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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - रासो काव्यों की साहित्यिक अभिव्यक्ति (Literary expression of raso poetry)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

रासो काव्यों की साहित्यिक अभिव्यक्ति (Literary expression of raso poetry)

प्रकृति चित्रण(Nature Illustration) :

दरबारी मनोवृत्ति वाले आश्रित कवि अद्भूत उक्तियों से अपने आश्रय-दाताओं को रिझाने का प्रयतन मात्र करते रहे हैं। फिर उनके आख्यानक काव्यों में दृश्य वर्णन अत्यल्प स्थान पर सका है। जहाँ कुछ मिलता भी है वह अलंकारों की छटा में ओझल सा प्रतीत होता है।

ऐसा लगता है कि प्रकृति चित्रण इस परम्परा में कुछ उपेक्षित सा रहा है जो कि एक परम्परा के अनुशरण में सीमित सा है। वीर काव्य में भी यही बँधी बँधाई प्रकृति चित्रण परमपरा देखने को मिलती है।

अद्भूत कल्पवना जाल से संवारे गए इन रीति युगीन रासो काव्यों में अधिकांश ऐश्वर्य-विलास, नायक की शोर्य प्रशंसा, वीरता, युद्ध पराक्रम, युद्ध की सामग्री तथा वीरों की सज-धज एवं तत्सम्बन्धी सामग्री का बड़े विस्तार के साथ वर्णन किया गया है। नाम पगिणनात्मक शैली का अनुकरण करने के कारण सामग्रियों की सूचियाँ इतनी लम्बी हो गई हैं जिससे प्रकृति वर्णन में अस्वाभाविकता सी आ गयी है।

इन कवियों ने प्रकृति वर्णन के उद्दीपन रुप को ही लिया है जो संस्कृत की आप्त शैली से प्रभावित है। कुछ कवियों के ऐ भी प्रकृति चित्रण देखने को मिलते हैं जिनसे उनकी मौलिकता एवं स्वाभाविकता उनके प्रकृति प्रेम की ओर ईषत संकेत करती है। राजनैतिक परिस्थितियों की गम्भीरता के कारण वे प्रकृति निरीक्षण का अधिक अवसर नहीं पासके।

विवेच्य रासो काव्यों में न्यूनाधिक रुप में उपलब्ध प्रकृति चित्रण निम्नानुसार प्रस्तुत किया जा रहा है।

दलपति राव रायसो में प्रकृति चित्रण का अभाव सा ही है। एक दो स्थलों पर कवि ने युद्ध वण्रन के अन्तर्गत प्रकृति का उद्दीपन रुप् में वर्णन किया है।

एक छन्द में युद्ध का एक वर्षां रुपक प्रस्तुत किया गया है। उदाहरण निम्नानुसार है-""सुतुर नाल घुर नाल छूट्ैं।

बान क्रवांन बंदूषन फूट्ैं।।
आंच सधुंध अंधेरी छाई।
चहूँ ओर अनु घटा सुहाई।।
जहाँ निसान करनाल सुबाजै।
भई सोभ मानौ घन गाजै।
बरस तीर त्यों बुंद अमंकै।
बिज्जु कोप त्यों घोप चमंकै।।''

प्रकृति वर्णन की दृष्टि से गुंलाब कवि का विशेष महत्व नहीं है। "करहिया कौ राइसौ' में प्रकृति के वर्णनों का प्रायः अभाव ही है।

शत्रुजीत रासों में भी अन्य रासो ग्रन्थों की भाँति प्रकृति का उद्दीपन चित्रणों में रमा है। प्रकृति के वर्णनों को रोचकता और पूर्णता देने का कवि ने प्रयास किया है। प्रकृति के उत्प्रेक्षापूर्ण वर्णनों की तो इस रायसे में भरमार है। षड ॠतुओं के वर्णन मेंकवि ने वसन्त, ग्रीष्म, वर्षा, शरद तथा शिशिर ॠतुओं के युद्ध रुपक प्रस्तुत किए हैं। ॠतु वर्णन निम्न प्रकार प्रस्तुत किया जा रहा है-

निम्नलिखित छन्द में बसन्त ॠतु का वर्णन किया गया है-

""जहाँ लाल भए अंग स्याह तोपन,
तिलंग मनौ फूले पलास दल उन्मत उदयान।
जहाँ टूटै तरवार गिरै छूटककै कटार,
वीर वगरौ बहार पतछारन के समान।
जहाँ कंत दतिया कौ वरबैरिन कौ अंत करौ,
वरह वसन्त मंजुघोषा मुखगान। आदि''

ग्रीष्म ॠतु वर्णन(Summer's description) :

सेनायें दावानल के समान दौड़ती हैं, गुमानियों के शरीर वृक्ष के पत्ते के समान सूख गए, अस्रों से निकली लपटें प्राण लपेट लेती हैं आदि निम्नलिखित छन्द में प्रस्तुत किया गया है-

""जहाँ वाग दैय वंग जुरौ जंग कौ उमंग दोर,
दावौ दल दंग दावानल के समान।
जहाँ सूखे तरु पात लौं गुमानि# के गात,
लगै सारन की लपटें लपेट लेत प्रान।।
जहाँ तेज कौ मजेज कौ अंगेज करै कौन,
भयौ भान वंस मोष मतां ग्रीषम कौ भांन।'
'

वर्षा ॠतु (Rain) :

सेनायें बादलों की घटा, तलवारों की चमक बिजली, चातक के सदृश वन्दीजन का गान आदि।
उदाहरणार्थ

""जहाँ घन लौ घुमंड दल उमड़ अनीपै जुरै,
तड़ता तड प कड़ौ कईक कृपान।
जहाँ औजै सांग नेजे, वेझे वेझलौं करेजे,
रहे मानों पौन घेरे छूट घुरवा घुरान।।
जहॉा त्याग, तन हंस श्रौन वरषा लगी है,
जगी चातक लौं वंदीजन करत वखान ।।
आदि''

शरद ॠतु (Autumn) :

कई हजार तलवारों की श्वेत चमक मानों कांस फूल गया है, पथिक का मार्ग चलना मानों वीरों का प्राण पयान करना है, #न्द्रििका के समान कीर्ति प्रकाशित होना, कमल के समान मुख पर निर्मल ओज रुपी जल आदि का वर्णन निम्नलिखित छनद में देखा जा सकता हे-

""जहाँ कइय हजार तलवार कड़ी दोऊ,
वो फूलौ नु कांस धरा दव्वन निदांन।
जहाँ फूट जात सीस सोष कट जात गात,
करै पथिक लौं प्रान आसमान कौं पयान।।
करै पथिक लौं प्रान आसमान कौं पयान।।
जहाँ चार चन्कासी खासी कीरत प्रकासी,
लसे पानिय विमल मुष कमल प्रमाना।'' आदि

शिशिर ॠतु (Shishir) :

""जहाँ लाग मुख घाउ फिरै चाहुड़ सौ चमूमें,
लत रुधिर अत्र हूमें घूमैं चावें जनु पांन।
जहाँ एकै वीर वरहू वरंगनां वरनत,
एकै वास करै मारतण्ड मण्डल महान।।
जहाँ ऐकन के भाग भए पीपर के पात,
सोष सीत के सताऐ मुख कमल निदांन।।'' आ
दि

आगे कवि ने हेमन्त ॠतु के स्थान पर हो#ी का एक युद्ध रुपक प्रस्तुत किया है, जिसमें प्रकृति चित्रण नहीं पाया जाता है।
पारीछत रायसा में प्रकृति का उद्दीपन रुप में चित्रण किया गया है। निम्नलिखित छन्द में वर्षां का एक युद्ध रुपक देखने योग्य है-

""बड़ सोर रहौ दसहू दिसान।
घहरात घोर बज्जे निसान।।
जनु प्रलय काल के मेघमाल।
कै इन्द्र वर्ज बल कौं जु घाल।।
उठ जंत्र विरीऊगै तमंक।
मन मघा नखत बिज्जुल चमंक।।
ध्र परसु बुन्द गोली समान।
वंदीजन चात्रक करत गान।।
वगपंत परीछत सुजत छांहि।
वरषोस रुप रन यों मचाई।।''

वर्षा के प्रतीक चिन्ह चातक, जलबूंद, बिजली की चमक, बादलों का गरजना आदि का प्रयोग वन्दीजन, बाण वर्षा, तलवार नगाड़े, आदि के लिय किया गया है।

एक अन्य छन्द में प्रकृति का वीभत्स वर्णन किया गया है। युद्ध के मैदान में शोणित की नदी बहना, उसमें योद्धाओं के कटे हुए हाथ हथेली सहित नालयुक्त कमल के समान लग रहे हैं तथ केश सिवार घास के समान हैं। उदाहरण निम्न प्रकार है-

""बँध लुथ्थन की जहं पार गई।
भ रश्रोनित वारत जंग भई।।
जहं जंमुष मीन विराजत हैं।
कर कंज सनालन राजनत हैं।।
रहे केस सिवाल सुछाइ जहाँ।
मच आमिष की बहु कींच तहाँ।।
डरि ढाल सुकच्छप रुप मड़े।
वकपंत सुकीरत सौभ मड़ै।''

एक क्रवांन' छन्द में कवि ने उद्दीपन रुप में वर्षा का युद्ध रुपक निम्न प्रकार प्रस्तुत किया है-

""जहां तोपन की घाई घन घाई सी मचाई,
वीर मांचौ धुंधकार धूम धुरवा समान।
जहाँ थाकौ रथभान परै दिस्ट में न आन,
सीसिहू के उनमान स्यार कंपै भयमान।।
जहाँ वन्दीजन चात्रक पढ़ावत उमाह हिए,
वरषत बुंद बान बरषा समान।
तहां माचौ घमसान सुन्नसान भौ दिसान
लरै दीरध दिमान वीर वाहक ग्रवांन।।

उपर्युक्त छन्द में तोपों के चलने, वीरों की दौड़ धूप से उठी धूल, वंदीजन बाण, आदि के लिए क्रमश- मेघ गर्जन, काली तथा धूमरी घटनाओं के धुरवों, चातक तथा बूंद आदि प्रतीको का प्रयोग किया गया है।

एक छन्द में प्रकृति का भयानक रुप में वर्णन भी उपलब्ध होता है१ उदाहरण निम्न प्रकार है-

""कैधौं बड़वागिन की प्रगटी प्रचण्ड ज्वाल,
कैधौं ये दवागिन की उलहत साखा है।
कैधौं जुर होरी ज्वाल छाये हैं पहारन पैं,
लत गढ़ोहिन कौ काल कैसे नाखा हैं।।''

इस प्रकार ""पारीछत रायसा'' में प्रकृति का कई रुपों में चित्रण उपलब्ध होता है।

"बाघाट रायसा'' में प्रकृति का कई रुपों में चित्रण उपलब्ध होता है।

केवल दो स्थानों पर उद्दीपन रुप में प्रकृति का साधारण वर्णन किया गया है।

उदाहरण निम्नानुसार हैं-

""तोप घलै जब होइ अवाज। परहि मनौ भादौं की गाज।।

तथा

"घली समसेरे सिरोहीं, भई तेगन मार। चमक जाती बीजुरी सी कौनु सकैहि निहार।।''

उपर्युक्त उदाहरणों में तोप की आवाज के लिए गाज गिरना तथा तलवारों की चमक के लिये बिजली के प्रतीक चुने गये हैं।

""झाँसी कौ राइसौ'' मैं प्रकृति चित्रण नगण्य है। केवल एकाध स्थान पर एकाध पंक्ति में उद्दीपन रुप में प्रकृति वर्णन देखने को मिलता 
है, जैसे-

""उड़े जितहीतित तुंड वितुंड।
झिरै झिरना भर श्रोनित कुंड।।

तथा 

""घटा सी उठी रैन जब सैन धाई।''

उपर्युक्त उदाहरणों में युद्ध क्षेत्र में रक्त के झरने बहना तथा सोना के चलने से उठी धूल को काली घटा के रुप में चित्रित किया है।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय  हिन्दी साहित्य में रासो काव्य परम्परा (Raso poetry tradition in Hindi literature)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

हिन्दी साहित्य में रासो काव्य परम्परा (Raso poetry tradition in Hindi literature)

रासो या रासक रचनायें

सन्देश रासक - यह अपभ्रंश की रचना है। रचियिता अब्दुल रहमान हैं। यह रचना मूल स्थान या मुल्तान के क्षेत्र से सम्बन्धित है। कुल छन्द संख्या २२३ है। यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है। इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है तभ कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाते लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति कि ॠतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ॠतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ॠतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है। यह रचना सं ११०० वि. के पश्चातद्य की है।

मुंज रास - यह अपभ्रंश की रचना है। इसमें लेखक का नाम कहीं नहीं दिया गया। रचना काल के विषय में कोई निश्चित मत नहीं मिलता। हेमचन्द्र की यह व्याकरण रचना सं. ११९० की है। मुंज का शासन काल १००० -१०५४ वि. माना जाता है। इसलिए यह रचना १०५४-११९० वि. के बीच कभी लिखी गई होगी। इसमें मुंज के जीवन की एक प्रणय कथा का चित्रण है। कर्नाटक के राजा तैलप के यहाँ बन्दी के रुप में मुंज का प्रेम तैलप की विधवा पुत्री मृणालवती से ही जाता है। मुंज उसको लेकर बन्दीगृह से भागने का प्रस्ताव करता है किन्त मृणालवती अपने प्रेमी को वहीं रखकर अपना प्रणय सम्बन्ध निभाना चाहती थी इसलिए उसने तैलप को भेद दे दिया जिसके परिणामस्वरुप क्रोधी तैलप ने मृणालवती के सामने ही उसके प्रेमी मुंज को हाथी से कुचलवाकर मार डाला। कथा सूत्र को देखते हुए रचना छोटी प्रतीत नहीं होती।

पृथ्वीराज रासो - यह कवि चन्द की रचना है। इसमें दिल्लीश्वर पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं का विशद वर्णन है। यह एक विशाल महाकाव्य है। यह तेरहवीं शदी की रचना है। डा. माताप्रसाद गुप्त इसे १४०० वि. के लगभग की रचना मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की एतिहासिकता विवादग्रस्त है।

हम्मीर रासो - इस रचना की कोई मूल प्रति नहीं मिलती है। इसका रचयिता शाङ्र्गधर माना जाता है। प्राकृत पैगलम में इसके कुछ छन्द उदाहरण के रुप में दिए गये है। ग्रन्थ की भाषा हम्मीर के समय के कुछ बाद की लगती है। अतः भाषा के आधार पर इसे हम्मीर के कुछ बाद का माना जा सकता है।

बुत्रद्ध रासो- इसका रचयिता जल्ह है जिसे पृथ्वीराज रासो का पूरक कवि भी माना गया है। कवि ने रचना में समय नहीं दिया है। इसे पृथ्वीराज रासो के बाद की रचना माना जाता है।

परमाल रासो - इस ग्रन्थ की मूल प्रति कहीं नहीं मिलती। इसके रचयिता के बारे में भी विवाद है। पर इसका रचयिता ""महोबा खण्ड'' को सं. १९७६ वि. में डॉ. श्यामसुन्दर दास ने ""परमाल रासो'' के नाम से संपादित किया था। डॉ. माता प्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सोलहवीं शती विक्रमी की हो सकती है। इस रचना के सम्बन्ध में काफी मतभेद है। श्री रामचरण हयारण ""मित्र'' ने अपनी कृति ""बुन्देलखण्ड की संस्कृति और साहित्य'' मैं "परमाल रासो'' को चन्द की स्वतन्त्र रचना माना है। किन्तु भाषा शैली एवं छन्द में -महोवा खण्ड'' से यह काफी भिन्न है। उन्होंने टीकामगढ़ राज्य के वयोवृद्ध दरवारी कवि श्री ""अम्बिकेश'' से इस रचना के कंठस्थ छन्द लेकर अपनी कृति में उदाहरण स्वरुप दिए हैं। रचना के एक छन्द में समय की सूचना दी गई है जिसके अनुसार इसे १११५ वि. की रचना बताया गया है जो पृथ्वीराज एवं चन्द के समय की तिथियों से मेल नहीं खाती। इस आधार पर इसे चन्द की रचना कैसे माना जा सकता है। यह इसे परमाल चन्देल के दरवारी कवि जगानिक की रचना माने तो जगनिक का रासो कही भी उपलब्ध नहीं होता है।

स्वर्गीय महेन्द्रपाल सिंह ने अपेन एक लेख में लिखा है कि जगनिक का असली रासो अनुपलब्ध है। इसके कुछ हिस्से दतिया, समथर एवं चरखारी राज्यों में वर्तमान थे, जो अब नष्ट हो चुके हैं।

