्कृति तथा ऐतिहासिक घटनाओं की झलक प्राप्त है। नखशिख तथा छंदमाला में काव्याचार्य की प्रतिभा प्रतिबिम्बित है। "रामालंकृत मंजरी' पिंगल शास्र का ग्रन्थ है। विज्ञान गीता अध्यात्मक विषयक अनूठा ग्रन्थ है। आचार्य केशवदास मिश्र काव्य रीति की एक विशिष्ट प्रणाली के प्रवर्तक हैं। अलंकार संबन्धी समीक्षा में उनका स्थान अद्वितीय है। उनकी कृतियों में तत्कालीन वृत्तियों का चित्रण प्राप्त है। हिन्दी साहित्य के प्रथम आचार्य का निधन सं. १६७४ वि. में हुआ। रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार उनका जन्म सं. १६१२ वि. है। श्री भगवानदीन के अनुसार जन्म सं. १६१८ वि. है। उनका जीवन युग के अनुरुप रंगीनी रसिकता अनेकपता तथा रोचकता से परिपूर्ण है। उनकी समस्त कृतियों का आधार संस्कृत ग्रन्थ माने जाते हैं। रीति भक्तिकाल में केशव सर्वप्रमुख कवि हैं जिन्होंने बुन्देली साहित्य को ही नहीं हिन्दी के रीतिकाव्य को भी महत्वपूर्ण देन दी है।

१.    केशव सब कबियन में मीरा, ज्यों मुतियन में हीरा।
मिसरी सी निसरी इमि, बानी बोले मोर पपीरा।।
तुगं भूमि तप भूमि ओरछो, बसै बेतवा तीरा।।
रामचन्द्रिका सरस बखानी, हरै सकल भव पीरा।।

पंडित कपिल देव तैलंग

२.    जगवंदित द्विज कुल तिलक अनुपम प्रतिभावान
कविता कानन केसरी केशव सुकवि सुजान

-शंकर द्विवेदी

३.    देखी केशव की कवितायी, रसिकन के मन भायी।
आखर अरथ अनोखे विवरण, वरनन की फुलवायी।।ं
कितऊ सरल जन मन को आवै समझत क कठिनाई।
जिनके काव्य कसौटी कस के कवियन मिलत बिदाई।।
कविता करता तीन है तुलसी केशव सूर।
कविता खेती इन चुनी सीला बिनत मजूर।।

आचार्य पद्माकर

मूल नाम प्यारेलाल का जन्म सम्वत् १८१० विक्रमी में सागर नगर में हुआ। इनके पिता श्री मोहनलाल भ सागर के शासक रघुनाथ राव के आश्रित थे। इनका जन्म स्थान बांदा भी माना जाता है। सम्वत् १८३० विक्रमी में नोने अर्जुन सिंह ने इन्हें अपना दीक्षा गुरु बनाया। वे रोसाई हिम्मत बहादुर के दरबार में भी रहे। बनगांव के युद्ध में उनके साथ थे। युद्ध का वर्णन हिम्मत बहादुर विरदावली में है। सम्वत् १८९० वि. में उनका शरीरान्त गंगा तट पर कानपुर में हुआ। उनके काव्य में रुप और यौवन के मनोहारी चित्र अंकित हैं। नायिका के शारीरिक सौन्दर्य के चित्रांकन है। वे रस सिद्ध कवि हैं। उनके कविता में जीवन की सक्रियता एवं यथार्थता है। ईश्वर पचीसी में संसार की असारता का चित्रण है। उनके काव्य में वीर और श्रृंगार रस का अद्भुत समन्वय है। प्रतापशाह विरदावली, हिम्मत बहादुर विरदावली, अर्जुनरायसा व्यक्तिरक ऐतिहासिक काव्य ग्रन्थ है। रामरसायन अन्तिम ग्रन्थ है। पद्माकर हिन्दी साहित्य के श्रृंगार, वीर एवं भक्ति भाव कविता के लिए प्रसिद्ध है। प्रकृति का वर्णन निरपेक्ष है। श्रृंगार काव्य के वे अग्रगण्य कवि हैं। सागर के सूबेदार रघुना# राव ने पद्माकर की कविता की सराहना करते हुए एक लाख रु. का नकद पुरस्कार दिया था। वे लाव-लश्कर के साथ यात्रा करते थे। उनकी कविता रीतिकालीन युग श्रृंगार तथा विलासिता की अभिव्यक्ति करती है। उन्होंने बुन्देली शब्दों की व्यापक काव्य के साथ इस प्रकार संयुक्त किया है कि वे उनमें विलीन हो गये हैं। इनकी भाषा ही इन्हें बुन्देलखण्ड तथा बुन्देली दोनों का श्रेष्ठ कवि घोषित करती है।

तुलसी, केशव, पद्माकर, गंगाधर लाल, बिहारी।
गई लिखी मधुरिमा जाकी वही ईसुरी न्यारी।।
रहे स्वतन्त्र मंदिर हिन्दी की जा हिन्दी को धारे।
रे मन चल बुन्देल भारती की आरती उतारे।।

तुलसी कवि केशवदास हुए, अरु आदि कवि इसी भूमि में आये।
गुप्त, बिहारी यहां जन्मे, चतुरेश, रमेश, ने छन्द रचाए।।
भूषण की जब डोली उठी तब दत्र ने कांधे दै मान बढ़ाए।
तुलसी ने घिसे जब चन्दन तो श्रीराम ने माथे में खौर लगाए।।

-पन्नालाल उपाध्याय

वेद व्यास, तुलसी, केशव की छायी कीर्ति।
धन्य कवि भूमि पुण्य प्रतिभा प्रसारिणी।।
रघुकुल सूर्य चित्रकूट में रमे थे यहीं।
अति रमणीय तीर्थ भूमि मोक्ष कारिणी।।
श्रीश गुण गांऊ पढ़ चूम चूम झूम झूम।।
हे बुन्देल भूमि हिन्द मानस विहारिणी।।

-हरिदास शर्मा "श्रीश

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त

हिन्दी साहित्य के प्रखर नक्षत्र, माँ भारती के वरद पुत्र मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त सन १८४६ ई. में पिता सेठ रामचरण कनकने और माता कौशिल्या बाई की तीसरी संतान के रुप में चिरगांव, झांसी में हुआ। माता और पिता दोनों ही परम वैष्णव थे। "कनकलताद्ध नाम से कविता करते थे। विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। घर में ही हिन्दी, बंगला, संस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरी जी ने उनका मार्गदर्शन किया। १२ वर्ष की आयु में ब्रजभाषा में कविता रचना आरम्भ किया। आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में भी आये। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती' में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई। प्रथम काव्य संग्रह "रंग में भंग' तथा वाद में "जयद्रथ वध' प्रकाशित हुई। उन्होंने बंगाली के काव्य ग्रन्थ "मेघनाथ वध' "ब्रजांगना' का अनुवाद भी किया। सन् १९१४ ई. में राष्टीय भावनाओं से ओत-प्रोत "भारत भारती' का प्रकाशन किया। उनकी लोकप्रियता सर्वत्र फैल गई। संस्कृत में लिखित "स्वप्नवासवदत्त' का अनुवाद प्रकाशित कराया। सन् १९१६-१७ ई. में महाकाव्य "साकेत' का लेखन प्रारम्भ किया। उर्मिला के प्रति उपेक्षा भाव इस ग्रन्थ में दूर किये। स्वतः प्रेस की स्थापना कर अपनी पुस्तकें छापना शुरु किया। साकेत तथा अन्य ग्रन्थ पंचवटी आदि सन् १९३१ में पूर्ण किये। इसी समय वे राष्ट्रपिता गांधी जी के निकट सम्पर्क में आये। 'यशोधरा' सन् १९३२ ई. में लिखी। गांधी जी ने उन्हें "राष्टकवि' की संज्ञा प्रदान की। सन् १९४१ ई. में व्यक्तिगत सत्याग्रह के अंतर्गत जेल गये। उनकी तीन पत्नियां तथा आठ संतान हुई। आगरा विश्वविद्यालय से उन्हें डी.लिट. से सम्मानित किया गया। १९५२-१९६४ तक राज्य सभा के सदस्य मनोनीत हुये। सन् १९५३ ई. में भारत सरकार ने उन्हें "पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने सन् १९६२ ई. में "अभिनन्दन ग्रन्थ' भेंट किया तथा हिन्दू विश्वविद्यालय के द्वारा डी.लिट. से सम्मानित किये गये।

इसी वर्ष प्रयाग में "सरस्वती' की स्वर्ण जयन्ती समारोह का आयोजन हुआ जिसकी अध्यक्षता श्री गुप्त जी ने की। सन् १९६३ ई. में अनुज सियाराम शरण गुप्त के निधन ने अपूर्णनीय आघात पहुंचाया। १२ दिसम्बर १९६४ ई. को दिल का दौरा पड़ा और साहित्य का जगमगाता तारा अस्त हो गया। ७८ वर्ष की आयु में दो महाकाव्य, १९ खण्डकाव्य, काव्यगीत, नाटिकायें आदि लिखी। उनके काव्य में राष्ट्रीय चेतना, धार्मिक भावना और मानवीय उत्थान प्रतिबिम्बित है। "भारत भारती' के तीन खण्ड में देश का अतीत, वर्तमान और भविष्य चित्रित है। वे मानववादी, नैतिक और सांस्कृतिक काव्यधारा के विशिष्ट कवि थे। डॉ. नगेन्द्र के अनुसार वे राष्ट्रकवि थे, सच्चे राष्ट्रकवि। दिनकर जी के अनुसार उनके काव्य के भीतर भारत की प्राचीन संस्कृति एक बार फिर तरुणावस्था को प्राप्त हुई थी।

१.    हमारा प्रांत बुन्देलखण्ड चाहे जितनी बातों में पिछड़ा हो किन्तु कविता प्रेम हमारा प्रकृतिगत स्वभाव है।
२.    इट इज झांसी कन्ट्रीब्यूशन टु फ्रीडम वर्ल्ड लिटरेचर क्राउन जेम आॅफ हिन्दी पोयट्री, दि नेशंस पोयट वेल नोन श्री मैथलीशरण गुप्त, ही टू इज माई ओन।

-भगवानदास माहौर

वृन्दावनलाल शर्मा

महान उपन्यासकार श्री वृन्दावनलाल वर्मा का जन्म मऊरानीपुर --झांसी-- में ९ जनवरी सन् १८८९ ई. में हुआ। उनके पिता श्री अयोध्या प्रसाद श्रीवास्तव कानूनगो थे। विद्यार्थी जीवन में ही आपने शेक्सपीयर के चार नाटकों का हिन्दी अनुवाद किया। सन् १९१३ में वकालत शुरु की, सन् १९०९ में राजपूत की तलवार --कहानी संग्रह-- प्रकाशित हुई। "गढ़-कुण्डार', "विराटा की पद्मिनी', "झांसी की रानी', "हंस मयूर', "माधवराय सिन्धिया', "मृगनयनी', पूर्व की ओर, ललित विक्रम, भुवन विक्रम, अहिल्याबाई "कीचड़' और "कमल' "देवगढ़ की मुस्कान', "रामगढ़ की रानी', "महारानी दुर्गावती', "अब क्या हो', "सोती आग', --ऐतिहासिक उपन्यास--, "लगन, "संगम', "प्रत्यागत', कुण्डली चक्र, प्रेम की भेंट, मंगलसूत्र, राखी की लाज, अचल मेरा कोई, बाँस का फांस, खिलौनी की खोज, कनेर, पीले हाथ, नीलकंठ, केवट, देखा-देखी, उदय, किरण, आहत, आदि सामाजिक उपन्यासों का लेखन पूर्ण किया। अंगूठी का दान, कलाकार का दण्ड, रश्मि समूह, शरणागत, मेढ़क का ब्याह, ऐतिहासिक कहानियां, गौरव गाथाएं, सरदार राने खां, राष्ट्रीय ध्वज की आन, एक दूसरे के लिए हम, आदि कहानियां लिखी। झांसी की रानी, बीरबल, चले चलो, नाटक तथा तीन एकांकी लिखे। हृदय की हिलोर, --गद्य काव्य--, दबे पांव --शिकार अनुभव, सोना --आंचलिक कहानी--, युद्ध के मोर्चे से, --वीरगाथा जीवनी-- १८५७ के अमर वीर --स्केच-- अपनी कहानी --जीवनी-- बुन्देलखण्ड के लोकगती, काश्मीर का कांटा, --राजनैतिक नाटक-- भारत यह है --रिपोर्ताज़-- आदि विविध रचनाएं लिखी। ललितादित्य डूबता शंखनाद, अमर ज्योति, आदि प्रकाश्य है। आपकी विभिन्न पुस्तकों का अनुवाद देशी और विदेशी भाषाओं में सम्पन्न हुआ।

भारत सरकार द्वारा सन् १९६५ ई. में "पदम् भूषण' द्वारा सम्मानित हुए। आगरा विश्वविद्यालय द्वारा सन् १९६८ में डी.लिट. उपाधि प्रदत्त हुयी। हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा सन् १९६५ में ""साहित्य वाचस्पति'' उपाधि प्रदान की गयी। "सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार', "साहित्य अकादमी पुरस्कारद्ध, "हिन्दुस्तानी अकादमी पुरस्कारद्ध तथा "बटुक प्रसाद पुरस्कार' --काशी नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी-- प्राप्त हुए। २३ फरवरी सन् १९६९ ई. को ८१ वर्ष की आयु में स्वर्गवासी हुए।

श्री वर्मा जी की कहानियां, उपन्यास, नाटक आदि आंचलिकता का गुण लिये हुए हैं। उनकी तुलना या प्रेरणा स्रोत सर वाल्टर स्काट को माना जाता है, यह भ्रामक है। उनकी घटनाचक्रों की पृष्ठभूमि, पात्रों की मानसिकता तथा वातावरण शुद्धतम भारतीय तथा बुन्देलखण्डी है।

बुदेलखण्ड का चप्पा-चप्पा उनका जाना और छाना हुआ था। यहाँ के निवसी उनकी रचनाओं में अनुप्राणित हैं। बुन्देलाण्ड का समस्त जीवन उनमें प्रतिफलित है। उनका जीवन एक महाकाव्य था। जिसमें विविध सर्ग उनकी रचनाएं थीं। उनके जीवन में बुन्देलखण्ड की मिट्टी की सुगन्ध बसी हुयी थी और वही उनकी रचनाओं में भी मुखरित थी। हिन्दी में एक वही लेखक थे जिसमें एक व्यापक भूखण्ड का अतीत, वर्तमान और भविष्य बोलता है। मानो वह कोई दपंण है जिसमें युगों के चित्र उभरतें, मिटते और मिट-मिट कर फिर उभरते हैं। --पुस्तकांश "मैंने स्मृति के दीप जलाएं' -श्री रामनाथ सुमन सन् १९७६--

सियारामशरण गुप्त

बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार श्री सियारामशरण गुप्त का जन्म भाद्र पूर्णिमा सम्वत् १९५२ वि. तद्नुसार ४ सितम्बर १८९५ ई. को सेठ रामचरण कनकने के परिवार में श्री मैथिलीशरण गुप्त के अनुज रुप में चिरगांव, झांसी में हुआ था। प्राइमरी शिक्षा पूर्ण कर घर में ही गुजराती, अंग्रेजी और उर्दू भाषा सीखी। सन् १९२९ ई. में राष्ट्रपिता गांधी जी और कस्तूरबा के सम्पर्क में आये। कुछ समय वर्धा आश्रम में भी रहे। सन् १९४० ई. में चिरगांव में ही नेता जी सुभाषचन्द्र बोस का स्वागत किया। वे सन्त बिनोवा जी के सम्पर्क में भी आये। उनकी पत्नी तथा पुत्रों का निधन असमय ही हो गया। मूलत- आप दु:ख वेदना और करुणा के कवि बन गये। साहित्य के आप मौन साधक बने रहे।

'मौर्य विजय' प्रथम रचना सन् १९१४ में लिखी। अनाथ, आर्द्रा, विषाद, दूर्वा दल, बापू, सुनन्दा, गोपिका आपके खण्ड काव्य हैं। मानुषी --कहानी संग्रह--, पुण्य पर्व --नाटक--, गीता सम्वाद, --अनुवाद--, उन्मुक्त गीत --नाट्य--, अनुरुपा तथा अमृत पुत्र --कविता संग्रह-- सर्वप्रसिद्ध है। दैनिकी नकुल, नोआखली में, जय हिन्द, पाथेय, मृण्मयी, आत्मोसर्ग काव्यग्रन्थ हैं। "अन्तिम आकांक्षा', "नारी' और गोद उपन्यास है। "झूठ-सच' निबन्ध संग्रह है। ईषोपनिषद, धम्मपद भगवत गीता का पद्यानुवाद आपने किया।

दीर्घकालीन हिन्दी सेवाओं के लिए सन् १९६२ ई. में "सरस्वती' हीरक जयन्ती में सम्मानित किये गये। आपको सन् १९४१ ई. में "सुधाकर पदक' नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी द्वारा प्रदान किया गया। आपकी समस्त रचनाएं पांच खण्डों में संकलित कर प्रकाशित है। असमय ही २९ मार्च १९६३ ई. को लम्बी बीमारी के बाद मां सरस्वती के धाम में प्रस्थान कर गये।

डॉ. रामकुमार वर्मा

एकांकी सम्राट डॉ. रामकुमार वर्मा का जन्म १५ सितम्बर सन् १९०५ ई. में मोहल्ला गोपालगंज, सागर में हुआ था। आप इलाहाबाद विश्वविद्यालय से विभागाध्यक्ष --हिन्दी-- पद से सेवा निवृत हुये। वीर हम्मीर, चित्तौड़ विजय --प्रबन्ध काव्य-- निशीथ, बालि वध, एकलव्य, --खण्ड काव्य-- कुलललना, नूरजहाँ, भोजराज, जौहर --आख्यान गीत, पृथ्वीराज की आंखें, रेशमी टाई, रुप-रंग, कुन्ती का परिताप, शिवाजी, रिम-झिम, कौमुदी महोत्सव --ऐतिहासिक एकांकी-- मयूर पंख, खट्टे-मीठे, ललित एकांकी, मेरे श्रेष्ठ रंग एकांकी प्रकाशित हैं। साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास, कबीर ग्रन्थावली --सम्पादित-- कबीर का रहस्यवाद, कबीर : एक अनुशीलन, संस्मरणों के सुमन भी प्रकाशित हैं। आपके काव्य संग्रह अंजलि, अभिशाप, रुपराशि, चारुमित्र, सप्तकिरण, हिमहास, स्मृति के अंकुर, रुप-रंग, ॠतुराज, दीपदान, कामकंदला, चन्द्र किरण, बापू, इन्द्रधनुष, अग्निशिखा, अशोक का शोक आदि हैं।

डॉ. वर्मा बहुमुखी प्रतिभा के साहित्यकार थे। वे श्रेष्ठ कवि तथा एकांकी लेखन के अद्वितीय रचनाकार थे। एक महान नाटककार एवं साहित्य के मूर्धन्य अध्येता थे। उनका प्रत्येक ग्रन्थ साहित्य जगत में प्रकाशमान है। सन् १९६३ ई. में "पद्म भूषण' से सम्मानित हुए।

श्री अम्बिका प्रसाद दिव्य

अजयगढ़ जिला पन्ना के सुसंस्कृत कायस्थ परिवार में श्री अम्बिका प्रसाद, "दिव्य' का जन्म १६ मार्च सन् १९०६ ई में हुआ था। एम. ए. --हिन्दी-- साहित्यरत्न उपाधि सम्पन्न "दिव्य जी' ने म.प्र. शिक्षा विभाग में सेवा कार्य प्रारंभ किया, प्राचार्य पद से सेवा निवृत हुवे। आप अंग्रेजी, संस्कृत, रुसी, फारसी, उर्दू भाषाविद् थे। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। खजुराहो की अतिरुपा, प्रीताद्रि की राजकुमारी, काला भौंरा, योगी राजा, सती का पत्थर, फजल का मकबरा, जूठी पातर, जयदुर्ग का राजमहल, असीम का सीमा, प्रेमी तपस्वी आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की। निमिया, मनोवेदना, बेलकली सामाजिक उपन्यास लिखे। गाँधी परायण, अंतर्जगत, रामदपंण, खजुराहो की रानी, दिव्य दोहावली, पावस, पिपासा, स्रोतस्विनी, पश्यन्ति, चेतयन्ति, अनन्यमनसा, विचिन्तयंति, भारतगीत प्रसिद्ध महाकाव्य तथा मुक्त रचनायें हैं। आपने लंकेश्वर, भोजनन्दन कंस, निर्वाण पथ, तीन पग, कामधेनु, सूत्रपात, चरण चिन्ह, प्रलय का बीज, रुपक सरिता, रुपक मंजरी, फूटी आँखे, भारत माता, झाँसी की रानी, आदि नाटक लिखे। निबन्ध विविधा, दीप सरिता, हमारी चित्रकला म.प्र. शासन --छत्रसाल पुरस्कार-- द्वारा पुरस्कृत है। वीमेन आॅफ खजुराहो अंग्रेजी की सुप्रसिद्ध रचना है। दिव्य जी का पद्य साहित्य मैथिली शरण गुप्त, नाटक साहित्य रामकुमार वर्मा तथा उपन्यास साहित्य वृंदावन लाल वर्मा जैसे शीर्ष साहित्यकारों के सन्निकट हैं। आपने कीर के कागर समान अपना शरीर ५ सितम्बर १९८६ ई. को शिक्षक दिवस समारोह में भाग लेते हुये हृदय-गति रुक जाने से त्याग दिया। आप आदर्श प्राचार्य के रुप में सन् १९६० में सम्मानित किये गये थे। दिव्य जी के उपन्यासों का केन्द्र बिन्दु बुन्देलखंड अथवा बुन्देले नायक हैं। बेल कली --पन्ना नरेश अमान सिंह-- जय दुर्ग का रंग महल --अजयगढ़-- सती का पत्थर --गठौरा का युद्ध-बुन्देलखण्ड का महाभारत-- पीताद्रे का राजकुमारी --रानी दुर्गावती-- तथा निमिया की पृष्ठभूमि बुन्देलखण्ड का जनजीवन है। सन् १९८६ ई. में मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा समिति भोपाल द्वारा "दिव्य पुरस्कार' का शुभारम्भ अहिन्दी प्रदेश के नाटककारों के लिए किया गया है। साहित्य सदन --अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति समारोह द्वारा उपन्यास विधा हेतु तथा दो हजार रुपये की राशि तथा द्वितीय पुरस्कार "कविता विधा हेतु' घोषित किये गये हैं। तथा "दिव्यालोक' का प्रकाशन भी संग्रहणीय स्मारिका के रुप में प्रस्तावित है। दिव्य जी का अभिनन्दन ग्रन्थ प्रकाश्य है।

केदारनाथ अग्रवाल

श्री केदारनाथ अग्रवाल का जन्म १ अप्रैल १९११ ई. में बाँदा जनपद के कमासिन ग्राम में हुआ। व्यवसाय से आप कुशल अधिवक्ता तथा सरकारी वकील के रुप में भी पदस्थ थे। "देश देश की कविता' प्रथम काव्यानुवाद प्रकाशित हुआ। युग की गंगा, नींद के बादल, गुलमेंहदी, आग का आइना, हे मेरी तुम, कहे किदार खरी-खरी, जमुन जल, जो शिलाएं तोड़े हैं, अनहारी हरियाली, कूकी कोयल खड़ी पेड़ की देह, बसन्त में प्रसन्न हुयी धरती, --काव्य संग्रह-- प्रकाशित हैं। पतिया --उपन्यास--, खिली बस्ती गुलाबों की --संस्मरण--, भी प्रमुख ग्रन्थ है। साहित्य अकादमी द्वारा "अपूर्वा' पुरस्कृत है। आप "मैथिलीशरण गुप्त' पुरस्कार से सम्मानित हुए तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन प्रयाग द्वारा "विद्यावाचस्पति' के उपाधि से अलंकृत किये गये।

आपको जनवादी कवि के नाते सन् १९७३ ई. में सोवियत लैण्ड पुरस्कार प्रदान किया गया तथा ""रुस का यात्रा'' भी की। इनकी काव्यप्रेरणा स्वयं का जीवनदर्शन है। उन्होंने किसान एवं मजदूरों की पीड़ा तथा ग्रामीण जीवन के दु:ख दर्दों को ईमानदारी से व्यक्त किया है। माक्र्सवादी विचारधारा से प्रभावित होकर रचना करते हैं, किन्तु इनका व्यक्तित्व स्वछन्द व प्रगतिशील है। वे केवल कवि ही नहीं सूक्ष्म विचारक भी हैं जैसा उनके साहित्यिक लेखों से प्रगट होता है। वे नये मूल्यों की स्थापना करनेवाले विद्रोही कवि हैं। समाज में नये जीवन की नयी किरण का स्वागत करते हैं। संघर्ष और विद्रोह के प्रति उनका दृष्टिकोण स्वस्थ है। उनके बिम्ब नवीन तथा सारगर्भित होते हैं। उनकी भाषा सरल व चुभती हुई है। "श्री केदारनाथ अग्रवाल पुरस्कार' समारोह बाद में प्रारम्भ हो गया है। बापू जी का देहान्त २२ जून, सन् २००० को हो गया।

गौरवर्ण के अनुपम तेजस्वी, कविता के कर्मठ कारीगर।
जनकवि श्री केदारनाथ हैं, बुद्धि विवेक विनय के सागर।।

- सुरेन्द्र नाथ पाण्डेय


जाकि शीश जमुन डुलावै चोर मोद मान, नर्मदा पखारै पाद पद्म पुण्य पेखी है।
कटि कल केन किंकणी सी कलधौंत कांति बेतवा विशाल मुक्त माल सम लेखी है।
व्यास कहे सोहे शीश फूल सम पुष्पावती पायजेब पायन पयिस्वनी पंरेखी है।
एहो शशि कहौ सांचि वहौ दिव्य भूमि ऐसी दनी और कहीं देखी है।

- राष्ट्रकवि घासीराम व्यास

यमुना टोंस नर्मदा चम्बल की माला पहिने
केन, धसान, पहूज, बेतवा, सिंध संगी है बहिनें
जिनके उरमें विंध्याचल का स्नेहभरा है, यही बुन्देल धरा है।
यथा नाम गुण तथा देवगढ़ है, देवों की नगरी
वेत्रवती तट प्रकृति नटी की स्वर्ग सम्पदा बगरी,
जिसका कानन चंदन सम रहता हरा भरा है बुन्देल धरा है।।

- रामदास गुप्त, इचौली


ढारे जाके शीश सदा जल जमुना मइया आप,
पांव पखारे रात दिना रेवा जाके परताप।
सोन, केन के जाके अंगना सुनियत सुखद अलाप,
जाके बन, बन नगरन लखियत वेत्रवती की छाप।
सुरग को सो कोउ खंड अखण्ड हमाओ धन्न बुन्देलखण्ड।

- दुर्गा प्रसाद शास्री "अनिरुद्ध'

हमारो धन्न बुन्देलखण्ड
बब्बर जब्बर आल्हा-ऊदल हिंनई जूझ गये जंग।
भई पिथौरा दिल्लीपति की हिनई उमंगे भंग।
छत्रसाल की हिंनई तमक कै चमक उठी ती खंग।
कालव कवै हिनई की लक्ष्मी खुल खेले रन रंग।
सूरगन को घन घना भुजदंड, हमाओ धन्न बुन्देलखण्ड।

- दुर्गा प्रसाद शास्री "अनिरुद्ध'

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - परवर्ती बुंदेली समाज और संस्कृति (Later Bundeli society and culture)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

परवर्ती बुंदेली समाज और संस्कृति (Later Bundeli society and culture)

मराठों के शासनकाल में बुंदेलखंड में यजुर्वेदिय हिन्दु शाखाओं के साथ ॠग्वेदीय हिन्दुओं का समागम हुआ।   इनमें ब्राह्मण तथा अन्य जातियों के अनेक वर्ग मिलते हैं। मुसलमानों में शिया और सुन्नी के सिवा भी अन्य बोहरा बहना आदि अन्य जाति के व्यक्ति इस प्रदेश के निवासी बने। अंग्रेजी राज्य में विलयन होने पर ईसाई मिशनरियों ने भी जिला स्तरों पर मुख्यालय बनाये और अपने धर्म का प्रचार-प्रसार किया। बुंदेली समाज अब तक चातुण्र्वण्य तक ही सीमित था और आर्यों तखा अनार्यों का श्रेणियों में आसानी से विभाजित हो जाता था पर गत दो सौ वर्षों में उसमें विविधता आई। सभी जातियाँ अपने खान-पान, विवाह संबंधों तथा जन्म आदि के संस्कारों में एक दूसरे के प्रभाव में आई। वर्तमान रीति-रिवाजों और संस्कारों में बहुत कुछ एक सा हो गया है।