राउजैतसी रासो - इस रचना में कवि का नाम नहीं दिया गया है और न रचना तिथि का ही संकेत है। इसमें बीकानेर के शासक राउ जैतसी तथा हुमायूं के भाई कामरांन में हुए एक युद्ध का वर्णन हैं जैतसी का शासन काल सं. १५०३-१५१८ के आसपास रहा है। अत-यह रचना इसके कुछ पश्चात की ही रही होगी। इसकी कुल छन्द संख्या ९० है। इसे नरोत्तम स्वामी ने राजस्थान भारतीय में प्रकाशित कराया है।

विजय पाल रासो - नल्ह सिह भाट कृत इस रचना के केवल ४२ छन्द उपलब्ध है। विजयपाल, विजयगढ़ करौली के यादव राजा थे। इसके आश्रित कवि के रुप में नल्ह सिह का नाम आता है। रचना की भाषा से यह १७ वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है।

राम रासो - इसके रचयिता माधव चारण है। सं. १६७५ वि. रचना काल है। इस ग्रन्थ में रामचरित्र का वर्णन है तथा १६०० छन्द हैं।

राणा रासो - दयाल दास द्वारा विरचित इस ग्रन्थ में शीशौदिया वंश के राजाओं के युद्धें एवं जीवन की घटनाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन १३७५-१३८१ के मध्य का हो सकता है। इसमें रतलाम के राजा रतनसिंह का वृत्त वर्णित किया गया है।

कायम रासो - यह रासो ""न्यामत खाँ जान'' द्वारा रचा गया है। इसका रचना काल सं. १६९१ है किन्तु इसमें १७१० वि. की घअना वाला कुछ    अंश प्रक्षिप्त है क्योंकि यदि कवि इस समय तक जीवित था तो उसने पूर्व तिथि सूचक क्यों बदला। यह वैसा का वैसा ही लिखा है इसमें राजस्थान के कायमखानी वंश का इतिहास वर्णित है।

शत्रु साल रासो- रचयिता डूंगरसी कवि। इसका रचना काल सं. १७१० माना गया है। छंद संख्या लगभग ५०० है। इसमें बूंदी के राव शत्रुसाल का वृत्त वर्णित किया गया है। 

आंकण रासो - यह एक प्रकार का हास्य रासो है। इसमें खटमल के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। इसका रचयिता कीर्तिसुन्दर है। रचना सं. १७५७ वि. की है। इसकी कुल छन्द संख ३९ है।

सागत सिंह रासो- यह गिरधर चारण द्वारा लिखा गया है। इसमें शक्तिसिंह एवं उनके वंशजों का वृत्त वर्णन किया गया है। श्री अगरचन्द्र श्री अगरचन्द नाहटा इसका रचना काल सं. १७५५ के पश्चात का मानते हैं। इसकी छन्द संख्या ९४३ है।

हम्मीर रासो- इसके रचयिता महेश कवि है। यह रचना जोधराज कृत्त हम्मीर रासो के पहले की है। छन्द संख्या लगभग ३०० है इसमें रणथंभौर के राणा हम्मीर का चरित्र वर्णन है।

खम्माण रासो - इसकी रचना कवि दलपति विजय ने की है। इसे खुमाण के समकालीन अर्थातद्य सं. ७९० सं. ८९० वि. माना गया है किन्तु इसकी प्रतियों में राणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय १७६०-१७९० के पूर्व की नहीं होनी चाहिए। डॉ. उदयनारायण तिवारी ने श्री अगरचन्द नाहटा के एक लेख के अनुसार इसे सं. १७३०-१७६० के मध्य लिखा बताया गया है। जबकि श्री रामचन्द्र शुक्ल इसे सं. ९६९-सं. ८९९ के बीच की रचना मानते हैं। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे सं. १७३०-७९० के मध्य लिखा माना जा सकता है।

रासा भगवन्तसिंह - सदानन्द द्वारा विरचित है। इसमें भगवन्तसिंह खीची के १७९७ वि. के एक युद्ध का वर्णन है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सं. १७९७ के पश्चात की है। इसमें कुल १०० छन्द है।

करहिया की रायसौ - यह सं. १९३४ की रचना है। इसके रचयिता कवि गुलाब हैं, जिनके श्वंशज माथुर चतुर्वेदी चतुर्भुज वैद्य आंतरी जिला ग्वालियर में निवास करते थे। श्री चतुर्भुज जी के वंशज श्री रघुनन्दन चतुर्वेदी आज भी आन्तरी ग्वालिया में ही निवास करते हैं, जिनके पास इस ग्ररन्थ की एक प्रति वर्तमान है। इसमें करहिया के पमारों एवं भरतपुराधीश जवाहरसिंह के बीच हुए एक युद्ध का वर्णन है।

रासो भइया बहादुरसिंह - इस ग्रन्थ की रचना तिथि अनिश्चित है, परन्तु इसमें वर्णित घटना सं. १८५३ के एक युत्र की है, इसी के आधार पर विद्वानों ने इसका रचना काल सं. १८५३ के आसपास बतलाया है। इसके रचयिता शिवनाथ है।

रायचसा - यह भी शिवनाथ की रचना है। इसमें भी रचना काल नहीं दिया है। उपर्युक्त ""रासा भइया बहादुर सिंह'' के आधार पर ही इसे भी सं. १८५३ के आसपास का ही माना जा सकता है, इसमें धारा के जसवंतसिंह और रीवां के अजीतसिंह के मध्य हुए एक युद्ध का वर्णन है।

कलियंग रासो - इसमें कलियुगका वर्णन है। यह अलि रासिक गोविन्द की रचना हैं। इसकी रचना तिथि सं. १८३५ तथा छन्द संख्या ७० है।

वलपतिराव रायसा - इसके रचयिता कवि जोगींदास भाण्डेरी हैं। इसमें महाराज दलपतिराव के जीवन काल के विभिन्न युद्धों की घटनाओं का वर्णन किया गया है। कवि ने दलपति राव के अन्तिम युद्ध जाजऊ सं. १७६४ वि. में उसकी वीरगति के पश्चात् रायसा लिखने का संकेत दिया है। इसलिये यह रचना सं. १४६४ की ही मानी जानी चाहिए। रासो के अध्ययन से ऐसा लगता है कि कवि महाराजा दलपतिराव का समकालीन था। इस ग्रन्थ में दलपतिराव के पिता शुभकर्ण का भी वृत्त वर्णित है। अतः यह दो रायसों का सम्मिलित संस्करण है। इसकी कुल छन्द संख्या ३१३ हैं। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने किया है, तथा "कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ, आगरा नसे भारतीय साहित्य के मुन्शी अभिनन्दन अंक में इसे प्रकाशित किया गया है।

शत्रु जीत रायसा - बुन्देली भाषा के इस दूसरे रायसे के रचयिता किशुनेश भाट है। इसकी छन्द संख्या ४२६ है। इस रचना के छन्द ४२५ वें के अनुसार इसका रचना काल सं. १८५८ वि. ठहरता है। दतिया नरेश शत्रु जीत का समय सं. १८१९ सं. १९४८ वि. तदनुसार सनद्य १७६२ से १८०१ तक रहा है। यह रचना महाराजा शत्रुजीत सिंह के जीवन की एक अन्तिम घटना से सम्बन्धित है। इसमें ग्वालियर के वसन्धिया महाराजा दौलतराय के फ्रान्सीसी सेनापति पीरु और शत्रुजीत सिंह के मध्य सेवढ़ा के निकट हुए एक युद्ध का सविस्तार वर्णन है। इसका संपादन श्री हरि मोहनलाल श्रीवास्तव ने किया, तथा इसे ""भारतीय साहित्य'' में कन्हैयालालमुन्शी हिदी विद्यापीठ आगरा द्वारा प्रकाशित किया गया है।

गढ़ पथैना रासो- रचयिता कवि चतुरानन। इसमें १८३३ वि. के एक युद्ध का वर्णन किया गया है। छन्द संख्या 
३१९ है। इसमें वर्णित युद्ध आधुनिक भरतपुर नगर से ३२ मील पूर्व पथैना ग्राम में वहां के वीरों और सहादत अली के मध्य लड़ा गया था। भरतपुर के राजा सुजारनसिंह के अंगरक्षक शार्दूलसिंह के पूत्रों के अदम्य उत्साह एवं वीरता का वर्णन किया गया है। बाबू वृन्दावनदास अभिनन्दन ग्रन्थ में सन् १९७५ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा इसका विवरण प्रकाशित किया गया।

पारीछत रायसा - इसके रचयिता श्रीधर कवि है। रायसो में दतिया के वयोवृद्ध नरेश पारीछत की सेना एवं टीकामगढ़ के राजा विक्रमाजीतसिंह के बाघाट स्थित दीवान गन्धर्वसिंह के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है। युद्ध की तिथि सं. १८७३ दी गई है। अतएव यह रचना सं. १८७३ के पश्चात् की ही रही होगी। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवासतव के द्वारा किया गया तथा भारतीय साहित्य सनद्य १९५९ में कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ आगरा द्वारा इसे प्रकाशित किया गया।

बाघाट रासो - इसके रचयिता प्रधान आनन्दसिंह कुड़रा है। इसमें ओरछा एवं दतिया राज्यों के सीमा सम्बन्धी तनाव के कारण हुए एक छोटे से युद्ध का वर्णन किया गया है। इस रचना में पद्य के साथ बुन्देली गद्य की भी सुन्दर बानगी मिलती है। बाघाट रासो में बुन्देली बोली का प्रचलित रुप पाया जाता है। कवि द्वारा दिया गया समय बैसाख सुदि १५ संवत् १८७३ विक्रमी अमल संवत १८७२ दिया गया है। इसे श्री हरिमोहनलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित किया गया तथा यह भारतीय साहित्य में मुद्रित है। इसे ""बाघाइट कौ राइसो'' के नाम से ""विंध्य शिक्षा'' नाम की पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है।

झाँसी की रायसी - इसके रचनाकार प्रधान कल्याणिंसह कुड़रा है। इसकी छन्द संख्या लगभग २०० है। उपलब्ध पुस्तक में छन्द गणना के लिए छन्दों पर क्रमांक नहीं डाले गये हैं। इसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा टेहरी ओरछा वाली रानी लिड़ई सरकार के दीवान नत्थे खां के साथ हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन किया गया है। झांसी की रानी तथा अंग्रेजों के मध्य हुए झांसी कालपी, कौंच तथा ग्वालियर के युद्धों का भी वर्णन संक्षिप्त रुप में इसमें पाया जाता है। इसका रचना काल सं. १९२६ तदनुसार १९६९ ई. है। अर्थातद्य सन् १९५७ के जन-आन्दोलन के कुल १२ वर्ष की समयावधि के पश्चात् की रचना है। इसे श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव दतिया ने ""वीरांगना लक्ष्मीबाई'' रासो और कहानी नाम से सम्पादित कर 
सहयोगी प्रकाशन मन्दिर लि. दतिया से प्रकाशित कराया है।

लक्ष्मीबाई रासो - इसके रचयिता पं. मदन मोहन द्विवेदी ""मदनेश'' है। कवि की जन्मभूमि झांसी है। इस रचना का संपादन डॉ. भगवानदास माहौर ने किया है। यह रचना प्रयाग साहित्य सम्मेलन की ""साहित्य-महोपाध्याय'' की उपाधि के लिए भी सवीकृत हो चुकी है। इस कृति का रचनाकाल डॉ. भगवानदास माहौर ने सं. १९६१ के पूर्व का माना है। इसके एक भाग की समाप्ति पुष्पिका में रचना तिथि सं. १९६१ दी गई है। रचना खण्डित उपलब्ध हुई है, जिसे ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है। विचित्रता यह है कि इसमें कल्याणसिंह कुड़रा कृत ""झांसी कौ रायसो'' के कुछ छन्द ज्यों के त्यों कवि ने रख दिये हैं। कुल उपलब्ध छन्द संख्या ३४९ हैं। आठवें भाग में समाप्ति पुष्पिका नहीं दी गई है, जिससे स्पष्ट है कि रचना अभी पूर्ण नहीं है। इसका शेष हिस्सा उपलब्ध नहीं हो सका है। कल्याण सिंह कुड़रा कृत रासो और इस रासो की कथा लगभग एक सी ही है, पर मदनेश कृत रासो में रानी लक्ष्मीवाई के ऐतिहासिक एवं सामाजिक जीवन का विशद चित्रण मिलता है।

छछूंदर रायसा - बुन्देली बोली में लिखी गई यह एक छोटी रचना है। छछूंदर रायसे की प्रेरणा का स्रोत एक लोकोक्ति को माना जा सकता है- ""भई गति सांप छछूंदर केरी।'' इस रचना में हास्य के नाम पर जातीय द्वेषभाव की झलक देखने को मिलती है। दतिया राजकीय पुस्तकालय में मिली खण्डित प्रति से न तो सही छन्द संख्या ज्ञात हो सकी और न कवि के सम्बन्ध में ही कुछ जानकारी उपलब्ध हो सकीफ रचना की भाषा मंजी हुई बुन्देली है। अवश्य ही ऐसी रचनाएं दरबारी कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने अथवा कायर क्षत्रियत्व पर व्यंग्य के लिये लिखी गई होगी।

घूस रासा - यह भी बुन्देली की एक छोटी सी रचना है। इसमें हास्य के साथ व्यंग्य का भी पुट है। रचनाकार को काव्य शिल्प की दृष्टि से अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। छन्दों के बंध, भाषा व शैली पर कवि का पूर्ण अधिकार है। उपलब्ध छन्द संख्या कुल ३१ है। प्रतिपूर्ण लगती है। यह भी दतिया राज्य पुस्तकालय की हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त हुई है। रचना के एक छन्द द्वारा कवि का नाम पृथीराज दिया गया है, परवर्ती रचना है। रचना काल अज्ञात है।

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History of Bundelkhand Ponds And Water Management - बुन्देलखण्ड के तालाबों एवं जल प्रबन्धन का इतिहास : टीकमगढ़ जिले के तालाब एवं जल प्रबन्धन व्यवस्था (Tikamgarh district pond and water management system)

History of Bundelkhand Ponds And Water Management - बुन्देलखण्ड के तालाबों एवं जल प्रबन्धन का इतिहास

टीकमगढ़ जिले के तालाब एवं जल प्रबन्धन व्यवस्था (Tikamgarh district pond and water management system)

प्राचीन काल में चन्देलों एवं बुन्देलों के राजत्वकाल के पहले समूचा बुन्देलखण्ड क्षेत्र, विन्ध्यपर्वत की श्रेणियों, पहाड़ियों एवं टौरियों वाला पथरीला, कंकरीला वनाच्छादित भूभाग था। टौरियों, पहाड़ियों के होने से दक्षिणी बुन्देलखण्ड विशेषकर ढालू, ऊँचा-नीचा पथरीला, मुरमीला राँकड़ भूभाग रहा है। 

टौरियों, पहाड़ियों एवं पठारों के बीच की पटारों, वादियों, घाटियों और खन्दकों में से बरसाती धरातलीय जल प्रवाह से निर्मित नाले-नालियाँ थीं। जो पथरीली पठारी भूमि होने से गहरी कम, चौड़ी छिछली-सी मात्र चौमासे (वर्षाकाल) में ही जलमय रहती थीं। पठारी नालियाँ-नाले होने से प्रवाह भी तेज रहता था लेकिन उनमें लगभग छह माह, जनवरी से जून तक पानी नहीं रहता था। जहाँ जिन नदियों की पटारों पहाड़ों की तलहटी में गहरी काटकर भरका निर्मित कर सकीं, उन्हीं भरकों में ग्रीष्म ऋतु में जल रहता रहा है। शेष अगणित नालियाँ-नाले सूखे, पथरीले, सघन कटीले वन युक्त थे कि जिनके बीच से आना-जाना भी कठिन था।

यह समूचा क्षेत्र जलहीन और निर्जन मात्र चौमासी चरागाही क्षेत्र था। नदियों-नालों के गहरे भरकों पटारों में ही जहाँ कहीं पानी रहता था। ढालू भमि होने से बरसाती धरातलीय जल नालियों-नालों एवं नदियों में से बहता हुआ क्षेत्र से बाहर-बड़ी नदी यमुना के द्वारा बंगाल की खाड़ी में चला जाता रहा।

बुन्देलखण्ड में प्रकृति प्रदत्त सुषमा सौन्दर्य था। सघन कटीले वन थे, वनाच्छादित पहाड़ियाँ, पहाड़ एवं टौरियाँ हैं। सुन्दर नीची-ऊँची घाटियाँ, वादियाँ, खन्दकें एवं पटारे थीं परन्तु पानी नहीं था। वर्षा के चौमासे के बाद शेष आठ माह जाड़ों और गर्मियों के ऋतुओं में यहाँ पानी का भयंकर संकट रहा करता था क्योंकि नालियाँ-नाले पथरीले ढालू रहे हैं जो कार्तिक-अगहन (नवम्बर-दिसम्बर) महीनों में ही सूख जाया करते थे। पानी का स्थायी पुख्ता प्रबन्ध न होने से क्षेत्र में जन बसाहट भी स्थायी नहीं थी। केवल चार-छह माह के लिये ग्वाले, अहीर एवं अन्य जातियों के लोग अपने-अपने पशुओं को लेकर आ जाते थे और नीची पटारों में अथवा डबरीले नालों-नदियों के किनारे बगर-मड़ैया डालकर इधर-से-उधर पशुओं को चराते घुमन्तु जीवन बिताया करते थे। जहाँ जिस नदी-नाले के डबरा-भरका में पानी मिला उसी के पास अस्थायी डेरे जमाए और पशुओं को चराते फिरते रहे। जब पानी सूखा तो नीचाई तरफ चले गए अथवा दूसरे नाले-नदियों के डबरा के पास डेरा बगर बना लिया। वह घुमन्तु चरवाहे अधिकतर नालों-नदियों के घाटों से और आवागमन के मार्गों से परिचित रहते थे तथा उन्हीं के आसपास विचरण करते रहते थे। तात्पर्य यह कि दीर्घकाल तक बुन्देलखण्ड के लोगों का चरागाही-चल जीवन रहा। न स्थायी जल संसाधन थे न स्थायी ग्राम-बस्ती व्यवस्थापन ही था।

भला हो चन्देले-बुन्देले राजाओं का, जिन्होंने इस चरागाही जल एवं जनविहीन अविकसित बंजर विन्ध्य भूमि को विकसित करने हेतु पहाड़-पहाड़ियों एवं टौरियों के मध्य की खन्दियों के मध्य से निर्मित नालों-नदियों में से व्यर्थ में बहते जाते बरसाती धरातलीय जल को रोकने हेतु तालाब-तलैयों एवं पुष्करों के निर्माण के महान लोकोपकारी पुण्य कार्य सम्पन्न कराए थे। उन्होंने नालों-नदियों से धरातलीय बहते पानी को थमा दिया तो बुन्देलखण्ड के लोगों का चरवाही घुमन्तू जीवन भी थम गया। तालाब बने, उनके बाँधों पर बस्तियाँ बसीं। बाँधों के पीछे की नीची तराई की बहारू एवं स्यार भू क्षेत्रों की समतल भूमि पर कृषि प्रारम्भ हुई। तालाबों के आसपास की वनाच्छादित समतल भूमि पर बावड़ियों का निर्माण कराया गया और तालाबों के पूँछों और बावड़ियों के समीप भी बस्तियाँ बसाई गईं कि लोगों को पीने एवं निस्तार के पानी की सुविधा प्राप्त रहे। तात्पर्य यह कि दक्षिणी बुन्देलखण्ड के जलविहीन एवं जनविहीन क्षेत्र में महोबा के चन्देल राजाओं एवं ओरछा राजवंशज बुन्देला नरेशों ने मनोहारी सुन्दर विशाल सरोवरों का निर्माण कराकर यहाँ के निर्जन, चरागाही घुमन्तु जीवन को स्थिरता दी थी। वनांचलीय जीवन को सामाजिक-आर्थिक जीवन में परिवर्तित कर दिया था।

चन्देलों ने जो तालाब बनवाए थे, वे जननिस्तारी जलापूर्ति के साधन थे। उनके पालों (बाँधों) में सुलूस (कुठिया-औनों) जैसे जल निकासी के साधन नहीं बनाए गए थे। पानी की आवक, जल-भराव भण्डारण के अनुसार बाँध की ऊँचाई एवं चौड़ाई रखी जाती थी। सामान्यतः दो पहाड़ों की खन्दक में अथवा दो टौरियों के मध्य की समतल पटार में पत्थर की पैरी (शिलाखण्ड) एवं मिट्टी से सुदृढ़ बाँध बनाकर, बाँध (पाल) के दोनों अन्तिम पूँछों (किनारों) पर टौरियों, पठारी चरचरी में से तालाब के पूर्ण जल भण्डारण के अतिरिक्त जल निकल जाने हेतु पाँखियाँ-पाँखी बना दी जाती थीं। पाँखी से पानी प्रवाहित हुआ कि समझ लिया तालाब पूरा भर गया। चन्देली तालाबों का ऐसा सोचा-समझा व्यावहारिक गणित बैठाया जाता था कि कितना भी पानी बरसे बाँधों के ऊपर से पानी नहीं निकल सकता था। बाँध की ऊँचाई एवं तालाब के अतिरिक्त पानी के निकास की पाँखियाँ-पाँखी में 10:7 का अनुपात देखने में मिलता है। ताकि तालाब का भराव जल बाँध (पाल) के ऊपर आने से पहले ही पाँखियों से बाहर तालाब के पृष्ठभागीय निचले बहारू क्षेत्र में से दूसरे शृंखला सरोवरों में अथवा किसानों के समतल कृषि क्षेत्रों टरेंटों और खेतों में चला जाये। इस अनुपातीय गणित निर्माण व्यवस्था के कारण कोई भी चन्देली तालाब मध्य बाँध से नहीं फूटा देखा गया है। यदि पाँखियों के पास से फोड़कर कुछ को खेती में तब्दील कर लिया गया है तो यह समाज विरोधी एक पृथक बात है। जो धनबलियों, बाहुबलियों एवं राजनैतिक रसूकदारों के चलते और प्रशासनिक कमजोरी के परिणामस्वरूप होता रहा है।

चन्देली एवं बुन्देली तालाबों के निर्माण का वास्तु स्थापत्य ही अलग किस्म का था। चन्देली बाँधों के आगे-पीछे विशाल आयताकार और वर्गाकार चौड़े सपाट पालदार शिलाखण्ड (पैरियाँ) बाँध की नींव के भराव के ऊपर एक को दबाते हुए दूसरी रखी जाती थी। मध्य भाग में मिट्टी भरी जाती थी। उसे पानी से भिगोकर कुटाई की जाती थी। दोनों ओर की पैरियाँ मानों मिट्टी के बाँध की सुरक्षा में पीठ दिये बैठा दी गई हैं कि तालाब के जल की उत्तुंग तरंगे, लहरें एवं बड़े-बड़े हेड़ा (तेज बड़ी लहरों के प्रहार) बाँध की मिट्टी तक न पहुँच सकें और न मिट्टी का क्षरण कर सकें। बाँध की बन्धाई सदैव बाहरी किये जाने का विधान है। यदि तल में बाँध की बुनियाद 60 फुट डाली गई है तो बाँध का ऊपरी शिखर (भाग दोनों ओर (आगे-पीछे) से कटता-पैरी-दर-पैरी पिछलता हुआ 40 फुट रखा जाता रहा है। तालाब में जल भरने वाले नाले-नालियाँ अथवा नदी का दबाव, बाँध के जिस स्थान पर अधिक बनने की सम्भावना होती थी तो वहाँ बाँध के भीतरी भराव क्षेत्र की ओर गुर्जनुमा गोलाई लिये हुए चाँदे, ओड़े, कोहनी, मोड़ें बना दिये जाते थे। वेग से आती जलधारा सर्वप्रथम इन कोहनियों अथवा चाँदौं या मोड़ों-ओड़ों से टकराकर दाएँ-बाएँ बिखर जाती। यह चाँदे अथवा मोड़ें पानी के दबाव-भार को झेलती सहती रहतीं और बाँध को कोई नुकसान नहीं पहुँचने देतीं।

बाँध के ऊपर विशेषकर मध्य बाँध पर देवालय, विष्णुजी अथवा शिव मठ अथवा देवी मन्दिर के निर्माण की परम्परा थी। यह देवालय चाँदौं, कुहनियों पर बनाए जाते थे। संलग्न स्नान घाट निश्चित किया जाता था कि लोग तालाब के घाट पर स्नान करें और देवालय में भक्ति भाव सामर्थ्यानुसार देव उपासना, आराधना, पूजा-पाठ करते रहें।

देवालय के पास स्नान घाट की सीढ़ियों पर तालाब में जल-भराव भण्डारण क्षमता का ‘संकेत चिन्ह’ स्थापित कर दिया जाता था। जो पाँखी-पँखिया अथवा बेशी पानी के निकास की नाली के स्तर (लेबिल) पर रोपा जाता था, जिसे हथनी, कुड़ी, चरई अथवा चौका जैसे नाम से जाना जाता था। तात्पर्य यह कि हथनी, कुड़ी, चरई में पानी आया कि पाँखी से निकलना प्रारम्भ हुआ। किन्हीं-किन्हीं तालाबों के मध्य एक चौपाला मजबूत पत्थर का खम्भा, जिसका शीर्ष तालाब की पाँखी नाली के लेबिल पर मिला दिया जाता था। इस परखी खम्भा का आशय था कि परखी के सिर पर पानी आया और नाली से तालाब का अतिरिक्त जल बाहर निकलने लगता।

तालाबों के बाँधों पर बस्तियाँ बसाई गई थीं, देवालय स्थापित किये गए थे कि लोग आते-जाते, नहाते-धोते, एवं पूजा-पाठ करते हुए सजगतापूर्वक अपने तालाब को अनवरत देखते रहें कि बाँध को कहीं कोई क्षति तो नहीं हो रही है, तालाब का पानी अपनी सीमा से ऊपर तो नहीं बढ़ रहा है। यदि बढ़ रहा तो नाली पाँखी में पड़े अवरोधों को दूर करें। नहाने के समय देखें कि पानी प्रदूषित क्यों हो रहा है? पानी प्रदूषित करने वाले पौधों, झाड़ियों एवं कारणों को दूर करें, क्योंकि तालाब गाँव की सामूहिक अमूल्य जीवनदायिनी सम्पत्ति हैं। सामूहिक विरासत हैं। अमृत कुण्ड हैं। चन्देला शासनकाल में तालाबों के अगोर क्षेत्र में कृषि जोत के खेत नहीं बनाए जाते थे। इस भावना के कारण कि यदि अगोर की भूमि जोती जाएगी तो खेतों की मिट्टी पानी में साथ बहकर, तालाब के भराव क्षेत्र में जमा होगी जिससे भविष्य में जल भण्डारण क्षमता कम हो जाएगी। तालाबों के अगोर में मैदान विशेषकर चरागाही वन क्षेत्र ही सुरक्षित रखा जाता था। कृषि तो तालाब के आजू-बाजू एवं पृष्ठभागीय पिछवाड़े के क्षेत्रों (पाँखियों की तरफ एवं बहारू भागों) में की जाती थी। तात्पर्य यह कि पानी प्राप्त होने वाले भाग में ही जोत होती थी। तालाब के अगोर एवं भराव क्षेत्र में शौच जाना सामाजिक तौर पर प्रतिबन्धित रहता था ताकि तालाब का पानी स्वच्छ एवं साफ बना रहे। क्योंकि उससे देवताओं का पूजन किया जाता। भगवान के जल विहार तालाबों में ही होते रहे हैं, जिस कारण तालाबों को स्वच्छ, पवित्र और साफ बनाए रखने की प्रथा थी। तालाबों का निर्माण हुआ तो वर्षा का धरातलीय जल सिमट-सिमटकर उनमें भर गया। ‘सिमट-सिमट जल भरहि तलावा’। बुन्देलखण्ड में पहाड़ों का, वन सम्पदा का प्राकृतिक सौन्दर्य तो था ही, चन्देल राजाओं ने इस जल, जनहीन क्षेत्र के बरसाती धरातलीय जल को ठहराकर जन-जीवन को ठहरा दिया था। बुन्देलखण्ड के प्राकृतिक सौन्दर्य को सरोवरों ने और अधिक आकर्षक एवं मनोहारी बना दिया था।

चन्देल राजाओं ने अपने राजत्वकाल में बुन्देलखण्ड में जल संग्रहण व्यवस्था हेतु तालाबों, बावड़ियों एवं कूपों के निर्माण पर इतनी अकूत अपार धनराशि व्यय की थी जो कल्पना के बाहर है। पत्थर की पैरी से तालाब, पत्थर से किले-महल, मठ-मन्दिर, पत्थर की बावड़ी बनाई गई थी। विशालकाय प्रस्तर शिलाएँ कैसे तालाबों, महलों, किलों एवं मन्दिरों पर सन्तुलित रूप से चढ़ाई-बैठाई गई होंगी जो वर्तमान तक अडिग जमी हुई हैं। उनकी प्रस्तर मूर्तिकला, भावभंगिमा तो आज के सृष्टि जगत के लिये एक चमत्कार एवं आश्चर्य ही है। तत्कालीन समय में उनकी आय भी शायद बहुत अधिक नहीं थी। महोबा, बांदा, कालिंजर, बारीगढ़, लौड़ी, चन्दला, चन्देरी, मदनपुर परिक्षेत्रों में अतिरिक्त शेष अधिकांश भूक्षेत्र रांकड़ पहाड़ी जल एवं जनहीन ही था। क्या व्यवसाय इतना विकसित था कि उसके करों से इतने कार्य सम्पादित हो गए? सोना-चाँदी की खदानें भी नहीं रहीं और न आज भी हैं। इतिहास में चन्देले राजपूत युग का राजवंश है। भारत के इतिहास में एक पराक्रमी लड़ाका राजवंश था। कलचुरियों, चालुक्यों से उनका सदैव संघर्ष होता रहा। मालवा पर भी अनेक आक्रमण हुए। ‘आल्हा’ लोक काव्य ग्रन्थ में आल्हा-ऊदल शूरमाओं द्वारा बावन युद्ध लड़े बतलाए, गाए जाते हैं। शायद पड़ोसी राज्यों पर चढ़ाई कर, उन राज्यों को लूटकर, लूट के धन को अपनी चन्देली प्रजा के जनहितकारी कार्यों तालाबों के निर्माण में व्यय किया हो और अपना राजकोष भरा हो।

चन्देलों ने तालाबों के निर्माण पर अपार धन व्यय किया जो धन का सही, लौकिक जनहित में व्यय था। बुन्देलखण्ड, जो जल एवं जनहीन क्षेत्र था, उसे जीवन प्राप्त हो गया था। इससे चन्देलों की यश-कीर्ति में अभिवृद्धि हुई और लोग गा-गाकर कहने लगे थे-

पारस पथरी है महुबे में, लोहो छुवत सोन हुई जाय। चन्देलों ने अनेक तालाबों के बाँधों पर मन्दिर बनवाए थे। उनमें शिलालेख भी लगवाए थे जिनमें गड़े हुए धन का संकेत मिलता है। वर्तमान में शिलालेख तो गायब हैं, परन्तु उनकी लोकोक्तियाँ आज भी कही जाती हैं-

इक लख हसिया दस लख फार। गढ़े हैं तला के पार।
तीर भर नाय-कै तीर भर माय। नगर नारायणपुर-चौका टोर।।

बुन्देलखण्ड गजेटियर-कर्नल लुआर्ड 1907 ई. पृ. 78 पर उल्लेख है कि जतारा के मदन सागर के तालाब पर सतमढ़िया एवं खण्डहर देवालय में एक चन्देलयुगीन अभिलेख था, जो सन 1895 ई. तक देखा गया था। उसमें लिखा था।

सतमढ़ियन के छायरे, और तला की पार।
जो होवे चन्देल कौ, सो लेव उखार।।

आचार्य पं. कृष्ण किशोर द्विवेदी अभिनन्दन ग्रन्थ में ‘मदन वर्मा और महोबा’ लेख में विवरण दिया गया है कि मदन वर्मा के समय महोबा राजकोष हीरों, मोतियों एवं स्वर्णमुद्राओं से भरा रहता था। तात्पर्य कि चन्देल राजाओं ने सरोवरों, किलों, महलों, मन्दिरों एवं बावड़ियों के निर्माण पर अकूत धन खर्च किया था। कहाँ से इतना धन आया होगा? यह प्रश्न अनुत्तरित ही है। उस वीरगाथा काल के लोक काव्यकारों (जगनक कवि) ने भले ही सच्चाई से ध्यान हटाने हेतु प्रचारित कर दिया कि ‘पारस पथरी है महुबे में, लोहो छुवत सोन हुई जाय’। तात्पर्य यह कि चन्देलों के पास पारस पत्थर था, जिसे लोहा से छुआने (स्पर्श) पर लोहा सोना में बदल जाता था। यह भी लोकमत है कि चन्देल राजा किसानों से लगान के रूप में हल का लोहे का फार एवं हँसिया लिया करते थे और उन्हें सोने में बदल लिया करते थे। ऐसे परिवर्तित सोने के फार एवं हँसिया तालाबों के बाँधों पर बने मन्दिरों के आसपास बाँध में दबा (गाड़) दिया करते थे। परन्तु पत्थर को लोहा से स्पर्श कराने पर लोहा का सोना बन जाना मात्र एक चमत्कारी परन्तु अविश्वसनीय एवं अवैज्ञानिक बात है। पत्थर में बालू में सोना तो निकलता है। सोना खनिज सम्पदा है। परन्तु बुन्देलखण्ड में सोने की खदानें न थीं और न हैं। भविष्य में वैज्ञानिक खोज हो और सोने की खदानें प्राप्त हो जाएँ, यह पृथक बात है।

बाँध का ग्वाल सागर सरोवर इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तालाब है, जिसका भराव क्षेत्र दस-बारह किलोमीटर की परिधि में है। जिसके किनारे-किनारे जल सुविधा के कारण जनबस्तियाँ बस गई थीं। इनमें बाँध, सेबार, रमपुरा, बनैरा, कैलपुरा, बम्हौरी एवं कछयांत चन्दूली तथा डुम्बार ग्राम प्रमुख रहे हैं। अपने निर्माण के समय ग्वाल सागर एक झील थी, जिसका जल निकलता ही नहीं था। केवल एक पाँखी पूर्वोत्तर भाग के पठार से थी जिसे पट्टी कहा जाता था। जहाँ से जब कभी अतिरिक्त बरसाती पानी ही बाहर बहकर निकल पाता था। कुछ भी हो, चन्देलों की नीति कृषि विकास, विस्तार एवं उसके लिये सिंचाई जल संग्रहण व्यवस्था की थी। कृषि सिंचाई जल व्यवस्था विषयक एक शिलालेख का उल्लेख डॉ. एस.के मित्रा ने अपने शोधग्रन्थ ‘अर्ली रूलर्स ऑफ खजुराहो’ के पृष्ठ 180 पर लिखा है, “Attention paid in Irrigation work for the facility of cultivation. The khajuraho Inscription of V.S. 1011 for examp, refer to the construction of embankment to divert the course of rivers (V. 26) evidently for benefit of the peasentry concern expression like NALA (canal) PUSKARNI (Tanks) and BHITI (Embankment) are met within different Chandela records. These were usually located near the cultivable plotes of land apparently to supply water to the fields.”