 मध्ययुग में अकबर के शासन के उपरांत शाहजहाँ और औरंगजेब के धार्मिक नीति में कट्टरता आने लगी और हिन्दुओं पर क्रमश: अत्याचार बढ़ने लगे और इसका प्रभाव हिन्दुओं के राजनैतिक नेताओं - विशेषकर अधीनस्थ सामंतों पर भी पड़। एक और राजपूत बादशाह की कृपा के पात्र बने रहना चाहते थे और दूसरी ओर वे आत्मसम्मान की रक्षा हेतु बलि देने को भी तैयार हो जाते थे, यहाँ उनका विद्रोही स्वर झलकता था। बुंदेलखंड के शासकों में इस काल में दो प्रवृतियां लक्षित होती हैं। एक वर्ग के जागीरदार, शासक, दरबारी, संस्कृति के दास बनते हैं और दूसरे वर्ग के शासक विद्रोह का रास्ता अपनाते हैं। इनमें वीरसिंह, जुझारसिंह, चम्पतराय, छत्रसाल, मानवती, शहीद सुमेरसिंह, मर्दनसिंह, बख्ताबलीशाह के नाम स्वातंत्र्य प्राप्ति के लिए तथा हरदौल सिंह, अमानसिंह, मथुरावली आदि के नाम बलिदान या उत्सर्ग के लिए प्रसिद्ध हैं। उत्सर्ग करने वाले व्यक्तियों को जनसमाज ने देव का दर्जा प्रदान किया है। शौर्य के क्षेत्र में मराठा शामन में तांत्या टोपे, रानी लक्ष्मीबाई, दुर्गावती के नाम स्मरणीय हैं। अंग्रेजी शासनकाल में चन्द्रशेखर, भगवानदास माहौर के साथ अन्य अनेक शहीदों के नाम बुंदेलखंड के जोड़े जाते हैं। मध्ययुग के उपरांत समाज और संस्कृति के क्षेत्र में बुंदेलखंड में विधानगत कठोरता बढ़ती गई है परंतु हिन्दु संस्कृति और सभ्यता की रक्षा के प्रयत्न भी हुए हैं। उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों की भाँति यहां आंग्ल और मुसलमानी प्रभाव न्यून ही रहा है अत: बुंदेली समाज के घटकों में वर्णो का प्राधान्य रहा है। विदेशी समाजों के प्रभाव सामाजिक-धार्मिक कट्टरता के कारण अनिष्टकारी परिणाम देने वाले नहीं है। अंधविश्वास, जाति से बड़ी जात, आनुवंशिक कुलीनता, धार्मिक अन्धता के परिणामस्वरुप मध्ययुगीन समस्त धार्मिक उपासनाओं में विविधता बढ़ती गई। राम, कृष्ण की रसिक उपासनाओ का जोर होने से अतिवादी रुप भी सामने आये। बुंदेली समाज में कुल मिलाकर धर्म, संस्कृति के क्षेत्र में संख्यातीत शाखा-प्रशाकायें दृष्टिगत होती हैं। बुंदेली समाज के घटकों का स्वरुप इस प्रकार है।

       हिन्दु वर्णाश्रम में ब्राह्मणों की व्यवस्था प्राय: अपदस्थ हो गई। समस्त ब्राह्मणों के दो वर्ग सारे देश में हो गए - उत्तर भारतीय ब्राह्मणों के लिए पंच गौड़ और दक्षिण भारतीय ब्राह्मणों के निमित्त पंच द्रविड़ वर्ग। पंच गौड़ - सास्वत, गोर, कान्यकुब्ज, मैथिल और उत्कल; पंच द्रविड़   - महाराष्ट्र, तैलंग या आंध्र, द्रविड़ या तमिल, कर्नाटक तथा गू के बीच की विभाजन रेखा नर्मदा नदी मानी जाती है। पंच गौड़ के अन्दर अनेक उपजातियाँ भी मानी जाती हैं जिनमें एक दूसरे से श्रेष्ठता की प्रतिस्पर्धा अभी तक बनी हुई है। बुंदेलखंड में अधिकांशत: जिझौतिया ब्राह्मण ही मुख्य रहै हैं।

       कान्यकुब्ज, सरयूपारीण सना और अन्य ब्राह्मण के वर्ग एक शताब्दी से पूर्व यहाँ नहीं थे। प्रारंभ में इनका कार्य मंदीरों में पूजा करना और शासकों का मंत्री होना था बाद में इन्हें जागीर और सनदें मिली तो ये कृषि, नौकरी आदि में भी प्रवृत हो गए। ब्राह्मणों को मूलस्थान के आधार पर संज्ञायें दी गई हैं। बुंदेलखंड में इनकी उपजातियाँ अहिवासी, जिझोतिया, कनौजिया, खेड़ावाल, मालवी, नागर, नार्मदेव, सनाढ्य, सरबरिया और उत्कल की पाई जाती है। विप्र, द्विज, बाँमन श्रोत्रिय महाराज आदि विशेषण इनके साथ जोड़े जाते हैं। पूर्व और उत्तर में ब्राह्मण मां भक्षण करते हैं पश्चिम में वेमसक का पानी पीते हैं परंतु बुंदेलखंड में इसका चलन नहीं है। एक ब्राह्मण दूसरे के यहाँ पक्की रसोई खाता है। इनके कुछ गुणों की जहाँ प्रशंसा होती है वहीं पर इनके संबंध मे जनश्रुतियां भी है -

(१)     विप्र परौसी अजय धन, बिटियन कौ दरबार।

एते पै धन न घटे पीपर राखौ दुआर।।

(२)     विप्र वैद नाऊ नृपति स्वान सौत मंजार।

जहाँ जहाँ जे जुरत है तहँ तहँ राखौ बिगार।।

(३)     करिया वामन, गोर चमार, इनके साथ न उतरियो पाऱ

ब्राह्मणों के बाद बुंदेलखंड की दूसरी जाति क्षत्रिय है जिनके ३६ प्रकार अथवा उपजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं। रसैल का कथन है कि उनकी कुलीनता के संदर्भ में यह बताना कठिन है कि शुद्ध रक्त कौन हैं?   बुंदेलखंड में अधिकांशत: परमार बिसेन, बुंदेला, बनाफर, चन्देल, मदौरिया, कछवाहा, तोमर, चौहान, धाकड़, हैदयवंशी, कलमुरि आदि भी प्रमुखता से पाये जाते हैं। इन्हीं के साथ दांगी, लोधी और कुरमी भी अपने को ठाकुर कहते हैं। ये मध्ययुग तक कृषि करने वाले माने गए हैं। करमियों में उररेंटे, चन्दनास, सिंगोरे, लोधी आदि अनेक उपजातियाँ हैं। शासक वर्ग के कारण इनमें बहुविवाह, बालविवाह और माँस, मदिरा का प्रचलन अब तक रहा है। दाँगी सागर में विशेष संख्या में होने के कारण इस प्रदेश को दाँगीपाड़ा भी कहा जाता है। वैसे दाँगी के संबंध में जनश्रुति यह है कि वे जगली जाति के हैं ; भले ही वे अपराध वृत्ति नही रखते हैं पर इनके संबंध में कहा जाता है -

(१)     खेत में बासी गाँ में दाँगी

(२)     जिनकी घोड़ी तितगई, दंग हाथ करयारी (लगान) रई।

(३)     तीन में न तेरा में, मृदंग बजावे डेरा में।

कदाचित दाँगी को चालाक प्रवृत्ति और अविश्वसनीय माननें के कारण यह प्रचलित है। राजपूतों में दाँगियों की भाँति देवी की पूजा प्रमुख है। शेष रीति-रिवाजों में य वैष्णव और शाक्त उपासकों की भाँति हैं।

बैश्य जिनके अनेक नाम बनिया, वणि, महाजन, सेठ, साहूकार आदि प्रचलित हैं ये वास्तव में सुदूर अतीत में अनाज, घी, और अन्य मनिहारी का समाज बेचने वाल थे। मध्ययुग के बाद इनका कार्य बैंकिंग और कृषि हो गया। वैश्य दो प्रकार के हैं - जैन और हिन्दु। मध्ययुग के बहुत बाद तक यह अलग विभाजन नहीं था। जैन - बनिया, ओसवाल, सैतवाल, परवार, गोला, घूरब, चरनापर, बघेलवाल, समैया आदि उपजातियों में विभाजित हैं। हिन्दु, बनिया, अग्रवाल, असाटी, गहोई, केसरवानी, महेश्वरी, नेमा आदि उपनामों से जाने जाते हैं। जैन बनिया दिगम्बर या श्वेताम्बर होते हैं और पारसनाथ, बाहुबलि को मानते हैं। हिन्दु बनिया पूर्णत: वैष्णव: होते हैं।

असाटी के बारे में जनश्रुति हैं -   "अर्धा जाले अर्धा गारे, जिनका नास असाटी पारे' इनकी उत्पत्ति के संबंध में अनेक मत हैं। गहोई वैष्णव हिन्दु होते हैं। महेश्वरी में ७२ कुल माने जाते हैं।

ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य मूलत: आर्यों के साथ जुड़े हैं और शेष जातियों की अनार्य उत्पत्ति मानी जाती है। इनमें सामाजिक स्तर के अनुसार शूद्र सबसे नीचे और उनके ऊपर अन्य सभी व्यावसायिक और कामगार जातियाँ आती हैं। सबसे निचले स्तर पर चमार, मोची, कोरी, तेली, बखोर, पासी, कलार, कुम्हार आदि की गणना की जाती है। इनकी गतिशीलता से कहीं अधिक घोसी, धोबी, गड़रिया, गूजर, अहीर आदि की होती है। व्यावसायिक वर्ग में सुनार, लुहार, ठठेरा, बढ़ई, कसेरा को अन्य दर्जा मिला है जबकि बनजारा, कुँजड़ा, भड़भूँजा, बनिया खत्रि आदि को उनके कार्य के आधार पर स्तर दिया गया है। कचेरा, लखेरा या माली, काद्दी, चौरसिया या बरई की भी इसी प्रकार स्थिति मानी गई है। आधुनिक युग में इन सभी जातियों का महत्व कम हो गया है। अनेक निचले स्तर के कहे जाने वाले, नौकरी करने लगे हैं और वर्ण की व्यवस्था नगरों में प्राय: कम हो गई है। गाँवों में अभी भी इसका यही कथित रुप है। प्रत्येक जाति के सथ कुछ जनश्रुतियाँ भी प्रसिद्ध हैं -

ब्राह्मण से संबंधित -

(१)    लंपा साँप सन्नोड़िया, मिलियौ हाथ ले गेड़ियाँ।

(२)    तीन घर तेरा चूल्हे।

(३)    आगे ब्राह्मण पीछे भाट

           ताके पीछे और जात।

(४)    ओई बाँस के डाल टोकना, ओई के चलनी सप।

          ओई कूँख के कैये राजा अमानजू, ओई कूँख की सहोद्रा बैन।।


क्षत्रियों सें संबंधित -

(१)     बारा बरस लौं कूकर जीये और सौटा लौं जिये सियार।

बरस अठारा क्षत्रिय जीये आगैं जीवे को धिक्कार।।

(२)    चार बां चौबीस गज अंगुल अष्ट प्रमाण

ता ऊपर सुल्तान हैं मत चुकौ चौहान

(३)     जिहि कि बिटीया सुन्दर देखी तिहि पै जाय धरे तरवार।


वैश्यों से संबंधित -

(१)     आमा नींबू बनिया, दाबे में रस देत

कायस्थ कौऔ काट्टया, मुदौं से ले लत

(२)     टुआर धनी के पर रहो, धका धनी के खाव

इक दिन ऐसा होयगो, आप धनी हो जाव

(३)     दुकान को एक घड़ी को भूलो

तो दुकान कये मैं तोय सब दिन को भूलौ।

(४)     डाँडी मारें साब कहावें, रह हाँके सो चीर।

चुपर चुपर के बाबा खावैं, जिनके और न छोर।।


अन्य जातियों से संबंधित -

अहीर -         अहीर गडरिया पासी, ये तीनों सत्यानाशी।

              अहीर गड़रिया गूंजर, ये तीनों चाहें ऊजर।।

बनजारा-       रंजन का पानी, छप्पर का घास, दिन के तीन खून माफ

              और जहाँ आसफ जहाँ के घोड़े, वहां भंगी जंगी के बैल

धोबी -         धोबी पर धोबी बसे, तब कपड़ो पर साबुन परे

              धोबी का गधा घर का ना घाट का

              राजा का सिरी, परि ताकै तिरी।

माली -         मुरार माली जोते टाली, टाली मर गई, धरे कुदाली।

लुहार -         अर, धर, चुचकार, इन तीनों से बचावे करतार।

नाई     -        नाई है छत्तीसा, ख्याना का पैसा।

शबरा -         शबरा के पागे, रावत के बाँधे

               जहँ चुल्ला, तहँ दुल्ला ।।

तुली -         इर पिरा खटका खटकीरा

              खाँसी को खाला, रई रोग

              मुटको तो छे ऊन जागा मरबोढ़

कसाई -        न देखा हो बाघ तो देखो बिलाई।

              न देखा हो ठग तो देखो कसाई।।

जुलाहा -       कारीगाह छोड़ तमाशा जाय, नाहक

              चोट जुलाहा खाय।

मल्लहा -        जहाँ बैठे मलाव, तहां लगे अलाव।

पिंडारी -        नीचे जमीन और ऊपर अल्लाह, और बीच में फिरे शेख दूल्ह।

       बुंदेली समाज में द्रविड़ उत्पत्ति की जातियों में गौड़ विशेष हैं। इनके रीति-रिवाजों का प्रभाव शेष जातियों पर भी पड़ा है। मुसलमानों के आगमन के बाद जो विभिन्न जाति के लोग ग्रामों और नगरों में बसे उनमें बहना के संदर्भ में मतभेद हैं। कट्टरपंथी हिन्दु का कहना है -

(१)     तुरुक तो तुरुक और बहना तुरुक।

(२)     अचेरा कचेरा पिंजारा

मुहम्मद से दूर, दीन से न्यारा

(३)     आधौ हिन्दू आधौ मुसलमान।

तिनखों कहं धुनुक पढ़ा न।।

(४)     शेखों की शेखी, पठानों की दई।

तुर्कों की तुर्कशी, बहनों की भई।।

इस प्रकार बुंदेलखंड के विभिन्न जातियों के लोग रहते हैं परंतु उनका अपना धर्म, रीतिरिवाज, संस्कार आदि का वैशिष्टय है। मुख्य जनसंख्या ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्यों और कामगार लोगों की है जो वास्तव में वैष्णव, शाक्त, शैव, जैन, मुसलमान और ईसाई हैं।

वर्तमान बुंदेली समाज कतिपय त्यौहारों और रीति-रिवाजों से बंधा है। नगरों सें इसका चलन कम, कस्बों और ग्रामों में विशेष है। उच्च वर्ण के लोगों की तुलना में निम्नवर्ण के लोग अभी भी जादू टोना, अंध विश्वास, बहुदेववाद, रुढियों और अज्ञान के शिकार हैं।

सामन्तवाद इस प्रदेश में पंद्रहवीं शताब्दी के बाद विशेष रुप से रहा है, इसीलिए उसके दोनों प्रकार के प्रभाव मिलते हैं। सद् पक्ष में जहाँ हिन्दू धर्म, जाति की सुरक्षा के निमित्त सांस्कृतिक पुनरुत्थान होता रहा है मंदिरों और स्थापत्यकला के स्मरणीय नमूनों को निर्माण हुआ है वहीं सामन्तवाद उसद्पक्ष में जनसमाज सका शोषण भी हुआ है। आदिम दास प्रथा, वर्ग शासन सत्ता से मुक्ति सामन्तवाद ने दी थी परंतु यही प्था बाद में आर्थिक, राजनीतिक और बौद्धिक उत्पीडन का कारण बना। सामन्तवाद के अन्तर्गत वर्गीय समाज को स्थायी बनाया गया। परिणाम स्वरुप शासक एक ही जाति के हुए। वंश परम्परा से शासकों का होना प्रगति में बाधक सिद्ध हुआ। बुंदेलखंड के पिछड़े होने का प्रमुख कारण यही है कि पिछले पाँच-छह सौ वर्षों में जनता को शासनाधीन रहना पड़ा, धर्म, संस्कृति सामाजिक आचार-विचार भी शासकों के द्वारा था उनकी नकल पर अपनाये गये। सामन्तों में ईश्वरत्व का आरोपण इसी समय हुआ। बुंदेलखंड में बुंदेला शासकों को "जू देव' उनके नाम के साथ लगाया जाना इसी प्रवृति का द्योतक है। जातीय कट्टरता, धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर समन्यवयहीनता का परिणाम यह हुआ कि बीसवीं शताब्दी में पश्चिम सभ्यता के संपर्क में आने पर मध्यवर्ग में विलक्षण परिवर्तन हुए। धर्म, संस्कृति परंपरा और सामाजिक अगतिकता को नयी पीढ़ी ने एकदम झाड़कर स्वतंत्र होने की प्रक्रिया अपनाई। एक अति पर पहुँचकर वह पश्चिम का अनुगामी बनी जबकि दूसरी अति पर लोग पुरातन मूल्यों और रुढियों से बाहर न निकल सके।

उत्तर मध्यकाल में बुंदेलखंड में उपासनाओं के क्षेत्र में अत्यधिक मिलती है। क्षत्रियों एवं उनसे संबंधित जातियों ने शक्ति, दुर्गा, विन्ध्यवासिनी, मैहर की शारदा देवी आदि के प्रति अनेक विध भक्तिभाव प्रदर्शित किया। नवरात्र में उपवास रखना, सिद्ध स्थानों पर मेले लगाना, कुल देवी की पूजा करना और शक्ति के अनेक रुप मानना, शासक वर्ग की रिवाज सा हो गया। शक्ति से संबंधित शिव, शंकर, पशुपति आदि नामो से शैव उपासना का प्रचलन ही नहीं हुआ, अनेकानेक शिव मंदिरों का निर्माण भी हुआ। कबीर की परंपरा में अक्षर अनन्य तथा कवियों निर्गुण ईश्वर की उपासना की। इनके सम्प्रदाय भी बने, छत्रसाल के समय से इसमें भी प्रगति आई। प्राणनाथ सम्प्रदाय के दो केन्द्र बाद भी गतिशील रहा। कृष्णोपासना भक्तिकाल में ब्रज प्रदेश में प्रधान थी, उत्तर मध्ययुग में बुंदेलखंड इसका केन्द्र बना। रामोपासना का प्रभावशाली श्रीगणेश ओरछा में हुआ था। "राम राजा' का मंदिर बनना और रामनवमी का त्यौहार धूमधाम से मनाया जाना राजकीय कार्य हो गया। दशहरा, दीवाली और शिवरात्रि के पर्वों� को बड़ी धूमधाम से मनाया जाने लगा।

गौड़, भील और अन्यान्य वर्गों की मान्यता सवर्णों की तुलना में कम ही रही। ठाकुर, बाबा, गौड़ बाबा, दरोइया बाबा, खब्बीस-बाबा, हरदोल-लाला, कारस देव, घटोईया देवा, पूजा देव, दूल्ही बाबा तथा खेर माता, हिंगलाज माता, मरई माता, हरीसिद्धि देवी, दन्तेश्वरी देवी आदि शक्तियों की विभिन्न प्रकार उपासनायें, अनुष्ठानें और पूजायें अन्य वर्गों में प्रचलित रहीं।

टोनेटोके, बलि, जादू, झाड़फूँक आदि के प्रयोगों में भी इनमें कोई अन्तर नहीं आया। जन्म से मृत्यु तक के समस्त संस्कारों आदि डालने की परंपरा बुन्देलखंड के सभी वर्गो के लोगों में प्रचलित है यह वस्तुत: अनार्य संस्कृति की देन है। मांसाहारी वर्ग भी अब शाकाहारी हो गये।

कानों में बाली पहनना क्षत्रियों या सामन्तों के प्रभाव में शुरु हुआ था, यह भी चलन अब बंद हो रहा है। शिव अनार्यों के देवता थे पर पूर्व मध्ययुग में वे पूर्णत: आर्यों के देवता बन गए। ग्रामीण समाज अब भी परम्पराओं, रुढियों, अंधविश्वासों का पालन कर रहा था।

 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेला शासन कालीन बुंदेली समाज और संस्कृती (Bundela Era Bundeli society and culture

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुंदेला शासन कालीन बुंदेली समाज और संस्कृती (Bundela Era Bundeli society and culture)

चन्देल कालीन समाज और संस्कृति में बुंदेला शासन के प्रारम्भ होने के बीच एक ऐसा संधिकाल बुंदेलखंड में आता है जिसकी संस्कृति और समाज का चित्रण साहित्य के माध्यम से ही संभव है। जगनिककृत "आल्हा' और विष्णुदास कृत "रामायन कथा' तथा "महाभारत कथा' का आश्रय लेना श्रेष्ठकर है। विदेशी आक्रमणों का ऐसा सिलसिला चला कि राजनैतिक दृष्टि से भारत में स्थिरता नहीं रह पाई। तथापि धार्मिक और सांस्कृतिक परिवेश कठोर नियमों से अनुसासित होने लाग। समाज के चारों वर्णों को स्मृतियों के अनुसार चलने के निर्देश धार्मिक नेताओं ने दिए। स्मृतियों के अनुसारण में कट्टरता बढ़ी और जाति और उपजातियों की श्रृंखला बढ़ती ही गई। सवर्णों में पुनर्विवाह वर्जित था परन्तु शूद्रों में इसका प्रचलन था। दास-दासियों के रखने का चलन था। चन्देलों के समय धर्म का जो रुप था उसमें इस काल में कोई लक्षणीय अन्तर नहीं दिखता है। गुजरात के सोलंकी नरेश कुमारपाल के संरक्षण में जैन धर्म अवश्य ही उत्थान पा गया। उड़ीसा के जगन्नाथ, कोणार्क के सूर्य मन्दिर के नमूने तथा भुवनेश्वर समूहों का निर्माण इस समय हुआ। जैन मन्दिरों के नमूने आबू के दैलवाड़े मन्दिरों में दृष्टव्य हैं राजाओं की चिन्ता अपने राज्य को विजित होने से बचाने की थी। चारण युग का प्रारंभ यहां से होता है, चन्द और जगनिक आदि कवि इसके प्रमाण हैं।

पर्वती काल में फिरोज तुगलग के समय तक समाज की दशा अत्यंत खराब हो चुकी थी। शासन का संचालन संकीर्णतापूर्ण, पक्षपातयुक्त और साम्प्रदायिता के आधार पर होता था अत: धार्मिक पक्षपात स्वाभाविक थे। हिन्दी जी तोड़कर अपनी समाज व्यवस्था बनाने में लगे थे पर राज्य की ओर से हस्तक्षेप होते थे। समाज में दास प्रथा थी। तैमूरलंग के आक्रमण से असंतुलन उत्पन्न हुआ। रुढिवाद और अंध विश्वासों की सघनता बढ़ी। वर्णाश्रम धर्म की कट्टरता इतनी बढ़ी कि एक उपविभाग का व्यक्ति दूसरे उपविभाग के व्यक्ति तके यहां खानपान, रोटी-बेटी का संबंध नही रखता था। विदेशी आक्रमणकारियों से जब भगवान जनता की रक्षा न कर सका तो धर्महीनता की स्थिति भी आने लगी। बुंदेलखंड के समाज को अब पूर्णत: धर्म, संस्कृति और सामाजिक व्यवस्थाओं के क्षेत्र में शासक का मुखापेक्षी होना पड़ा। राजा के निर्देश कवियों की वाणी का अभिव्यक्त हुए हैं। इस समय आल्हा और जल समाज के प्रचलित उपक्तियां इस प्रकार हैं -

(१)     बारा बरस लौं कूकर जीये ओ तेरा लौं जिये सियार ।

बरस अठारा छत्री जीये आँगे जीये तो धिक्कार ।।

(मौखिक आल्हा परंपरा से)

(२)     जाहि प्रान प्रिया लागिन सौ बैठे लिज धाम।

जो काया पर मूछ वाई सो कर हैं संग्राम।।

(३)     बाई जित परमाल के बज्जे घोर निसान।

सैन सहित गढ़ मिलियो मल्लखन बलवान।।

इनसे पता चलता है कि चन्देलों के समय से राजाओं को युद्धरत रहना पड़ता था। समाज का स्थान राज्य के बाद आता है अत: हिन्दू धर्म के अनुसार राजा के लिए मरना जन समाज का धर्म हो गया था। राजा की कल्पना ईश्वर के अंश के रुप में की गई। देशी राजाओं ने हिन्दु जनता की उन्नति के लिये जितने कार्य किये उससे कहीं अधिक अपने स्वार्थों की पूर्ति की।

बुंदेली समाज का प्रतिनिधित्व १२वीं शताब्दी में महोबा के द्वारा, पन्द्रहवीं शताब्दी में ग्वालियर के द्वारा तथा उसके बाद ओरछा और पन्ना के द्वारा होता था। पन्ना के शासकों का गौड़ों और मरठों से संबंध जुड़ता है तब बुंदेलखंड के समाज में वैविध्य आने लगता है। मुगल श्णासन का प्रभाव भी समाज की रुढियों और विविध सामाजिक जीवन मूल्यों में परिवर्तन लाता है। अंतिम विदेशी प्रभाव अंग्रेजी समाज का है जिसमें वर्तमान बुंदेली समाज की संरचना हुई इस प्रकार बुंदेली समाज सामन्तवाद के प्रभाव से प्रारंभ होकर साम्राज्यवाद की अतियों का शिकार भी बनता है।

महोबा बारहवीं शताब्दी के बुंदेलखंड का सर्वाधिक प्रसिद्ध केन्द्र रहा है। चन्दबरदाई कृत महोबा खण्ड और जन कवि जागनिक कृत आल्हाणखण्ड दोनों ही कृतियाँ महोबा की सामाजिक, सांस्कृतिक दशाओं का वर्णन करती है। चन्देल साम्राज्य का अन्त, परमाल की मृत्यु और कलिं और महोबा की मुसलमानी शासकों द्वारा अधिग्रहण करने से हो जाता है। इसके बाद बुंदेलखंड का यह प्रदेश सोलहवीं शताब्दी तक प्रभावहीन हो जाता है। महोबा का शासक बहुत ही कमजोर और कायर माना गया है परन्तु उसके दो वीरों के माध्यम से इसकी ख्याति विशेष हुई है। शासक के व्यक्तित्व का पर्दाफाश होता है परन्तु इसके साथ ही समाज में स्मृतियों के शासन का आभास भी मिलता है। वर्णाश्रम, राजा के प्रति प्रजा का कर्तव्य, वीरों का जान देकर राज्य की रक्षा करना आदि इस समय की सामाजिक विशेषताएं हैं। चार वर्णों का विभाजन इस काल में अनेक जातियों और उपजातियों में हो गया था। इनके निर्माण में व्यवसाय का कर्मप्रधान कारण था। सोने का काम करने वाला सुनार, लोहे का काम करने वाला लुहार, लकड़ी का काम करने वाला बढ़ई, चमड़े का काम करने वाला चमार और ताम्बूल का व्यवसाय करने वाला तंबोली आदि से स्पष्ट होता है। स्थान परक नामों से भी उपजातियां बनी - कनौजिया, सरयूपारीण। क्षत्रिय भी छत्ती कुरियों में बंटे। कायस्थ पृथक् जाति बन गई। कुलीनता का विचार अति को पंहुचा। ब्राह्मणों ने जपतप वाला रुप तिरोहित होने लगा और वे मन्दिरों में वेतन भोगी पुजारी तथा पाठशालाओं के संचालक और शिक्षक बने। अनेक ब्राह्मण शासक भी रहे। क्षत्रियों में बल, स्वाभिमान का गौरव था परन्तु जिहि की बिटिया सुन्दर देखी तिहि पै जाय धरे तरवार की वृत्ति भी बन गई थी। सारत: अधिकांश राजपूत विलासप्रिय, दरबारी संस्कृति को अपनाने लगे। वैश्य पूर्णत: वाणिज्य पर आश्रित हो गया और अहीरों, ग्वालों ने गोपालन अपनाया। इनमें भी अनेक जातियां बनी। छुआछूत का प्रसार हुआ। चांडाल आदि अस्पृश्यों को बस्ती के बाहर झोंपड़ियां बनानी पड़ीं।

सामाजिक मूल्यों में देव ॠण, पितृ ॠण, ॠषि ॠण और मानव ॠण चुकाना जीवन का अनिवार्य लक्ष्य बना। बहुविवाह गौरव की बात हो गई। अतिथि सत्कार, दान, साधु विद्वानों के सत्कार में जनमानस की रुचि थी। दास दासियों के साथ अच्छा व्यवहार किया जाता था। शैव धर्म, वैष्णव धर्म, अभिचार, जादू-टोना तो प्रचलित थे, बौद्ध और जैन धर्म भी मान्य थे। व्यापक हिन्दु धर्म में वेद और पुराणों के साथ स्मृतियों की भी मान्यता थी परन्तु कर्मकाण्ड और बाह्योपचार के आधिक्य के कारण राजा महाराजाओं तथा धना व्यापरियों ने विशाल मन्दिर बनवाये। कलचुरी और परमरी ही नहीं चन्देल चौहान और गहिरवार आदि सभी शैव धर्मावलम्बी थे। योग और तन्त्र की शैव धर्म में प्रतिष्ठा हो चुकी थी। ज्ञानमार्ग के साथ सगुणवादियों को भी शिवपूजी में सिद्धियों की उपलब्धी माननीय हुई। वीरों ने शिवभाल में माथा दे वीरगति प्राप्त करना अन्यत्म धर्म माना। पंचमकार सम्प्रदायों के स्थान पर वैष्णव धर्म का पुनरुत्थान, शंकराचार्य की उपासना से भिन्न भक्तिमार्ग का सूत्रपात वास्तव में सनातन धर्म का प्रबल समर्थन देने वाला हुआ। इन सबका साहित्य एवं कला के क्षेत्र में व्यापक प्रभाव हुआ। महोबा के विशाल भवन, कालिं के किले और मंदिर के उत्कृष्ट नमूनों कें परवर्तीका में कुछ नया नहीं जोड़ा जा सका। महोबा का महत्व ही इसके बाद कभी न हो सका इसलिए बुंदेली साहित्य का प्रारम्भ भी वीर काव्य से होता है।

महोबा के उपरान्त ग्वालियर बुंदेलखंड का दूसरा महत्वपूर्ण राज्य है जिसमें साहित्य, संगीत और कला प्रेमी तोमर वंश का शासन रहा। इनके समय में समाज, धर्म, संस्कृति और साहित्य में समृद्धि हुई। सुदूर अतीत में ग्वालियर हूण राजा तोरमाण और उसके पुत्र मिहिरकुल के हाथ में ६वीं शताब्दी तक रहा। ९वीं शताब्दी में कन्नौज के राज भोज ने (चतुर्भुज मन्दिर के प्रमाण से) अपनी   अधीन किया। १०वीं शताब्दी के मध्य में कछवाहा राजपूतों ने इस जीता और सन् ११२८ में वे परिहारों द्वारा पराजित हुए। सन् ११६९ में कुतुबद्दीन एबक ने मुहम्मद गौरी के लिए जीता। सन् १२१० में परिहारों ने फिर इसे अपने अधिकार में किया। सन् १२३२ से १३९८ तक यह अल्तमश के अधीन रहा। तैमूर के आक्रमण के समय तोमरों ने इसे अपने अधिकार किया यद्यपि सन् १४०४, सन् १४१६, सन् १४२९ में इस राज्य के निमित्त अनेक युद्ध हुए पर सन् १५१८ तक तोमरवंशी शासकों ने इस भूमि पर राज्य किया।

तोमरवंशी राजा मानसिंह और उनके पूर्व डूँगरेन्द्र सिंह के समय में ग्वालियर एक सांस्कृति स्मृद्धि का केन्द्र था। साहित्य के क्षेत्र में रइधू, पुष्पदन्त, स्वयंभू और विष्णुदास जैसे कवियों ने यहाँ आश्रय पाया। मानसिंह के समय में अनेक कलाकृतियां, वास्तुकला और स्थापत्य कला के सुन्दर नमूनों का निर्माण हुआ। तोमरवंशी राजपूत यद्यपि बुंदेला नहीं हैं पर बुंदेलशंड में इनका इन दो शताब्दियों में विशेष महत्व रहा है। सामाजिक दृष्टि से यह भूभाग ब्राह्मण, क्षत्रियों और वैश्यों का प्रदेश था परन्तु विभिन्न आक्रमणों और शासकों की नीतियों के फलस्वरुप यहां मुसलमान, मराठा और ईसाई सभी बसे हैं। बुंदेलों का शासन ओरछा में होते ही इस राज्य का महत्व धीमे-धीमे कम हो गया क्योंकि सन् १५२६ में इसे बाबर ने तथा सन् १५४२ में शेरशाह ने १५५८ में अकबर ने अपनी सल्तनत के अधीन कर लिया। अन्य सामाजिक सांस्कृतिक दशाओं में कोई उल्लेखनीय परिवर्तन नहीं आया। हिन्दुओं ने अपनी जाति व्यवस्था, वर्णाश्रम को उत्तरोत्तर कठोर बनाया है। राजपूत संस्कृति का सर्वोत्कृष्ट आकर्षण गुजरात में उड़ीसा, मध्यभारत से पंजाब तक फैले हिन्दु, बौद्ध, जैन मंदिरों की वास्तुकला है। अनेक कला समीक्षकों और इतिहासकारों की सम्मति में खजुराहो का कंटरिया महादेव का मंदिर, भुवनेश्वर का लिंगराज मंदिर, कोणार्क का सूर्य मंदिर तथा ग्वालियर का तेली का मन्दिर वास्तु की सर्वोत्तम उपलब्धियां हैं। उदयादित्य परमार द्वारा उदयपुर (ग्वालियर) में १०५९ और १०८९ ईस्वी के भीतर निर्मित नीलकंठ अथवा उदयेश्वर मन्दिर अपेक्षाकृत अन्य प्रसिद्ध मध्ययुगीन मन्दिर हैं, किन्तु यह भारत के सुन्दरतम मन्दिरों में से एक है।

ओरछा राज्य की स्थापना और शासन से ही बुन्देला शासन की स्मृद्धि और प्रभुत्व का परिचय मिलता है। "बिन्दु दो दुर्गमेश:' के मुद्रांक से ओरछा राज्य का शासन चलता था। समस्त राजन्य परिवार की एकमात्र देवी विन्ध्यवासिनी थी। उनके दो सिंहों के कारण उन्हें सिंहवासिनी भी कहा जाता था। ध्वज में सूर्य वंश का प्रतीक काला और स्लेटी और हरा मिश्रित (या) रंग तथा एक ध्वज पर अनुमान युद्ध के देवता, शमीवृक्ष की शाखायें तथा देवी के आसन के नीचे सर (हेमकरन का) होना एक राजकीय मुद्रा की आवश्यकता थी। बुंदेलों के गोत्र काश्यप, शाखा जाबालि, प्रवर, वत्स, अरा, असित, सूत्र कात्यान गायत्री सावित्री, देव सूर्य, आद्य देवी विमला या विन्ध्यवासिनी ॠषिवशिष्ठ, शिख-दक्षिणावर्त, पक्ष सरयू और गरुड़, वृक्ष पीपल, सम्प्रदाय वैष्णव होते हैं। ओरछा के साथ टीकमगढ़ का राज्येतिहास भी यही है। ओदछा का नाम ओंदो और को मिला कर ओरछा बना है। टीकमगढ़ का नाम त्रिविक्रम-टीकम - कृष्ण के नाम के आधार पर बना है। ओरछा राज्य की विशेषताएँ जनश्रुतियों में इस प्रकार सुनी जाती हैं -

जतारा के निमित्त 

नौ सौ बिहेर नवासी कु आ।

छप्पन ताल जतारा हुआ।।

ओरछा की सतधारा के निमित्त

पहली भरी अर्जुन दिमान ने

दूजी भरी जो मुगलान के मारे

य सभी धारायें

तीजी भरी परता सू रुद्र ने

इन राजाओं ने पुण्य

चौथी भरी चन्द हकारे

कर्मों से बहती है

पंचम पाँचे भरी

मधुशाह ने षष्ठम, दुल्हाराब दुबारें

साहिब सूरत के संग्राम भरी, सतधारा की सातहु धारें


जतारा का अन्य संदर्भ -

नृपति भारती चन्द हुए प्रजानिपाल सुख कंद

नित निपुण पावन परम जाहिर बखत बुलंद

राजा सन ---- होत हो धरम नित सरसाय

कीन्ह प्रजन रंजन, साविधि अरि भंजन विधि भय

शहर, सलीमनाबाद बारशाह सलाई तत्रा

सुनि वा भारतीयचन्द नृप ताहि अरिवल अघपत्रा

दल सज्जित करकै कियौ समर घोर तिहिसाथ

मेड़ मैं कर मेदिनी लियौ प्रशस्था साथ

नगर सलीमनाबाद की कीन्द जतारा नाम

दुर्गा महाध्वज रुप, निज कीन्ह गमन निज धाम

अपर सुन्दर आटिक रचे अरु सर दुर्ग नवीन

सूरन कौ सिर भोर (सुहावन) पावन श्री जस जूह छूयो है

दीनन को दु:ख खंडन को भुज दण्डन पै भुवभार लयो है

ईस आशीष तैं पूरन है अति तूरन कारन मूर हयौ है

शालीमन के मद माँड़ को भूपति भारती चन्द्र भयी है।


यहाँ पर प्राप्त सतमढिया का संदर्भ -

सात मढ़ई की चातरी, और तलाव के पार।

जो होवे चन्देल को, सो लेवे उखार।।


वस्तुत: बुंदेला शासन में हिन्दु धर्म का पुनरुत्थान हुआ है परन्तु उसका स्वर अत्यंत मद्धिम रहा है। राजपूत स्वयं को सर्वाधिक कुली रघुकुल तिलक मानते थे। अत: शीघ्र ही उनमें वंशाभिमान, स्थीनीय देशभक्ति और संकुचित जातीयता की भावनायें घर कर गई। सामाजिक रुप से राजपूत-योद्धाओं ने अर्ध दैवी दर्जा अख्तियार करके स्वयं को शेष समाज से अलग कर लिया। इस प्रकार अब एक घमंडी और सैनिक अभिजात वर्ग का निर्माण हुआ। वे गायकों और चापलूसों से सदेव घिरे रहने लगे। जिन्होंने राजपूतों की पृथकत्व और अपने को बड़ा समझने की भावना को कृत्रिम रुप से और बढ़ाया। इसकी प्रतिक्रिया शीघ्र ही संपूर्ण समाज पर हुई। भारतीय संस्कृति को अवनति की ओर ले जाने वाली दो भयंकर सामाजिक कुरीतियां युद्ध कुशल राजपूतों की देन हैं। ये कुरीतियां हैं जन्म के आधार पर वर्ण विभाजन और जीवन के उच्चतर क्षेत्र से स्रियों को निकाल देना। इसी प्रकार जातीय बन्धन, खानपान निषेध, पर्दाप्रथा, उच्च वर्णों की स्रियों को घर की चारदीवारी में बंद रखने में कट्टरता आई। कम उम्र के विवाह, सती प्रथा मुसलमानों के आक्रमण के बहुलता के सामने आये। समाज की चातुर्वण्य व्यवस्था इस काल में आकर लचीली न होने से टूट गई। सम्पूर्ण समाज विभिन्न कटघरों में रहकर सामन्तों का मुखायेक्षी हुआ। ब्राह्मण अपनी जीविका राजदरबारों, मंदिरों और शिक्षालयों में जाकर कमाने लगे। क्षत्रियों कि विभिन्न श्रेणियां सेना में, वैश्य कृषि अथवा व्यापार तथा शेष वर्ग सेवा में बद्ध हुए। पगड़ी रखना, दुपट्टा रखना, चादर ओढ़ना अभिजात्य की निशानी बना। दशहरा, दिवाली, होली, रक्षाबंधन, कंजलियाँ आदि त्यौहारों को विशेष तौर से मनाया जाने लगा। ओरछा मे पहले विष्णु की पूजा होती थी। बाद में राम मंदिर बना और उनके साथ हनुमान, सीता, लक्ष्मण आदि की मूर्तियों की स्थापना की गई। शिवपूजा इस प्रदेश में पहले से चली आ रही थी। ओरछा के राजाओं की उत्तरोत्तर अवनति भी हुई। मधुकर शाह और वीरसिंह देव प्रथम के समय दो महत्वपूर्ण राम राजा का मन्दिर और जहांगीर महल बनाये गये। परन्तु त्यागी और ईमानदार हरदौल का विषपान करके प्राणापंण करना इनकी आपसी कटुता का प्रतीक है। हरदौल अब भी ग्रामों में देवता की भाँति पूजे जाते हैं।

महाराजा हरदौल बुन्देला नगर ओरछा म्यान।

जियत किए बहु पुन्य मरै पै थपे जगत में आन।।

                                    (किंवदन्ती)


बुंदेला शासकों की स्वाधीन राज्य के प्रति संघर्षशीलता और बादशाह की अधीनता में युद्धों में सहायता से बुंदेलखंड के समाज में वीरता, त्याग, बलिदान, धर्मपरायणता और सांस्कृतिक उत्सवों की भरमार अधिक रही है। एक हिन्दु राष्ट्र (संकीर्ण अ-- में) की कल्पना में समस्त जनसमाज को संघर्षरत रहना पड़ा है। फलत: यह प्रदेश अपनी अतीत से ही प्रगतिशील नहीं बन सका। सांस्कृतिक दृष्टि से निश्चित ही बुंदेलों के छोटे-छोटे राज्यों में निहित, संगीत धर्म की समृद्धि होती रही है और उत्तर भारत के अन्य राज्यों की भांति मुसलमान प्रभाव न्यून ही रहै हैं।

ओरछा के बाद बुंदेला शासन पन्ना से संचालित होता है। महाराज छत्रसाल इसके शीर्ष नेता माने जाते हैं। छत्रसाल मधुकर शाह के भाई उदोतसिंह के पौत्र चम्पतराय के पुत्र थे। चम्पतराय ने औरंगजेब के समय बुंदेलों की पहली राजधानी कलिं (महोबा के पास) ही थी बाद में वह पन्ना बना दी गई। बुंदेलखंड में अब तक मुसलमानों का वास भी प्रारंभ हो गया। इम्पीरियल गजेटियर के अनुसार ब्राह्मण, क्षत्रिय, लोध, अहीर, कुरमी और चमारों की जनसंख्या इस राज्य में विशेष रही है। वस्तुत: छत्रसाल तक वैष्णव धर्म की ही उन्नती हो रही थी। प्राणनाथ सम्प्रदाय को भी छत्रसाल के समय में प्रक्षय मिला। राजदरबार के कवियों ने वैष्णव भक्ति और घासी सम्प्रदाय (प्राणनाथ का दूसरा नाम) भक्ति दोनों के प्रभाव में काव्य रचनायें की हैं। कतिपय कबीरपंथी मार्ग का अनुसरण करने वाले (अक्षर अनन्य का विशेष संदर्भ) व्यक्तियों ने धर्म के बाह्यचारों का खण्डन करने का प्रयत्न किया है। छत्रसाल का शासन काल राष्ट्रीय उन्मेष का युग था। लाल कवि एक योद्धा कवि, सलाहकार की भांति छत्रसाल के जीवन की सत्य घटनाओं का चित्रण अपने काव्य में करते हैं जब भूषण शिवाजी को उद्बुद्ध कर रहे थे, लाला कवि का छत्रसाल के प्ति वही कार्य था। धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक दृष्टि से यह समस्त काल उन्मेष का था। हिन्दु संस्कृति और समाज दोनों में कट्टरता से नियमों का पालक किया गया। जाति प्रथा अत्यंत रुढ़ हो गई थी। छत्रसाल के वैभव एवं शौर्य की चर्चा शिवाजी के समानान्तर की जाती है। युद्धों में ही सारा राज्य सन्नद्ध था फलत: बुंदेलखंड की सीमाओं में विस्तार हुआ। जनश्रुति भी है -

(१)     इत जमना उत नर्मदा, इत चम्बल उत टौंस।

छत्रसाल सौं लरन की, रही न काहूं हौंस।।

(२)     दक्षिण से जोर कें, मरोट बाद शाहिन कों।

तोरे तुरकान कीन्हीं अकह कहान की।।

जेर कर जालिम जहान के नरेशन कों।

शेर पर साहिबी सम्हारो कुलै मान की।

छत्ता नरनाह त्यौं सपूत हृदय शाह वीर।

जगत बड़ाई कवि करन बखान की।

नर्मदा कालिन्दी टौंस चम्बल महावट तैं।

विरच बुंदेली हद्द बाँधी हिन्दुवान की।

(३)     भैंस बंधी है, ओरछा, पड़ हुसंगाबाद।

लगवैया है सागरे, चपिया रेवा पार।

छत्रसाल के पत्रों के सिरनामों   पर अक्सर एक पंक्ति लिखी रहती थी।

"जान है सो मान है, न मान है सो जान है।।'

छत्रप्रकाश और छत्रविलास में छत्रसाल के जीवन और नीतियों का पूर्ण विवरण मिलता है।

छत्रसाल के समय से ही बुंदेलखंड में मराठों का प्रवेश होता है जबकि बुंदेला शासको ने गौंडवाने के शासकों की कन्याओं से विवाह प्रारंभ कर दिये थे। छत्रसाल के राज्य का तीसरा हिस्सा बाजीराव पेशवा का मुहम्मद वंश हो बुन्देलखंड से निकालने सहायता के पुरस्कार में दिया गया था।

 जो गति ग्राह गजेन्द्र की सो गति भई है आय।

       बाजी जात बुंदेल की राखौ बाजी राय।।

यहां से बुंदेलखंड का शासन सूत्र मराठों और छोटे जागीरदारों में बँट जाता है। सामन्तवाद की समस्त कमियाँ और खूबियाँ इस काल के समाज को प्रभावित करती हैं।

 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - कलचुरि कालीन बुंदेली समाज और संस्कृति (Bundeli society and culture in Kalachuri Era)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

कलचुरि कालीन बुंदेली समाज और संस्कृति (Bundeli society and culture in Kalachuri Era)

कलचुरियों के समाज में नीति, मर्यादा, धर्मनिष्ठा के साथ युद्धों की अधिकता थी अत: अनिश्चय का वातावरण था। शैवोपासना का प्रसार युवराज देव के समय में हुआ। इस समय शोण नदी के तट पर मत्तमयूर शैवों का बहुत बड़ा मठ बनाया गया। इतिहासकारों के विचार से युवराजदेव के राज में शैव सिद्धांत, शैवागम, शैवाचार्य, शैवमठ मन्दिरों की बाढ़ सी आ गई थी। बुंदेलखंड में ज्ञान साधना के केन्द्रों के रुप में अनेक मठों का निर्माण किया गया। गुर्गी और बिलहारी के मठ और मंदिर इस समय में साहित्य और अन्य विद्याओं की अभूतपूर्व उन्नति। शैवों के साथ सिद्ध भी जुड़े हुए हैं। कदम्ब गुहा शैव-सिद्धों का महत्वपूर्ण स्थान रहा है तथा गोलकी मठ के साथ तो अनेक ग्रामों की आय भी जुड़ी थी। युवराज देव के समय में साहित्य के क्षेत्र में कवि "राजशेखर' का बुंदेलखंड में आना और "विद्वशाल भंजिका' नाटक, कर्पूरमंजरी तथा बालरामायण की रचना तत्कालीन साहित्यिक वातावरण को प्रस्तुत करती है। ग्यारवीं शताब्दी में कर्ण ने काशी में "कर्णमेह' नाम से शिव का प्रसिद्ध प्रसाद बनवाया था। ऐसा ही अमकंटक में चित्रकूट देवालय के नाम से निर्माण किया गया। स्थापत्य और वास्तुकला की दृष्टि से यह उत्कृष्ट कलाकृति है। बारहवीं शताब्दी में चंदेलों की बढ़ती हुई शक्ति के समक्ष कलचुरियों का पराभव हुआ। कलचुरिवंश लगभग तीन सौ वर्ष तक दक्षिण बुंदेलखंड का शासक रहा। इनके मदिरों में शिव मंदिर अधिक है साथ ही सामान्यतयर त्रिदेवों की पूजा भी होती थी। मूर्तियों में अलंकरण का प्रावधान और प्राधान्य था। समाज में विभिन्न वर्गों में उपजातियों का निर्माण इसी काल में हुआ था। क्षत्रिय युद्धों में, वैश्य व्यापार में और ब्राह्मण अपनी जीविका के साधनों के लिए सामंतों के आश्रित तो ये ही साथ ही आचार-विचार और रीतिरिवाजों के कठोरकार रहे थे। कलचुरियों के बाद चंदेलकाल में इसका विस्तार ही हुआ।

चंदेल काल :

आठवीं नवीं शताब्दी के उपरांत बुंदेलखंड के समाज में विशेष परिवर्तन आया। विदेशी आक्रमणकारियों के संस्कृत के कारण हिन्दु समाज में कट्टरता की भावना बढ़ी। आर० सी० मजूमदार ने ब्राह्मणों की निरंकुशता को एक अनिवार्य कारण माना जिसके कारण शेष समाज को उनके अधीन बन जाना पड़। दसवीं ग्यारहवीं शताब्दी के इतिहासकार इब्नशुर्दद्व के लेखों में भी इस का समर्थ नहीं मिलता है। चन्देलकाल में जाति विभाजन के दो पहलू थे - व्यावसायिक और विवाह जन्म जो बारहवीं शताब्दी के अंत तक स्थिर न रह सके। जातीय वर्ग विश्रंखलन सभी वर्णों में घटित हुआ। सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए समाज को ब्राह्मणों की ओर देखना पड़ता था। अलबेरुनी ने लिखा है महमूद ने भारतवर्ष की सभी अर्जित घाती और उसका सौंदर्य सोलह आने नष्ट कर दिया। हिन्दुओं के विचार क्रमश: संकीर्णता की ओर बढ़ते गए। इस समय परिवार की दशा व्यावसायिक थी और उपजीविका से संबंध रखती थी। मध्ययुग तक वैश्य केवल कृषि का कार्य करते थे परंतु इस काल में वे कृषि कार्य से एक दम विरक्त हो गए और बूढ़ों के साथ ब्राह्मणों और क्षत्रियों ने इस हस्तगत कर लिया।

केशव प्रसाद मिश्र के अनुसार विवाह जैसे संस्कार में भी ब्राह्मणों को अन्य जाति (क्षत्रियों, वैश्य) की कन्या से विवाह वर्जित था। मध्ययुग के उत्तर में बाल-विवाह भी प्रचलित हुए और उसके निर्मित मनु-समृति और पराशर संहिता की व्यवस्थाओं को दुहराया गया -

अष्ट वर्षा भवेगौरी नव वर्षा तु रोहिणी ।

दश वर्षा भवेत्कन्या तत उर्दू रजस्वला।।

प्राप्तेषु द्वादश वर्षे कन्यां यो न प्रयच्छति।

मसि मसि रजस्तस्या: पिवन्ति पितर: स्वयं।।

                      (पराशर संहिता)

बाल्यविवाह का एक कारण मुसलमानों अथवा विदेशियों के अत्याचार भी था। विधवा विवाह मना किया गया। बहुविवाह प्रथा प्रचलित रही। धीरे-धीरे जाति के बाहर का संबंध निषिद्ध हुआ। चंदेल राजाओं ने समकुलशील वालों के यहाँ भी विवाह संबंध किए हैं। नारियों की दशा इसी के साथ साथ गिरी और कन्या उत्पन्न करने पर उस ही दृष्टि से देखा गया। नारियों के अभिशप्त दशा में पहुँचने पर पारिवारिक विश्रंखलता आनी स्वाभाविक थी।

भोजन और पेय में शूद्रों को छोड़ कर शेष सभी वर्ण आपस में मिलते जुलते थे। शूद्र कि स्थिती दिन-प्रतिदिन गिरती गई। ब्राह्मण से शूद्र का यह निर्देश "टूरे तावत्स्थीयताम् । ब्राह्मण प्रस्वेद कनिका प्रसरन्ति' उनकी स्थिति का ज्ञापन कराता है। मद्यपान यद्यपि घृणित था परंतु यह प्रचलित था। वस्रों में पैजाम, पगड़ी, मिरजई का चलन था। आभूषण प्राय: सभी स्री-पुरुष पहनते थे।

सामाजिक रीत-रिवाजों में परिशुद्धता का विशेष ध्यान रखा जाता था। कृषि कार्य में बैसाख सुदी तीज को कृषि वर्ष का आरंभ माना जाता था। देवशयन आषाढ़ सुदी ११ को और देव जागरण कार्तिक सुदी ११ को मानना कृषि संबंधी पूजा की रीति थी। सामान्य लोगों में कर्म और उनके फलों का विश्वास था (प्राय: सुकृतिनामर्थे देवायान्ति सहायताम् प्रबोध चन्दोदयय पृ० १४१) पर अनार्य जातियों में विशेषकर गौड़ और सौरों में भूतप्रेत में विश्वास दृढ़ था। फलस्वरुप ये अनेक काल्पनिक देवताओं की पूजा करके धर्म भावना की तृप्ति करते थे। भाव-जगतम, जवार, झाड़ फूँक पर लोगों को औषधियों से भी अधिक विश्वास था। यह तांत्रिकों और अघोरपंथियों का युग था। वर्तमान बुंदेलखंड में जिम ग्राम देवताओं (खेरमाता, भिड़ोहिया, घटोइया, गौड़ बाब, मसानबाबा, नट बाबा, छीट) का प्रचलन है तथा जिन महामारियों की देवियों और शक्तियों की पूजा प्रचलित है वह इन्हीं की देन है।

मनोरंजन के क्षेत्र में उच्चस्तरीय वर्गों में गायन, वादन और नृत्य, अभिनय आदि थे तो शेष वर्गों में पर्यटनशील सपेरे, अभिचार और ऐन्द्रजालिक कार्य थे। इस प्रकार जिन बुराईयों का श्री गणेश इन शताब्दियों में हुआ वह कालान्तर में प्रौढ़ हो गई। आर्थिक दशा सामान्यत: अच्छी थी पर धार्मिक विवाद और संप्रदायगत संघर्ष बढ़ते ही गए। हठयोग #ौर तंत्र का प्रसार भी हुआ। धार्मिक अनैक्य के रहते हुए भी बौद्धधर्म का तिरोहण हुआ परन्तु कुमारिल और शंकर के अभियान के बावजूद जैन धर्म पल्लवित होता रहा। खजुराहो और महोबा में बने जैन मन्दिर इसके प्रमाण हैं। चंदेह शासकों का धर्म हिन्दु था पर वे जैन धर्म के प्रति उदार थे। धर्म में वैष्णव सम्प्रदाय के स्वरुप में परिवर्तन आया। बुद्ध विष्णु के अवतार के रुप में घोषित हो चुके थे। अहिंसा के समादार से वैष्णव धर्म ने जैन धर्म को आसन्त किया है शैव मत प्रसार वैष्णव मते के समानतर ही रहा परन्तु शाक्त को भी लोग मानते रहे। इस प्रकार विष्णु, देवी, गणेश, सूर्य आदि की पूजा प्रचलित थी परन्तु वैदिक विधियां तपंण, सूर्योपासना और हवन क्रमश: महत्वहीन होती गई। प्रत्येक हिन्दु गृह में किसी न किसी देव की लघु मूर्ति प्रतिष्ठित होती गई। हिन्दुओं के पंचांग त्यौहार से भरे पड़े थे। तीर्थ यात्रा की महिमा स्थापित हुई। मन्दिरों का जीर्णोद्धार, तालाब खुदवाना धार्मिक कृत्य बन गया। जहां तक इस्लाम की बात है बुंदेलखंड में इसका प्रभाव मुगलकाल में भी प्राय: नगण्य रहा है।

देशी राज्यों के उदय से प्रदेशीय भाषाओं का उदय भी हुआ। चन्देल साम्राज्य के अंतर्गत बुंदेली की विकास हुआ। अन्य भाषाओं में गौणी, बघेली का विकास हो रहा था। बुंदेली साहित्य का निर्माण इसी समय प्रारंभ हुआ। संस्कृत में उपदेशात्मक साहित्य, सोमदेवकृत कथा सरित्सागर, त्रिविक्रम भ कृत नल चम्पू, कृष्ण मिश्र रचित प्रबोध चन्द्रोदय (नाटक) तथा धार्मिक साहित्य पर भाष्य लिखे गये। ललित कलाओं, ज्योतिष, आयुर्वेद आदि पर ग्रन्थों का प्रणयन हुआ।

चन्देलों ने जलाशयों और दुर्गों के निर्माण में विशेष शक्ति लगाई कालंजर का दुर्ग यद्यपरि ७वीं शती का निर्मित माना जाता है पर यह चन्देल साम्राज्य का विशेष आकर्षण था। अजयगढ़, बारीगढ़, मतियागढ़ मारफ, मौधा, मरहर, देवगढ़ आदि इसी युग का स्मरण कराते हैं। मुद्राओं में चन्देल और कलचुरियों के सिक्के मिलते जुलते हैं।

चन्देलों ने उस संक्रमण काल में शासन किया है जिसमें मुसलमान क्रमश: विजय की ओर और हिन्दु पतन की ओर बढ़ रहे थे। शासकों की राजनितिक दृष्टि में संकीर्णता होने के कारण राष्ट्रीयता का सार्वभौम भाव प्राय: लुप्त था। देश बाहर और भीतर से संघर्ष की भट्टी में था। कुल मिलाकर धर्म, समाज, संस्कृति और साहित्य में परिस्थितियों से साक्षात् करने वाली दृष्टियों को अपनाया गया। धार्मिक उदारता तो रही पर भीतर से समाज धर्म और संस्कृति में एक कठोर व्यवस्था का ताना बाना बुन रही थी। तांत्रिकों और अघोरपंथियों के उदय के साथ मैथुन और मदिरा का उसी प्रकार प्राबलय हो गया जिस प्रकार वज्रयानियों और मंत्रयानियों में था। हिन्दुधर्म में उपासना के और अनेक माध्यम स्थापित हो गये। धर्म यात्रा, तीर्थ, दान, त्यौहार और व्रतों की मान्यता अधिक हो गई। यही चन्देल कालीन बुंदेली समाज का स्वरुप और संस्कृति थी।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - वाकाटक और गुप्त युगीन बुंदेली समाज और संस्कृति (Vakataka and Gupt Era Bundeli Society and Culture)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

वाकाटक और गुप्त युगीन बुंदेली समाज और संस्कृति (Vakataka and Gupt Era Bundeli Society and Culture)

वाकाटकों के पूर्व और मौर्यौं के बाद का बुंदेली समाज शुंग वंश, नागवंश, सातवाहन, विक्रमादित्य, शक, कुषाण, नवनाग आदि शासकों की अधीनता में रहा है। इस समय शासकों के बीच संघर्ष अधिक हुए हैं। इस युग गो आचार्य द्विवेदी ब्राह्मण साम्राज्य न मानकर हिन्दु संस्कृति का निर्माण युग मानते हैं जिसमें ब्राह्मण संघर्षशील तो हैं परंतु आपस में ही बौद्धों के प्रति प्रतिक्रिया कहीं नहीं थी। सामाजिक राजनीतिक क्षेत्र में अत्यंत उथल-पुथल थी। धर्मशास्र को नवीन रुप दिया गया (यह वस्तुत: संकट की व्यवस्था थी) पर परवर्ती स्मृतिकार उसे आगे न बढ़ा सके। विभिन्न शासकों के समाज तंत्र में समान्वित किया गया। पं० द्विवेदी लिखते हैं कि मान से या अपमान से यवन, शक, कुषाम सभी #ुस समाज तंत्र में खपा लिये गये। राजनीति में राजा की निरंकुशता का, उसके दैवी अधिकारों का जन्म भी इस युग से पहले ही हो गया था। इस युग में ब्राह्मण राज हो गया। परिणाम यह हुआ कि जब आगे दैवी अधिकार वाले सम्राटों का उत. हुआ तब राज्यपीठों से अपदस्थ हुए ब्राह्मणवंशों में पराजय, जन्य कुण्ठा एवं जन्म जात श्रेष्ठता की झूठी भावना घर कर गई और सम्राटों के दरबार के समान ही समाज में ऊँच-नीच एवं स्पृश्य-अस्पृश्य के भेद दिखाई दिये।