इस अभिलेख में चन्देल राजाओं की भावना का पता चलता है कि वे कृषकों एवं कृषि विकास के लिये समर्पित थे। कृषि राजस्व आय ही चन्देलों का मुख्य आय स्रोत था। अधिसंख्य तालाबों का निर्माण हुआ तो कृषि क्षेत्र बढ़ा। सभी लोग रोजगारों में लग गए थे। व्यापारी व्यवसाय में, कृषक कृषि में और मजदूर, बेलदार, दक्ष कारीगर तालाबों के निर्माण, नहरों की खुदाई एवं मरम्मत कार्यों में लग गए थे। जब सभी लोगों के हाथ काम में लग गए तो समाज में सम्पन्नता आई और शासन स्वर्ण युग नाम से विख्यात हो गया था।

बुन्देलखण्ड की पथरीली-ककरीली भूमि को पानी मिला। लोहे के फार लगे हलों ने पथरीली जमीन फाड़ दी, किसानों ने बीज बोया तो धरती ने अन्न रूपी सोना उगल दिया। किसानों के घर भरे, लगान के बदले मिले अन्न से चन्देलों के जखीरे भरे। प्रजा सम्पन्न हुई, राजा की शक्ति बढ़ी, राजकोष भरा। अन्न धन से सभी धन प्राप्त हो सकते हैं। इस पथरीली ककरीली बुन्देल भूमि से लोहे के फार ने पानी के सहयोग से सोना उगलवाना प्रारम्भ कर दिया था। सबसे शिरोमणि है पानीधन, जिससे अन्न धन पैदा होता है। कहावत है अन्न धन है सो अनेक धन हैं।

टीकमगढ़ मंडल में मदन वर्मा (1030-1165 ई.) ने बरसाती धरातलीय जल संग्रहण पर अकूत धन व्यय किया था। उसने पहाड़-पहाड़ियों एवं टौरियों के बीच की खन्दकों, पटारों में बाँध बनवाकर क्षेत्र के बहते जाते पानी को रोककर विशाल झीलों-सरोवरों का निर्माण करा दिया था। उसके अधिसंख्य तालाबों में विशाल सरोवर हैं-ग्वाल सागर बल्देवगढ़, मदन सागर अहार, मदन सागर जतारा, मदन सागर महोबा, मदन सागर मदनपुर। उसके द्वारा बनवाए गए लगभग 1100 तालाबों में से ग्वालसागर, मदनसागर जतारा एवं मदन सागर अहार तो विशाल झीलें हैं। मानो मदन वर्मा ने इस पहाड़ी पठारी वनाच्छादित जलविहीन शुष्क भू क्षेत्र पर छोटे-छोटे लघुसागरों की रचना कर इस बीहड़ भूमि का रूप-स्वरूप निखारकर इसे आकर्षक एवं मनोहारी बना दिया था।

पं. बनारसीदास चतुर्वेदी ने ‘विन्ध्यभूमि’ के पृ. 18 पर लिखा है कि, “विन्ध्य की प्रकृति का वर्णन अधूरा ही रहेगा यदि यहाँ के सरोवरों का जिक्र न किया जाये। वस्तुतः यहाँ के सरोवर प्राकृतिक सौन्दर्य के मुख्य अंग हैं।”

श्री केशवचन्द मिश्र ने अपने ग्रन्थ ‘चन्देल एवं उनका राजत्वकाल’ में पृष्ठ 230 पर चन्देली तालाबों के निर्माण स्थल चयन पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि दो पर्वतों के बीच की दूरी अथवा नीचा मैदान है, अथवा नदी-नालों के छोड़न हैं, उन्हीं स्थलों को जलाशयों की रचना के लिये चुना गया है। कहीं-कहीं तो ऐसी दो टगरों के बीच प्रशस्त बाँध, बाँधकर रचना कर दी गई हैं, जहाँ वर्षाजल एकत्र कर लिया जाता था। दो पहाड़ियों के मध्यवर्ती नालों को बन्द कर भी चित्ताकर्षक तालाबों की रचना कर ली गई है। इन जलाशयों की रचना की विशेषता यह है कि वे जैसे ही विशाल हैं, वैसी ही मजबूत भी हैं। उनके तटों पर चतुर्दिक स्नानार्थ मनोहर घाट बने हैं और पूजन के निमित्त देवालयों की रचना की गई है।

चन्देलों ने तालाबों का निर्माण कराकर पानी ठहरा दिया तो बुन्देलखण्ड के लोगों का चरवाही, चरागाही घुमन्तु जीवन ठहर गया था। तालाबों के पानी के आश्रय से लोग इकट्ठे बस्तियाँ बसाकर निवास करने लगे थे और उन्हें कृषि युग में प्रविष्ट होने का अवसर प्राप्त हो गया था। इस प्रकार महोबा के चन्देल राजाओं ने धरातलीय बरसाती जल संग्रहण के लिये तालाबों के निर्माण पर अपार अकूत धन व्यय कर यहाँ के लोगों को जल उपलब्ध कराकर जीवनदान दिया था तो सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गतिविधियों के विकासवादी द्वार खुल गए थे।

1. ग्वाल सागर बाँध (बल्देवगढ़) Gwal Sagar Bandh (Baldevgarh) :

टीकमगढ़ जिला का विशाल झीलनुमा ग्वाल सागर तालाब का निर्माण चन्देल राजा मदनवर्मा (1030-1165 ई.) ने कराया था। उस समय इस क्षेत्र में जल का अभाव था। जलाभाव के कारण क्षेत्र में जन-जीवन अस्थिर चरवाही घुमन्तु प्रकार का था। स्थायी जनबसाहट की बस्तियाँ भी नहीं थीं। कुछ पशुपालक एवं अहीर-ग्वाले पशुओं को टपरे, बगर बनाकर और अपने लिये मड़ैयाँ-मचान बनाकर खानाबदोसी जीवन बिताते, पशुओं को चराते विचरते रहते थे। वे अषाढ़ मास से माघ मास तक आठ-नौ महीना अपने पशु टौरियों, पहाड़-पहाड़ियों पर एवं उनकी पटारों, खन्दियों में से प्रवाहित नदियों-नालों के आसपास डेरे लगाते हुए कभी इधर कभी उधर घुमन्तु खानाबदोसी जीवन बिताते विचरते रहते थे।

बल्देवगढ़ (पूर्वकालिक बाँध बस्ती) टीकमगढ़ जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर, पूर्वी अंचल के डगई भूभाग में 24.46 उत्तरी अक्षांश एवं 79.7 पूर्वी देशान्तर पर ऊँची-नीची घाटियों, पटारों-खंदकों एवं पहाड़ों के मध्य सघन वन क्षेत्र के मध्य स्थित रहा है। दसवीं सदी तक यह क्षेत्र जल एवं जलविहीन वनाच्छादित मात्र एक चरागाही भूभाग ही था।

यहाँ बड़े-बड़े पहाड़ रहे हैं तो छोटी-छोटी टौरियाँ भी हैं। पहाड़ों एवं टौरियों के मध्य लम्बी संकरी-संकरी पटारें, खन्दियाँ हैं, जिनमें से सर्पाकार नालियाँ नाले और झिन्नें (झरने) कलकल निनादित प्रवाहित रहते थे। आने-जाने के मार्ग ऊँचे-नीचे थे। ऊपर से नीचे खन्दियों में उतरो, फिर घाटियाँ (घाटी) चढ़ो। पूर्वी पश्चिमी भाग में टौरियाँ पहाड़ियाँ रही हैं तो उत्तर दिशा से सफेद चट्टानों वाला आता ऊँचा पेटका पहाड़ रहा है और दक्षिण दिशा की ओर से आता बड़ा पहाड़, विपरीत दिशाओं से समानान्तर से आते यह सफेद कोह एवं काला कोह मानों एक-दूसरे को देख ठिठक कर खड़े रह गए कि जिनके मध्य एक पटार थी जो लगभग सौ मीटर थी। इसी पटार में से पूर्वी अंचल का बरसाती धरातलीय जल समेट कर लातीं बहतीं गौर एवं गुरिया दो छोटी नदियाँ उत्तर दिशा को चली जाती थीं। पहाड़ों खन्दियों एवं सघन वन से निर्मित यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत रोमांचकारी है।

मदन वर्मा ने पेटका पहाड़ एवं बड़ा पहाड़ के मध्य की पटार को बन्द कर गुरिया-गौर नदियों के प्रवाहित जल को थमा दिया था। लगभग सौ मीटर लम्बा, साठ मीटर चौड़ा एवं बीस-बाईस मीटर ऊँचा बाँध दोनों पहाड़ों के पूँछों को मिलाकर बनवा दिया था। छोटे से बाँध से विशाल झीलनुमा सरोवर बन गया था। बाँध पत्थर की पैरियों एवं मिट्टी से ग्वालों के जनसहयोग से बनवाया था। जिसे गायों एवं ग्वालों को समर्पित करते हुए इसका नाम ग्वाल सागर रख दिया था। मदनवर्मा ने अपने नाम पर बाँध के पीछे संलग्न सुन्दर बावड़ी बनवाई थी, जिसे मदनबेर ही कहा जाता रहा है। मदनबेर से सटकर बाँध को पीठ दिये महाबली श्री हनुमान जी की प्रतिमा स्थापित करवाई थी। ग्वाल सागर बाँध के भराव की ओर पेटका पहाड़ के अन्त में पूँछा के पास शिवलिंग स्थापित कर शिव मन्दिर बनवाया था। उस स्थान का नाम शिवघाट रखा था।

ग्वाल सागर बाँध तैयार होने के पश्चात मदन वर्मा के बाँध के उत्तरी पार्श्व में पेटका पहाड़ी पर बस्ती बसाई थी। बस्ती का नाम भी बाँध के नाम पर ही रखा था तथा बाँध ग्राम को क्षेत्र का परगना मुख्यालय भी स्थापित कर दिया था जिससे 149 ग्राम नियन्त्रित होते थे (देखो बुन्देलखण्ड गजेटियर-कर्नल सी.ई. लुआर्ड 1907 पृ. 68)। ग्वाल सागर तालाब बना तो क्षेत्र के लोगों, पशुओं एवं वन्य प्राणियों को जल मिला तो जीवनदान मिला। बहता पानी ठहरा तो लोगों का विचरण रुक गया। घुमन्तू जीवन बस्तियों के रूप में ठहर गया था।

बाँध बस्ती धीरे-धीरे व्यापारिक नगर बन गया था। क्षेत्र की वनोपज महुआ, गुली, अचार चिरोंजी एवं गुड़, चावल, घी का निर्यात चन्देरी को होने लगा था। चन्देरी के प्रसिद्ध व्यापारी सेठ पाड़ाशाह अपने लद्दू बैलों-भैंसो (टाड़ौं) पर दिशावरी सामान लादकर बाँध क्षेत्र में लाकर दे जाते थे और यहाँ की सामग्री टाड़ौं पर लादकर चन्देरी ले जाते थे। अधिसंख्य जैन मतावलम्बी उसी समय चन्देरी-ललितपुर परिक्षेत्र से यहाँ आए और व्यापार व्यवसाय की सुविधा से ग्रामों में फैल गये थे तथा यहाँ निवास करने लगे थे।

बाँध का ग्वाल सागर सरोवर इस क्षेत्र का सबसे बड़ा तालाब है, जिसका भराव क्षेत्र दस-बारह किलोमीटर की परिधि में है। जिसके किनारे-किनारे जल सुविधा के कारण जनबस्तियाँ बस गई थीं। इनमें बाँध, सेबार, रमपुरा, बनैरा, कैलपुरा, बम्हौरी एवं कछयांत चन्दूली तथा डुम्बार ग्राम प्रमुख रहे हैं। अपने निर्माण के समय ग्वाल सागर एक झील थी, जिसका जल निकलता ही नहीं था। केवल एक पाँखी पूर्वोत्तर भाग के पठार से थी जिसे पट्टी कहा जाता था। जहाँ से जब कभी अतिरिक्त बरसाती पानी ही बाहर बहकर निकल पाता था।

मदन वर्मा ने ग्वाल सागर तालाब एवं बाँध ग्राम स्थापित करने के बाद बाँध ग्राम के पश्चिम की टौरियों के मध्य एक छोटी सी तलैया भी बनवाई थी। ग्वाल सागर विशाल झील बनाई तो उसके समीप ही तलैया बनवाई तो लोगों ने उसका नाम ‘सौतेली’ रख लिया था। सौतेली तलैया के पश्चिम में बहेरिया नाले (वर्तमान विन्धयवासनी नाला) के वाम पार्श्व की विन्ध्य श्रेणी पर कौशिकी देवी (विन्ध्य पर्वत श्रेणी पर वास करने से विन्ध्यवासिनी देवी) की बलुआ प्रस्तर प्रतिमा स्थापित की थी। विन्ध्यवासिनी देवी मन्दिर से क्षेत्र का प्राकृतिक सौन्दर्य निहारते ही बनता है जो मनोहारी एवं आकर्षक है।

ग्वाल सागर झील पहाड़ों, टौरियों, घाटियों एवं वादियों के मध्य हरित अटवी वृक्षावलियों से घिरी सटी बड़ी आकर्षक एवं मनोहारी है। समय बीतता गया। काल-चक्र के झोंकों में सन 1181-82 ई. बैरागढ़ (उरई) के मैदान में बुन्देलखण्ड का महाभारत पृथ्वीराज चौहान एवं मदन वर्मा के नाती परमाल देव के मध्य हुआ था, जिसमें चन्देली राजसत्ता का पराभाव हो गया था और बुन्देला राजसत्ता का आविर्भाव हुआ था।

ओरछा के महाराजा विक्रमाजीत सिंह (1776-1817 ई.) ने झाँसी के मराठा मामलतदारों की लूट एवं आतंकवाद से त्रस्त होकर सन् 1783 में ओरछा के बजाय टेहरी (टीकमगढ़) को राजधानी बना लिया था। उन्होंने अपनी सैन्य व्यवस्था को सुदृढ़ करने के लिये सुदृढ़, सुरक्षित दुर्ग निर्माण के निमित्त, पहाड़ों, घाटियों, खन्दियों खन्दकों एवं वनाच्छादित वाले बाँध ग्राम का चयन कर, बड़ा पहाड़ के पूँछा (नोंका) से पेटका पहाड़ के उत्तुंग शिखर के पूर्वी पार्श्व में ग्वाल सागर तालाब के किनारे-किनारे लगभग 20 हेक्टेयर विस्तार में गिरि दुर्ग, वन दुर्ग एवं जल दुर्ग जैसा मिश्रित सुन्दर, सुदृढ़ एवं सुरक्षित सैन्य दुर्ग का निर्माण सन 1812 ई. में कराया था, जिसमें ओरछा राज्य की सेना, तोपें एवं युद्ध सामग्री का भण्डार रहता था। इस किले का मुख्य कीला दरवाजा एक गहरी खन्दक की घाटी पर बड़ा पहाड़ के पूँछ पर निर्मित किया गया है, जिस तक किसी भी शत्रु का पहुँच पाना असम्भव रहा है। कीला दरवाजा ग्वाल सागर बाँध प्रांगण पर खुलता है। इस बाँध प्रांगण पर खुलता है। इस बाँध प्रांगण में बाबा कपूरशाह की मजार है तो तालाब के शिवघाट से संलग्न श्री कृष्ण के बड़े भाई श्री बल्दाऊ जी का मन्दिर महाराजा विक्रमाजीत सिंह ने बनवाकर, किला उन्हीं को समर्पित करते हुए बल्देवगढ़ नाम रखा था। किला का नामकरण बल्देवगढ़ हुआ तो बाँध बस्ती को भी बल्देवगढ़ बोला-कहा जाने लगा था। बुन्देलखण्ड के तालाब महाराजा विक्रमाजीत सिंह ने किला बल्देवगढ़ को जल के मध्य करने के उद्देश्य से उत्तरी पूर्वी किनारे पेटका पहाड़ की गहरी खन्दक, जिसमें से ग्वाल सागर का अतिरिक्त जल प्रवाहित होता जाता था, पर चूना पत्थर का लगभग 45 फुट ऊँचा एवं 35 फुट चौड़ा सुन्दर सीढ़ियों-घाटोंदार बाँध बनवाकर जन निस्तारी तालाब का निर्माण कराया था जो ग्वाल सागर से बाहर निकलने वाले जल से भरता है। इस तालाब का नाम जुगल सागर रखा था तथा उसके बाँध पर जुगल किशोर जी (श्री कृष्ण) का मन्दिर बनवा दिया था। इसके अतिरिक्त एक दूसरा तालाब धरम सागर, बल्देवगढ़ के पश्चिमोत्तर भाग में बनवाया था, जिसका बाँध चूना पत्थर का पक्का बना हुआ है। इसमें जुगल सागर का अतिरिक्त जल एवं बड़े पहाड़ के पश्चिमी भाग की पटारों का पानी आता है। इसका जल भराव क्षेत्र जुगल सागर के पीछे बने बाँध से लेकर ग्वाल सागर बाँध के पृष्ठ भाग में बनी मदनबेर तक था। इस प्रकार किला एवं बल्देवगढ़ नगर चारों ओर जल से घेर दिया गया था। मानो किला एवं बस्ती को जल की रजत करधनी पहना दी गई हो। लासपुर की सलक्षण वर्मा के युग की त्रिदेवी की प्रतिमा नायक बस्ती में स्थापित की गई थी।

बुन्देला राज्य शासन काल में बल्देवगढ़ (बाँध) एक विकसित व्यावसायिक केन्द्र बन गया था। बड़े-बड़े धनी व्यापारी, सेठ-साहूकार यहाँ निवास करते थे, जिनमें तिवारी जू, मिसर जू, चौधरी जी (वैश्य), नायक जी आदि प्रमुख राजमान्य घराने थे। यहाँ के लोगों के भवन मकान पक्के चूना ईंट के दुमंजिला पालकी शैली के दरवाजों वाले थे। अधिसंख्य बस्ती ब्राम्हण विद्वानों एवं साहूकारों की थी। ओरछा नरेश प्रताप सिहं तो इसे ‘काशी’ कहा करते थे। राजा ने पश्चिमी पार्श्व की पठार में सुन्दर बगीचों की स्थापना कराई थी। केतकी का बगीचा खन्दियाँ की पटार में था। बगीचों के चारों ओर कटीले मोटे बाँसों की बागड़ें थीं। बड़े पहाड़ को चुल के पास से काटकर ग्वाल सागर झील से जल निकासी हेतु कुठिया सुलूस बनाया गया था, जहाँ से नहर द्वारा पानी लाकर भदभदा से नहरों द्वारा चन्दूली विन्ध्यवासिनी हार, कछयाँत बल्देवगढ़ ग्रामों के कृषकों तथा तीन राजकीय उद्यानों, बगीचों को दिया जाता था। एक समय था राजशाही का, जब बल्देवगढ़ ग्रीष्म ऋतु में भी वर्षा काल का ही बना रहता था। यहाँ गर्मी के मौसम में भी पानी बहता रहता था। गर्मी की ऋतु में शिमला की शीतलता यहाँ निवास करती थी। अब लू-लपट, धूल और जलाभाव का डेरा पड़ा हुआ है।

इस ग्वाल सागर तालाब से वर्तमान में दो नहरें निकाली गई हैं। पुरानी का जीर्णोद्धार कर इसे 6 किलोमीटर तक बढ़ाया गया है, जो बायीं नहर है। दायीं नहर लगभग 26 किलोमीटर लम्बी है। इन नहरों से लगभग 1500 हेक्टेयर कृषि भूमि सींची जाती है। सिंचित रकबा तो बढ़ा लिया गया, जबकि पानी की आवक के साधन विकसित नहीं किए गए हैं। ग्वाल सागर तालाब से बल्देवगढ़, कछयाँत, बनैरा, कैलपुरा, बम्हौरी, रमपुरा, सेवार, चन्दूली, जिनागढ़ खास, जिनागढ़ जंगल, बलवन्त नगर, देवी नगर, राजनगर, जटेरा, सुजानपुरा खास, सुजान ऊगढ़ एवं श्यामपुरा आदि ग्रामों को कृषि सिंचाई एवं पशुधन को पानी की सुविधा है।

ग्वाल सागर तालाब में मत्स्य पालन होता है। यहाँ की रोहू मछली का बाजार कोलकाता है, जहाँ यहाँ के रोहुआ की भारी माँग रहती है। इस तालाब के अगोर में बसे ग्रामों में कृषि जोत भूमि बढ़ गई है। समतल भूमि के अलावा लोग टौरियों के ढाल भी जोत देते हैं, जिस कारण बरसात में भूमि क्षरण होकर मिट्टी तालाब में आती रहती है। नहरों से किसान खेतों की सिंचाई को पानी लेते हैं, परन्तु जब सिंचाई हो जाती है तो नहर का ‘औंका’ बन्द करने के बजाय, खदानों, नालियों की ओर पानी छोड़ देते हैं, जो दिन-रात बहता एवं बर्बाद होता रहता है। तालाब के बाँध एवं पूरी नहरों की छिलाई-सफाई दुरुस्ती भी आवश्यक है। नियमित मरम्मत, साफ-सफाई से तालाब की देखभाल एवं सुरक्षा रहेगी।

ग्वाल सागर झील के अन्दर मध्य में एक टापू (द्वीप) है, शिव मन्दिर है। यदि टापू पर पर्यटक कॉटेज निर्मित करा दी जाए और नौका विहार (बोटिंग सैर सपाटा) व्यवस्था कर दी जाए तो सिंचाई विभाग के साथ-साथ स्थानीय लोगों की आय में इजाफा होगा। बल्देवगढ़ कस्बा से बनैरा, रमपुरा, सेवार को आने-जाने के लिये भी नालें चलवाई जा सकती हैं। इससे आने-जाने वाले लोगों का समय बचेगा और प्रकृति का आनन्द भी मिलेगा।

बल्देवगढ़ परिक्षेत्र सिंचाई जल के अभाव से सदियों से पिछड़ा रहा है। तालाब हैं, परन्तु वर्षा कम होने एवं कृषि रकबा बढ़ जाने से तालाब सूख ही जाते हैं। यदि सुजारा के पास सेधसान नदी पर एक ऐनीकट बन जाए और ऐनीकट शाखा को लुहर्रा से अहार के मदन सागर एवं बल्देवगढ़ के ग्वाल सागर सरोवरों की ओर विभक्त कर दिया जाए तो क्षेत्र में पानी ही पानी होगा। क्षेत्र सर सब्ज हो जाएगा।

2. मदन सागर अहार (मदनेशपुरम) Madan Sagar Aahar (Madaneshapuram) :

अहार ग्राम टीकमगढ़ के पूर्वी अंचल में ही बल्देवगढ़ परिक्षेत्र में स्थित है जो 24.44 उत्तरी अक्षांश एवं 79.5 पूर्वी देशान्तर पर टीकमगढ़ से 27 किलोमीटर पूर्व में तथा बल्देवगढ़ से 10 किलोमीटर की दूरी पर पश्चिम को है। यहाँ आने-जाने के लिये टीकमगढ़-छतरपुर बस सुविधा नियमित प्राप्त रहती है। टीकमगढ़ से वाया नारायणपुर अहार बल्देवगढ़ बस यातायात सुविधा भी है, जिससे आप सीधे अहार पहुँचते हैं। टीकमगढ़-बल्देवगढ़ बस मार्ग पर अहार पुलिया बस-स्टॉप से अहार तक को टैक्सी सुविधा भी मिलती है।

बाँध (बल्देवगढ़) क्षेत्र में पहाड़-पहाड़ियाँ एवं टौरियाँ सर्वाधिक रही हैं जिनके मध्य की खन्दियों में होकर क्षेत्र का बरसाती धरातलीय प्रवाहित जल बहता चला जाता था। अहार (मदनेशपुरम) की पहाड़ी की खाँद से एक बड़ा नाला दक्षिण-पूर्व का धरातलीय जल समेटता हुआ पहाड़ी श्रृंखला की पटार से निकलता हुआ, पश्चिमोत्तर दिशा में प्रवाहित सौनदा (सौरदी) नाले से मिलकर उर नदी में विलय होकर उत्तर की ओर चला जाता था।

मदन वर्मा ने यहाँ की पहाड़ी श्रृंखलाओं को मध्य बाँध में मिलाते हुए लगभग 350 मीटर लम्बा, 20 मीटर चौड़ा एवं 8 मीटर ऊँचा विशाल बाँध (पाल) बनवाकर अपने नाम पर सरोवर तैयार करा दिया था जिसे मदन सागर ताल कहा जाता रहा है। बाँध के मध्योतर मदनेशपुरी बस्ती बसा दी थी, तथा मदनेशपुरी बस्ती के दक्षिणी पार्श्व की टौरिया पर मदनेश्वर शिव मठ बनवाया था। मदनेश्वर मठ के पश्चिमी पार्श्व में टौरिया की तलहटी में सुन्दर बावड़ी का निर्माण कराया था। इस सरोवर के बाँध में दो कौनियाँ उत्तरी भाग में एवं दक्षिण भाग में हैं तथा दोनों कौनियों को मिलाते हुए बाँध के मध्य भाग में चौड़ा अर्द्ध चन्द्राकार, भराव की ओर उभरे पेट की भाँति बड़ा चांदौ है। इस सागर के जल के निकास को कोई कुठिया, औनों या सलूस नहीं था। अतिरिक्त जल उत्तर की ओर की पहाड़ी की खाँद से निकलता था। बाँध के दक्षिणी पूँछा की टौरिया पर घुमन्तु ग्वालों-अहीरों को बसा दिया था, जिसे ढड़कना ग्राम कहा जाता रहा है।

मदन वर्मा के मृत्योपरान्त उसका पौत्र परमालदेव (1165-1202 ई.) महोबा राजगद्दी पर आसीन हुआ था। अहार जैन सिद्ध क्षेत्र के साहित्य संग्रह में लेख प्राप्त है कि चन्देल काल में चन्देरी के धनाढ्य व्यापारी जैन पाणाशाह सलक्षणपुर (सरकनपुर) विलासपुर (लासपुर) से अपने टाँड़ौं पर गुड़, घी, चावल चिरौंजी एवं राँगा लादे हुए मदनेशपुरम चन्देरी वापिस जा रहे थेे। जब उनका टाँड़ौं तालाब के पूँछा से आगे बढ़ रहा था तो एक बैल जिस पर राँगा लदा हुआ था, उसका खुर वहाँ पड़ी हुई एक विशाल चट्टान से टकरा गया। जैसी ही बैल का खुर चट्टान से छुआ तो उस पर लदा हुआ राँगा चाँदी हो गया था। चाहे पाणाशह क्षेत्र के दुकानदारों आसामियों से उदारी के चुकावरे में चाँदी भरकर ले जा रहे हों और लुटेरों के भय से राँगा कहते रहे हों और जब चट्टान से टकराने पर बैल की खोजी (खास) जमीन पर गिरी हो तो चाँदी जमीन पर बिखर गई हो तो पाणाशह ने बहाना बनाते हुए कह दिया हो कि मेरे बैल की खोजी में रांगा था, लेकिन इस चट्टान के स्पर्श से राँगा चाँदी हो गया है। यह स्थान एवं चट्टान सिद्ध है। बस इस चमत्कार से पाणाशह सेठ ने उस विशाल चट्टान से श्री शान्तिनाथ जी की प्रतिमा गढ़ने के लिये प्रसिद्ध मूर्तिकार वास्तुकार वाल्हन के पुत्र महामतिशाली पापट को बुलवाकर संवत् 1237 के अगहन शुदी 3 शुक्रवार (सन् 1180 ई.) को बनवाकर, परमालदेव के समय ही इस 21 फुट ऊँची प्रतिमा की प्राण प्रतिष्ठा सन 1182 ई. में की गई थी। श्री शान्तिनाथ जी को पहले के लोग मूड़ा देव कहा करते थे। यह स्थल मदन सागर तालाब के दक्षिणी पूँछा के पश्चिमी पार्श्व में है। मैं यह भी कहना चाहूँगा कि सरकनपुर बल्देवगढ़ (बाँध) क्षेत्र में कहीं भी राँगा की खदानें नहीं रही हैं। हाँ बाँध के पेटका पहाड़ के पेटकाहार (भाटा) में चाँदी का पत्थर प्राप्त रहा है।

मदन सागर तालाब में बरसाती धरातलीय जल लाते दो बड़े नाले पटैरिया नाला एवं कुसैरिया नाले आते हैं। जो ताल लिधौरा, बगौरा, शा, बाजीतपुरा एवं बैरवार ग्रामों के मौजों का बरसाती जल लाते हुए, इसे भरते हैं। परन्तु अब इसमें पानी की आवक कम हो गई है क्योंकि इसके जल स्रोतों (नालों) पर नए-नए बाँध बन गए हैं। फिर भी तालाब एक छोटा समुद्र-सा है। बाँध की पैरियाँ खिसक रही हैं। तालाब के बाँध पर सिंचाई विभाग का कार्यालय है, जिसकी नाक के नीचे बाँध दुर्दशा का शिकार है। तालाबों की मरम्मत-दुरुस्ती का धन अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों की जेबों में चला जाता है। भ्रष्टाचार कर लेने को अधिकारी-कर्मचारी एवं जनप्रतिनिधि चौकस-चौकन्ने रहते हैं और ग्राम क्षेत्र के तालाबों की देखरेख, सुरक्षा एवं मरम्मत-दुरुस्ती जैसे रचनात्मक कार्यों में उदासीन रहते हैं क्योंकि सार्वजनिक हित के कार्यों के बजाय वे व्यक्तिगत हित अधिक साधते हैं। उसी समय पारस पत्थर समूचे बाँध परिक्षेत्र में चला, जिसके चमत्कार से क्षेत्र के प्रत्येक नालियाँ नाले पर बाँध (पाल) बनाकर तालाब तैयार किए गए थे। मदनेशपुरम से दक्षिण की ओर 6 किलोमीटर की दूरी पर दो पहाड़ियों के मध्य की पटार में बाँध बनवाकर सुन्दर सरोवर तैयार किया गया था। इस बाँध का मध्य भाग मदन सागर तालाब मदनेशपुरम की भाँति चौड़ा है। जिसके भराव क्षेत्र की ओर गोलाई लिये हुए चाँदी है ताकि तालाब में भरने वाला जल चाँदे से टकराकर दाएँ-बाएँ कटता जाय और बाँध (पाल) पर पानी का दबाव न बन सके। तालाब के बाँध पर दो शिव मठ हैं। पृष्ठभागीय शिव मठ कलात्मक है, जिसमें एक शिला लेख संस्कृत में 2 फीट दस इंच लम्बा, दो फीट दो इंच चौड़ा लगा होने का जैन साहित्य में उल्लेख मिलता है। जिसमें 28 पंक्तियाँ चन्देल राजाओं के लोकहितकारी कार्यों की प्रशस्ति विषयक थीं। वर्तमान में मठ भी ध्वस्तावस्था में है और शिला लेख भी गायब है। बाँध के उत्तरी पार्श्व में एक विशाल सूर्यनारायण मन्दिर बनवाया गया था और भगवान सूर्यनारायण के नाम पर इस बस्ती का नामकरण ‘नारायणपुर’ किया गया था। कालान्तर में नारायणपुर एक सम्पन्न नगर हो गया था। ऐसी जनश्रुति है कि नारायणपुर के पहाड़ों के पत्थर से चाँदी बनाई जाती थी। नारायणपुर के तालाब के बाँध के पीछे की बहारुओं में गन्ने की खेती बहुतायत से होती थी जिससे गुड़ बनाकर बाहर भेजा जाता था। यहाँ चन्देलकालीन पत्थर के कोल्हू से गन्ना की पिराई कर रस निकालकर गुड़ बनाया जाता था। इसी नारायणपुर नगर के अग्रहार (आगे के भाटे) में मूड़ादेव (श्री शान्तिनाथ का मन्दिर) होने से उसे अहार कहा जाने लगा था। उत्तर चन्देलकाल में मदनेशपुरी ध्वस्त हो गई। मदनेश्वर शिव मठ गिर गया। क्षेत्र पर कोई जमाल मुसलमान का बोलबाला हो गया तो अहार को मौजा अहार जमालपुर कहा जाने लगा था।