वाकाटक काल में अपने-अपने वर्ण के अन्तर्गत विवाह की अनुमति थी परंतु कभी-कभी अनुलोभ विवाह भी होते थे। वाकाटक रुद्रसेन का विवाह प्रभावती गुप्तों से होना इसका प्रमाण है। इसी प्रकार ब्राह्मण क्षत्रिय विवाह का भी उल्लेख मिलता है। ब्राह्मणों में उपपद प्रसिद्ध थे पर कुल के नाम से प्रचलित न हुए थे। वाकाटकों के लेखों में ॠग्वेदी और सामवेदी ब्राह्मणों का उल्लेख कहीं नहीं है। वर्ण व्यवस्था का पालन नियमानुसाल था। वाकाटक काल में पत्थरों और कहीं-कहीं ईटों से मन्दिर बाँधने की पद्धति प्रचार में आने लगी थी। अजंता की गुफाओं से ज्ञात होता है कि तत्कालीन राजप्रसाद, घर और दूकान लकड़ी के होते थे। कालिदास के साहित्य में तत्कालीन सामाजिक परिवेस का परिचय मिलता है।

वाकाटक काल में पौराणिक हिन्दु धर्म का भी अत्याधिक उत्कर्ष हुआ। उनके राज्य में सर्वत्र अनेक हिन्दु देवी के देवालयों का निर्माण हुआ। अधिकांश वाकाटक राजाओं के शैव होने के कारण अन्य देवो की अपेक्षा भगवान शिव के मंदिरों का निर्माण संख्या में हुआ होगा। साहित्य के क्षेत्र में संस्कृत और प्राकृत दोनो की रचनायें लिखी मिलती है। स्थापत्य की दृष्टि जबलपुर के पास बहरीबंध और तीगोवा के मंदिर को ध्यान में रखना आवश्यक है।

वाकाटकों के समय में बुंदेलखंड में शिवोपासना के साथ विष्णुपूजा में तीव्रता आई। कृष्ण और राम विष्णु के अवतार के रुप में पूजे जाने लगे। परशुराम को भी विष्णु का अवतार माना जाने लगा। विष्णु और शिव के बीच अभिन्नता स्थापित की गई। यह हिन्दु संस्कृति के निर्माण का युग था जिसे पं० द्विवेदी ने शुंगों के काल से ही माना है। शुंगो के शासन काल में वैष्णव देवमन्दिरों का निर्माण हो रहा था और पश्चिमोत्तर सीमाओं के यवन भागवत धर्म मे दीक्षित हो रहे थे। इसके अतिरिक्तत टुमेन मे प्रस्तुत काल का एक विष्णु मंदिर प्राप्त हुआ है। जिसमें आजकल विन्ध्यवासिन देवी की मूर्ति लगा दी गई है। इसे वासुदेव की लीलाओं के अर्धचित्रों से अलंकृत किया गया है।

बौद्ध धर्म में महायान शाखा का सूत्रपात हुआ और उसमें भी मूर्तिपूजा होने लगी। जैन धर्म का भी प्रचार हुआ। लक्ष्णीय बात यह है कि शैव और वैष्णव को राजचिन्हों में भी धारण किया गया।

दामोदर धर्मानन्द कौसम्बी के अनुसार समुद्रगुप्त ने आर्यावर्त को भी विजित किया तथा नौ नाग राजा को अपना चाकर बताया। प्रयाग प्रशस्ति में इसे विस्तार से कहा गया है। समुद्रगुप्त तसे हर्षकाल तक के समाज में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तीन उच्च वर्ग माने गए थे। शुद्रों की स्थिती में विशेष परिवर्तन नहीं हुआ। उत्तर कालीन हिन्दु धर्म में श्रेणियों और सामाजिक दलों के पारस्परिक संबंध संगोत्र विवाह-पद्धति, सहभोज के नियमों द्वारा शासित थे। ब्राह्मण क्षत्रिय स्पर्धा चालू रही। गुप्तवंश के शासन में समाज और धर्म की उन्नति के अनेक प्रयत्न हुए। विशुद्ध साहित्य के क्षेत्र में जो सर्वतोन्मुख उन्नति हुई उसका दर्शन हमें कलाओं में होता है। न केवल वास्तु तथा स्थापत्य कलाओं ही वरन् चित्रमाला, संगीत, लक्षणकला और मुद्रा निर्माम की कला का अभूतपूर्व विकास हुआ। ब्रह्मगुप्त, आर्यभ और वहाहमिहिर इस काल के प्रसिद्ध वैज्ञानिक, गणितज्ञ हैं। कालिदास का साहित्य एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस युग में धार्मिक सहिष्णुता के साथ साथ एक राष्ट्रीय संस्कृति का विकसित होने का असर था। भारत धार्मिक क्षेत्र में ही नहीं सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर समन्वय की भावना विशेष थी। स्पष्ट है कि विवाह, खान-पान, संस्कारों आदि में निषेध कठोर नहीं हुए थे। अन्त्यज की दशा शुद्धों से भई बुरी थी। दास प्रथा का प्रचलन था। नारी की स्थिती में परिवर्तन आ ग गया था । गुप्तकालीन स्मृतिग्रंथों में वैदिक शिक्षा केवल उच्चकुलों की स्रियों तक सीमित हो गई थी, सती, पर्दा प्रथा का कहीं कहीं प्रचलन था। अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार उन्नति में था। वाकाटक और गुप्तकाल मंदिरों के निर्माण का युग माना जाता है। फाहियान पाँचवीं शताब्दी में भारत आया था। उसने बौद्धधर्म, जैनधर्म की उन्नति का विवरण दिया है। इस प्रकार की सर्वतोन्मुखी उन्नति के कारण ही गुप्तकाल को इतिहास का स्वर्णयुग कहा जाता है।

इसी समय के आसपास हूणों ने भारत के राजनीतिक जीवन में अत्याधिक अस्त व्यवस्तता प्रस्तुत की। गुप्त साम्राज्य को हूण आक्रमणों से प्रबल धक्का पहुँचा। कतिपय इतिहासकार हूणों के आक्रमण को गुप्त साम्राज्य के पतन का कारण भी मानते हैं। कालांतर में हूण लोग हिन्दू समाज में मिला लिये गये। अनेक विद्वानों का विचार है की इन्हीं हूणों से अनेक राजपूत वंश उत्पन्न हुये हैं। राजपूतों की इस विदेशी उत्पत्ति को बुंदेलखंड के संदर्भ में बिलकुल भी नही माना जा सकता क्योंकि बुंदेली समाज में शौर्य अवश्य है पर इसके साथ-साथ सदाशयता, राष्ट्रीयता और स्वाभिमान की भावना विशेष है।

गुप्त साम्राजय के बाद हर्षवर्धन को भारतीय इतिहास तथा बुंदेलखंड दोनों में विशेष महत्व का माना गया है। बुंदेलखंड में हर्षवर्धन का शासनकाल अत्यंत महत्व का माना जाता है। उसने हूणों के आक्रमण को विफल किया था। हूणों का मुखिया तोरमण था उसने बुंदेलखंड कुछ समय के लिए एरन (बुंदेलखंड की प्राचीन नगरीध पर राज किया था। एरन के लेख में तथा अन्यत्र भी उसके बुंदेलखंड में भयभीत करने वाले शासन का उल्लेख है। इतिहासकारों ने हूणों की संस्कृति और सभ्यता को बर्बर कहा है क्योंकि उनका आघात केवल भारत ही नहीं विश्व की अन्य सभ्यताओं पर पशुता पूर्ण माना गया है। बुंदेलखंड में बर्बतापूर्ण व्यवहार करने वालों को "हूण' (हूण का विकृत रुप) कहा जाता है। बन्दरों की प्रकृति हूणों से समान मानकर उन्हें अपने खेत से भगाने के लिए "हूडजा' का प्रयोग संभवत: इसी का प्रतीक है। ऐसे ही बिना नियम के खेल "हुड़ी' भी कबड्डी का रुप है जिसमें खिलाड़ी की साँस की उपेक्षा सहनशक्ति की परीक्षा ली जाती है और सभी प्रकार से नोचा-खसोटा जाता है। हर्षचरित में कतिपय महत्वपूर्ण उल्लेख करते हैं जिनसे बुंदेलखंड में रहने और तत्कालीन जीवन के संबंध में कहा जा सकता है- जैसै - हर्ष की बहन राज्यश्री का अपने पति की मृत्यु पर क्षुब्ध होकर विन्धय पर्वत पर चला जाना, हर्ष द्वारा उसकी खोज करना और विन्ध्य पर्वत पर चला जाना, हर्ष द्वारा उसकी खोज करना और विन्ध्य प्रदेश के जीवन में कृषि और अहेर का उल्लेख करना आदि ऐसे साहित्यिक साक्ष्य हैं जो हर्ष कालीन बुंदेलखंड के जीवन की झाँकी देते हैं। हर्षचरित में गाँव और जंगल के जीवन में समानता बताई गई है जिससे यह भी निष्कर्ष लिया जा सकता है कि जातीयता का विशेष बोलबाला नही था। इसी समय की अजंता गुफा की चित्रावली भी (६-७वीं शताब्दी के आस पास) इसका साक्ष्य है।

मुसलमानों के पूर्व तथा हर्ष के बाद उत्तर भारत (६४० ई० से १२०० ई०) अनेक छोटे-छोटे राज्यों में बँट जाता है। विभिन्न शासकों में कन्नौज का राजकुल, आयुध राजकुल, प्रतिहार और गहड़वाल वंश प्रमुख हैं। मिहिरभोज और अल्पकालीन शासन इस प्रदेश को कुछ न दे पाया । मिहिरभोज से पहले नवीं शताब्दी में बुंदेलखंड प्रतिहारों के नागभट के अधीन रहा था। इसी की परंपरा में महीपाल दसवीं शताब्दी में और उसके बाद विनायकपाल भी थोड़े समय तक बुंदेलखंड में टिक पाये। विजयपाल के समय में सात शक्तियां उदित हुई और वे इस प्रकार है -

आन्हिलवाड़ के चालुक्य

जेजाकमुक्ति मे चन्देल

ग्वालियर के कच्छपघात

डाहल के चेदि

मालवा के परमार

दक्षिणी राजपूताना के गुहिल

शाकम्भरी के चौहान

ये शक्तियां एक जुट न रह सकीं। बुंदेलखंड में तीन शासकों के कुलों का विशेष प्रभाव रहा। ये तीनों जेजाकमुक्ति के चन्देल, डाहल और चेदि (बाद में कलचुरि) और ग्वालियर के कच्छपघात विभिन्न प्रकार से जनसमाज और संस्कृति को एक खास जीवन देते हैं। समस्त उत्तर भारत सामंतवाद में स्थिरता, उन्नति और कला उत्कर्ष की ओर अपने सामर्थ्य के अनुसार अग्रसर होता है। चन्देलों को बुंदेलखंड के उत्तर तथा कलचुरियों को दक्षिण में समकालीन ही माना गया है। दोनो राजसत्ताओं में दिग्विजय के दाँव पेंच चलते रहे थे इनका शासनकाल हिन्दु धर्म और समाज दोनों की उन्नति देने वाला था।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - मौर्ययुगीन बुंदेली समाज और संस्कृति (Mauryan Bundeli society and culture)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

मौर्ययुगीन बुंदेली समाज और संस्कृति (Mauryan Bundeli society and culture)

ई० पू० ८०० से ई० पू० २०० तक का काल महाजनपदीय शास्रों का परिचय देता है। मध्यप्रदेश शब्द इतना व्यापक है कि उसमें बुंदेलखंड पर बनने वाले प्राय: सभी जनपदों सा समावेश हो जाता है। मध्यप्रदेश में चेदि, वत्स, मत्स्य और शूरसेन की गणना की जाती है। मौर्य युग के पूर्व मध्यप्रदेश में नागवंश का साम्राजय रहा है। विद्वानों की दृष्टि में नाग ब्राह्मण माने गए हैं तथा इनसे शैव साधना जुड़ी हुई है। नागों तथा नवनागों की धर्मसाधना के प्रतीक सिक्कों पर मिलते हैं। नन्दी, त्रिशूल और शिवनिग्रह प्रमुख माने जाते हैं। उनकी मूर्तियाँ नागछत्रों से युक्त हैं और वे अपने भारशिव तथा शिव का नन्दी कहते हैं। नागों का उत्तराधिकार वाकाटकों को मिला था। वाकाटक भी ब्राह्मण थे। नागों के वंश को शिशुनाग वेश भी कहा गया है।

बिम्बीसार के समय में समस्त मध्यप्रदेश में बस्तियाँ थी। शिशुनाग, काकवर्ण और महान्दी इस जाति के प्रबल शासक रहे हैं। बुंदेलखंड में नाग लोग मातृतंत्र को मानने वाले थे। जिसका प्रमाण ॠग्वेद के सपंराज्ञी के उल्लेख से मिलता है। नागों का स्री तंत्र महाभारत काल में पुरुष तंत्र में बदल गया।

मौर्यकाल में जैनधर्म, बौद्धधर्म, वैष्णव, शैव, पाशुपत और शाक्त उपासनाओं के उल्लेख मिलते हैं। बुंदेलखंड में दुर्गापूजा विशेष प्रसिद्ध हुई। हरिवंश पुराण के अनुसार वही विन्ध्यवासिनी देवी बनी। वन्य जातियों में वृक्ष चैत्य, शाल वृक्ष, सिद्ध साध्य, गंधर्व नदी तथा कालावाची नक्षत्र भी पूजित रहे हैं। कौटिल्य का अर्थशास्र और विभिन्न जातक इसके प्राण हैं।

पं० द्विवेदी ने भरत, वात्सय जीवक, न्यदि, वररुचि, वात्स्यायन चाणक्य का महाभारत की विभूतियों में दर्शाते हुए चाणक्य को बुन्देलखण्डी दर्शाया है। उनके अनुसार विष्णुगुप्त चाणक्य का जन्म स्थान वर्तमान बुंदेलखंड के पन्ना नगर से २५ मील दक्षिण-पूर्व तथा नागौद से १५ मील पश्चिम स्थित वर्तमान "नाचना' नाम का जनरल कनिंघम द्वारा पहचाना गया "चणक' ग्राम है। झाँसी के पास "गुर्जरा' और "एरछ' दोनों स्थानों को बुद्ध से जोड़ा गया है।

इस काल के ब्राह्मण के स्वधर्म में अध्ययन, अध्यापन, यजन, याजन, दान देना तथा उसका प्रतिग्रहण था तो क्षत्रियों में भी अध्ययन, यजन, दान शस्र जीव और भूतराक्षकर्म माना गया है। बौद्ध और जैन धर्म ग्रन्थों में ब्राह्मणों की अपेक्षा क्षत्रियों की श्रेष्ठता का प्रतिपादन है। वैश्यों के स्वधर्म में व्यापार, पशुपालन और कृषि तो शूद्रों को स्वभावज कर्म परिचर्या दाय में मिली। वैदिक युग की वर्ण व्यवस्था अब वंशागत हो गई थी और एक दूसरे में समन्वय की कोई व्यवस्था नहीं थी।

मौर्य काल में लोकाभिमुख कला के दर्शन, भृत्माण्ड, मुद्राओं, राजप्रसादों, अशोक के स्तम्भों, पौरसभओं में होते हैं। धर्मो का भी लोक रंजन था। इस युग की विलक्षण बात यह है कि भारतवर्ष का विदेशों से संबंध जुड़ा। ग्रीक संस्कृति का भारतीय संस्कृति पर प्रभाव पड़। इसी प्रकार हकमानी साम्राज्य, यूनानी साम्राज्य, यूनानी साम्राज्य और चीन के साथ भी संबंध बढ़े और उनसे भारतीयों ने प्रभाव ग्रहण किए और प्रभावित भी किया।

मौर्यकाल में बुंदेलखंड का शासन चंद्रगुप्त के अधीन रहा है ऐसा कोई निश्चित साक्ष्य नहीं मिलता है। बुद्धघोष के प्रमाण और जूनागढ़ के शिलालेख भी चन्द्रगुप्त का दक्षिणापथ पर अधिकार साबित नहीं करतै हैं अत: यह अनुमान लगाया जा सकता है कि चाणक्य भले ही बुंदेलखंड का है परंतु समस्त प्रदेश नागों और स्थानीय शासकों के अधीन रहा है। सागर के रानीगर के मंदिर में चन्द्रगुप्त का आना बताया जाता है पर इसका कोई साक्ष्य नहीं है। नागवंशी आचार-विचार, रहन-सहन द्रविड़ों के हैं; अत: इस काल में बुंदेलखंड के समाज और संस्कृति में दो प्रबाव लक्षित किए जा सकते हैं; आर्य संस्कृति और द्रविड़ संस्कृरति।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - वैदिक तथा पुराणयुगीन बुन्देली समाज और संस्कृति (Vedic and Puranic Bundali society and culture)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

वैदिक तथा पुराणयुगीन बुन्देली समाज और संस्कृति (Vedic and Puranic Bundali society and culture)

यदि यह मान लिया जाये कि द्रविड़ों के उन्नत काल में आर्यों का आक्रमण या आगमन हुआ था और इसी मे वृत्र ने इन्द्र का प्रतिरोध किया था तो निश्चित है इसमें ही वृत्रासुर हुआ होगा और उसके कारण इन्द्र का ब्रह्म हत्या का मार्गी बनाया जाना औचित्य पूर्ण सिद्ध होता है। द्विवेदी जी ने कहा है कि आर्यों ने भारत में बसने   से पूर्व यहाँ के तत्कालीन निवासियों की उस सभ्यता का ध्

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - प्रागैतिहासिक बुंदेली समाज और संस्कृति (Prehistoric Bundeli society and culture)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

प्रागैतिहासिक बुंदेली समाज और संस्कृति (Prehistoric Bundeli society and culture)

बुंदेलखंड नर्मदा, चंबल, बेतवा और केन आदि नदियों से घिरा हुआ है और प्राचीन काल में प्रसिद्ध मध्यप्रदेश का एक अंग था। बुंदेलखंड के आदिम निवासियों #ौर उनकी संस्कृति का स्वरुप निर्णय करने में तीन प्रकार की सामग्री मिलती है। पुरातात्विक चित्र और औज़ार तथा वैदिक एवं पौरामिक साहित्य में आये उल्लेख ।

भित्ति चित्रों और औज़ारों के आधार पर नृवंशीय एवं समाजशास्रीय उपलब्धियों हुई हैं तथा पौराणिक साहित्य के आदिम समाज की धार्मिक उपलब्धियों का प्रमाणीकरण हो जाता है। एतिहासिक   और धार्मिक दृष्टि से बुंदेली समाज का मिला-जुला रुप इस प्रकार आता ह। ऐतिहासिक युग से बहुत पहले बुंदेलखंड की आदिम संस्कृति को दर्शाने वाले वे शिलागृह हैं जिनका पता बीसवीं शताब्दी के छठे दशक में लगा है। आदिम निवासी प्राय: पर्वत की गुफाओं में रहते थे। बुंदेलखंड के सागर, पन्ना, होशंगाबाद, छतरपुर, रायसेन आदि स्थानों के समीप अनेक भित्ती चित्र प्राप्त हुए हैं। इन चित्रों का निर्माण पं० कृष्णदत्त वाजपेयी के मतानुसार कम से कम ६००० ई० पू० से प्रचलित हो गया था। उन्होंने मध्यप्रदेश में पाये जाने वाली भित्ति-चित्र की गुफाओं का वैज्ञानिक ढंग से आकलन करके निर्णय दिया है कि प्राचीन गुफा-चित्रों से वहां निवास करने वालों की जीवन-चर्चा तथा रुचि का पता चलता है। मुख्यतया जो दृश्य इन चित्रों में मिलते हैं - विविध आयुधों से पशु पक्षियों का शिकार, जानवरों की लड़ाई, मानवों में पारंपरिक युद्ध, पशुओं पर सवाली, गीत, नृत्य, पूजन, मधु-संचय था घरेलू जीवन-संबंधी अनेक दृश्य। लोगों के जीवन-निर्वाह का मुख्य साधन शिकार था। शिकार किये जाने वाले जानवर बाघ, हिरन, भैंसा, हाथी, गैंडा और शूकर विशेष हैं। भित्ति चित्र दो प्रकार के हैं - एक वे जिनमें शिकार और रक्षा के लिये विविध आयुधों का प्रयोग है, दूसरे वे, जिनमें युद्ध के दृश्य चित्रित है। इनमें घोड़ों पर सवार सरदार अपने सिर के ऊपर छत लगाये जा रहे हैं। कई जगह शिकारियों और योद्धाओं के विचित् पहनावे मिले हैं। बरौदा गाँव (जिला सागर) के समीप के गुफा चित्र में एक योद्धा ऊँची टोपी और लम्बा कोट पहने दिखाया गया है। अनेक चित्रों में हाथी पर सवार लोग दिखाए गए हैं।

सागर जिले के बरथावली नामक स्थान में एक रोचक गुहा-चित्र है, जिसमें नदी का खेल प्रदर्शित है। एक व्यक्ति का सिर नीचे और पैर ऊपर किये हुए दिखाया गया है। किन्हीं किन्हीं चित्रों में घरेलू जीवन, खान-पान, नृत्य, गायन आदि के चित्रण हैं। विद्वानों के मत से भित्ति-चित्रों के माध्यम से हमें जिस आध समाज का अनुमान लगता है। वह अत्यंत परवर्ती समाज है। मोहन-जोदड़ो और हड़प्पा की सभ्यता से बहुत पहले इस भू-भाग पर नर्मदा और चम्बल की प्राचीन सभ्यताएं प्रचलित थीं जिनका समय प्राप्त प्राचीनतम पत्थरों के औज़ारों के आधार पर लगभग पाँच लाख ई० पू० माना गया है।

(क) पूर्व पाषाण युग - पुरातत्व सामग्री के आधार पर इस युग का समय ५ लाख वर्ष पूर्व माना गया है। नर्मदा घाटी के अवशेष होशंगाबाद, नरसिंहपुर के बीच भुतरा, सागर, दमोह, रीवा तथा बुंदेलखंड के क्षेत्रो में मिले हैं जिन्हें बी. रंगाचार्य ने उपयोग की दृष्टि से बने औज़ार इस बात के प्रमाण हैं कि मनुष्यों की प्रथम बस्तियां यहाँ थी। श्री एच० डी० सांकलिया ने भी इसी का समर्थन किया है कि मनुष्यों की बस्तियों में बिल्लौर-पत्थर, बलुआ पत्थर तता सोपानाश्म (ट्रप) तीनों प्रकार के हथियार प्रयुक्त होते थे। इस के युग के मानव, नदी या झरनों के करीब कन्दराओं में वास करते थे। उसका मुख्य कार्य मृगया ही था। खेती का सूत्रपात इस समय तक नहीं हुआ था।

(ख)    मध्य पाषाण युग - इस युग (७००० ई० पू०) की पुरातात्त्विक सामग्री के क्षेत्र नर्मदा घाटी, विन्ध्याचल के क्षेत्र के सिवा हैदराबाद, काठियावाड़ और पंजाब तक फैले हैं। पं हरिहरनिवास द्विवेदी के अनुसार आकृति की दृष्टि से इस काल के औज़ार और शस्र चौकोर फल, पीछे की ओर से भोंथरे किए कए, अर्द्धचन्द्रकार फल कुरेदने के औज़ार, शलाकाकर फल के रुप में है। उनका उपयोग बिना मुठिया के नहीं होता था। मनुष्यों के अस्थि पं और अन्य जीवों के अस्थि पं के आधार पर निष्कर्ष निकलता है कि इस युग के मनुष्य नृवंश की दृष्टि से नीग्रो थे। श्री श्यामचरण राय की विचार है कि ये लोग उन लोगों में से हो सकते हैं जिन्हें आजकल "आस्ट्रेलाइड' कहते हैं और जिनकी संतान की गौंड, भील, मुंडा आदि है। बुंदेलखंड में गौड़, भील, कोल, कीरात, शबर और कोटक् की स्थिती का प्रमाण परवर्ती पौराणिक साहित्य में भी मिलता है। शिकार के सिवा इन लोगों ने कृषि का भी सूत्रपात किया था। ये पहाड़ी भूमि को छोटे-छोटे समतलों में विभाजित करके कृषि करते थे। ये लोग मरणोत्तर जीवन की भी कल्पना करते थे। विद्वानों का मानना है कि इस समय के लोग संगीत, नृत्य में प्रवीण थे। सांस्कृतिक तत्वों के रुप में बट पूजा, बिल्वा और का भी संकेत मिलता है। खेती में उर्वरता लाने के लिए ये प्रेत पूजा भी करते थे।

(ग)    उत्तर पाषाण काल (४००० ई० पू०) - इस काल के अवशेषों में कुल्हाड़ी, चिमनाने के पत्थर, पत्थर के हथौड़े, कुदाली, मूसल, हड्डी के सूजे, चूल्हे तथा मिट्टी के आदिकालीन बर्तन प्रमुख हैं। मध्यप्रदेश की सीमाओं में हमीरपुर, बाँदा, छत्तरपुर, पन्ना में ये अवशेष प्राप्त हुए हैं। इस युग के संस्कृति के निर्माता भारतवर्ष में "आग्नेय दिशा' से आए। इनकी आकृति भारत में निषादों से मिलने के कारण इन्हें "आग्नेय निषाद' की संज्ञा दी गई। आर्यों के मध्यप्रदेश तक सारे भारत में ये फैल गये थे। वैदिक साहित्य तथा बौद्ध जातकों में इन लोगों का बार बार स्मरण किया गया है। इनकी भाषा को चांडाल भाषा कहा गया है। ऐसा पं० द्विवेदी ने अपनी पुस्तक मध्यभारत का इतिहास में भी माना है।

डॉ० सांकलिया ने निषादों को अन्न उत्पन्न करने वाला, एक स्थान पर रुककर रहने वाला तथा अग्नि का उपयोग जानने तथा पशु पालने वाला माना है। वे चाक (चक्र) पर रखकर मिट्टी के बर्तन बनाते थे, गाड़ी के पहियों का अविष्कार इन्होंने कर लिया था। झोंपड़े बनाकर रहने की प्रकृति इनकी थी। ग्रामों की सभ्यता का विकास इन्होंने कर लिया था। ""प्रकृतिगत विभिन्नता, स्थान भेद और जीवनयापन के भेद के कारण इसी काल में भारतवर्ष में विशेष कार्य करने वालों की श्रेणियों के रुप में जाति संस्था का उदय हुआ, जो आर्यों की वर्ण व्यवस्था से बहुत पहले की आदिम सामाजिक संस्था है।'' इनमें निभेद और समता की भावना है तथा श्रुतिस्मृति के विधानों का कोई हस्तक्षेप नही है इसे डॉ० राजबाली पाण्डेय ने भी स्वीकार किया है। वस्तुत: इस युग में स्थिर जीवन की कल्पना के साथ मृतकों को गाड़कर था उनके भस्मावशेषों को मिट्टी के बर्तन में रखकर और मिट्टी में दबाकर उन पर स्मृति चिन्हों के रुप में पत्थर खड़े किए गए। बौद्ध स्तूपों की विशाल कल्पना भी इसी भावना का परिणाम है इसका पं० हरिहरनिवास द्विवेदी ने भी समर्थन किया है।

उत्तर पाषाण युग के विकसित औज़ार, मिट्टी के बर्तन, तरकस में लौटकर आने वाले बाण, बाँस की नली से फूंक कर (उत्पन्न शक्ति से चलने वाले अस्र, कुदाली, खेती की नवीनता आदि इस काल की विशेषताएँ हैं। गेहूँ, कन्दली, नारिकेल, ताम्बूल, वातिगण, अलाबू, निम्बूक, जम्बू, कपास, कपंट, शान्मील, ककवाक आदि का प्रचलन इस काल में हो गया था।

आग्नेय (निषादों) की देन में मत्स्यगंधा की कल्पना, अनगढ़ पत्थर में देवत्व की स्थापना, देवताओं पर रक्तलेप करना और मांग भरना (बाद में इसे सिंदूर से स्थानापन्न किया गया।) उत्तर पाषाण युग के उपरान्त चंबल घाटी और बेतवा घाटी की सभ्यतायें है जिनकी पृथक अस्तित्व नहीं माना गया है। वैदिक साहित्य में "अयस' धातु का उल्लेख हुआ है। विद्वानों का विचार है कि चम्बल के क्षेत्र में (मध्यभारत, मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश के चम्बल वाले भाग, द्रविड़ों की संस्कृति दिव्य थी। ये मानव सभ्यता के क्षेत्र में उच्चमान स्थापित करने में समर्थ हो गए थे।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेली समाज और संस्कृति (Bundeli society and culture)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुंदेली समाज और संस्कृति (Bundeli society and culture)

किसी भी देश की संस्कृति उस देश के धर्म, दर्शन, साहित्य, कला तथा राजनितिक विचारों पर आधारित रहती है। भारत की संस्कृति अनेक तत्वों के मिश्रण से बनी है। विश्व की अनेक प्राचीन संस्कृतिया नष्ट हो गई, परन्तु भारतीय संस्कृति की धारा आज भी प्रवाहित है।

भारतीय संस्कृति के इतिहास पर दृष्टिक्षेप करने के पूर्व उसकी विशेषताएँ देखना आवश्यक है। ने इस प्रकार है -