बुन्देलखण्ड में एक कहावत रही है कि ‘घर में साला, खेत में नाला और मुहल्ले में लाला’ का बोलबाला चलता हो जाय तो तीनों विकसित नहीं हो पाते न वहाँ सरसता रहती है। उरई के माहिल देव पड़िहार की बहिन मलना देवी को परमालदेव राजा महोबा ने बलपूर्वक अपनी रानी बना लिया था, जिस कारण माहिल परमालदेव से आन्तरिक विद्वेष रखता था। यद्यपि परमाल देव ने माहिल को अपने यहाँ रखकर सामन्ती पद देकर उसे प्रसन्न करने की चेष्टा की थी। परन्तु पुराना शत्रु एवं नया मित्र जैसे कभी वफादार नहीं माने जाते। वही स्थिति परमालदेव और माहिलदेव की हुई थी। माहिलदेव महोबा के राजमहल में रहते हुए भी चन्देल राज्य के विनाश के लिये कूटनीतिक दावपेंच लगाता रहता था। दूसरे पड़ोसी सशक्त राजाओं के साथ ऐसे अशोभनीय कृत्य करा देता था कि वे असन्तुष्ट होकर महोबा राज्य पर आक्रमण कर दें। उसे सफलता भी मिली। पृथ्वीराज चौहान के सैनिकों, अधिकारियों के साथ महोबा के बाग में विश्राम कर लेने की बात पर उसने उन्हें अपमानित किया और युद्ध के लिये आमन्त्रित किया। परिणामस्वरूप पृथ्वीराज चौहान ने 1181 ई. में चन्देल राज्य महोबा पर आक्रमण कर दिया था। बैरागढ़ (उरई) के पास चौहान-चन्देल युद्ध हो गया, जिसमें पृथ्वीराज चौहान ने परमालदेव को पराजित कर उसके वैभव को धूल-धूसरित कर दिया था। चन्देलों की शक्ति क्षीण होते ही बुन्देली राजसत्ता का अभ्युदय हुआ था।

बुन्देला नरेशों ने भी जनहित में बरसाती धरातलीय जल संग्रहण के लिये तालाबों के निर्माण की योजना यथावत जारी रखी। वीरसिंह देव चरित्र (अंग्रेजी ऐतिहासिक) चिरंजीलाल माथुर पृ. 2 पर उल्लेख है कि ओरछा (टीकमगढ़) नरेश महाराजा प्रतापसिंह ने राज्य के किसानों को कृषि सिंचाई सुविधा प्रदान करवाने हेतु 73 पुराने चन्देली तालाबों का जीर्णोद्धार कराया था और उनमें सिंचाई के लिये पानी निकास हेतु कुठियाँ बनवाकर सलूस लगवाये थे। इसके साथ खेतों (टरेटों) तक नहरें खुदवाई थी। चन्देली तालाबों के जीर्णोद्धार के अतिरिक्त उन्होंने 450 नवीन तालाबों का निर्माण कराया था, जिनमें कुछ कच्चे मिट्टी के बाँध वाले थे तो कुछ चूना की पट्टी (बाँध) बनाकर स्टाप डैम सरीखे ही थे, तो कुछ पक्के पत्थर की पैरी एवं मिट्टी के सुदृढ़ तालाब थे।

मदन वर्मा के बनवाये मदन सागर अहार के बाँध पर मदनेशपुरम बस्ती बुन्देला युग में ध्वस्त हो गई थी। मदनेश्वर नाथ का मठ भी ध्वस्त हो गया था। महाराजा प्रताप सिंह ने बाँध पर ध्वस्त भवनों को बाँध पर ही समतल कराकर तालाब के जल निकासी हेतु दो सुलूस कुठिया बनवा दिए थे। मदन सागर तालाब का जो अतिरिक्त जल उत्तर की ओर की पहाड़ियों की पटारों, खदियों से निकल जाता था, उसे महाराजा प्रताप सिंह (1874-1930) ने लड़वारी में दो तालाब माँझ का ताल एवं नया ताल बनवाकर रोक दिया था। इससे मदन सागर अहार तालाब की लम्बाई 6 किलोमीटर हो गई थी। वर्षा ऋतु में जब मदन सागर सरोवर 6 किलोमीटर लम्बा भरता है और पर्यटक तालाब के भराव-बाँधों पहाड़ियों पर से सिद्ध क्षेत्र अहार जी जाते-आते हैं तो सौन्दर्य छटा अवलोक कर विमोहित हो जाते हैं। मानो भगवान शान्तिनाथ ने अपनी शान्ति यहाँ की वादियों, घाटियों, तालाब की उत्तुंग पर्वत श्रेणियों को भी प्रदान कर दी हो। मदन सागर तालाब में मत्स्य पालन भी होता है। सरोवर का सौन्दर्य अवलोकनीय है।

3. मदन सागर सरोवर, जतारा Madan Sagar Sarovar, Jatara

मदन सागर सरोवर जतारा, टीकमगढ़ जिले के उत्तरी-पूर्वी अंचल में, टीकमगढ़ से 40 किलोमीटर की दूरी पर 25.1 उत्तरी अक्षांश एवं 79.6 पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। जतारा नामकरण के बारे में आइने अकबरी ग्रन्थ (ब्लोचमैन भाग-2, पृ. 188) में उल्लेख है कि यहाँ एक सूफी सन्त अव्दर पीर रहा करते थे। उनके दर्शनों के लिये आगरा से अबुल फजल यहाँ की जात्राएँ (यात्राएँ) किया करते थे। अबुल फजल की जात्राओं के कारण ही इस कस्बा का नाम जतारा पड़ गया था। पं. गोरेलाल तिवारी ने अपने ग्रन्थ ‘बुन्देलखण्ड का संक्षिप्त इतिहास’ में बतलाया है कि जतारा का प्राचीन नाम जटवारा था, कालान्तर में जटवारा से जतारा हो गया। ओरछा स्टेट गजेटियर में यह भी उल्लेख है कि “नौ सौ बेर, नवासी कुआँ, छप्पन ताल जतारा हुआ।”

जतारा तालाब के दक्षिणी पार्श्व में गौर (गौरइया) पहाड़ है तो उत्तरी पार्श्व में दतैरी देवी पहाड़ है। गौरेया माता पहाड़ एवं दतैरी देवी पहाड़ को जोड़ती पहाड़ी नीची श्रृंखला थी, जिसकी पटार (खाँद) से पश्चिमोत्तर क्षेत्र का बरसाती धरातलीय जल प्रवाहित होता रहता था, जो पूर्व दिशा की नीची भूमि से उर नदी में चला जाता था। पश्चिमोत्तर भाग में बड़ी ऊँची-ऊँची अनेक टौरियाँ-पहाड़ियाँ थीं जो हरे-भरे पेड़ों से आच्छादित बड़ी आकर्षक मनोहारी लगती रही हैं।

मदन वर्मा चन्देल ने प्राकृतिक सौन्दर्य से भरपूर जतारा के गौरेया माता पहाड़ एवं उत्तर-पूर्व के दतैरी माता पहाड़ के मध्य की पहाड़ी नीची श्रृंखला को बीच में दबाते-चपाते हुए विशाल सरोवर का निर्माण करा दिया था, जिसे मदन वर्मा के नाम से मदन सागर तालाब कहा जाने लगा था। इस मदन सागर सरोवर के अतिरिक्त पानी के निकास के लिये गौरेया पहाड़ के दक्षिणी-पश्चिमी पार्श्व में एक छोटा-सा बाँध निर्मित किया गया था, जो तालाब के पूर्ण भराव का प्रतीक (मान) था। अतिरिक्त पानी इसी बाँधनुमा पाँखी को पार कर दक्षिण-पूर्व की निचली भूमि से बहता चला जाता था। मदन सागर तालाब का मुख्य प्रथम बाँध लगभग 600 मीटर लम्बा, 30 फुट ऊँचा एवं 60 फुट चौड़ा है, जो आगे-पीछे पत्थर की पैरियाँ लगाकर बीच में मिट्टी का भराव कर बनाया गया है। इसका भराव क्षेत्र तीन हजार एकड़ से भी अधिक है। जब यह तालाब पूर्णरूपेण भर जाता है तो एक समुद्र की भाँति दिखता है। जतारा कस्बा एवं यहाँ के मदन सागर तालाब की यह विशेषता है कि बस्ती पहाड़ों के पूर्वी अंचल की निचाई में है और मदन सागर तालाब पहाड़ों के मध्य की ऊँचाई वाली समतल पटारी भूमि पर है। बस्ती निचाई में, तालाब ऊँचाई पर, जिस कारण यहाँ हर समय समशीतोष्ण मौसम बना रहता है। इसीलिये जतारा को बुन्देलखण्ड का स्विट्जरलैण्ड माना जाता है।

मदन सागर तालाब के प्राकृतिक मनमोहक सौन्दर्य का आनन्द लेने हेतु राजा मदन वर्मा चन्देल ने तालाब के मध्य के ऊँचे पठार पर एक भवन बनवा दिया था, जिसे मदन महल कहा जाता था। उक्त महल वर्तमान में ध्वस्त हो चुका है, परन्तु उक्त महल के स्थान पर एक शिव मन्दिर बनवा दिया गया है। तालाब के बाँध से पहाड़ियों, टौरियों की हरीतिमा के मध्य से अस्त होते सूर्य की लालिमा की छवि निहारते ही बनती है। ऐसा लगता है मानो सूर्य की लालिमा तालाब की लोल-लोल लहरों के ऊपर बैठकर अठखेलियाँ करती पालना (झूला) झूल रही हों। चाँदनी रात में उत्तुंग लोल लहरें मानों चारूचन्द्र की स्वच्छ चाँदनी में अनूठी छटा बिखेरती अठखेलियाँ कर रही हों अथवा मानो अगणित चन्द्र मदन सागर तालाब के जल में क्रीड़ा करते हुए मदमस्त होकर झूम रही हों।

तालाब के दक्षिणी पार्श्व में गौर पहाड़ (गौरइया पहाड़) है जिस पर गौरइया देवी का मन्दिर है। शायद इन्हीं देवी के नाम पर पहाड़ का नाम गौरइया पहाड़ पड़ा हो अथवा चन्देल राजाओं के पूर्व यहाँ गोरवंशीय क्षत्रियों का आधिपत्य रहा हो, जिससे इसे गौर पहाड़ कहा गया हो। गौर पहाड़ के नीचे बाँध के पूँछा पर सत मढ़ियाँ (सात मढ़ी) बनी हुई थीं। जिनका उल्लेख ओरछा स्टेट गजेटियर 1907 पृ. 78 पर है। लिखा है कि मढ़ियों पर एक शिलालेख था जिसमें उल्लेख था कि “सतमढ़ी के छायरैं और तला के पार। धन गड़ो है अपार। जो होवे चन्देल कौं सो लेव उखार।”

सतमढ़ियों के समीप ही प्राचीनकालीन ईदगाह मस्जिद है। बाँध के ऊपर एक सुन्दर विश्रामगृह बना हुआ है। विश्रामगृह के पास ही सन् 1897 ई. में महाराजा प्रताप सिहं ने तालाब से कृषि सिंचाई हेतु जल निकासी के लिये कुठिया, सलूस एवं नहरों का निर्माण कराया था। बाँध के पीछे नहर दो शाखाओं में विभक्त है। एक शाखा बाँध के पीछे के नजरबाग में से किले के पास से बस्ती में से गुजरती हुई राम बाग आदि बगीचों को सिंचाई जल देती गाँव के बाहर दूर दूर तक चली गई है। दूसरी शाखा मुख्य नहर (दायीं नहर बैरवार क्षेत्र की भूमि की सिंचाई करती है। किटा खेरा, मचौरा, पिपरट, बहारू एवं बैरबार ग्रामों की कृषि सिंचाई इसी दायीं नहर से होती है। बाँध के पीछे नौ देवियों के मन्दिर एक पुंज रूप में निर्मित खड़े हुए हैं। बाँध के उत्तरी पूर्वी भाग की पहाड़ी पर किला है, जो ओरछा नरेश भारतीचन्द ने बनवाया था। उनके भाई मधुकर शाह भी इस किले में रहे थे। जतारा का किला एवं महल हिन्दू मुस्लिम स्थापत्य शैली में निर्मित है जबकि किले का पूर्वाभिमुखी प्रवेश दरवाजा हिन्दू शैली का ही है। यहाँ की एक भग्न गुर्ज रामशाह गुर्ज नाम से जानी जाती है। किले में हनुमान मन्दिर है। इसी से संलग्न तालाब की ओर मुस्लिम शैली की इमारतों के खण्डहर हैं तो बाँध के पीछे दक्षिणी-पूर्वी भाग में स्लामशाह सूर (पुत्र शेरशाह सूरी) के समय के अनेक स्लामी भग्न मकबरे हैं, जिनमें बाजने का मठ, बारह दरवाजी मकबरा के अतिरिक्त 20 से 30 भवनों, मकबरों के भग्नावशेष अवलोकनीय हैं। किला से संलग्न बाँध में तालाब के भराव की ओर एक कुहनी निर्मित है जो तालाब के जल का दबाव (जलाघात) रोकने के लिये है। नदियों-नालों से आता वेगपूर्ण जल कुहनी से टकराकर दाएँ-बाएँ विभक्त होकर भराव क्षेत्र में फैल जाता है और बाँध सुरक्षित रहता है।

मदन सागर तालाब में बरसाती धरातलीय जल लाते दो बड़े नाले पटैरिया नाला एवं कुसैरिया नाले आते हैं। जो ताल लिधौरा, बगौरा, शा, बाजीतपुरा एवं बैरवार ग्रामों के मौजों का बरसाती जल लाते हुए, इसे भरते हैं। परन्तु अब इसमें पानी की आवक कम हो गई है क्योंकि इसके जल स्रोतों (नालों) पर नए-नए बाँध बन गए हैं। फिर भी तालाब एक छोटा समुद्र-सा है। बाँध की पैरियाँ खिसक रही हैं। तालाब के बाँध पर सिंचाई विभाग का कार्यालय है, जिसकी नाक के नीचे बाँध दुर्दशा का शिकार है। तालाबों की मरम्मत-दुरुस्ती का धन अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों की जेबों में चला जाता है। भ्रष्टाचार कर लेने को अधिकारी-कर्मचारी एवं जनप्रतिनिधि चौकस-चौकन्ने रहते हैं और ग्राम क्षेत्र के तालाबों की देखरेख, सुरक्षा एवं मरम्मत-दुरुस्ती जैसे रचनात्मक कार्यों में उदासीन रहते हैं क्योंकि सार्वजनिक हित के कार्यों के बजाय वे व्यक्तिगत हित अधिक साधते हैं।

चन्देल काल में जतारा परिक्षेत्र में जल प्रबन्धन हेतु सर्वाधिक तालाबों का निर्माण कराया गया था। पहाड़-पहाड़ियों एवं टौरियों के मध्य से बरसाती जल के नाले-नालियाँ बहते थे, जिन्हें पत्थर की पैरियों एवं मिट्टी के विशाल सुदृढ़ बाँधों से रोककर बड़े-बड़े तालाब बनवा दिए गए थे। प्रवाहित जल को तालाबों में थमा दिया गया था। पानी थमा तो लोगों का चलता-फिरता घुमन्तु जीवन थम गया था। पानी थमा तो पानी का जलस्तर ऊँचा बढ़ा। सैकड़ों बेरे (बावड़ियाँ) और कुँआ बने। जतारा की लोह लंगर व्यापारियों द्वारा बनवाई बावड़ियाँ तो शायद भारत में अपने ढंग की निराली हैं, जो आकार में विशाल और गहरी हैं। उनमें सीढ़ियाँ नहीं है बल्कि दूर से पानी तक सपाट ढालू मार्ग हैं ताकि पशु भी आसानी से उतरते हुए पानी पीते रहें। ऐसी निराली स्थापत्य शैली में बनी लोह लंगर बावड़ियाँ केवल जतारा में ही हैं जिनमें आदमी, पशु सभी स्वमेव स्वतन्त्रतापूर्वक जल पीते रहे हैं।

जतारा में पानी का भरपूर प्रबन्ध हुआ तो क्षेत्र का आर्थिक, धर्म, संस्कृति कि विकास हुआ। आइने अकबरी में व्लोचमैन ने लिखा है कि मदन सागर बाँध के ऊपर निर्मित किले की दक्षिणी दीवाल से संलग्न एक दरगाह अब्दा पीर की है, जहाँ अबुल फजल दुआ लेने आया करता था। वह अब्दा पीर सन्त सम्भवतः सूरीवंश के सुलतान स्लामशाह सूरी के समय जतारा में रहे हों। स्लामशाह सूरी के समय जतारा स्लामिक संस्कृति का नगर था। उस समय उसे स्लामाबाद के नाम से जाना जाता था।

टीकमगढ़ जिला गजेटियर सन 1995 पृ. 100 पर अब्दा पीर साहब के विषय में उल्लेख है कि अजमेर के ख्वाजा मुइनुद्दीन चिस्ती (सन्त) ने अपने एक मुरीद (शिष्य) ख्वाजा रुकनुद्दीन समरकन्दी की शाहबूरी के जतारा क्षेत्र में रहने की हिदायत दी थी। अपने गुरू की हिदायत पाकर ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब, जो उस समय चन्देरी में रहते थे, जतारा (स्लामाबाद) आए और मांचीगढ़ के फूटा ताल को एकान्त-शान्त उपयुक्त समझ, वहीं रहने लगे थे। जैसे ही क्षेत्र के लोगों को ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब के माँची के फूटा ताल पर ठहरे होने एवं उनके चमत्कारों का पता लगता गया, तो लोग उनके पास अपने दुखों-दर्दों से निजात पाने के लिये पहुँचने लगे। एक स्थानीय शेख शाह मुहम्मद रसीद साहब ख्वाजा साहब की सेवा के लिये जतारा से नित्य आने-जाने लगा। वह अपने घर से रुकनुद्दीन साहब के लिये पका हुआ खाना भी लाया करते थे।

एक दिन शेख शाह मुहम्मद रसीद, ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब के लिये भोजन लेकर आए तो उनका पुत्र अब्दा भी बिना वालिद रसीद की जानकारी के उनके पीछे-पीछे चुपचाप चला आया और ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब के दर के बाहर छिपकर खड़ा हो गया था।

ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब ने कुछ देर बाद अपनी दिव्य दृष्टि से बालक अब्दा का बाहर चुपचाप अकेला खड़ा होना जाना तो शेख रसीद से उसे अन्दर दर पर लाने को बोला। शेख रसीद दर से बाहर निकले और अब्दा को चुपचाप खड़ा देखकर चकित हुआ तथा पुत्र अब्दा को लेकर ख्वाजा साहब के पास पहुँचा। ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब ने बालक अब्दा को अपने पास बैठाकर, अपने खाना में से खाना खिलाते हुए, उसकी मुराद पूछी। बालक अब्दा ने कहा, “मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मैं जो चाहूँ सो वह हो जावे।” ख्वाजा साहब ने प्यार से अब्दा की ओर देखते हुए कहा, “हाँ, तेरी इच्छा पूरी होगी, जो तू चाहेगा, वही होगा।” इस प्रकार अब्दा ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब का मुरीद (शिष्य) हो गया था। एक दिन बालक अब्दा ने ख्वाजा साहब के वरदान के परीक्षण हेतु सोचा कि जो मछली मैंने खाई है, वह जिन्दा हो जावे, तो पेट में खाई मछली मुँह से जिन्दा निकल पड़ी और तालाब में उछल गई। इस घटना से वह अपने गुरू ख्वाजा साहब के पक्के मुरीद विश्वासी हो गए थे।

कुछ समय बाद अब्दा के पिता शेखशाह मुहम्मद रसीद दिवंगत हो गए थे तथा ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब चन्देरी चले गए थे। तब रूहानी शक्तियों से मंडित अब्दा पागल की भाँति फकीरी भेष में घूमने-फिरने लगे थे। वे कभी फूटा ताल माँची में दिखते तो कभी जतारा में बस्ती से दूर किले की दीवाल के सहारे खड़े टिके दिखते। कभी-कभी जतारा से दूर बम्हौरी गाँव की पहाड़ी पर दिखते थे। लोग उन्हें पागल सिर्री मानते थे, जबकि उनके पास तो ख्वाजा रुकनुद्दीन साहब की रूहानी (दैवी, ईश्वरीय) शक्तियाँ थीं, जिस कारण लोग उनके पास अपनी व्याधियों, दुखों के निवारणार्थ आने लगे थे। अब्दा की वाणी सफलीभूत होने लगी थी। धीरे-धीरे अब्दा फकीर पागल से अब्दा पीर रूप में प्रसिद्ध हो गए थे। वह ख्वाजा रूकनुद्दीन साहब की राह के सन्त चिस्ती ही बन गए थे।

एक दिन एक व्यक्ति अब्दा पीर साहब के पास कम्बल ओढ़े थर-थर काँपता आया। उसे तिजारी चढ़ी हुई थी। अब्दा पीर साहब ने उसकी पीड़ा देख कर, उससे कहा कि कम्बल को शरीर से हटाकर दूर रख दो। जैसे ही तिजारी वाले व्यक्ति ने अपने शरीर से कम्बल पृथक कर अलग रखा तो अब्दा साहब ने अपनी रूहानी शक्ति (दैवी शक्ति) से तिजारी को कम्बल पर चढ़ा दिया और वृद्ध व्यक्ति ठीक, स्वस्थ हो गया। परन्तु कम्बल काँपने लगा था। तिजारी उतरने से वृद्ध घर चला गया और फिर उनके पास नहीं आया। तो अब्दा साहब ने वृद्ध के हालचाल पूछने के लिये स्वयं उसके पास चलने हेतु, जमीन से कहा कि तू मुझे उस वृद्ध के पास ले चल। पलक झपकते वे उस वृद्ध के पास जा पहुँचे।

ऐसे रूहानी चमत्कारों से प्रभावित होकर लोग अब्दा पीर साहब के पास समूहों में आने लगे थे। लोग अब्दा पीर साहब को घेरने लगे थे, जिस कारण वे कभी माँची तो कभी जतारा चलते-फिरते रहने लगे थे। परेशान होकर एक दिन जतारा माँची छोड़ चार-पाँच किलोमीटर दूर पूर्व दिशा में स्थित ग्राम बम्हौरी की पहाड़ी की खोह (गुफा) में प्रविष्ट होकर छिप गए थे तथा खोह के दरवाजे को एक विशाल प्रस्तर शिला से बन्द कर लिया था। वह पहाड़ी आज भी ‘अब्दा पीर साहब की पहाड़ी’ नाम से प्रसिद्ध है। आज भी लोग बिना धर्म-जाति विभेद के अपने दुखों-व्याधियों से निजात पाने की दुअा लेने-मांगने अब्दा पीर साहब की गुफा पहाड़ी (दर) पर जाते हैं। भादों माह के जुमेरात के दिन अब्दा पीर पहाड़ी पर विशाल मेला लगता है। ओरछा राज्य की महारानी साहिबा ने पहाड़ी पर यात्रियों की सुविधा के लिये एक कोठी (सराय) बनवा दी थी। अब्दा पीर पहाड़ी के पूर्वोत्तर पार्श्व में धरम सागर (थर) नामक विशाल सरोवर है।

4. महेन्द्र सागर (प्रताप सागर), टीकमगढ़ Mahendra Sagar (Pratap Sagar), Tikamgarh :

टीकमगढ़ नगर, ओरछा राज्य का राजधानी मुख्यालय था, जो वर्तमान में जिला मुख्यालय है। यह 24.25 उत्तरी अक्षांश एवं 78.50 देशान्तर पर स्थित है। इसका प्राचीन नाम टेहरी था। सन 1783 ई. में झाँसी के मराठा प्रबन्धकों की लूट, आतंक से त्रस्त होकर महाराजा विक्रमाजीत ने ओरछा राजधानी को छोड़कर टेहरी को राजधानी बना लिया था। जिन्होंने पहाड़ी पर किला बनवाया था तथा पहाड़ी के पश्चिमी भाग में आधुनिक बस्ती बसाकर उसे नगर परकोटे से सुरक्षित किया था। चूँकि महाराजा विक्रमादित्य सिंह श्री कृष्ण उर्फ टीकम जी के अनन्य भक्त थे इसलिये उन्होंने किला का नामकरण टीकमजी के नाम पर टीकमगढ़ रख दिया था। जब नगर की बसाहट हो गई तो नगर बस्ती भी टीकमगढ़ नाम से जानी जाने लगी थी।

टीकमगढ़ राजधानी मुख्यालय हो जाने पर भी यहाँ कोई तालाब नहीं था। नगर निवासियों की जल व्यवस्था हेतु राजाओं ने कुँए, चौपरे नगर के चारों ओर एवं मुहल्लों में बनवा दिए थे। नगर के बाहर चारों और एक-एक मील की दूरी पर बावड़ियाँ, कुएँ बनवाए गए थे कि राज्य के ग्रामीण क्षेत्रों से जो लोग गाड़ियों, गधों एवं लद्दू भैसों पर माल लादकर आवें, वह वहाँ ठहरकर मवेशियों को जल पिलाएँ, स्वयं भोजन करें, फिर बाजार करें और कार्य पूरा होने पर बिना परेशानी घर वापिस जाएँ।

टीकमगढ़ किला पहाड़ी के दक्षिणी छोर की ओर नीची समतल भूमि थी, जो कृषि भूमि थी, जिसमें 8-10 कुएँ थे। नायकों का एक मन्दिर है जिसके पास एक लोर तला (बन्धिया) था, जिसमें पूर्वी क्षेत्र का बरसाती जल बहता हुआ आकर भर जाता था। वह लोर तला नायकों का कृषि तला था। जब लोर तला जल से भर जाता था तो उसका वेशी पानी महाराजपुरा के चन्देली तालाब को भरता था। महाराजपुरा तालाब का वेशी जल बौरी के हनुमान सागर तालाब को भरता हुआ जामुनी नदी में चला जाया करता था।

विक्रमाजीत सिंह ने अपने जीवन-काल में ही पुत्र धर्मपाल सिंह को राजा बना दिया था, जिनका निःसन्तान निधन हो गया था। तत्पश्चात उनकी मझली महारानी लड़ई सरकार रीजेन्ट बनी थी, जिन्होंने दिगौड़ा के जागीरदार के ज्येष्ठ पुत्र हमीर सिंह को गोद लेकर ओरछा (टीकमगढ़) का राजा बना दिया था। परन्तु उनके 1854 ई. में राजा बनने के 3 साल बाद सन् 1857 ई. में गैर क्षेत्रीय मराठी दासता से विमुक्ति का युगान्तकारी संघर्ष प्रारम्भ हो गया था, जिस कारण राज्यों का सम्पूर्ण ध्यान मराठों को बुन्देलखण्ड से निष्कासित करने में लग गया था। युगान्तकारी संघर्ष के शमन के पश्चात 1870 में हमीर सिंह का निधन हो गया था। वह निःसन्तान थे जिस कारण रीजेंट महारानी लड़ई सरकार ने हमीर सिंह के छोटे भाई प्रताप सिंह दिगौड़ा को गोद लेकर ओरछा (टीकमगढ़) का राजा बनाया था।

राजगद्दी पर बैठते समय वह मात्र 20 वर्ष के थे, जिस कारण राज्य शासन व्यवस्था की देखरेख के लिये अंग्रेजी सरकार ने एक अंग्रेज अधिकारी मेजर ए. मायने को नियुक्त किया था।

बुन्देलखण्ड के तालाब सन 1887 ई. में महाराजा प्रताप सिंह ने पहाड़ी के दक्षिणी अंचल की नीची भूमि पर चूना-पत्थर की एक किलोमीटर लम्बी पट्टी का बाँध बनाकर उसमें सुन्दर स्नान घाट-सीढ़ियाँ बनवाकर पक्की पट्टी के पीछे मिट्टी का चौड़ा बाँध तैयार करवाकर प्रताप सागर तालाब बनवा दिया था। इसी प्रताप सागर तालाब को लोग महेन्द्र सागर कहने लगे थे।

प्रताप सागर तालाब के उत्तरी अंचल में अनूठा महिला स्नान घाट, देवी मन्दिर, चित्रगुप्त मन्दिर, प्रतापेश्वर महादेव मन्दिर, नायकों का मन्दिर, तत्पश्चात तालकोटी, हनुमान मन्दिर, बजाज की बगिया का मन्दिर है। तालाब के पीछे परमार परिवार का मकबरा है जिससे संलग्न महाराजा प्रताप सिंह का सैरगाह महेन्द्र बाग है जो अति सुन्दर बगीचा है। महेन्द्र बाग के दक्षिण में सलूस के पीछे गऊ घाट स्थान है जिसमें जल भरा रहता था। इसमें गायें और अन्य पशु पानी पीते रहते थे। महाराजा प्रताप सिंह ने पुरानी टेहरी के मध्य से किला को घेरते हुए एक गहरी एवं चौड़ी पत्थरों से युक्त नाली बनवाई थी जो जानकीबाग बगीचे को पानी देती थी तथा वृन्दावन तालाब को भरा करती थी। प्रताप सागर तालाब का उबेला पूर्व की ओर है जिसमें से तालाब का वेशी पानी निकलकर बगर के तालाब को भरता था।

महाराजा प्रताप सिंह के समय टीकमगढ़ में रामलीला का मंचन भव्य रूप से किया जाता था। रामलीला में लंका के दृश्य मंचन के लिये तालाब के अन्दर एक कोठी बनवाई थी जिसे लंका नाम दिया गया था। इसी लंका कोठी के पास एक विभीषण मढ़ी बनवाई गई थी।

5. धर्म सागर सरोवर, थर-बराना (Dharma Sagar Sarovar, Thar-Barana) :

धर्म सागर तालाब टीकमगढ़ जिला के बड़े तालाबों में से एक है, जो जतारा के मदन सागर के पूर्व में, सीधे चलने पर दस किलोमीटर की दूरी पर, लेकिन वाहन मोटर अथवा मोटर साइकिल से टेढ़े-मेढ़े चक्करदार पक्के पलेरा बस मार्ग पर स्थित ग्राम कुड़याला के दक्षिण में मुड़कर, पहुँच मार्ग पर 5 किलोमीटर चलकर धर्म सागर सरोवर पर पहुँच जाते हैं। इस टेढ़े चक्करदार मार्ग से चलने पर जतारा से इसकी दूरी 20 किलोमीटर हो जाती है। इस तालाब के भराव क्षेत्र के चारों ओर कुड़याला, खैरों, पठापुर, रामनगर, बराना एवं बम्हौरी अब्दा ग्राम बसे हुए हैं। थर ग्राम तालाब के बाँध पर ही बसा था, परंतु अब बाँध के पृष्ठ भाग में लगभग डेढ़ किलोमीटर समतल (थर भूमि) पर बस गया है । वैसे इस तालाब का जल भराव क्षेत्र भी थर भूमि (समतल) वाला ही है, जो चारों ओर की पहाड़ियों, टौरियों के मध्य आठ-दस किलोमीटर की गोलाई में है। आठ-दस किलोमीटर के घेरे में 20 से 25 फुट ऊँचा पानी संग्रहीत होने पर, यह तालाब एक छोटा समुद्र-सा लगने लगता है। बाँध पर खड़े होने पर, मैदानी हवा के वेग से पानी के हिडौले (बड़ी लहरें) जब बाँध से टकराते हैं तो लगता है कि बाँध हिल रहा है, उड़ा जा रहा है। अजीब दृश्य देखकर दिल धड़कने लगता है। अजीब है थर का धर्म सागर। मनमोहक है, दर्शनीय है, आकर्षक है, लेकिन पूर्ण भरने पर थर-थर कंपाता भी है, दिल धड़काता भी है, भयभीत करता है।