(१)     भारत की संस्कृति आध्यात्म भावना पर आश्रित है। यहाँ भौतिकवाद की अपेक्षा अध्यात्मवाद पर अधिक बल दिया गया है।

(२)     इस संस्कृति में सांसारिक सुख की उपेक्षा की दृष्टि से नही देखा गया है। मनुष्य की सर्वांगीण उन्नति के लिए उसके शरीर, मन और आत्मा की उन्नती, भौतिक सुख तथा आध्यात्मिक संतोष आवश्यक है। धर्म, अर्थ, काम के साथ अंतिम ध्येय मोक्ष होता है। धर्म का पालन कर अर्थ प्राप्त कर तथा धर्मसम्मत काम का सेवन कर ही मनुष्य अपने अंतिम लक्ष्य (मोक्ष) को प्राप्त कर सकता है।

(३)     मानव की सर्वांगीण उन्नति के लिए वर्ण और आश्रम-धर्म का पालन आवश्यक माना गया है। अपनी और समाज की उन्नति तभी हो सकती है जब मनुष्य वर्ण और आश्रम से स्वधर्म का पालन करे। इसका पालन करते हुए उसे अपने लोकिक सुख और समृद्धि का अवसर मिलता है तथा मनुष्य का अंतिम लक्ष्य भी याद रहता है। इसी वर्णाश्रम व्यवस्था के आधार पर प्राचीन भारत में अनेक संस्थाएं तता परम्पराएं निर्मित हुई।

(४)     अन्य विचारधाराओं के प्रति सहिष्णुता भारतीय संस्कृति की विशेषता रही है। भारतीय संस्कृति "वसुधैव कुटुम्बकम्' (सारा संसार एक परिवार है) की भावना से अनुप्रणित है।

(५)     इस संस्कृति का अन्य लक्षण ग्रहणशीलता रहा है। इसने द्रविड़, आर्य, यवन, शक, कुषाण, हूण, अफ़गान, तुर्क आदि अनेक जातियों के उपयोगी विचारों तथा परम्पराओं को समय-समय पर ग्रहण किया है।

सदाचार-संबलित भारतीय संस्कृति का प्रचार भारत के बाहर भी हुआ। परन्तु वह तलवार के बल पर नहीं उदारता और सहिष्णुता के आधार पर। भारतीय संस्कृति से इतिहास को कालक्रमानुसार देखने से ज्ञात होता है कि इस संस्कृति के विकास मे अनेक उतार-चढ़ाव आए, परन्तु अपनी विशेषताओं के कारण सभी बाधाओं को पार कर भारतीय संस्कृति आज जीवित है।

समाज यदि सामाजिक मूल्यों की विभिन्न संबंध-परताओं और वर्गीकरण की कुल जमा है तो संस्कृति उसका एक क्रियात्मक रुप है। इसे दूसरे शब्दों में जाये तो ""संस्कृति की किसी जन जीवन-पद्धति के रुप में और समाज को उसी का अनुसरण करने वाले व्यक्तियों का समूह माना जायेगा। संस्कृति विभिन्न युगों में स्वरुप धारण करती है और संस्कृति संश्लेण की प्रक्रिया अत्यंत सूक्ष्म होती है। जैसे समग्र प्रवाह में एक बिन्दु का पृथक आंकना दुष्कर है, वैसे ही सांस्कृतिक इकाई के अन्तर्गत एक विशिष्ट प्रभाव को विश्लेषित करना कठिन है। आज का बुन्देली समाज विभिन्न युगीन समाजों और संस्कृतियों का परिणाम है। इसके उद्भव और विकास की प्रक्रिया अत्यन्त आश्चर्यजनक है।   "बुंदेली' शब्द स्वत: पाँच सौ से एक हजार वर्षों के बीच अपनी प्रकृति का निर्माण कर पाया है जबकि इसको वहन करने वाले समाज और संस्कृति का इतिहास सभ्यता के उदय काल से जुड़ा है।''

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुँदेलखण्ड क्षेत्र में पाये जाने वाले जीव-जंतु (Animals found in the Bundelkhand region)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुँदेलखण्ड क्षेत्र में पाये जाने वाले जीव-जंतु (Animals found in the Bundelkhand region)

हिंसक जानवर :

बुंदेलखण्ड में कई जाति के हिंसक जानवर पाये जाते हैं। कुछ का नाम एवं संश्रिप्त विवरण इस प्रकार है :-

शेर :-

यहाँ केवल नाहर या छोटा शेर पाया जाता है। यह घने जंगलों में पहाड़ों, नालों और वृक्षों के सहारे सुनसान जगहों पर रहता है, लेकिन यह बहुतायत में नहीं पाया जाता है। वर्तमान में इसका अस्तित्व कुछ विशेष स्थानों पर ही है।

तेंदुआ :-

यह हर गाँव के जंगल या सुनसान इलाकों में पाया जाता है। भूख मिटाने के 
लिए रात में भी गाँव की आबादी में चक्कर लगाता है। इसे खाने के लिए बकरी और गाय चाहिए। इस जानवर को स्थानीय भाषा में करांयच और लकड़बग्घा भी कहा जाता है।

चीता :-

चीता इस इलाके में अजैगढ़ और चंदेरी के आस- पास पाया जाता है। यह अपने खाने के लिए हिरन, बकरी आदि का शिकार करता है। अजयगढ़ एवं पन्ना में शिकारी चीते पाले हुए हैं।

भालू :-

यह प्रायः पहाड़ों और नदियों- नालों के सहारे पत्थरों की खोहों में रहता है। यह जानवर जड़े और बेर आदि खाता है। अपने खाने के लिए जीवों को नहीं मारता है। स्थानीय लोग इसे रीछ कहते हैं।

इसके अतिरिक्त और भी बहुत से छोटे- बड़े हिंसक जानवर पाये जाते हैं। भेड़िया या बिगना, गीदई या लड़ैया, जंगली कुत्ता, श्रीगोश, सेही, चाखा या अघलेंड़ा भी यहाँ के जंगलों में वर्तमान हैं।

अन्य जानवर :-

हिरन की जाति के निम्नलिखित जीव यहाँ पाये जाते हैं :-

-- हिरन या मृग, रीझ, नीलगाय, चिनकारा या छिकरा, सांभर, चीतल या चीतरा, चौसींगा, भिड़िया आदि
-- इनके अतिरिक्त लोमड़ी, खरगोश, बंदर, लंगूर, चमगादड़, न्यौला अधिक संख्या में पाये जाते हैं।
-- सांप, बीछी, गोह, गोहरा, छिपकली, गिरगट या गिरछौना, छछूंदर आदि का भी बाहुल्य है।

जलीय- जीव :

यहाँ की नदियों झीलों और तालाबों में प्रायः निम्नलिखित जाति की मछलियाँ पाई जाती है :-

महशेर, गुलाबी मछली, बछुआ, नैनी या भिरगल, बैकरी, रोहू, गोंच, कलवांस या करोंची, टेंगरा या कनटुवा सोंर, ग्वाली, चपटा, बाली, पड़हन, अनबारी, चिलबा, बाम, झिंगरा, सिलंद, सिरी, मुई, स्वांग, दिगर, बवास, बस, करटा, बजुरी और करोसा। मछलियों के अलावा यहाँ की नदियों और तालाबों में घडियाल, मगर, कछुआ, सुस, उदविलाव, केकड़ा, जैसे जल- जीव भी पाये जाते हैं।

पक्षी :

यहाँ अनेक प्रकार के पक्षी मैदानों, जंगलों और तालाबों में पाए जाते हैं, जो इस प्रकार है :-

मोर, तोता, कौवा, फाख्ता, गौरैया, सारस, हाड़ल, पिड़ी, तीतर, बहेर, लवा, मुरेला या सखा, मंगूरा, चाहा, गलगलिया, लालमुनैया, छपका, भर- तीतर, राज- हंस, पनडुब्बी।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेलखंड की जीवनोपयोगी  हस्तकला (Bundelkhand's Life-purpose handicraft)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुंदेलखंड की जीवनोपयोगी  हस्तकला (Bundelkhand's Life-purpose handicraft)

बुंदेलखंड की अनेक जातियाँ जीवन की सामान्य आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में नाना प्रकार की हस्तकलाओं को प्रस्तुत करने में अपना सानी नही रखती। विशेषत: कोरी, लुहार, बढ़ई, कुम्हार, गड़रिये और बसीरों के कर्म में कला प्राण रुप में लेकर रमा है। कोरी सूत कातते हैं और बुनकर बुनते हैं। इनके द्वारा जाजम, दरी, कालीन इत्यादि तैयार किये जाते हैं। अनेक ग्रामों में लुहार इतने चतुर हैं कि वे बन्दूक के कुन्दे और नाल आदि भी तैयार कर लेते हैं। यत्रतत्र गड़रिये भी बहुत हैं। ये सुन्दर कंबल तैयार किया करते हैं। बजीर लोग तरह-तरह की चटाईयाँ, बच्चों के लेटने के लिए चँगेला था चंगेर, टोकनियाँ, चुलिया-टिपारे और पँखे आदि बड़ी कुशलता से बनाते हैं। गृहकला के सड़े-गले कागज़ और कपड़ों को गलाकर मटोल्लियाँ और दिकोलीयाँ तैयार की जाती हैं। ख की सिकोली, उरई की सींको के लचकदार पंखे, चिरैया तथा मुठी-खुनखुने तैयार किये जाते हैं। उच्च जाति की स्रियां त्यौहारों में भाँति-भाँति के रंग-बिरंगे चौक पूरती है और दीवारों पर भावपूर्ण चित्रकारी करती है।

जैसा की संकेत किया गया वर्णाश्रम व्यवस्था के अनुसार प्राचीन काल से ही अनेक जातियाँ अपना-अपना कार्य कुशलता से करती आ रही हैं, आज की उत्तम हस्तकला को परंपरागत मान लेने पर हम कह सकते हैं कि प्राचीन हस्तकला इससे उच्चकोटि की रही होगी।

दस्तकारी के लिए इस प्रदेश की प्रसिद्ध दूर-दूर तक है। चंदेरी के कपड़ा और ज़री के काम के लिए, गऊ कपड़ बुनने के लिए तथा दतिया, ओरछा, पन्ना और छतरपुर मिट्टी के बर्तन तथा लकड़ी और पत्थर के काम के लिए प्रसिद्ध है।


बुंदेलखंड की तपोभूमि:

बुंदेलखंड के पर्वतीय भागों, प्राकृतिक उपत्यकाओं, खोहों तता आश्चर्यजनक जलाशयों ने ॠषियों-मुनियों को प्रभावित किया है, इसके अनेक उदाहरण हमारे समझ है। कोलाहल से बड़ी दूर पर गिरि-गहर, झर-झर निर्झर और तुहित बिन्दुपूर्ण दूर्वादल पर चारुचन्द की छन-छन आने वाली शीतल शान्तिदायिनी किरणों का आनन्द पाने के लिए "रामचरित मानस' बहुत हैं। तपोभूमि के संबंध में लिखते समय हमने गो० तुलसीदास की कवितावली के अयोध्योकांड का २८वां मुक्त उद्धत किया है। उससे स्पष्ट है कि विन्ध्यभूमि (बुंदेलखंड) में बड़े-बड़े ब्रह्मचारी तपस्या किया करते थे।

मर्यादा पुरुषोतम राम, लक्षमण और सीता सहित भारद्वाज मुनि के आश्रम से लेकर आगस्त ॠषि के आश्रम तक सहस्रों तपस्यारत ॠषियों मुनियों के आश्रम इसी प्रान्त में थे।

अयोध्या से प्रस्थान करने के बाद राम प्रयाग तक बिना किसी मुनि से भेंट किये पहुंचे। प्रयाग में वे भारद्वाज मुनि से मिले। फिर वे बाल्मीकि ॠषि के आश्रम में पधारे। यह आश्रम करबी के निकट है। इसकी पुष्टि अनेक विद्वानों ने की है। रामायण में भी स्पष्ट कि राम प्रयाग से चित्रकूट आने पर किसी मध्यवर्ती स्थान में ही बाल्मीकि से मिले थे। अत: वह स्थान करबी से नज़दीक ही होनो चाहिए। इस स्थान में पाये जाने वाले प्राचीन चिन्ह और महर्षी की स्मारक स्वरुप मूर्ति भी पाई जाती है। यहीं उन्होंने श्री राम को चित्रकूट पर्वत पर निवास करने का परामर्श दिया था :

चित्रकूट गिरि करहु निवासु।

तहं तुम्हार सब भाँति सुपासू।।

सैल सुहावन कानन चारु।

करि केहरि मृत विहंग बिहारु।।

चित्रकूट बुंदेलखंड में ही है। गो० तुलसीदास ने अपनी सिद्धी सधी लेखनी में इस प्रदेश का प्राकृतिक सौंदर्य समस्त रामायण के पाठकों के मनस्तल पर अंकित कर दिया है। रहीम कवि ने चित्रकूट के बारे में लिखा है:

चित्रकूट में काम रहे, रहिमन अवध नरेश।

जा पर विपदा पड़त है सो आवत पहि देश।।

अत्रि-अनुसूइया का आश्रम भी चित्रकूट पर्वत श्रेणी के अन्तर्गत है। जब राम को चित्रकूट में वास करने कि लिए बाल्मीकि जी ने परामर्श दिया था, तब उन्होंने अत्रि-अनुसूइया के आश्रम के बारे मे भी संकेत दिया था:

नदी पुनीत पुरान बखानी।

अत्रि प्रिया निज तप बल आनी।।

सुरसीर दार नाऊ मन्दाकिनि।

जो सब पातक पोतक डाकिनी।।

अत्रि आदि मुनिवर बहु बसहिं।

करहिं योग जप तप तन कसहीं।।

अत्रि आश्रम से विदा होकर राम शरभंगा ॠषि के आश्रम में पहुँचे। यह स्थान पन्ना, सोहावल राज्यों की सीमा पर सोहवल राज्य में है और इटारसी-इलाहाबाद रेलवे लाईन पर मझगवां स्टेशन से ८-९ सील उत्तर पूर्व में स्थित है। यह पर्वत आज भी शरभंगा पर्वत कहलाता है। यहाँ ॠषि के नाम पर एक जल कुण्ड है। कुण्ड मन्दिर के समीप है। मन्दिर में ॠषि की ध्यान-मग्न मूर्ति है। एक दूसरे मन्दिर में राम लक्ष्मण और जानकी की मूर्तियाँ हैं।

इस प्रकार राम ने उस क्षेत्र में तपस्या करने वाले ॠषियों मुनियों से भेंट की। वे इस भाग के दूसरे स्थान में बी आये। वह स्थान "आरंग तीर्थ' के नाम से प्रसिद्ध है। यह तीर्थ पन्ना से १० मील पूर्व और देवेन्द्र नगर से लगभग १५ मील उत्तर में स्थित है। इस आश्रम में अगस्त ॠषि के शिष्य सुतिक्षण मुनि तप किया करते थे। इस स्थान का बुंदेलखंड में अपना विशेष महत्व है। सारंग की पहाड़ी के चारों ओर दो सौ छोटे छोटे मठ बने हुए हैं।

पुण्यमयी नर्मदा का प्रवाह क्षेत्र बुंदेलखंड ही है, वह दक्षिण में मण्डला जिले से निकल कर जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद और निमाड़ होती हुई खम्भात की खाड़ी में समुद्र में जा मिलती है। यह अपना मार्ग अधिकांशत: पहाड़ों आदि को चीर कर खाई-खन्दकों के बीच मे बनती है। ऐसा माना जाता है कि यह संघर्ष का सफलता का संदेश देती है। इसके किनारे अनेक ॠषियों-मुनियों ने तपस्या की थी। उनमे भृगु ॠषि का तप स्थल भेड़ाघाट प्रसिद्ध है।

ॠषियों ने इस नदी की अनेक रुपों में प्रार्थना की है। इसे किसी ने शंकर के तेज से अविर्भूत माना है तो किसी ने उनके शरीर से। स्कन्दपुराण इसे शिव का स्वरुप ही मानता है। इसे सामवेद-मूर्ति भी माना गया है। कथा है कि नर्मदा ने र्तृकड़ों वर्षों तक ब्रह्मा ने नर्मदा से वर माँगने के लिए कहा। नर्मदा ने निवेदन किया कि मुझे गंगा के समान बना दीजिए। ब्रह्मा ने कहा कोई किसी की बराबरी नही कर सकता। निराश हो नर्मदा काशी जाकर तप करने लगी। शंकर जी प्रसन्न हुए और उन्होंने वरदान दिया, तुम्हारे तट पर के पाषाण खण्ड शिवलिंग स्वरुप हो जायेंगे और गंगा, यमुना तथा सरस्वती के स्नान से जिन पापों की निवृती होती है, वे सब तुम्हारे दर्शन मात्र से नष्ट हो जायेंगे।

""स्मरणाज्जन्मजं पापं, दर्शानेन त्रिजन्मजम्।

स्नानाज्जन्म सहसाख्यं, हान्ति रेवा कलियुगे।।''

इसलिए नर्मदा के तट पर अनेक नगर, घाट और मंदिर हैं। नर्मदा तट के अनेक स्थानों पर विभिन्न पर्वों� पर मेले लगते हैं। बरमान घाट और भेड़ाघाट के मेले प्रसिद्ध हैं।

त्रिपुरी क्षेत्र की उत्पत्ति-कथा बाल रामायण में दी गई है। उससे इस प्रदेश का महत्व भली-भाँति प्रकट होता है। बताया गया है कि त्रिपुरासुर से अप्रसन्न होकर शिव ने उसके तीन नगरों को जला डाला। उसके कुछ भाग आकाश से गिर का पृथ्वी पर "त्रिपुरी' के नाम से प्रख्यात हुआ।

पन्ना अपने प्रणामि संप्रदाय के मंदिर के लिए सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध है। नेपाल को छोड़ कर भारत में उक्त समुदाय का इतना बड़ा मंदिर नहीं है। प्रतिवर्ष शरद पूर्णिमा के अवसर पर गुजरात, काठियावाड़, मुम्बई और सिन्ध तथा नेपाल के सहस्रों यात्री पन्ना में एकत्र   होते हैं।

इस संप्रदाय को स्वामी प्राणनाथ ने चलाया। वे छत्रसाल के गुरु थे। छत्रसाल की प्रेरणा से ही प्राणनाथ जी पन्ना आये थे। वहीं उन्होंने समाधि भी ली।

प्रणामी संप्रदाय हिन्दु धर्म में एक उदार और सुधारवादी दृष्टि को लेकर सामने आया था। इसमें कबीर, नानक और महाराष्ट्र के संतो का व्यापक प्रभाव है। प्रणामी साहित्य में परमात्मा को अक्षरातीत कह कर संबोधित किया गया है। हिन्दू और मुसलमानों का भेद अथवा जाति-पाति का भेद इस संप्रदाय को मान्य नही है।

इस संप्रदाय में सैद्धान्तिक रुप से मूर्ति पूजा का विरोध किया गया है, फिर भी प्रतीक रुप कृष्ण की बाँसुरी और उनके मुकुट की पूजा की जाती है। प्रसाद और चरणामृत भी वितरित किया जाता है। यह संप्रदाय भारत मे किसी समय प्रचलित प्रतीक महत्ता का पुनरोदय करता है।

बुंदेलखंड में अनेक जैन तीर्थ भी हैं। इनके केन्द्र स्वर्णगिरी (सोनागिरि), नयणगिरि (रेसन्दीगिरि) और द्रोणागिरि प्रमुख हैं। इनके सिवा चंदेरी, देवगढ़, पपौरा और कुण्डलपुर भी प्रसिद्ध हैं। इनमे से अनेक स्थानों पर तीथर्ंकरों की विशाल पाषाण प्रतिमाओं युक्त मन्दिरों के साथ सनातन-धर्मी विष्णु-शिव आदि देवताओं के भी मंदिर हैं। इन स्थानों के जैन मंदिरों का निर्माण काल ५वीं से १२वीं शताब्दी के बीच बताया गया है। चंदेरी के जान मंदिर तेरहवीं सदी में मुस्लमानों के आक्रमण के समय खंडित कर दिये गये।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुँदेलखण्ड के भोजन- पेय, भोजन व वस्राभरण (Bundelkhand's meals - drinks, meals and utensils)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुँदेलखण्ड के भोजन- पेय, भोजन व वस्राभरण (Bundelkhand's meals - drinks, meals and utensils)

बुँदेलखण्ड के लोगों का प्रिय भोजन महुआ और बेर माना जाता है। ये दोनों वृक्ष इस जनपद के लोकप्रिय वृक्ष हैं। स्थानीय भोजन में महुआ को मेवा, बेर को कलेवा ( नास्ता ) और गुलचुल का सर्वोत्तम मिष्ठान का गौरव मिला था, जैसा कि इस पंक्ति से स्पष्ट होता है :-

मउआ मेवा बेर कलेवा गुलचुल बड़ी मिठाई।
इतनी चीजें चाहो तो गुड़ाने करो सगाई।।

"लटा' जोकि भूने हुए मछुओं को कुट कर उनमें गरी, चिरौंजी आदि मेवा मिला कर छोटी- छोटी कुचैया की तरह बनाया जाता है, इस जनपद का विशिष्ट भोज्य रहा है। स्थानीय लोग बाहर से आने वाले मेहमानों के लिए इसी "लटा' को परोसते थे। यहाँ के लोगों की एक कहावत अधिक प्रचलित हैं कि :-

""खानें को मउआ, पैरबै में अमोआ'' इस बात का संकेत देती है कि स्थानीय लोगों में मउआ और अमोआ दोनों काफी लोकप्रिय था। भोजन के संबंध में अनेक लोकमान्यताएँ प्रचलित हैं:-

चैत मीठी चीमरी बैसाख मीठो मठा
जेठ मीठी डोबरी असाढ़ मीठे लठा।
सावन मीठी खीर- खँड़ यादों भुजें चना,
क्वाँर मीठी कोकरी ल्याब कोरी टोर के।
कातिक मीठी कूदई दही डारो मारे कों।
अगहन खाव जूनरी मुरी नीबू जोर कें।
पूस मीठी खिचरी गुर डारो फोर कों।
मोंव मीठी मीठे पोड़ा बेर फागुन होरा बालें।
समै- समै की मीठी चीजें सुगर खबैया खावें।

बुँदेलखण्ड वासियों में अलग- अलग मौसम में अलग भोजन खाने का प्रचलन था। ये लोग भोजन खाने में कभी- कभी काफी सावधानी से काम लेते हैं। इनके यहाँ बेर का बहुत ही महत्व था। ये लोग भोजन खाने से पहले बेर अवश्य खाते थे। मुखें बेर, अघाने पोंड़ा। यहाँ के लोगों का मानना था कि कच्चे चावल की नोक भाले की नोक के बराबर हानिकारक होती है :-

"चावर की कनी उर भाला की अनी।'

लोगों को भोजन का प्रभाव लोकसंस्कृति पर दिखाई देता था। इसलिए उनलोगों का मानना था कि जैसा भोजन किया जाएगा, वैसा ही मन होगा :

जैसो अनजल खाइये, तैसोई मन होये।
जैसो पानी पीजिए, तैसी बानी होय।।

उपर्युक्त लोकमान्यताओं से प्रमाणित होता है कि प्रत्येक काल में भोजन का महत्व अपनी जगह आप रहा है।

विभिन्न कालों में भोजन :

बुँदेलखण्ड में पुलिंद, निषाद, शबर, रामठ, दोंगी कोल तथा भील जातियों निवास करती थी। स्थानीय भोजन पर इन जातियों का प्रभाव अधिक दिखाई देता है।

प्रागैतिहासिक काल :

भोजन - पेय पदार्थ :-

इस काल के लोक प्रचलन में इस अंचल का नाम "गुड़ाना' था। यह नाम गोंडों जाति से प्रभावित है। इस विशेष जाति ने यहाँ की लोकसंस्कृति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। गोंड़ लोग जंगली फल, फूल, पत्ते, कंदमूल, महुआ, अचार, तेंदू, भेलवाँ, केवला खाते थे। बाद में इस जाति ने जंगली पशुओं और पंछियों का मांस भी खाना प्रारंभ कर दिया था और यह उनका प्रिय भोज्य बन गया था। महुए से निकाली हुई शराब उनका मुख्य पेय थी।

दूसरी प्रमुख जातियाँ, पुलिंद और शबर थी। इनका भोज्य मधु और माँस था। इनका भी प्रमुख पेय शराब ही था। जंगली फल- फूल बीनकर उन्हें खाना तथा सुखाकर रखना उनकी दिनचर्या में शामिल था। महुए का आसव या चुआया हुआ मद्य उनके हर घर में हर समय मिल जाता था।

वस्राभरण :-

इन जातियों का इस काल में वेश बिल्कुल सादा था। पहले वे नग्न ही रहते थे। बाद में वृक्षों की छाल, लंगोटी लगाते थे। फिर कपड़े की लंगोटी से अपने शरीर को ढकने लगे।

महाभारत काल :

भोजन - पेय पदार्थ :-

बुँदेलखण्ड की वन्य- संस्कृति में एक विशेष परिवर्तन तब आया, जब आर्यों की आश्रमी संस्कृति ने यहाँ प्रवेश किया। भोजन- पेय की सामग्री और उनके प्रयोग के ढ़ंग में भी एक क्राँतिकारी परिवर्तन आया। महाभारत काल में लोगों में शाकाहारी भोजन अधिक प्रचलित हो गया था। चावल की बनी बहुत - सी भोज्य पदार्थ विभिन्न प्रकार की चटनी, मधुर पेयों का प्रचलन अधिक था। इसके अतिरिक्त दूध, दही, मक्खन, घी जैसे शक्तिवर्धक पदार्थ भी अपनी- अपनी सामर्थ्य के अनुसार प्रयोग किये जाते थे। लोग जिसका अन्न खाते थे, उसपर हथियार नहीं चलाते थे। बड़े भोग देने वालों का समाज में सम्मान था।

वस्राभरण :-

इस काल में जनपद के लोगों का वस्र और पहनावा सादा था। पुरुष एक उत्तरीय वस्र से शरीर को लपेटता था। इसके अतिरिक्त दूसरा अधोवस्र कटि में बाँधने के लिए प्रयोग किया जाता था। दोनों प्रकार के कपड़े बिना सिले सूती या रेशमी होते थे। सिर पर कई प्रकार की सफेद और रंगीन पगड़ियों का प्रयोग करते थे। स्री अधोवस्र को साड़ी की तरह और उत्तरीय वस्र को ओढ़नी की तरह पहनती थी। सोने और चाँदी के आभूषणों का प्रयोग स्री- पुरुष दोनों करते थे।

जनपद काल :

भोजन - पेय पदार्थ :-

जनपद काल में बुँदेलखण्ड की संस्कृति में अनार्य और आर्य संस्कारों का समन्वय हो चुका था। इस कारण यहाँ वैदिक युग के भोज्य प्रचलित होने लगे थे।    "पुआं' और "भात' उच्च वर्ग में प्रिय बन गया था। लोगों में सत्तु का भी प्रचलन भी इसी समय हुआ। अमरस और शकरकंद प्रयुक्त किया जाने लगा था। लोगों में गन्ना, फल और तरकारियाँ आदि उत्पन्न करने का प्रचलन शुरु हो गया था। भोजन में स्वच्छता और छुआछूत का ध्यान रखा जाता था। उच्च जातियों के लोग निम्न वर्ग के साथ भोजन नहीं करते थे।

वस्रावरण :-

इस काल में लोग धोती, दुपट्टा और पगड़ी का प्रयोग करते थे। उच्च वर्ग के स्री एवं पुरुष कंचुक का भी प्रयोग करते थे। इस काल में भी आदिवासियों में लंगोटी का ही प्रचलन था। 
आदिवासियों की स्रियां उत्तरीय नहीं पहनती थी, जबकि उच्च वर्ग की स्रियों में साड़ी का प्रचलन हो गया था। विशेष वर्ग के लोग, विशेष अवसरों पर रंगीन वस्र या रेशमी कपड़े और सोने- चाँदी के आभूषण धारण करते थे। यहाँ के लोगों में ऊन के कंबल शीत ॠतु में प्रयोग करने का प्रचलन हो गया था। साँची में प्राप्त एक आकृति से स्पष्ट होता है कि लोगों में जूते का प्रयोग भी आरंभ हो चुका था। इस समय का वृश्चिककालिक आकार का जूता आज भी बुँदेलखण्ड में प्रचलित है। लकड़ी की खड़ाऊँ का भी प्रयोग किया जाता था। गाँव के लोग इसे शोक से आज भी पहनते हैं।

मौर्य- शुंग काल :

भोजन - पेय पदार्थ :-

महाभारत काल में यादवों की संस्कृति ने दूध और दूध से बनी मक्खन, घी, दही, छांछ जैसी पौष्टिक वस्तुओं को प्रधानता दी थी, जो इस काल में भी मान्य रही। इस जनपद में वनों की अधिकता थी। इस कारण शहद, जंगली फल, कंद आदि भी भोज्य पदार्थ बने रहे। मैदानों में उच्च वर्ग के लोगों का भोजन चावल और गेहूँ पर निर्भर था, किंतु मध्यम वर्ग, जो ज्वार आदि का प्रयोग करते थे, उत्सवों या सामूहिक आनंद के अवसरों पर मधुरस या महुए की मदिरा का पान सभी लोग किया करते थे। इस काल में बौद्ध धर्म द्वार प्रचारित अहिंसा के बावजूद मांस- भक्षण बना रहा। भागवत- धर्म के प्रसार ने सात्विक आहार पर बल दिया था, जिसके कारण विभिन्न फलों के रस, औषधियों और पुष्पों से बने पेय प्रयुक्त होने लगे थे।

वस्रावरण :-

मौर्य- शुंग काल में यहाँ के पुरुष घुटनों तक लटकती धोती, बटी हुई रस्सियों से बना कमरबंद, एड़ियों तक लटकता पटका, कंधों पर दुपट्टा और सिर पर पगड़ी या साफा पहना करते थे। उच्च वर्ग में रंगीन कपड़े और कामदार पगड़ियाँ प्रचलित थी। रेशम, क्षोम और कपास के कपड़े सभी लोग ( उच्च वर्ग ) पहनते थे। स्रियाँ घुटनों तक साड़ी या धोती, करधनी और कमरबंद बाँधती थी। शरीर का ऊपरी भाग प्रायः नग्न ही रहता था। कभी- कभी इनमें मलमल की चादर की संकेत रेखाएँ उत्कीर्ण होती थी। स्रियों के सिर पर कामदार ओढ़नी सुशोभित हुआ करती थी। उच्च वर्ग की स्रियाँ रंगीन तथा रेशू के वस्र पहना करती थी, जबकि मध्यम वर्ग की प्रायः सूती। तत्कालीन विधवाएँ वर्तमान की तरह ही श्वेत वस्र धारण करती थीं। साधु कौपीन और चादर पहनते थे।

नाग- वाकाटक काल :

भोजन - पेय पदार्थ  :-

नाग ने इस अचल पर तीन सौ सालों तक और वकाटक ने ढ़ाई सौ वर्षों तक राज किया। इसी युग में, गुप्त नरेशों का भी इस अंचल पर अधिकार रहा, इसलिए यह साढ़े पाँच सौ साल बुँदेलखण्ड के इतिहास में महत्वपूर्ण हैं। इस काल का महत्व भोज्य- पेय और वस्रावरण की दृष्टि से भी अधिक है। इस समय सभी पाँचों प्रकार के आहार- पेय- भक्ष्य, भोज्य, लेहय, चोष्य और पेय सरलता से उपलब्ध थे। गेहूँ और जौ की रोटी, कई प्रकार के चावल, गुड़- घी से बने आटे के लड्डू, उच्च वर्ग के खाद्य- पदार्थ थे। दूध, दही- शहद, मक्खन और घी काफी मात्रा में प्रयोग किये जाते थे। "फाहयान' के अनुसार समूचे अंचल में जीवों का मारना, सुरा पीना और प्याज- लहसुन खाना अनजाना था। हालांकि यह तथ्य सही नहीं है। इस अंचल में वन्य जातियाँ जंगली फल और मांस खाती थीं। इसके साथ ही निम्न जातियाँ और विशेष अवसरों पर सामंती वर्ग भी मांस का प्रयोग करते थे। महुए से बना "पुष्पांसव' इस अंचल का विशिष्ट पेय माना जाता था। यहाँ भोजन के बाद ताम्बुल खाने का चलन प्रत्येक वर्ग में था।

वस्राभरण :-

बेसनगर और पवाया में प्राप्त मूर्तियों से इस युग के वस्राभरणों का पता चलता है। इस काल में पुरुष सिर पर पगड़ी, कंधों और भुजाओं पर उत्तरीय और नीचे कटि में करधनी का प्रयोग किया करते थे। अंगोछा और बंडी का भी प्रचलन मिलता है। स्रियाँ साड़ी का प्रयोग किया करती थी। इस समय चोली या स्तनांशुक का प्रयोग प्रारंभ हो चुका था। साड़ी के साथ- साथ नीवबंध से बंधा हुआ घाघरा भी प्रचलन में आ गया था। घाघरे का प्रचलन वर्तमान में देखा जा सकता है। यहाँ की नवविवाहिताएँ रेशमी वस्र धारण करती थीं। सीले वस्रों, कंचुक और जाँघिया का प्रमाण भी प्राप्त होता है। इस युग की विशेषता विदेशी परिधान का पाया जाना भी है।

चंदेल काल :

भोजन - पेय पदार्थ :-

चंदेल काल बुँदेलखण्ड की समृद्धि और सुख का प्रतीक माना जाता है। यहाँ के आहार में भी इस समृद्धि का प्रभाव देखने को मिलता है। सरोवरों की जगह- जगह मौजूदगी ने कृषि और इसकी ऊपज ने इस अंचल को भर दिया था। गेहूँ, चावल, जौ आदि से निर्मित पकवान, पशुओं से प्राप्त दूध, दही, घी, मक्खन और उनसे बने मिष्ठान, बनोंपल से प्राप्त फल- कंद, जलाशयों से प्राप्त कमलकड़ी, कमलगट्टे, सिंघाड़े आदि गन्ना- ईख से बना रब, गुड़, शक्कर और उनसे बने रसिले व्यंजन तथा अनेक प्रकार की सब्जियों, भोजन- पेय को पौष्टिक एवं शक्तिप्रदायक बनाने में समर्थ थी। जैन और बौद्ध धर्मों द्वारा मांस- भक्षण पर नियंत्रण से, शाकाहार को काफी बढ़ावा मिला था। गाय और नंदी की पूजा तथा कृषि में उसकी उपयोगिता के कारण, इसका मांस बिलकुल वर्जित था। दूसरे पशुओं का मांस- भक्षण कुछ जातियों और कुछ विशेष अवसरों पर किया जाता था। सुरा- पान भी वर्जित था, किंतु वन्य जातियों, शुद्रों और क्षत्रियों में इसका प्रचलन था। सामान्य क्षत्रिय और सामंत मद्य- पान करते थे।

वस्राभरण :-

महोबा में प्राप्त सिंहनाद, अवलोकितेश्वर से प्रतीत होता है कि पुरुष अधोभाग में घुटना और ऊर्ध्वभाग में अंशुक धारण करते थे। इसके अतिरिक्त लहरियादार धोती का भी प्रचलन देखने को मिलता है, जिसे स्थानीय लोग कुचीताला कहते हैं। इस काल में पायजामें का प्रचलन शुरु हो चुका था। धोती, अंगोछा और दुपट्टा के साथ कूर्पासक का भी प्रयोग होता था। बुँदेलखण्ड के लोगों में पगड़ी प्रतिष्ठा का प्रतीक निरंतर बनी रही।

स्रियाँ अंगिया, चोली और फतुही जैसे वस्र, ऊर्ध्वभाग में धारण करती थी। स्रियों के कूर्पासक पूरी और आधी बाहों के सामने से खुलने वाले होते थे। उनके अधोवस्र लहरियादार और चुन्नटवाली लंबे जाँघिया जैसे पैरों से सटी धोती या साड़ी होती थी, जो आज की देहाती दोकछयाऊ धोतियों से मिलती- जुलती है। पुरातत्ववेत्ता बेगलर ने चार प्रकार के अधोवस्रों का उल्लेख किया है:-

-- पेटीकोट, जिसकी गाँठ सामने की ओर होती थी। उसमें बेलबूटे भी बने होते थे। उनका कपड़ा महीन होता था।

-- लंबा कपड़ा साड़ी के रुप में प्रयुक्त होता था।

-- जाँघ के नीचे तक आने वाली धोती जैसी महीन साड़ी, जिसकी ग्रंथी पीछे लगती थी।

-- टखनों तक लटकने वाला छोटा महीन वस्र।

पेटीकोट वस्तुतः लहंगा है, जो इस अंचल में अधिक प्रचलित रहा है। स्वच्छ धोती या लहंगे के बाद ही लहंगे की खोज हुई थी।

आल्हा गाथा में नौलखा हार की कथा- सी है, जिससे ज्ञात होता है कि हार गले का सर्वप्रिय आभूषण था।

तोमर काल :

तोमर काल में बुँदेलखण्ड का रुप निश्चित हो गया था। उसमें छः पेय और अठारह भक्ष्य हुआ करते थे। बरा- बरीं, लपसी, कसार, सेव- लड्डू, मोतीचूर के लड्डू, घेवर (मैदा, घी, चीनी से बनी एक मिठाई), बाबर, पूड़ी, खाजे, फेनी, गुझा दहोंरी, बढ़ई, (उर्द की दाल, चावल और आटे से बना पकवान), मोड़े, रोटी, कढ़ी, पकौढ़ी, समोसा, पेराका, पछयावा (दही का मधुर पेय, जो भोजन के अंत में लिया जाता है), सिखिसि, मठा, बासोंधी (खोवा, दूध आदि मिश्रित कर सुगंधित दूध का पेय), अनेक प्रकार का दूध, आम, इमली का पनौ (आम, इमली के गूदे को घोलकर बनाया गया मीठा या नमकीन पेय) सामान्यतः प्रचलित थे। इनमें बहुत से ऐसे हैं, जो वर्तमान तक प्रयोग में लाए जाते हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि समोसा उस समय भी प्रचलन में था। भोजन के बाद ताम्बुल का प्रयोग किया जाता था।

पद्मावती- रास एवं महाभारत में पाट- पाटम्बर और पाट- पटौर कहकर, सूती- रेशमी सभी तरह के परिधान का संकेत मिलता है।

दिये साहि निरमोलक चीरा।
पाटम्बर खीरोदक खीरा।।

कुसुंभ रंग के वस्र बहुत लोकप्रिय थे। छुपछांही कपड़ा बनता था। सारी, कंचुकी, अँगिया, चोली, ओढ़नी और टोपीवाला परिधान नारियों का था। टोपी की जगह पुरुष टोपा पहनते थे, लेकिन पगड़ी या पग ज्यादा प्रचलित थी। अंगरखा और धोती पुरुषों का पहनावा था। यहाँ टोपा और टोपी का प्रचलन विदेश से आया था। स्रियाँ पवित्र अवसरों पर लहंगा पहना करती थी। डा. मोती चंद ने इसे बुँदेलखण्ड का विशिष्ट वस्र बताया है। यह कहा जाता है कि लहंगों, नुगरों और चोली इस जनपद का जनपदीय परिधान रहा है।

तोमर काल में मेंहदी लगाने का प्रचलन हो चुका था। महाभारत में कस्तुरी, कुमकुम, अगरु, सिरीखंड, कपूर, सिंदूर और केश- प्रसाधन का उल्लेख मिलता है।

बुंदेल काल :

भोज्य - पेय :- 

इस समय लोग भात, दाल, कढ़ी, बरा- मगौरा, पापर, कोंच काचरिया, बिजौरौ, खाँड़, घी, मांड़े, मिर्च का चूर्ण और आम का अचार जैसी वस्तुओं का अपने भोजन में प्रयोग किया करते थे। पक्की रसोई में पूड़ी, कचौड़ी, पपरिया, खाजे, तिरकारी, मालपुआ, लडुआ, मोहनभोग, खीर, खुरमी- खुरमा, पुआ, पूरी, चटनी आदि पकवान होते थे। इस काल के लोग रायता का उपयोग करते थे। रायता के साथ- साथ खँड़, कलेवा, गर्म जलेबी और दूध या दूध का लड्डू तथा ब्यारी परोसा जाता था। रात के भोजन के पश्चात दूध का पेय अवश्य दिया जाता था। गाँव में महुआ से बने मुरका, लटा, डुबरी और भुने चने से बना सत्तु तथा बेर से बना बिरचुन जैसी वस्तुएँ लोग चाव से खाया करते थे। महेरी, लपसी, मीड़ा, घेंघुर, खींच आदि भी लोकप्रिय भोजन रहे हैं।

वस्रावरण :-

इस काल के लोग पीली झँगुलिया, किंकिनी, हार और नुपूर पहने थे। महाकवि हरिराम व्यास ने अपने एक पद में नील कंचुकी, लाल, तरोटा और तनसुख की झुमक साड़ी का उल्लेख है, जो नारी के परिधान हैं। तनसुख तत्कालीन विशेष वस्र है, जिसका अर्थ है, तन को सुख देने वाला। १८वीं सदी के परिधान में जरकसी पाग के साथ तुर्रा का उल्लेख मिलता है। पुरुष कटि में पीले पट के साथ लाल कछनी पहनते थे। स्री के वस्रों में कसौनी नया है, जो स्तनों को कसनें के लिए उपयोग में लाया जाता था। १९ वीं सदी में "सूतना' नामक परिधान जनसामान्य का होने लगा था, हालांकि इससे पहले इसे सिर्फ सैनिक ही पहनते थे। सैनिक धोती की जगह पर सूतना पहन कर जाते थे। इस काल में एक विशेष प्रकार का वस्र, चोल का प्रचलन होने लगा था। गाँव के लोगों के परिधानों में परदेनिया, सारी, लहँगा, नुगरों, रेजा, अंगिया, चोली, पोलिका, चुनरिया, पैछौरा आदि स्रियों में प्रमुख वस्र थे। पुरुषों में पचरंग पाग, झामा- कुर्ती, अंगरखा, बंडी, बंडा, साफा, झोला, सुजनी प्रमुख थे। 

आभूषणों में निम्नलिखित गाँव में अधिक प्रचलित थे, जैसे टिकुली, छुटा, बिचौली, सुतिया हमेल, ककना, दौरी, पुंगरिया, दूर, कनफूल, छापें- छाल, गजरा, चुरियाँ, करधोनी, पैजना, बिछिया, श्रृंगार प्रसाधनों में सिंदूर, टिपकिया, पटियाँ, अंजन, कजरा, मेंहदी, महावर और गुदना लोकप्रिय थे।

पुनरुत्थान काल :

भोजन - पेय :-

इस काल का भोजन- पेय मध्ययुग जैसा था। इसमें मिष्ठानों की विविधता अधिक बढ़ गई थी।

वस्रावरण :-

इस काल की वेश- भूषा पर मुसलमानों की वेशभूषा का प्रभाव दिखाई देता है। इस काल की नारियों के वेशभूषा में दुशाल जुड़ गया था। पुरुषों में फतूरी, अंगरखा, मिरजई और पगड़ी का रिवाज था। कंधे या सिर पर अँगोछा डालने या बाँधते थे। नगरीय क्षेत्रों में अंग्रेजों का काफी प्रभाव वस्रावरण पर पड़ने लगा था, लेकिन गाँव इस प्रभाव से बहुत दूर था। 

इस काल में ॠतुओं के आधार भोजन में तो कम, वस्रो में अधिक बदलाव हुआ था। शीत में ऊन, रुई और प्याँर का प्रयोग किया जाने लगा था। इस पर एक दोहा प्रसिद्ध है :-

""जाड़ो ठाँड़ो खेत में, भर- भर लेत उसासे''
""मेरे बैरी तीन हैं, कंबल प्याँर कपास''

पगड़ी की जगह गोल टोपी या दुपलिया ने लिया था। बगलबंदी की जगह पर कुर्ता का प्रचलन आरंभ हो चुका था। शहरी क्षेत्रों में लोग पायजामा और नेकर पहनने लगे थे। गाँव में परदनी का महत्व बना ही रहा। इस काल में पैगना, अनोटा, बिछिया, बाली का उपयोग स्रियों के द्वारा होने लगा था।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेलखंड का वैभव एक झलक (A glimpse of Bundelkhand's splendor)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुंदेलखंड का वैभव एक झलक (A glimpse of Bundelkhand's splendor)

बुंदेलखंड विन्ध्याचल की उपव्यकाओं का प्रदेश है। इस गिरी की अनेक ऊँची नीची शाखाऐं - प्रशाखाऐं हैं। इसके दक्षिण भाग में मेकल, पूर्व में कैमोर, उत्तर-पूर्व में केंजुआ, मध्य में सारंग और पन्ना तथा पश्चिम में भीमटोर और पीर जैसी गिरी शिखाऐं हैं। यह खंड लहरियाँ लेती हुई ताल-तलैयों, घहर-घहर कर बहने वाले नाले और चौड़े पाट के साथ उज्जवल रेत पर अथवा दुर्गम गिरि-मालाओं को चीर कर भैरव निनाद करते हुए बहने वाली नदियों का खंड है। सिंध (काली सिंध), बेतवा, धसान, केन तथा नर्मदा इस भाग की मुख्य नदियाँ हैं। इनमें प्रथम चार नदियों का प्रवाह उत्तर की ओर और नर्मदा का प्रवाह पूर्व में पश्चिम की ओर है। प्रथम चार नदियाँ यमुना में मिल जाती हैं। नर्मदा पश्चिम सागर (अरब सागर) से मिलती हैं। इस क्षेत्र में प्रकृति ने विस्तार लेकर अपना सौन्दर्य छिटकाया है।

बुंदेलखंड लोहा, सोना, चाँदी, शीशा, हीरा, पन्ना आदि से समृद्ध है। इसके अलावा यहाँ चूना का पत्थर भी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। विन्धय पर्वत पर पाई जाने वाली चट्टानों के नाम उसके आसपास के स्थान के नामों से प्रसिद्ध है जैसे - माण्डेर का चूना का पत्थर, गन्नौर गढ़ की चीपें, रीवा और पन्ना के चूने का पत्थर, विजयगढ़ की चीपें इत्यादि। जबलपुर के आसपास पाया जाने वाला गोरा पत्थर भी काफी प्रसिद्ध है।

इस प्रांत की भूमि भोजन की फसलों के अतिरिक्त फल, तम्बाकू और पपीते की खेती के लिए अच्छी समझी जाती है।

यहाँ के वनों में सरई, सागोन, महुआ, चार, हरी, बहेरा, आँवला, घटहर, खैर, धुबैन, महलौन, पाकर, बबूल, करौंदा, सेमर आदि के वृक्ष अधिक होते हैं।

बुंदेलखंड में ग्रामों की संख्या अधिक है। उनके नाम वृक्षों, जलाशयों, पशुओं, पक्षियों, घास-पात अथवा स्थान विशेष के निकट होने वाली कोई ध्वनि विशेष के आधार पर रखे गये प्रतीत होते हैं। चूँकि इस भाग में वृक्षों की अधिकता है और जलाशय भी अनेक हैं, अत: अधिकांश नाम इन्हीं से ही सम्बन्ध रखते हैं। वृक्षों में विशेषकर पीपल, आम, जामुन, ऊमर, इमली, बेल, बेर, महुआ, चार और हरदू पर बहुत से नाम हैं। केवल जबलपुर जिसमें प्राय: ५० गाँव पिपरिया, पिपरहटा नाम के हैं। इसी प्रकार अनेक जमुनियां, उमेरिया, इमलई अथवा इसनिया हैं।

इबरी, कुआ, सागर, झीरिया आदि नाम जलाशयों पर आधारित हैं। जलाशय सूचक नामों से साथ कहीं-कहीं वृक्षों के नाम संयुक्ति होकर ग्राम नाम बन गये हैं। जैसे सेमरताल, आमानरो।

पशुओं के नाम से भी कई गाँव के नाम पड़े हैं जैसे रीछ से रीछई या रीछाई, हिरन से हिरनपुरी।

वृक्षों से नाम स्थान पर कई गाँवों के नामक पशुओं और जलाशयों के नाम को भी मिला कर बने हैं जैसे - बाघडबरी, हाथीसरा, गिधौटा, मगरमुहा, झींगुरी ।

उपयुक्त ग्राम-नाम-परिचय से ज्ञात होता है कि ग्रामों के बड़े विचित्र नाम रखे गये हैं जो कभी कभी हास्यपद भी लगता है। पास-पास बसे हुए गाँवों के बीच की दूरी नाक-कान के बीच की दूरी अर्थात थोड़ी ही बताते हुए किसी लोक कवि ने कहा है -

धर-मसकी और धरमपुरा, लोलकचैया, विजयपुरा।

लखापतेरी उतनी दूर, नाक-कान है जितनी दूर ।।


वास्तुकला:

बुंदेलखंड के बीते वैभव की झलक हमें आज उक्त भूमि पर छिटकी हुई पाषाण काल से प्राप्त होती है। इस भूमि पर इस कला ने कितना आदर पाया और उसका कितना विकास हुआ, यह बात पुरातत्व-विशेषज्ञों से छिपी नही है। यो प्रागैतिहासिक काल कि आदिवासियों द्वारा पूजी जाने वाली मूर्तियाँ भी बुंदेलखंड से प्राप्त होती हैं। कला की दृष्टि से इनका मूल्य अधिक नहीं है, किंतु मूर्तिकला के आदि रुप का इनसे अच्छा ज्ञान होता है। ये मूर्तियाँ बहुत मायने रखती हैं और अमूल्य हैं।

बुंदेलखंड के विभिन्न स्थानों में सुर्ख रंग की चित्रकारी भी मिलती है। उसका रंग इतना पक्का है कि अब तक वह किसी प्रकार भूमि धूमिल नही हो पाया। इनमें मनुष्यों और घोड़ों के भद्दे चित्र हैं। इतिहासज्ञ इस चित्रकारी को पूर्व ऐतिहासिक काल की बतलाते हैं। करबी तहसील के कल्याणपुर ग्राम में मानिकपुर के निकट सारहट के जंगल और कठौता में शाहगढ़ और देवरा के निकट (बिजावर) पिपरियां में फतहपुर (हता-दमोह) में ऐसी लाल रंग की चित्रकारी बहुत है।

देवरा के निकट शिला-भित्तियों पर गैरिक रंग के बने हुए चित्र मानव प्रकृतिकी आदिम अनुभूतियों के साक्षी हैं। इन चित्रों में पशुओं का प्रदर्शन किया गया है। निकट ही आखेटिक अवस्था में मानव-चित्र भी हैं।

जहाँ तक रामायण तथा महाभारत के स्वर्ण युगों की कला-कृतियों का संबंध है, बुंदेलखंड की क्या सारे भारत में वे नहीं के बराबर है। उक्त ग्रंथों द्वारा ही हमें उनकी कला का ज्ञान होता है। महाभारत युग में महाराज युधिष्ठिर के सभा-भवन का निर्माण जिस कुशलता से दानव आदि कलाकारों ने किया था, उसका वर्णन ग्रंथों में ही सीमित है। काव्य कला द्वारा ही उसका आनन्द लिया जा सकता है। इन दोनो युगों में बुंदेलखंड के अधिकांश भाग में असभ्य जातियों का विस्तार था। अत: किसी प्रकार की कला का विकास न हो पाया।

नागौढ़, जबलपुर, और महौबा आदि कुछ स्थानों में बौद्ध युग की मूर्तिकला कहीं कहीं मिलती है। शिलालेख भी प्राप्त हुए हैं। सम्राट अशोक ने इस प्रांत पर भी अपना अधिकार स्थापित किया था और धर्म प्रचार हेतु शिलालेखों पर धर्म प्रशस्तियाँ उत्तकीर्ण कराईं थी। धर्म से सदा ---

तृतीय शताब्दी से तेहरवीं शताब्दी तक इस प्रांत में उस स्थापत्य कला का सृजन हुआ जो कलिं और खजुराहों की कृत्तियों में जीवन्त रुप में आज भी वर्तमान हैं। कलिं का कला चंदेली काल की है। खजुराहो की उससे भी पहले की है, क्योंकि चीनी यात्री (जो कि हर्षवर्धन के राज्य-काल में आया था) ह्येनसांग ने भी खजुराहो में मंदिर का होना लिखा है। कदाचित चंदेलों ने उन पुरातन मन्दिरों का जीर्णोद्धार करा कर प्रशस्तियां अंकित रहाई होंगी। खजुराहो का विशाल मन्दिर, देवगढ़ की विष्णुमूर्ति, दतिया का पुराना महल, पन्ना का बृहस्पति कुण्ड, जतारा का मदनसागर आदि वास्तुकला के सवाल प्रमाण है। अजयगढ़, बरुआ सागर, तालबेहट, करैरा आदि में भी कला की प्रचुरता है।

खजुराहो में बीस मन्दिरों के समूह कविकल्पना को मानो मूर्तिमती करके पृथ्वी पर उतार लाया है। शिल्पी का स्वप्न मानो साकार हो गया है। अपने विशाल मंडपों, अंतरालों, आमलक शिखर अनुशिखर और स्तूपिका से सज्जित ऊँची मीनारों और अपनी असंख्य अनुपम शिलाकृतियों से विभूषित यह मन्दिर समूह आज अनगिन को अपने दर्शन का आमंत्रण देने लगा है। मन्दिर के बाहर और भीतर दोनों ओर की दीवारों देवताओं, अप्सराओं, संदरियों, विद्याधरों, युगल-मिथुनों, गज और शार्दूलों की सुन्दर कला-कृतियों से सजाई गई हैं। खजुराहों के शिल्पी अनुपम कृतित्व हैं, उसकी नारी प्रतिमाएं इतनी सुंदर हैं, उन्हें देख कर ऐसा लगता है मानो जड़ में चेतन अपने सम्पूर्ण वैभव के साथ जाग उठा हो। इतना सम्मोहन है कि पाषाण में जीवन सपंदन का भ्रम होने लगता है।

खजुराहो के शिल्पियों ने नारी के जीवन और भाव के प्रत्येक रुप का अंकन किया है। कबी शालमंजिक के रुप में तो कभी अपने प्रेमी के साथ काम-क्रीड़ा तथा भोगविलास करते, सखियों के साथ हास, परिहास और वार्तालाप करते, बच्चों को स्तनपान कराते, श्रृंगार करते, सोते, उठते-बैठते, प्रत्येक स्थिती में तन्मय और भाव-विभोर होकर। विशाल अर्ध निमिलित नेत्र, उन्नत उरोज, भारी नितम्ब, अनेक टेढ़ी-मेढ़ी भंगिमाओं, भरे अधरों पर तैरती तरल हँसी अथवा मुस्कुराहट में प्रेम का मौन निमंत्रण नारी-मूर्ति-शिल्प की विशेषता है।

नागौढ़ के निकट मुमरा ग्राम का शिव मंदिर तथा नचना ग्राम (अजयगढ़) के समीप चौमुखनाथ का मन्दिर दोनों अपने ढंग के हैं। इतिहासकारों का मत है कि इन्हें नागवंशीय शैव शासकों ने बनवाया था। नचना का शिवालय नागकालीन स्थापत्य का अद्भुत उदाहरण है। उसमे शिव-पार्वती को शिखरों पर कैलाश पर्वत पर का दृश्य अंकित किया गया है। कुछ लोग मुमरा और नचना के मन्दिरों की गणना गुप्तकालीन स्थापत्य कला में किया करते हैं। इन मंदिरों के दरवाजों पर विचित्र कलायुक्त तोरण उत्कीर्ण हैं। जबलपुर जिले में तिगवां ग्राम में गुप्तकालीन सुंदर विष्णु मंदिर हैं।

सागर जिले में अनेक स्थानों पर भी ऐसी कला का क्षेत्र है। बीना के आस पास तो इसके भंडार हैं, विशेष कर एरन ग्राम के निकट हूण राज्य काल में बुन्देलखण्ड की राजधानी थी।

जबलपुर के पास लगभग आठ मील पश्चिम की ओर तेवर (त्रिपुरी) नामक ग्राम है। इसके आस-पास देवालयों और खण्डहरों के अवशिष्ट पाये जाते हैं, जिनमें उक्त स्थान के बीते वैभव की झलक मिलती है। यहां अनेक मूर्तियाँ पाई जाती हैं, जिनमें वज्रपाणि, भगवान बुद्ध और जैन तीथर्ंकर ही विशेष हैं। तेवर की प्राचीनता हमें ईसा की पहली शताब्दी में ले जाती है। तेवर जिसे त्रिपुरी कहते हैं कलचुरियों का प्राधान्य रहा है। किन्तु कुछ मूर्तियों तथा एक प्राचीन बावली को छोड़ कर अन्य कोई भाग्नावशेष नहीं बचा है। त्रिपुरी से थोड़ी दूर कर्णबेल में कुछ प्राचीन भाग्नावशेथ है।

त्रिपरी ही चेदी की राजधानी थी।

जबलपुर के पास ही गढ़ा ग्राम पुरातन "गढ़ा मण्डलराज्य' के अवशेषों से पूर्ण है। गढ़ा-मण्डला गौड़ों का राज्य था गौड़ राजा कलचुरियों के बाद हुए हैं।

जबलपुर के पास की कलचुरि वास्तुकला का विस्तृत वर्णन अलेक्ज़ेन्डर कनिंहाम ने अपनी रिपोर्ट (जिल्द ७) में किया है। प्रसिद्ध अन्वेषक राखालदास बैनर्जी ने बी इस विषय पर एक अत्यन्त गवेष्णापूर्ण ग्रंथ लिखा है। भेड़घाट और नंदचंद आदि गाँवो में भी अनेक कलापूर्ण स्मारक हैं।

भेड़ाघाट में प्रसिद्द "चौंसठ योगिनी' का मंदिर। इसका आकार गोल हैछ। इसमे ८१ मूर्तियों के रखने के लिए खंड बने हैं। यह १०वीं शताब्दी में बना है। मन्दिर के भीतर बीच में अल्हण मन्दिर है।

इन सभी स्थानों में मन्दिरों और मूर्तियों में जिस प्रकार की कला पाई जाती है, उससे स्पष्ट होता है कि बुन्देलखंड वास्तव में कला-भूमि रहा है। मूर्तियों की मुखमुद्रा, शरीर की बनावट, वक्ष प्रदेश, कटि, अँगुलियाँ तता नासिका आदि की बनावट से उच्चकोटि की कला का परिचय मिलता है। अनेक स्थानों में प्राप्त मूर्तियों में तो इतनी दक्षता पाई जाती है कि शिल्पकार के छैनी-हथौड़े की सम्पूर्ण शक्ति उसमें चुक गई होती है। शरीर पर के रोम तक दर्शाये जा सके हैं। इतना ही नहीं पारदर्शक वस्र भी दर्शाये जा सके हैं।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास (Brief History of Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास (Brief History of Bundelkhand)

पुरातात्विक साहित्यिक शोधों कि विपुलता ने इतने नये तथ्य प्रस्तुत किए हैं कि भारतवर्ष के समग्र इतिहास से पनरालेखन की आवश्यकता प्रतीत होने लगी है। "बुंदेलखंड' का इतिहास भी इसी प्रकार नयी शोधों के संदर्भ में आलेखन की अपेक्षा रखता है। "बुंदेलखंड 'शब्द मध्यकाल से पहले इस नाम से प्रयोग में नहीं आया है। इसके विविध नाम और उनके उपयोग आधुनिक युग में ही हुए हैं। बीसवीं शती के प्रारंभिक दशक में रायबहादुर महाराजसिंह ने बुंदेलखंड का इतिहास लिखा था। इसमे बुंदेलखंड के अन्तर्गत आने वाली जागीरों और उनके शासकों के नामों की गणना मुख्य थी। दीवान प्रतिपाल सिंह ने तथा पन्ना दरबार के प्रसिद्ध कवि "कृष्ण' ने अपने स्रोतों से बुंदेलखंड के इतिहास लिखे परन्तु वे विद्वान भी सामाजिक सांस्कृतिक चेतनाओं के प्रति उदासीन रहे।

पं० हरिहर निवास द्विवेदी ने "मध्य भारत का इतिहास' ग्रंथ में बुंदेलखंड की राजनैतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक उपलब्धियों की चर्चा प्रकारांतर से की है। इस ग्रंथ में कुछ स्थानों पर बुंदेलखंड का इतिहास भी आया है। एक उत्तम प्रयास पं० गोरेलाल तिवारी ने किया और "बुंदेलखंड का संक्षिप्त इतिहास' लिखा जो अब तक के ग्रंथो से सबसे अलग था परन्तु तिवारीजी ने बुंदेलखंड का इतिहास समाजशास्रीय आधार पर लिख कर केवल राजनैतिक घटनाओं के आधार पर लिखा है।

बुंदेलखंड सुदूर अतीत में शबर, कोल, किरात, पुलिन्द और निषादों का प्रदेश था। आर्यों के मध्यदेश में आने पर जन जातियों ने प्रतिरोध किया था। वैदिक काल से बुंदेलों के शासनकाल तक दो हज़ार वर्षों में इस प्रदेश पर अनेक जातियों और राजवंशं ने शासन किया है और अपनी सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना से इन जातियों के मूल संस्कारों को प्रभावित किया है। विभिन्न शासकों में मौर्य, सुंग, शक, हुण, कुषाण, नाग, वाकाटक, गुप्त, कलचुरि, चन्देल, अफगान, मुगल, बुंदेला, बघेल, गौड़, मराठ और अंग्रेज मुख्य हैं।

ई० पू० ३२१ तक वैदिक काल से मौर्यकाल तक का इतिहास वस्तुत: बुंदेलखंड का "पौराणिक-इतिहास' माना जा सकता है। इसके समस्त आधार पौराणिक ग्रंथ है।

पौराणिक इतिहास :

समस्त भारतीय इतिहासों में "मनु' मानव समाज के आदि पुरुष हैं। इनकी ख्याति कोसल देश में अयोध्या को राजधानी बनाने और उत्तम-शासन व्यवस्था देने में है। महाभारत और रघुवंश के आधार पर माना जाता है कि मनु के उपरांत इस्वाकु आऐ और उनके तीसरे पुत्र दण्डक ने विन्धयपर्वत पर अपनी राजधानी बनाई धी । मनु के समानान्तर बुध के पुत्र पुरुखा माने गए हैं इनके प्रपौत्र ययति थे जिनके ज्येष्ठ पुत्र यदु और उसके पुत्र कोष्टु भी जनपद काल में चेदि (वर्तमान बुंदेलखंड) से संबंद्ध रहे हैं। एक अन्य परंपरा कालिदास के "अभिज्ञान शाकुंतल' से इस प्रकार मिलती है कि दुष्यंत के वंशज कुरु थे जिनके दूसरे पुत्र की शाखा में राजा उपरिचर-वसु हुए थे । इनकी ख्याति विशेष कर शौर्य के कारण हुई है। इनके उत्रराधिकारियों को भी चेदि, मत्स्य आदि प्रांतो से संबंधित माना गया है। बहरहाल पौराणिक काल में बुंदेलखंड प्रसिद्ध शासकों के अधीन रहा है जिनमें चन्द्रवंशी राजाओं की विस्तृत सूची मिलती है। पुराणकालीन समस्त जनपदों की स्थिति बौद्धकाल में भी मिलती है। चेदि राज्य को प्राचीन बुंदेलखंड माना जा सकता है। बौद्धकाल में शाम्पक नामक बौद्ध ने बागुढ़ा प्रदेश में भगवान बुद्द के नाखून और बाल से एक स्तूप का निर्माण कराया था। वर्तमान मरहूत (वरदावती नगर) में इसके अवशेष विद्यमान हैं।

बौद्ध कालीन इतिहास के संबंध में बुंदेलखंड में प्राप्त तत्युगीन अवशेषों से स्पष्ट है कि बुंदेलखंड की स्थिती में इस अवधि में कोई लक्षणीय परिवर्तन नहीं हुआ था। चेदि की चर्चा न होना और वत्स, अवन्ति के शासकों का महत्व दर्शाया जाना इस बात का प्रमाण है कि चेदि इनमें से किसी एक के अधीन रहा होगा। पौराणिक युग का चेदि जनपद ही इस प्रकार प्राचीन बुंदेलखंड है।

मौर्यकाल :

मौर्यों के पहले का राजनैतिक जो कि बुंदेलखंड क्षेत्र की चर्चा करता हो उपलब्ध नहीं है। वर्तमान खोजों तथा प्राचीन वास्तुकला, चित्रकला, मूर्तिकला, भित्तिचित्रों आदि के आधार पर कहा जा सकता है कि जनपद काल के बाद प्राचीन चेदि जनपद बाद में पुलिन्द देश के साथ मिल गया था ।

सबसे प्राचीन साक्ष्य "एरन' की परातात्विक खोजों और उत्खननों से उपलब्ध हुए हैं। ये साक्ष्य ३०० ई० पू० के माने गए हैं। इस समय एरन का शासक धर्मपाल था जिसके संबंध में मिले सिक्कों पर "एरिकिण' मुद्रित है। त्रिपुरी और उज्जयिनि के समान एरन भी एक गणतंत्र था । मौर्यशासन के आते ही समस्त बुंदेलखंड (जिनमें एरन भी था) उसमे विलीयत हुआ। मत्स्य पुराण और विष्णु पुराण में मौर्य शासन के १३० वर्षों का यह साक्ष्य है-

उद्धरिष्यति कौटिल्य सभा द्वादशीम, सुतान्।

मुक्त्वा महीं वर्ष शलो मौर्यान गमिष्यति।।

इत्येते दंश मौर्यास्तु ये मोक्ष्यनिंत वसुन्धराम्।

सप्त त्रींशच्छतं पूर्ण तेभ्य: शुभ्ङाग गमिष्यति।

मौर्य वंश के तीसरे राजा अशोक ने बुंदेलखंड के अनेक स्थानों पर विहारों, मठों आदि का निर्माण कराया था । वर्तमान गुर्गी (गोलकी मठ) अशोक के समय का सबसे बड़ा विहार था। बुंदेलखंड के दक्षिणी भाग पर अशोक का शासन था जो उसके उज्जयिनी तथा विदिशा मे रहने से प्रमाणित है। परवर्ती मौर्यशासक दुर्बल थे और कई अनेक कारण थे जिनकी वजह से अपने राज्य की रक्षा करने मे समर्थ न रहै फलत: इस प्रदेश पर शुङ्ग वंश का कब्जा हुआ जिसे विष्णु पुराण तथा मत्स्य पुराण में इस प्रकार दिया है -

तेषामन्ते पृथिवीं दस शुङ्गमोक्ष्यन्ति ।

पुण्यमित्रस्सेना पतिस्स्वामिनं हत्वा राज्यं करिष्यति ।।

विष्णुपुराण

तुभ्य: शुङ्गमिश्यति।

पुष्यमिन्नस्तु सेनानी रुद्रधृत्य स वृहदथाल

कारयिष्यीत वै राज्यं षट् त्रिशंति समानृप:।।

मत्स्य पुराण

वृहद्थों को भास्कर पुण्यमित्र का राज्य कायम होना वाण के "हषचरित' से भी समर्थित है। शुङ्ग वंश भार्गव च्वयन के वंशाधर शुनक के पुत्र शोनक से उद्भूल है। इन्होंने ३६ वर्षों तक इस क्षेत्र में राज्य किया। इसके उपरांत गर्दभिल्ला और नागों का अधिकार इस प्रदेश पर हुआ। भागवत पुराण और वायुपुराण में किलीकला क्षेत्र का वर्णन आया है। ये किलीकला क्षेत्र और राज्य विन्ध्यप्रदेश (नागौद) था। नागों द्वारा स्थापित शिवाल्यों के अवशेष भ्रमरा (नागौद) बैजनाथ (रीवाँ के पास) कुहरा (अजयगढ़) में अब भी मिलते हैं। नागों के प्रसिद्ध राजा छानाग, त्रयनाग, वहिनाग, चखनाग और भवनाग प्रमुख नाग शासक थे। भवनाग के उत्तराधिकारी वाकाटक माने गए हैं।

पुराणकाल में बुंदेलखंड का अपना एक महत्व था, मौर्य के समय में तथा उनके बाद भी यह प्रदेश अपनी गरिमा बनाए हुए था तथा इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य हुए।

वाकाटक और गुप्तशासन : 

डा० वी० पी- मिरांशी के अनुसार वाकाटक वंश का सर्वश्रेष्ठ राजा विन्ध्यशक्ति का पुत्र प्रवरसेन था। इसने अपने साम्राजय का विस्तार उत्तर में नर्मदा से आगे तक किया था। पुराणों में आये वर्णन के अनुसार उसने परिक नामक नगरी पर अधिकार किया था जिसे विदिशा राज के नागराज दैहित्र शिशुक ने अपने अधीन कर रखा था। पुरिका प्रवरसेन के राज्य की राजधानी भी रही है।

वाकाटक राज्य की परम्परा तीन रुपों में पाई जाती है -

क)        स्वतंत्र वाकाटक साम्राज्य

ख)        गुप्तकालीन वाकाटक साम्राजय

ग)        गुप्तों के उपरान्त वाकाटक साम्राजय

कुन्तीदेवी अग्निहोत्री का विचार है कि सन ३४५ से वाकाटक गुप्तों के प्रभाव में आये और पाँचवीं शताब्दी के मध्य तक उनके आश्रित रहे हैं। कतिपय विद्वान विन्ध्यशक्ति के समय से सन् २५५ तक वाकाटकों का काल मानते हैं। ये झाँसी के पास बागाट स्थान से उद्भूत है अत: बुंदेलखंड से इनका विशेष संबंध रहा है।

प्रमुख वाकाटक शासक :

१)      प्रवरसेन प्रथम सन २७५ ई० से३३५ ई०

२)      रुद्रसेन प्रथम ३३५ ई० से ३६० ई०

३)      पृथ्वीसेन ३६० ई० से ३८५ ई०

४)      रुद्रसेन द्वितीय ३९० ई० से ४१० ई०

५)     प्रवरसेन द्वितीय ४१० ई० से ४४० ई०

६)     नरेन्द्रसेन ४४० ई० से ४६० ई०

७)     पृथ्वीसेन द्वितीय ४६० ई० से ४८० ई०

८)     हरिसेन

इतिहासकारों के अनुसार हरिसेन ने पश्चिमी और पूर्वी समुद्र के बीच की सारी भूमि पर राज किया था।

गुप्तवंश का उद्भव उत्तरी भारत में चतुर्थ शताब्दी में हुआ था। चीनी यात्री ह्येनसांग जिस समय बुंदेलखंड में आया था, उस समय भारतीय नेपोलियन समुद्रगुप्त का शासनकाल था। उसने वाकाटकों को अपने अधीन कर लिया था । कलचुरियों के उद्भव का समय भी इसी के आसपास माना गया है। समुद्रगुप्त की दिग्विजय और "एरन' पर उसका अधिकार शिलालेखों और ताम्रपटों के आधार पर सभी इतिहासकारों ने माना है, "एरन' की पुरातात्विक खोजों को प्रो० कृष्णदत्त वाजपेयी ने अपनी पुस्तिका "सागर थ्रू एजेज' में प्रस्तुत किया है।

एरन के दो नाम मिलते हैं "एरिकण और "स्वभोनगर' ।

स्वभोनगर से स्पष्ट है कि यह वैभव की नगरी रही है। हटा तहसील (वर्तमान दमोह जिला) के सकौर ग्राम में २४ सोनो के सिक्के मिले हैं जिनमें गुप्तवंश के राजाओं के नाम अंकित हैं। इससे स्पष्ट है कि गुप्तों के समय में बुंदेलखंड एक वैभवशाली प्रदेश था । स्कन्दगुप्त के उपरांत बुंदेलखंड बुधगुप्त के अधीन था। इसकी देखरेख मांडलीक सुश्मिचंद्र करता था। सुश्मिचंद्र ने मैत्रायणीय शाखा के मातृविष्णु और धान्य विष्णु ब्राह्मणों को एरन का शासक बनाया था जिसकी पुष्टि "एरण' के स्तम्भ से होती है। सुश्मिचंद्र गुप्त का शासन यमुना और नर्मदा के बीच के भाग पर माना गया है।

गुप्तों की अधीनता स्वीकार करने वालों में उच्छकल्प और परिव्राजकों का नाम लिया जाता है। पाँचवी शताब्दी के आसपास उच्छकल्पों की राजसत्ता की स्थापना हुई थी। ओधदेव इस वंश का प्रतीक था। इस वंश के चौथे शासक व्याघ्रदेव के वाकाटकों की अधीनता स्वीकार कर ली थी। इसके शासकों में जयनाथ और शर्वनाथ के शासनकाल के अनेक दानपत्र उपलब्ध हुए हैं जिनसे पता चलता है कि उच्छकल्पों की राजधानी "उच्छकल्प' (वर्तमान ऊँचेहरा) में थी। इनके शासन में आने वाले भूभाग के "महाकान्तर' प्रदेश कहा जाता है। इसी के पास परिव्राजकों की राजधानी थी । विक्रम की चौथी सदी में परिव्राजकों ने अपने राज्य की स्थापना की थी । इनका राज्य वम्र्मराज्य भी कहा जाता है। वम्र्मराज्य पर बाद में नागौद के परिहारों ने अपना शासन जमा लिया था ।

पाँचवी शताब्दी के अंत तक हूण शासकों द्वारा बुंदेलखंड का शासन करना इतिहासकारों ने स्वीकार किया है। हूणों का प्रमुख तोरमाण था जिसने गुप्तों को पराजित करके पूर्वी मालवा तक अपना साम्राज्य बढ़ाया था । एरण के वराहमूर्ति शिलालेख में तोरमण के ऐश्वर्य की चर्चा है। इतिहासकारों के अनुसार भानुगुप्त और तोरमाण हर्षवर्धन के पूर्व का समय अंधकारमय है। चीनी यात्री ह्यानसांग के यात्रा विवरण में बुंदेलखंड का शासन ब्राह्मण राजा के द्वारा चलाया जाना बताया गया है। बुंदेलखंड को ह्मष साम्राजय् के बाहर माना गया है। कालांतर में ब्राह्मण राजा ने स्वयं हर्ष की अधीनता स्वीकार कर ली थी। हर्ष के उपरांत अराजकता की स्थिती में बुंदेलखंड धार नरेश भोज के अधिकार में आया । इसके बाद सूरजपाल कछवाहा, तेजकर्ण, वज्रदामा, कीर्तिराज आदि शासक हुए पर इन्होनें कोई उल्लेखनीय योगदान नहीं दिया।

कलचुरियों का शासन :

सन ६४७ से १२०० ई० के आसपास तक कन्नौज में अनेक शासक हुए, इनमें यशोवम्र्मन, आयुध, राजकुल, प्रतिहार, गाहड़वाल, शाकम्भरी के चौहान (अजयराज, विग्रहराज चतुर्थ वांसलदेव और पृथ्वीराज तृतीय प्रमुख हैं। इसी समय देश पर मुस्लिम आक्रमण भी हुए। मध्यकाल तक आसाम में भास्कर वर्मन, बंगाल में पालराजकुल का प्रभाव बढ़ा तो त्रिपुरी में कलचुरि जेजाकमुक्ति (बुंदेलखंड) में चन्देल, मालवा में परमाल तथा आन्हिवाड़ में चालुक्य राजकुलों की शक्ति में संवर्द्धन हुआ। बुंदेलखंड में कलचुरियों और चन्देलों का प्रभाव दीर्घकाल तक रहा।

कलचुरियों की दो शाखायें हैं -

रत्नपुर के कलचुरि और त्रिपुरी के कलचुरि। बुंदेलखंड में त्रिपुरी के कलचुरियों का महत्व है। यह वंश पुराणों में प्रसिद्ध हैध्यवंशी कार्तवीर्य अर्जुन की परंपरा में माना जाता है। इसके संस्थापक महाराज कोक्कल ने (जबलपुर के पास) त्रिपुरी को अपनी राजधानी बनाया अतएव यह वंश त्रिपुरी के कलचुरियों के नाम से विख्यात है। प्राचीन काल में नर्मदा के शीर्ष स्थानीय प्रदेश से महानदी के प्रदेश का विस्तृत भूभाग चेदि जनपद के नाम से प्रसिद्ध था। मध्यकाल में इसे "डहाल' कहा जाने लगा। कोवकल बड़ी सूझबूझ एवं दूरदृष्टि वाला उत्साही व्यक्ति था ; उसने उत्तर के चंदेलों की बढ़ती हुई शक्ति से लाभ उठाने के लिए चन्देल कुमारी नट्टा देवी से विवाह किया।

प्रतापी कोवकलदेव के पुत्र मुग्धतुंग और केयूरवंर्ष ने अभूतपूर्व उन्नति की थी। बिलहरी के शिलालेख के अनुसाल केयूरवर्ष ने गौड़, कर्णाटलाट आदि देशों की स्रियों से राजमहल को सुशोभित किया था और उससे कैलास से सेतुबंध तक के शत्रु भयाक्रान्त थे। केयूरवर्ष के प्रताप का वर्णन राजशेखर ने विद्शाल मंजिका नाटक में भी किया है।

कलचुरियों ने लक्षमणदेव, गंगेयदेव, कर्ण, गयाकर्ण, नरसिंह, जयसिंह आदि का शासन काल समृद्धिपूर्ण माना जाता है। इन्होंने ५०० वर्ष तक शासन किया जिसे सन १२०० के आसपास देवगढ़ के राजा ने समाप्त कर दिया और फिर चन्देलों के अधीन आया। हर्षवर्धन के समय चन्देल राज्य एक छोटी सी ईकाई थी परन्तु उसके बाद यह विस्तार पाकर दसवीं शताब्दी तक एक शक्तिशाली राज्य बन गया।

चन्देलों का शासन :

महोबा चन्देलों का केन्द्र था। हर्षवर्धन की मृत्यु के बाद गहरवारों ने इस पर अधिकार कर लिया था। गहरवारों को पराजित करने वाले परिहार थे। स्मिथ और कीनधम ने इस जनश्रुति का समर्थन अपने ग्रंथों में किया है। केशवचन्द्र मिश्र का कथन है कि चन्द्रात्रेय से नन्नुक के राज्यकाल तक का (सन ७४० से ८३१ तक) १० वर्ष तक का समय चन्देलों के उदय का काल है। इस वंश के प्रमुख शासक मुनि चन्द्रात्रेय, नृपति भूभुजाम और नन्नुक हैं। धंग के खजुराहो शिलालेख से इसका प्रमाण मिलता है। इसी संदर्भ मे कोक्कल के लेख और ताम्रपत्रों से प्रभूत सामग्री मिलती है।

चन्देलों की उत्पति विवादास्पद है। डॉ स्मिथ, कीनंधम, वैद्य और हेमचंद्र राय के मतों में बहुत भिन्नता है। किवदन्ती के अनुसाल हेमावती के पुत्र का चन्द्रमा से उत्पन्न होना चन्देल कहलाया है। जन्म सम्बन्धी वृतांत में चन्देलों का कलिं में रहना, प्रथम प्रतापी शासक बनना भी शामिल हैं। महाकवि चन्द ने भी चन्देलों के राजवंशों की विस्तृत सूची दी है। चन्देलों का आदि पुरुष नन्नुक माना जाता है। इसे प्रारंभ मे राजा न मानकर नागभ द्वितीय (प्रतिहार शासक) के संरक्षण में विकसित होने वाला शासक बताया गया है। ऐसा साक्ष्य धंग के खजुराहे - अभिलेख में भी मिला है।

चन्देलों की अपनी परंपरा है। नन्नुक आदि शासक हैं। इसके बाद वाक्यपति का नाम आता है। वाक्यपति के दो पुत्र हुए जयशक्ति और विजयशक्ति। जयशक्ति को वाक्यपति के बाद सिंहासन में बैठाया गया और इसके नाम से ही बुंदेलखंड क्षेत्र का नाम "जेजाक-मुक्ति' पड़ा। मदनपुर के शिलालेख और अलबेरुनी के भारत संबंधी यात्रा विवरण में इस तथ्य को समर्थन मिलता है। अलबरुनी ने जेजाक मुक्ति के स्थान पर "जेजाहुति' शब्द का प्रयोग किया है।

जयशक्ति के बाद विजयशक्ति गद्दी पर बैठा। इसने कोई महत्वपूर्ण कार्य नही किए परन्तु उसके पुत्र राहील की ख्याति अपने पराक्रम के लिए विशेष है। केशव चन्द्र मिश्र ने लिखा है कि "यदि चन्देल शासक राहील के कार्यों का सिंहावलोकन किया जाये तो ज्ञात होगा कि ९०० ई० से ९१५ ई० तक के १५ वर्षों के शासन काल मे उसने सैन्यबल संगठित किया, उसे महत्वाशाली बनाया और अजयगढ़ की विजय करके ऐतिहासिक सैनिक केन्द्र स्थापित किया। कलचुरि से वैवाहिक संबंध जोड़कर उसने प्रभावशाली कार्य किया।' राहिल के बाद चन्देल राज्य की स्वतंत्र सत्ता का और विकास होता है। चन्देलों ने सोलहवीं शताब्दी तक शासन किया। शासकों में प्रमुख इस प्रकार हैं -

-         नन्नुक सन् ८३१ ई०

-         वाक्पति सन् ८४५ ई०

-         यशोवम्र्मन ९३० ई०

-         धंग सन् ९५० ई०

-         गंड सन् १००० ई०

-         विद्याधर १०२५ ई०

-         विजयपाल १०४० ई०

-         देववर्मा १०५५ ई०

-         कीर्तिवर्मा सन् १०६० ई०

-         सल्लक्षण वम्र्मन ११०० ई०

-         जयवर्मन १११० ई०

-         पृथ्वीवर्मन ११२०

-         मदनवर्मन ११२९ ई०

-         परमर्दि ११६५ ई०

-         त्रैलोक्यवर्मन १२०३ ई०

-         वीरवम्र्मन १२४५ ई०

-         भोजवर्मा १२८२ ई०

-         वीरवर्मा द्वितीय १३०० ई०

-         कीर्तिराय १५२० ई०

-         रामचन्द्र १५६९ ई०

चन्देलों के साथ दुर्गावती का भी नाम लिया जाता है।

चन्देल काल में बुंदेलखंड में मूर्तिकला, वास्तुकला तथा अन्य कलाओं का विशेष विकास हुआ। "आल्हा' के रचयिता जगीनक माने जाते हैं। ये चन्देलों के सैनिक सलाहकार भी थे। पृथ्वीराज से चन्देलों से संबंध भी आल्हा में दर्शाये गये हैं। सन् ११८२-८३ में चौहानों ने चन्देलों को सिरसागढ़ में पराजित किया था और कलिन् का किला लूटा था।

चन्देलों की कीर्ति के अनेक शिलालेख हैं। देवगढ़ के शिलालेख में चन्देल वैभव इस प्रकार दर्शाया है - "$ नम: शिवाय। चान्देल वंश कुमुदेन्दु विशाल कीर्ति: ख्यातो बभूव नृप संघनताहिन पद्म:।' चन्देलों के प्रमुख स्थान खजुराहो, अजयगढ़, कलिंजर, महोबा, दुधही, चांदपुर आदि हैं।

चन्देल अभिलेख से स्पष्ट है कि परमार नरेश भोज के समय मे विदेशी आक्रमणकारियों का ताँता लग गया था । कलिं को लूटने के लिए मुहम्मद कासिम, महमूद गज़नवी, शहाबुद्दीन गौरी आदि आर्य और विपुलधन अपने साथ ले गये। कुतुबुद्दीनएबक मुहम्मद गौरी के द्वारा यहां का शासक बनाया गया था उसके मरने के बाद स्वतंत्र हुआ और चंगेजखाँ के आक्रमण तक शासक बना रहा।

बुंदेलखंड में कलिं का किला सभी बादशाहों को आकर्षण का केन्द्र रहा और इसे प्राप्त करने के सभी ने प्रयत्न किया। हिन्दु और मुसलमान राजाओं में इसके निमित्त अनेक लड़ाईयां हुईं। खिलजी वंश का शासन संवत् १३७७ तक माना गया है। अलाउद्दीन खिलजी को उसके मंत्री मलिक काफूर ने मारा, मुबारक के बनने पर खुसरो ने उसे समाप्त किया। कलिंजर और अजयगढ़ चन्देलों के हाथ में ही रहे। इसी समय नरसिंहराय ने ग्वालियर पर अपना अधिकार किया। बाद में य तोमरों के हाथ में चला गया। मानसी तोमर ग्वालियर के प्रसिद्ध राजा माने गए हैं।

बुंदेलखंड के अधिकांश राजाओं ने अपनी स्वतंत्र सत्ता बनानी प्रारंभ कर दी थी फिर वे किसी न किसी रुप में दिल्ली के तख्त से जुड़े रहते थे। बाबर के बाद हुमायूँ, अकबर, जहांगीर और शाहजहाँ के शासन स्मरणीय है।

बुंदेलों का शासन :

बुंदेल क्षत्रीय जाति के शासक थे तथा सुदूर अतीत में सूर्यवंशी राजा मनु से संबन्धित हैं। अक्ष्वाकु के बाद रामचन्द्र के पुत्र "लव' से उनके वंशजो की परंपरा आगे बढ़ाई गई है और इसी में काशी के गहरवार शाखा के कर्त्तृराज को जोड़ा गया है। लव से कर्त्तृराज तक के उत्तराधिकारियों में गगनसेन, कनकसेन, प्रद्युम्न आदि के नाम ही महत्वपूर्ण हैं।

कर्त्तृराज का गहरवार होना किसी घटना के आधार पर हैं जिसमें काशी मे ऊपर ग्रहों की बुरी दशा के निवारणार्थ उसके प्रयत्नों में "ग्रहनिवार' संज्ञा से वह पुकारा जाने लगा था। कालांतर "ग्रहनिवार' गहरवार बन गया।

बनारस के राजाओं की अनेक समय तक सूर्यवंशी सूर्य-कुलावंतस काशीश्वर पुकारा जाता रहा है। इनकी परंपरा इस प्रकार है - कर्त्तृराज, महिराज, मूर्धराज, उदयराज, गरुड़सेन, समरसेन, आनंदसेन, करनसेन, कुमारसेन, मोहनसेन, राजसेन, काशीराज, श्यामदेव, प्रह्मलाददेव, हम्मीरदेव, आसकरन, अभयकरन, जैतकरन, सोहनपाल और करनपाल। करनपाल के तीन पुत्र थे - वीर, हेमकरण और अरिब्रह्म। करनपाल ने हेमकरन को अपने सामने ही गद्दी पर बैठाया था। इसे करनपाल की मृत्यु पर शेष दो भाईयों ने पदच्युत कर देश निकाला दे दिया था।

अपने भाइयों से त्रस्त होकर हेमकरन ने राजपुरोहित गजाधर से परामर्श लिया। उसने विन्धयवासिनी देवी की पूजा के लिए प्रेरित किया। मिर्जापुर में विन्ध्यवासिनी देवी की पूजा में चार नरबलियाँ दी गई, देवी प्रसन्न हुई और हेमकरन को वरदान दिया परंतु हेमकरन के भाईयों का अत्याचार हेमकरन के लिए अब भी कम नही हुआ। कालांतर में उसने एक और नरबलि देकर देवी को प्रसन्न किया। देवी नें पाँचों नरबलियों के कारण उसे पंचम की संज्ञा दी। इसके बाद वह विन्ध्यवासिनी का परम भक्त बन गया। जनसमाज में वह "पंचम विन्ध्येला' कहलाया। देवी द्वारा दिये गए वरदानों को ओरछा राज्य के इतिहास में विशेष महत्व दिया गया है।

एक अन्य कथा के अनुसार हेमकरन ने देवी के समक्ष अपनी गर्दन पर जब तलवार रखी और स्वयं की बलि देनी चाही तो देवी ने उसे रोक दिया परंतु तलवार की धार से हेमकरन के रक्त की पांच बूंदें गिर गई थीं इन्हीं के कारण हेमकरन का नाम पंचम बुंदेला पड़ा था। ओरथा दरबार के पत्र में अभी भी पूर्ववर्ती विरुद्ध के प्रमाण मिलते हैं जैसे - श्री सूर्यकुलावतन्स काशीश्वरपंचम ग्रहनिवार विन्ध्यलखण्डमण्लाहीश्वर श्री महाराजाधिराज ओरछा नरेश। चूंकि हेमकरन को विन्ध्यवासिनी देवी का वरदान रविवार को मिला था, ओरछा में आज भी पवरात्र महोत्सव में इस दिन नगाड़े बनाये जाते हैं। मिर्जापुर स्थित गौरा भी हेमकरन के बाद गहरवारपुरा के नाम से प्रसिद्ध है। इसके बाद का चक्र बड़ी तेजी से घूमा और वीरभद्र ने गदौरिया राजपूतों मे अँटेर छीन लिया और महोनी को अपनी राजधानी बनाया। गढ़कुण्डार इसके बाद बुंदेलों की राजधानी बनी। वीरभद्र के पाँच विवाह और पाँच पुत्र प्रसिद्ध हैं - इनमें रणधीर द्वितीय रानी से, कर्णपाल तृतीय रानी से, हीराशी, हंसराज और कल्याणसिंह पँचम रानी से थे। वीरभद्र के बाद कर्णपाल (१०८७ ई० से १११२ ई०) गद्दी पर बैठा। उसकी चार पत्नियाँ थीं। प्रथम के कन्नारशाह, उदयशाह और जामशाह पैदा हुए। द्वितीय पत्नी से शौनक देव तथा नन्नुकदेव तथा चतुर्थ पत्नी से वीरसिंहदेव का जन्म हुआ।

कन्नारशाह (१११२ ई० - ११३० ई०), शौनकदेव (११३० ई०-११५२ ई०), नन्नुकदेव (११५२ई०-११६९ ई०) ओरछा की गद्दी पर क्रम से बैठे। इसके बाद वीरसिंह के पुत्र मोहनपति (११६९ ई०-११९७ ई०), अभयभूपति (११६९ ई०-१२१५ ई०) गद्दी पर आये। अर्जुनपाल अभयभूपति का पुत्र था। ये १२१५ ई० से १२३१ ई० तक गद्दी पर रहा। उसने तीन विवाह किए। दूसरी रानी से सोहनपाल का जन्म हुआ। यह ओरछा बसाने में विशेष सहायक माना जाता है।

ओरछा के बुंदेला :

रुद्रप्रताप के साथ ही ओरछा के शासकों का युगारंभ होता है। वह सिकन्दर और इब्राहिम लोधी दोनों से लड़ा था। ओरछा की स्थापना मन १५३० में हुई थी। रुद्रप्रताप बड़ नीतिज्ञ था, ग्वालियर के तोमर नरेशों से उसने मैत्री संधी की। उसके मृत्यु के बाद भारतीचन्द्र (१५३१ ई०-१५५४ई०) गद्दी पर बैठा। हुमायूँ को जब शेरशाह ने पदच्युत करके सिंहासन कथियाया था तब उसने बुंदेलखंड के जतारा स्थान पर दुर्ग बनवा कर हिन्दु राजाओं को दमित करने के निमित्त अपने पुत्र सलीमशाह को रखा। कलिं का किला कीर्तिसिंह चन्देल के अधिकार में था। शेरशाह ने इस पर किया तो भारतीचन्द ने कीर्तिसिंह की सहायता ली। शेरशाह युद्ध में मारा गया और उसके पुत्र सलीमशाह को दिल्ली जाना पड़ा।

भारतीचन्द के उपरांत मधुकरशाह (१५५४ ई०-१५९२ ई०) गद्दी पर बैठा। इसके बाद समय में स्वतंत्र ओरछा राज्य की स्थापना हुई। अकबर के बुलाने पर जब वे दरबार में नही पहुँचा तो सादिख खाँ को ओरछा पर चढ़ाई करने भेजा गया। युद्ध में मधुकरशाह हार गए। मधुकरशाह के आठ पुत्र थे, उनमें सबसे ज्येष्ठ रामशाह के द्वारा बादशाह से क्षमा याचना करने पर उन्हें ओरछा का शासक बनाया गया। राज्य का प्रबन्ध उनके छोटे भाई इन्द्रजीक किया करते थे। केशवदास नामक प्रसिद्ध कवि इन्हीं के दरबार में थे।

इन्द्रजीत का भाई वीरसिंह देव (जिसे मुसलमान लेखकों ने नाहरसिंह लिखा है) सदैव मुसलमानों का विरोध किया करता था) उसे कई बार दबाने की चेष्टा की गई पर असफर ही रही। अबुलफज़ल को मारने में वीरसिंहदेव ने सलीम का पूरा सहयोग किया था, इसलिए वह सलीम के शासक बनते ही बुंदेलखंड का महत्वपूर्ण शासक बना। जहाँगीर ने इसकी चर्चा अपनी डायरी में की है।

वीरसिंह देव (१६०५ ई० - १६२७ ई०) के शासनकाल में ओरछा में जहाँगीर महल तथा अन्य महत्वपूर्ण मंदिर बने थे। जुझारसिंह ज्येष्ठ पुत्र थे, उन्हें गद्दी दी गई और षेष ११ भाइयों को जागीरें दी गई। सन् १६३३ ई० में जुझारसिंह ने गोड़ राजा प्रेमशाह पर आक्रमण करके चौरागढ़ जीता परंतु शाहजहाँ नें प्रत्याक्रमण किया और ओरछा खो बैठे। उन्हें दक्षिण की ओर भागना पड़ा। उनके कुमारों को मुसलमान बनाया गया तथा वे कहीं पर दक्षिण में ही मारे गये। वीरसिंह के बाद ओरछा के शासकों में देवीसिंह और पहाड़सिहं का नाम लिया जाता है परंतु ये अधिक समय तक राज न कर सके।

वीरसिंह के उपरांत चम्पतराय प्रताप का इतिहास प्रसिद्ध है। औरंगज़ेब की सहायता करने (दारा के विरुद्ध) पर उन्हें ओरछा से जमुना तक का प्रदेश जागीर में दिया गया था। दिल्ली दरबार के उमराव होते हुए भी चम्पतराय ने बुंदेलखंड को स्वाधीन करने का प्रयत्न किया और वे औरंगज़ेब से ही भीड़ गए। सन १६६४ मे चम्पतराय ने आत्महत्या कर ली। ओरछा दरबार का प्रभाव यहाँ से शून्य हो जाता है।

पन्ना दरबार इसी के बाद छत्रसाल के नेतृत्व में उन्नति करता है। ओरछा गज़ेटियर के अनुसार मुगल शासकों नें चम्पतराय के परिवार को गद्दी न दी और जुझारसिंह के भाई पहाड़सिंह को शासक नियुक्त किया। ओरछा के परवर्ती शासकों ने सुजानसिंह (१६५३ ई०-१६७२ ई०), इन्द्रमीण (१६७२ ई०-१६७५ ई०), यशवंत सिंह (१६७५ ई०-१६८४ ई०), भगवंत सिंह (१६८४ ई० - १६८९ ई०), उद्दोतसिंह, दत्तक पुत्र (१६८९ ई०-१७३६ ई०), पृथ्वी सिंह (१७३६ ई०-१७५२ ई०), सावंत सिंह (१७५२ ई०-१७६५ ई०) तथा हतेसिंह विक्रमाजीत, धरमपाल, तेजसिंह, हमीरीसिंह, प्रतापसिंह के नाम प्रमुख हैं।

छत्रसाल ने बुंदेलखंड की स्वतंत्र सत्ता स्थापित करने में अथक परिश्रम किया। औरंगज़ेब ने इन्हें भी दबाने की कोशिश की पर सफल न हुए। छत्रसाल ने कलिं को भी अपने अधिकार में किया। सन् १७०७ ई० सें औरंगज़ेब के मरने के बाद बहादुरगढ़ गद्दी पर बैठा। छत्रसाल से इसकी खूब बनी। इस समय मराठों का भी ज़ोर बढ़ गया था।

छत्रसाल स्वयं कवि थे। छत्तरपुर इन्हीं ने बसाया था। कलाप्रेमी और भक्त के रुप में भी इनकी ख्याती थी। धुवेला-महल इनकी भवन निर्माण-कला की स्मृति दिलाता है। बुंदेलखंड की शीर्ष उन्नति इन्हीं के काल में हुई। छत्रसाल की मृत्यु के बाद बुंदेलखंड राज्य भागों में बँट गया। एक भाग हिरदेशाह, दूसरा जगतराय और तीसरा पेशवा को मिला। छत्रसाल की मृत्यु १३ मई सन् १७३१ में हुई थी।


(क)    प्रथम हिस्से में हिरदेशाह को पन्ना, मऊ, गढ़ाकोटा, कलिंजर, शाहगढ़ और उसके आसपास के इलाके मिले।

(ख)    द्वितीय हिस्से में जगतराय को जैतपुर, अजयगढ़, जरखारी, बिजावर, सरोला, भूरागढ़ और बाँदा मिला।

(ग)     बाजीराव को तीसरे हिस्से में कलपी, हटा, हृदयनगर, जालौन, गुरसाय, झाँसी, गुना, गढ़कोटा और सागर इत्यादि मिला।

अठारवीं शताब्दी में हिन्दुपत के वंशज सोनेशाह ने छत्तरपुर की स्थापना की। कृष्णकवि (पन्ना दरबार के राजकवि) ने इसे छत्रसाल द्वारा बसाया माना है। जबकि छत्तरपुर गजेटियर में इसे सोनोशाह का नाम ही दिया है। सोनेशाह के बाद छत्तरपुर राज्य में प्रतापसिंह, जगतराज और विश्वनाथसिंह आदि राजाओं ने शासन किया। सोनेशाह के समय में छत्तरपुर में अनेक महलों, तालाबों, मन्दिरों का निर्माण करवाया।

मराठों का शासन :

छत्रसाल के समय से ही मराठों का शासन बुंदेलखंड पर प्रारंभ हो गया था। उस समय ओरछा का शासक भी मराठों को चौथ देता था। दिल्ली के मुसलमान शासकों द्वारा अराजकता फैलाने के कारण उत्तर भारत में धीमे-धीमे अंग्रेजी शासन फैलता जा रहा था। सन् १७५९ में अहमदशाह अब्दाली के विरुद्ध युद्ध में गोविन्दराव पतं मारे गए।

बुंदेलखंड में अंग्रेजों का आगमन हानिकारक सिद्ध हुआ। कर्नल वेलेजली ने सन् १७७८ में कलपी पर आक्रमण किया और मराठों को हराया। कालांतर में नाना फड़नवीस की सलाह मे माधव नारायण को पेशवा बनाया गया तथा मराठों और अंग्रेजों में संधि हो गई।

हिम्मत बहादुर की सहायता से अंग्रेजों नें बुंदेलखंड पर कब्जा किया। सन् १८१८ ई० तक बुंदेलखंड के अधिकांश भाग अंग्रेजों के अधीन हो गए।

बुंदेलखंड मे राजविद्रोह :

सन् १८४७ का वर्ष अंग्रेजों के लिए इसीलिए उत्तम सिद्ध हुआ था क्योंकि महाराज रणजीत सिंह का पुत्र उनके बाद पंजाब का राजा बनाया गया। लार्ड डलहौज़ी इस समय गवर्नर जनरल थे और उन्होंन दिलीपसिंह को अयोग्य शासक बताकर पंजाब पर कब्जा जमा लिया। शिवाजी के वंशज प्रतापसिंह को पुर्तगालियों से मिले रहने का आरोप लगा कर सतारा में कैद किया और दक्षिण का बाग अपने अधीन किया। झाँसी में गंगाधरराव की मृत्यु के बाद दामोदर राव को गोद लिया गया। लक्ष्मी बाई को हटाने के प्रयत्न भी जारी हो गए परंतु इसी समय १८५७ के विद्रोह की घटना घटी। बरहमपुर, मेरठ, दिल्ली, मुर्शीदाबाद, लखनऊ, इलाहाबाद, काशी, कानपुर, झाँसी में विद्रोह हुआ और कई स्थान पर उपद्रव हुए। झाँसी पर विद्रोहियों ने किले पर अपना अधिकार जमाया और रानी लक्ष्मीबाई ने किसी प्रकार युद्ध करके अपना अधिकार जमाया और रानी लक्ष्मीबाई कहलाई।

सागर की ४२ न० पलटन ने अंग्रेजी हुकूमत मानना अस्वीकार कर दिया। बानपुर के महाराज मर्दनसिंह ने अंग्रेजी अधिकार के परगनों पर कब्जा करना प्रारंभ कर दिया। खुरई का अहमदबख्श तहसीलदार भी मर्दनसिंह मे मिल गया। ललितपुर, चंदेरी पर दोनों ने कब्जा किया। शाहगढ़ में बख्तवली ने अपनी स्वतंत्र सत्ता घोषित की। सागर की ३१ नं० पलटन चूंकि बागी न थी इसीलिए उसकी सहायता से मर्दनसिंह की मालथौन में डटी हुई सेना को हटाया गया, फिर ४२ नं० पलटन से युद्ध हुआ।

बख्तवली नें ३१ नं० पलटन ने शेखरमजान से मेल कर लिया विद्रोह की लहर, सागर, दमोह, जबलपुर आदि स्थानों में फैल गई। इस समय तक पन्ना के राजा की स्थिती मजबूत थी, अंग्रेजों ने उनसे सहायता माँगी। राजा ने तुरन्त सेना पहुँचाई और जबलपुर की ५२ नं० की पलटन को बुरी तरह दबा दिया गया। शनै: शनै: बख्तवली और मर्दनसिंह को नरहट की घाटी में सर हारोज ने पराजित किया। अंग्रेजी सेना झाँसी की ओर बढ़ती गई। झाँसी, कालपी में अंग्रेजों को डटकर मुकाबला करना पड़ा। रानी लक्ष्मी बाई दामोदर राव (पुत्र) को अपनी पीठ पर बाँधकर मर्दाने वेश में कालपी की ओर भाग गयी। इसके बाद झाँसी पर भी अंग्रेजों का अधिकार हो गया।

कालपी में एक बार फिर बख्तवली और मर्दनसिंह ने रानी के साथ मिलकर सर ह्यूरोज से युद्ध किया। यहाँ भी उसे पराजय हाथ लगी। वह ग्वालियर पहुँची और सिंधिया को हराकर वहाँ भी शासक बन बैठी पर सर ह्यूरोज ने ग्वालियर पर अचानक हमला किया। राव साहब पेशवा, तात्या टोपे का पराभव, रानी की मृत्यु आदि ने पूर्णत: विद्रोह की अग्नि को ठंडा कर दिया। बुंदेलखंड के सारे प्रदेश इस प्रकार अंग्रेजी राज्य में समा गए।

बुंदेलखंड का राजविद्रोह वास्तव में जनता का विद्रोह न होकर सामन्तों और सेना का विद्रोह था इसी पृष्ठभूमि में सांस्कृतिक और धार्मिक भावना के साथ साथ स्वामिभक्ति का पुट विशेष है। देश की सीमा वस्तुत: सामन्तो की जागीरों अथवा राज्यों की सीमायें थीं। सामन्तों का धर्म जनता का धर्म था अत: विद्रोहियों द्वारा देश पर कब्जा और धर्म का नाश असह्य था जिसे गोली में लगी चर्बी के बहाने हिन्दु और मुसलमानों दोनो ने व्यक्ति किया।

कल्याण सिंह कुड़रा ने झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई की वीर गाथा करते हुए लिखा है - चलत तमंचा तेग किर्च कराल जहां गुरज गुमानी गिरै गाज के समान।

तहाँ एकै बिन मध्यै एकै ताके सामरथ्यै, एकै डोलै बिन हथ्थै रन माचौ घमासान।।

जहाँ एकै एक मारैं एकै भुव में चिकारै, एकै सुर पुर सिधारैं सूर छोड़ छोड़ प्रान।

तहाँ बाई ने सवाई अंगरेज सो भंजाई, तहाँ रानी मरदानी झुकझारी किरवान।।

कवि ने रानी की वीरता का परिचय देते हुए कहा है कि रानी किस प्रकार वीरतापूर्वक शत्रु का सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त होती है।

अंग्रेजी राज्य में विलयन :

बुंदेलखडं की सीमायें छत्रसाल के समय तक अत्यंत व्यापक थीं, इस प्रदेश में उत्तर प्रदेश के झाँसी, हमीरपुर, जालौन, बाँदा, मध्यप्रदेश के सागर, जबलपुर, नरसिंहपुर, होशंगाबाद, मण्डला तथा मालवा संघ के शिवपुरी, कटेरा, पिछोर, कोलारस, भिण्ड, लहार और मोण्डेर के जिले और परगने शामिल थे। इस पूर भूभाग का क्षेत्रफल लगभग ३००० वर्गमील था। अंग्रेजी राज्य में आने से पूर्व बुंदेलखंड में अनेक जागीरें और छोटे छोटे राज्य थे। बुंदेलखंड कमिश्नरी का निर्माण सन् १८२० में हुआ। सन् १८३५ में जालौन, हमीरपुर, बाँदा के जिलों को उत्तर प्रदेश और सागर के जिले को मध्यप्रदेश में मिला दिया गया, जिसकी देख रेख आगरा से होती थी। सन् १८३९ में सागर और दामोह जिले को मिलाकर एक कमिश्नरी बना दी गई जिसकी देखरेख झाँसी से होती थी। कुछ दिनों बाद कमिश्नरी का कार्यालय झाँसी से नौगाँव आ गया। सन् १८४२ में सागर, दामोह जिलों में अंग्रेजों के खिलाफ बहुत बड़ आन्दोलन हुआ परंतु फूट डालने की नीति के द्वारा शान्ति स्थापित की गई। इसके बाद बुंदेलखंड का इतिहास अंग्रेजी साम्राज्य की नीतियों की ही अभिव्यक्ति करता है। अनेक शहीदों ने समय समय पर स्वतंत्रता के आन्दोलन छेड़े परंतु गाँदी जी जैसे नेता के आने से पहले कुछ ठोस उपलब्धि संभव न हुई।

बुंदेलखंड का इतिहास आदि से अंत तक विविधताओं से भरा है परंतु सांस्कृतिक और धार्मिक एकता की यहाँ एक स्वस्थ परंपरा है।
 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेलखंड के रासीकाव्य (Bundelkhand Ke Rasikavya)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुंदेलखंड के रासीकाव्य (Bundelkhand Ke Rasikavya)

मध्यप्रदेश के पन्ना, छत्तरपुर, टीकमगढ़, दतिया, सागर, दमोह, नरसिंहपुर जिले तथा जबलुपर जिले की जबलपुर एवं पाटन तहसीलों का दक्षिणी और दक्षिण-पश्चिमी बाग ; होशंगाबाद जिले की होशंगाबाद और सोहागपुर तहसीलें, रायसेन जिले की उदयपुर, सिलवानी, गैरतगंज, बेगमगंज, बरेली तहसीलें एवं रायसेन, गौहरगंज तरसीलों का पूर्वी भाग ; गुना जिले की कुरवई तससील और विदिशा, बासौदा, सिरोंज तहसीलों के पूर्वी-भाग ; गुना जिले की अशोकनगर (पिछोर) और मुंगावली तहसीलें और ग्वालियर गिर्द का उत्तर-पूर्वी भाग ; किंभड जिले का लहर तहसील का दक्षिणी भाग ।

उपर्युक्त भूभाग के अतिरिक्त उसके चारों ओर की पेटी मिश्रित भाषा और संस्कृति की है। भाषाविज्ञान की दृष्टि से भी ये सीमायें न्यायसंगत हैं। डॉ० वीरेन्द्र वर्मा ने "हिन्दी भाषा का इतिहास' नामक ग्रंथ में लिखा है - ""बुन्देली बुंदेलखंड की उपभाषा है। शुद्ध रुप में यह झांसी, जालौन, हमीरपुर, ग्वालियर, ओरछा, सागर, नरसिंहपुर, सिवनी तथा होशंगाबाद में बोली जाती है। इसके कई मिश्रित रुप दतिया, पन्ना, चरखारी, दमोह, बालाघाट तथा छिंदवाड़ा के कुछ भागों में पाये जाते हैं ।''

श्री प्रतिपाल सिंह जूदेव ने अपने एक लेख ""बुंदेलखंड की सीमायें'' के अन्तर्गत निम्नलिखित छन्द में बुंदेलखंड की सीमाओं का उल्लेख किया है -

उत्तर समथल भूमि, गंग जमुना सु------ है प्राची दैस कैमूर, सोन कोसी सुलसति हैं। दक्खिन रेवा, विंध्याचल तनशीतल करनी है। पश्चिम में चम्बल, चंचल सोहति मन हरनी, तिनमीहा राजे गिरि, वन सरिता सहित मनोहर । कीर्तिस्थल बुंदेलन को बुंदेलखंड वर ।

इसी प्रकार एक अन्य कवि ने अपनी कविता में बुंदेलखंड का परिचय दिया है-

""खुजराहो, देवगढ़ का दुनिया भर में बखान ।

पत्थर की मूर्तियों को मानो निल गए प्रान।।

चन्देरी, ग्वालियर की ऐतिहासिक कीर्ति-छटा।

तीर्थ अमरकंटक, चित्रकूट, बालाजी महान।।

सोनागिरि, पावा गिरि, पपौरा के धर्म-स्थल।

अपने धर्म-संस्कृति पर हमको भारी घमंड।।

जय जय भारत अखंड जय बुंदेलखंड ।।''

विंध्य पर्वत श्रेणियों के चतुर्दिक विभिन्न सरिताओं के आवेष्टित बुंदेलखंड की प्रकृति भी अत्यन्त स्मरणीय है। भारतवर्ष के ठीक मध्य में यह क्षेत्र चार प्रमुख नदियों के आयात में आबाद है। ये चारों सरिताएं यमुना, नर्मदा, चंबल और बेतवा   भी मानी जाती हैं पर अक्षांशों में २३ ० , ४५ ० , और ५० ० उत्तरीय तथा ७७ ० , ५२ ० , और ८२ ० पूर्वी भू रेखाओं के मध्य यमुना, टोंस, नर्मदा और कालीसिंधु को भी परि----- किया जाता है। कर्क रेखा बुंदेलखंड के दक्षिण में पड़ती है अत: वह सभी तोष्ण कटिबन्ध के गर्भ में पड़ता है। बुंदेलखंड का प्रमुख पर्वत विंध्याचल पुराणों में भी अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध है। समस्त प्रदेश में पर्वत श्रेणियाँ दृश्यमान है। ये प्रकार की मानी जाती हैं -

१.      दक्षिण में विंध्याचल श्रेणी पश्चिम से पूर्व तक फैली है। इसकी चौड़ाई १२ मील और समुद्र सतह से ऊँचाई दो हजार फीट या इससे अधिक है ।

२.      पन्ना श्रेणी

३.      माडर का पहाड़

४.      कैमूर श्रेणी - इसकी चौड़ाई १० से ३० मील तक तथा समुद्र सतह से ऊँचाई एक हज़ार फीट से तीन हज़ार फीट तक है। बुंदेलखंड की पर्वतीय सीमाओं में उत्तर में विंध्याचल और दक्षिण में सतपुड़ा पर्वत को भी माना जाता है।

बुंदेलखंड के एक नाग "दशार्ण' के आधार पर स्पष्ट है कि "ॠण शब्द दुर्ग भूमि जले च इति यादव' के समान्तर दशार्णों देश: नदी च दशार्णो की उक्ति कें कात्यायान वस्तुत: पश्चिम के दशार्ण की चर्चा कर रहा था । कालिदास ने मेघदूत में दशार्ण संबन्धी दो श्लोक लिखे हैं जो बुंदेलखडं की प्रकृति का परिचय देते हैं -

पाण्डुच्छायोपवन वृत्तय: केतकै सूचि भिन्नै -

नीडारम्र्गुह बलि भुजा माकुल ग्राम चैत्या

त्वय्था सन्नै परिणत कल श्याम जम्बू वनान्ता

संपत्स्यन्ते कतिपय दिन स्थायि हंसा दशार्णा

तेषां दिक्षु प्रथित विदिशा लक्षणां राजधानी,

गत्वा सद्य: फलम विकलं

कामुकत्वस्य लब्धा

तीरोपान्तस्तनित सुभगं पास्यसि स्वदयास्मात्

सुभभंग मुखमिवे पयोवेत्रक्त्याशच लोमि ।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुंदेलखंड का सीमांकन (Bundelkhand Ka Seemankan)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय

बुंदेलखंड का सीमांकन (Bundelkhand Ka Seemankan)

सीमांकन का अर्थ यहा पर किसी ऐसी कृत्रिम रेखा से नहीं है, जो किसी राजनीतिक और विधिरहित दृष्टिकोण से नियमित की गयी हो, वरन ऐसे प्राकृतिक सीमांत से है, जो उस क्षेत्र के ऐतिहासिक परिवेश, संस्कृति और भाषा के अद्भुत ----- को सुरक्षित रखते हुऐ उसे दूसरे जनपदों से अलग करता हो। राजनीतिक भूगोल के विद्वानों ने सीमांत और सीमा के अंतर को भलीभाँति स्पष्ट किया है।

किसी भी जनपद के सीमांकन के लिए तीन आधार प्रमुख होते हैं -

भू-आकारिक, प्रजातीय और कृत्रिम ।

भू-आकारिक आधार पर सीमा का निर्धारण पर्वत, नदी, झील आदि से होता है, क्योंकि वो अधिक स्थायी अवरोधक हैं। उदाहरण के लिए बुंदेलखंड के दक्षिण मे महादेव, मैकेल ऐसे पर्वत हैं जिनको पार करना प्राचीन काल में अत्यन्त कठिन था और उत्तर-पश्चिम में भी चंबल के खारों और बीहड़ों की एक प्राकृतिक रुकावट विद्यमान थी । प्रजातीय आधार में जाति भाषा, संस्कृति और धर्म अर्थात पूरा सांस्कृतिक वातावरण समाहित है। कभी-कभी जनपद की सांस्कृतिक इकाई भू-आकारिक सीमा को पार कर जाती है, किंतु उसके कुछ ठोस कारण होते हैं। कृत्रिम आधार से मेरा तात्पर्य उन सीमाओं से है, जिन्हें व्यक्ति राजनीतिक सुविधा के लीए स्वयं खींचता है अथवा जो दो भू-भागों के बीच समझौते या संधि से अंकित की जाती है। बुंदेलखंड के सीमांकन मे इस आधार का महत्व नही है।

बुंदेलखंड के सीमांकन के अनेक प्रयत्न मिलते हैं, जिनके विवरण और विश्लेषण से भी एक स्पष्ट स्वरुप बिंबित होना स्वाभाविक है. भू-आकारिक सीमांकन नये नही हैं, किन्तु भौतिक आधार पर निर्धारण नवीन होना संभव है। प्रसिद्ध भूगोलवेत्ता एस० एम० अली ने पुराणों के आधार पर विंध्यक्षेत्र के तीन जनपदों -विदिशा, दशार्ण एवं करुष का सोन-केन से समीकरण किया है। इसी प्रकार त्रिपुरी लगभग ऊपरी नर्मदा की घाटी तथा जबलपुर, मंडला तथा नरसिंहपुर जिलों के कुछ भागों का प्रदेश माना है। वस्तुत: यह बुंदेलखंड की सीमा-रेखाएँ खींचने का प्रयत्न नहीं है किंतु इससे यह पता चलता है कि उस समय बुंदेलखंड किन जनपदों में बंटा था ।

इतिहासकार जयचंद्र विद्यालंकार ने ऐतिहासिक और भौगोलिक दृष्टियों को संतुलित करते हुए बुंदेलखंड को कुछ रेखाओं में समेटने का प्रयत्न किया है -

""(विंध्यमेखला का), तीसरा प्रखंड बुंदेलखंड है जिसमें बेतवा (वेत्रवती), धसान (दशार्ण) और केन (शुक्तिगती) के काँठे, नर्मदा की ऊपरली घाटी और पंचमढ़ी से अमरकंटक तक ॠक्ष पर्वत का हिस्सा सम्मिलित है। ॠक्ष पर्वत का हिस्सा सम्मिलित है। उसकी पूरबी सीमा टोंस (तमसा) नदी है।''

वर्तमान भौतिक शोधों के आधार पर बुंदेलखंड को एक भौतिक क्षेत्र घोषित किया गया है और उसकी सीमायें इस प्रकार आधारित की गई हैं - ""वह क्षेत्र जो उत्तर में यमुना, दक्षिण   में विंध्य पलेटो की श्रेणियों, उत्तर-पश्चिम में चम्बल और दक्षिण-पूर्व में पन्ना-अजयगढ़ श्रेणियों से घिरा हुआ है, बुंदेलखंड के नाम से जाना जाता है। उसमें उत्तर प्रदेश के चार जिले - जालौन, झांसी, हमीरपुर और बाँदा तथा मध्य-प्रदेश के चार जिले - जिले दतिया, टीकमगढ़, छत्तरपुर और पन्ना के अलावा उत्तर-पश्चिम में किंभड जिले की लहर और ग्वालियर जिले की मांडेर तहसीलें भी सम्मिलित है।'' ये सीमारेखाएं भू-संरचना की दृष्टि से उचित कही जा सकती हैं, किन्तु इतिहास संस्कृति और भाषा की दृष्टि से बुंदेलखंड बहुत विस्तृत प्रदेश है।

बुंदेलखंड की भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषिक इकाइयों मे अद्भुत समानता है। भूगोलवेत्ताओं का मत है कि बुंदेलखंड की सीम स्पष्ट हैं और भौतिक तथा सांस्कृतिक रुप में निश्चित हैष वह भारत का एक ऐसा भौगोलिक क्षेत्र है, जिसमें न केवल संरचनात्मक एकता, भौम्याकार और सामाजिकता का आधार भी एक ही है। वास्तव में समस्त बुंदेलखंड में सच्ची सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक एकता है।

बुंदेलखंड में निम्नलिखित जिले और उनके भाग आते हैं और उनसे इस प्रदेश की एक भौगोलिक, भाषिक एवं सांस्कृतिक इकाई बनती है।


१.  उत्तर प्रदेश के जालौन, झाँसी, ललितपुर, हमीरपुर जिले और बांदा जिले की नरैनी एवं करबी तहसीलों का दक्षिण-पश्चिमी भाग ।

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