धर्म सागर सरोवर थर का बाँध दो पहाड़ों के मध्य की खाँद में लगभग 200 मीटर लम्बा, 30 फुट ऊँचा और 60 फुट चौड़ा है। उत्तरी पहाड़ी एवं दक्षिणी पहाड़ी के मध्य की खाँद तो लगभग 100 मीटर ही है, लेकिन बाँध की मजबूती के लिये पहाडों की पश्चिमी तलहटी 50-50 मीटर भराव क्षेत्र की ओर दबाते हुए बाँध को 200 मीटर लम्बा किया गया है। बाँध मदन वर्मा चन्देल शासनकालीन है। इस तालाब में बरसाती जल की आवक दक्षिणी-पश्चिमी और उत्तरी दिशाओं के आठ-दस किलोमीटर परिक्षेत्र से है। तालाब के अगोर (भराव क्षेत्र) से संलग्न टौरियों पहाड़ियों के मध्य चार-पाँच ग्राम बसे हुए हैं, जिनका बरसाती धरातलीय प्रवाहित जल इस तालाब में इकट्ठा होता है। इसके अतिरिक्त रामनगर की तरफ से दैजा नाला दूर-दूर का पानी लाकर इसी तालाब में डालता है। एक नाला खैरों वाला है, जो इसी तालाब में आता है। पानी के वेग-दबाव को काटने-मोड़ने हेतु बाँध में छह मोड़ें (चाँदे) दिए गए हैं।

थर के धरम सागर सरोवर का भराव क्षेत्र लगभग आठ किलोमीटर के घेरे से भी अधिक है। भराव क्षेत्र के संलग्न चारों ओर टौरियाँ पहाडियाँ हैं, जिनकी पटारों में पानी भर जाने पर तालाब विकराल रूप धारण कर लेता है। इसका उबेला (अतिरिक्त पानी निकलने की पाँखी) तालाब के उत्तरी दिशा के पहाड़ के उत्तरी पूँछा के चचरीले-पथरीले मैदानी ढाल से है, जो तालाब के बाँध के उत्तर में लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर है, तथा नया बनाया गया है। चन्देल काल में जब बाँध (तालाब) बना था, तभी चचरीले मैदानी भाग में पत्थर की पैरियाँ लगाकर एक छोटा नीचा बाँध (रोक) बनाया गया था, जो मात्र एक-एक पत्थर का ही था, जो अब अस्त व्यस्त स्थिति में है, जिस कारण लगभग एक फुट जल भराव कम हो रहा है। वर्तमान में उबेला से अतिरिक्त निकलते जाने वाले पानी को रोकने के लिये एक पटार में स्टाप डैम कम वैस्ट वियर निर्मित कर दिया गया है।

धरम सागर तालाब के बाँध पर प्राचीन थर ग्राम बसा हुआ था जो वर्तमान में बाँध के पीछे समतल भूमि पर लगभग 2 किलोमीटर दूर स्थापित हो चुका है। प्राचीन बस्ती थर के भग्नावेश अभी भी दृष्टव्य हैं। महान पक्की ईटों-पत्थर, मिट्टी एवं चूना से बनाए गए थे। बस्ती में देवालय भी थे। बाँध के उत्तरी भाग की पहाड़ी की तलहटी में एक चिरौल के वृक्ष के नीचे गौंड़ बब्बा जू का चबूतरा है, तो दक्षिणी पार्श्व की पहाड़ी की तरफ बाँध के दक्षिणी पूँछा के मैदान में विशाल पीपल के पेड़ के नीचे शिव मन्दिर है। पीपल के वृक्ष के पार्श्व में चार ताड़वृक्ष (ताड़ पाठे) हैं, जो हवा के वेग से निरन्तर सरसराते, नाना प्रकार के स्वरों में गुनगुनाते, मानो धर्म सागर समुद्र एवं आसपास के प्राकृतिक सौन्दर्य की महिमा का मधुर गान करते रहते, पर्यटकों के स्वागत को आतुर खड़े हैं।

धरम सागर सरोवर के निर्माण के समय चन्देल काल में, तालाब के बाँध में जल निकास के लिये औंनौं (सलूस) नहीं बनाया गया था। क्योंकि उस समय बरसाती धरातलीय प्रवाहित जल संग्रहण के लिये बनाए गए तालाबों का जल केवल जन निस्तार एवं पशुओं, वन्य प्राणियों को पीने के लिये भंडारण, सुरक्षित संग्रहीत रखा जाता था। केवल एक अथवा दो उबेला, पाँखियाँ मात्रा से अधिक पानी भरने पर, बाँध के दाएँ-बाएँ पार्श्वों की चचरीली-पथरीली, टौरियाऊ भूमि से होकर बना दी जाती थीं जिससे भराव क्षमता से अतिरिक्त जल निकलता जाए और बाँध को किसी प्रकारद की क्षति न पहुँच सके।

बुन्देला शासन काल में, ओरछा (टीकमगढ़) नरेश महाराजा प्रताप सिंह जू देव ने राज्य में कृषि विकास एवं विस्तार हेतु तालाबों के संग्रहीत जल को सिंचाई हेतु प्रयोग करने के निमित्त सन 1897 ई. में बड़े विशाल तालाबों में पानी निकासी के लिये औनें, सलूस बनवाने एवं नहरें खुदवाकर खेतों तक पानी पहुँचाने की योजना प्रारम्भ की थी। सिंचाई के लिये तालाब के पानी की निकासी हेतु बन्धान के मध्य भाग के दक्षिणी पार्श्व में कुठिया सलूस बनवाकर दाईं-बाईं नहर निकाली गई थीं जो तत्कालीन अभियान्त्रिकी कला का श्रेष्ठ नमूना है। पहाड़ों के मध्य के दर्रा पटार में से सलूस एवं नहरें ऐसे कलात्मक तरीके से निकाली गईं कि नीचे पुल है तो पुलों के ऊपर से सरसराती नहरें बहती हैं। नहरों के नीचे से पटार का पानी निकलता चला जाता है। बाँध के पृष्ठ भाग से पचास फुट की दूरी से बाईं एवं दाईं नहरें विभक्त की गई हैं। नहरों पर भी पानी को बन्द करने, खोलने, छोड़ने के लिये छोटे-छोटे सलूस लगे हैं। पानी किस नहर में कितना छोड़ा जाना है यह सब कार्य सलूसों के माध्यम से किए जाने की व्यवस्था है। इस तालाब से लगभग 1500 हेक्टेयर की सिंचाई होती है।

इस तालाब में मत्स्य पालन तो होता ही है, साथ ही साथ ग्रीष्म ऋतु में चीमरी, डँगरा (खरबूज-तरबूज), मूँग उड़द एवं धान भी पैदा कर लिया जाता रहा है। 

तालाब का बाँध सुदृढ़ है। जिस पर पानी का दबाव, वेग-आघात काटने हेतु छह कौनियाँ-चाँदे-मोड़ें दी गई हैं। प्राचीन तालाब होने से बाँध के ऊपरी भाग की सीढ़ियाँ खिसकने लगी हैं। थर का यह धर्म सागर सरोवर बुन्देलखण्ड की प्राचीन पुरानिधि है। बाँध की मरम्मत वांछित है ताकि बाँध एवं सरोवर आकर्षण का केन्द्र बना रहे एवं सैलानियों-पर्यटकों के आवागमन का स्थल बन सके।

6. नदनवारा तालाब, नदनवारा (Nadanwara pond, Nadanwara)

चन्देल राजाओं, जिनकी राजसत्ता बुन्देलखण्ड में लम्बे समय तक रही थी, उनके पूर्व बुन्देलखण्ड जलविहीन क्षेत्र था। क्षेत्र पठारी-पहाड़ी, ऊँचा-नीचा, असमान वनाच्छादित था। वेतवा, पहुँज, सिंध, यमुना नदियों वाला उत्तरी बुन्देलखण्ड ही विकसित था, क्योंकि इन नदियों में पानी रहता था। ‘सुखी जीव जहँ नीर अगाधा’ के अनुसार इन नदियों के कछारीय भाग के लोग सम्पन्न थे, कृषि करते थे। अनेक औद्योगिक एवं व्यावसायिक नगर इन नदियों के किनारे बसे थे। जैसे पंवाया, नरवर, देवगढ़ चन्दैरी, काल्पी एवं हमीरपुर जैसे बड़े-बड़े महानगर पानीदार नदियों के किनारे ही थे और आज भी नामवर हैं।

दक्षिणी बुन्देलखण्ड शुष्क पठारी, पहाड़ी भूभाग था। जो बरसाती पानी चौमासे में बरसता था वह टौरियों, पहाड़ियों के मध्य की नालियों-नालों में से तेज गति से बहता क्षेत्र से बाहर निकल जाता था, क्योंकि बरसाती धरातलीय जल को क्षेत्र में रोकने के लिये तालाब आदि नहीं थे। जब पानी नहीं था तो खेती नहीं होती थी, लोग केवल पशुपालन करते थे। हाँ, नदियों के तटों को काटकर समतल बनाते हुए छोटे-छोटे खेत बनाकर उनमें धान, बराई (गन्ना), जौ, चना, मसूर बो लेते थे। खरीफ की बरसाती फसल में कोदो, धान, लठारा, समां, शाली कुटकी एवं तिल्ली बो कर अपनी गुजर-बसर कर लिया करते थे। आबादी घुमक्कड़ थी, खानाबदोस जैसी।

चन्देल नरेशों ने दो टौरियों, पहाड़ियों के मध्य पत्थर मिट्टी से लम्बे-चौड़े मजबूत बाँध (बन्धान, पाल) बनवाकर तालाब बनवाए। जब पानी इकट्ठा हो गया तो बाँध पर अथवा बाँध के किनारे बस्ती बसा दी गई। बाँध अथवा तालाब के नाम पर बस्ती का नाम रखा जाना प्रारम्भ हुआ। नदनवारा तालाब बना तो उसी से संलग्न नदनवारा बस्ती भी बसा दी गई थी।

नदनवारा तालाब एवं ग्राम, जिला टीकमगढ़ के पश्चिमी पार्श्व में 25.2 उत्तरी अक्षांश एवं 78.52 पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। जिले में यह एक बड़ा तालाब है, जिसकी सिंचाई क्षमता 1677 हेक्टेयर से भी अधिक है। इस तालाब पर पहुँचने के लिये टीकमगढ़ मोहनगढ़ जैरोन बस मार्ग पर से एक लिंक रोड है। दूसरा मार्ग टीकमगढ़-पृथ्वीपुर बस मार्ग के बम्हौरी बराना ग्राम से नदनवारा तालाब को जाता है।

नदनवारा तालाब चन्देला युगीन, प्राचीन तालाब है जो वारगी नदी के जल को दो पहाड़ियों के मध्य रोककर बनाया गया था। वारगी नदी के जलाघात को बाँध सह नहीं पाया था, जिस कारण बाँध टूट गया था, जिसे ओरछा नरेश महाराजा वीर सिंह देव प्रथम (1605-27 ई.) ने बाँध का पुनर्निर्माण कराया था। उन्होंने तालाब के भराव की ओर ऊँची पक्की दीवाल एवं स्नान घाट बनवा दिए थे। बाँध पर गणेश जी की मूर्ति स्थापित कराई थी, जिस कारण लोग इसे गणेश ताल भी कहने लगे थे। बाँध पर एक ऊँचा बड़ा चबूतरा भी बैठक हेतु बनवाया था। इस चबूतरे से तालाब का दृश्य बड़ा विहंगम एवं मनोहारी लगता है। बाँध पर रेस्ट हाउस है।

नदनवारा तालाब के पक्के बाँध की लम्बाई 250 मीटर और ऊँचाई 17.50 मीटर है। दो पहाड़ियों के मध्य बड़ी चौड़ी पाँखी, उबेला (क्षमता से अधिक जल निकास साधन) है, जिसकी चौड़ाई 107 मीटर है। तालाब का भराव क्षेत्र लगभग 15 वर्ग किलोमीटर है। इस तालाब से लगभग 2800 हेक्टेयर कृषि भूमि सींची जाती है। इसकी बाईं नहर की लम्बाई 16 किलोमीटर है जिससे केशरीगंज, नदनवारा, बुदर्रा, पाराखेरा, बाराबुजुर्ग, ककावनी, लुहुरगुवाँ, मजल, ममौरा, रौतेरा, बजरंगगढ़ आदि इन ग्यारह ग्रामों को पानी जाता है। दाईं नहर लगभग 5 किलोमीटर लम्बी है जिससे नदनवारा, बम्हौरी मुड़िया एवं खाकरौन ग्रामों की फसलों को पानी पहुँचाया जाता है।

जिला के लगभग 150 चन्देली तालाब खेती में प्रयुक्त हैं, जिनके पट्टे रियासती समय में रसूकदार किसानों को दे दिए गए थे। वर्तमान में 995 तालाब इस जिला में शासकीय हैं। इनके अतिरिक्त लगभग 600 कच्ची बन्धियां (तालाब) भी टीकमगढ़ जिला में हैं, जो किसानों ने निजी तौर पर अपनी मौरूसी पट्टे की भूमि पर बना रखी हैं जिनमें किसान रबी एवं खरीफ की फसल बोते रहे हैं। नदनवारा तालाब टौरियों, पहाड़ियों के मध्य प्राकृतिक सुषमा-सौन्दर्य से परिपूर्ण है। उत्तरी-पश्चिमी कोण में उबेला है। ‘विन्ध्य भूमि’ प्रदेश परिचय अंक वर्ष 4 अंक 2-3 रीवा के पृष्ठ 20-21 पर इस नदनवारा तालाब के बारे में एक विस्मयकारी चमत्कारिक चर्चा को उल्लिखित किया गया है कि “इस तालाब का निर्माण ओरछा नरेश महाराजा वीर सिंह देव प्रथम (1605-27 ई.) ने कराया था। यह तालाब वारगी नामक नदी को रोककर बनवाया गया है। कहा जाता है कि दो बार इस नदी के तालाब ने बाँध को तोड़ दिया था और तीसरी बार भी टूटने की आशंका थी। इसलिये श्रावण शुक्ल पूर्णिमा को महाराज वीरसिंह देव ने स्वयं उस बाँध पर शयन किया। रात में जब नदी में बाढ़ आई तब ऐसा लगा कि बाँध टूट जाएगा और राजा बह जाएँगे। तब नदी ने देवी का रूप धारण करके स्वप्न दिया, ‘तुम यहाँ से हट जाओ, बाँध टूट रहा है।’ महाराजा देवी के बड़े भक्त थे। उन्हें सदा देवी जी के द्वारा स्वप्न होता और आगे आने वाले कार्यों का संकेत मिलता था। उसी के अनुसार वे कार्य भी करते थे। नींद खुलने पर महाराज चिन्तित हुए। कुछ समझ में न आया। नदी का वेग देखकर ऐसा लग रहा था कि अभी कुछ पलों में बाँध टूटता है। उन्होंने देवी जी से निवेदन किया- “मैंने अनेक बार आपकी आज्ञाओं का पालन किया है। जब-जब आपने आदेश दिया उसे शिरोधार्य किया, लेकिन एक मेरी प्रार्थना आप भी स्वीकार कर लीजिए। मैं चाहता हूँ कि यह बाँध बना रहे। टूटे नहीं। बड़े परिश्रम से हमने इसका निर्माण कराया है। इसके रहने से असंख्य पशु-पक्षी पानी पीयेंगे और मानव समाज का भी उपकार होगा। इसलिये आप नदी को दूसरी ओर से ले जाइए।

राजा की विनम्र प्रार्थना सुनकर देवी का हृदय पिघल गया और उसने बाँध न तोड़ना स्वीकार कर लिया। बाँध से करीब 50 गज की दूरी पर दो पहाड़ियों के बीच होकर नदी ने अपना मार्ग बना लिया और बहने लगी। बारगी की इस कृपा पर राजा बहुत प्रसन्न हुए और फूले न समाये। तभी से यह ताल लोकरंजन कर रहा है। लोगों का कथन है कि प्रारम्भ में यह ताल बहुत बड़ा था। पच्चीसों मील के घेरे में था। वर्तमान समय में रानीगंज, बिदारी आदि जो गाँव पहाड़ियों से बहुत दूर बसे हुए हैं, वहाँ तक इस सरोवर का पानी फैला रहता था। समय की गतिविधि से विशाल रकबा कम हो गया है।

इस तालाब में कमल खिले रहते हैं। सिंघाड़ा भी बहुत होता है। वर्षाकाल में बाँध पर खड़े होने पर दूर तक जल ही लज दिखता है। पहाड़-पहाड़ियों से नीचे गिरती हुई जलधाराएँ बहुत सुन्दर लगती हैं। दूर-दूर से पानी आकर इस तालाब में इक्ट्ठा हो जाता है। इस तालाब का गहरीकरण आवश्यक है क्योंकि पानी के साथ दूर-दूर से मिट्टी इसमें भर रही है।

7. तालाबों का नगर कुड़ार (Taalaabon ka Nagar Kudaar) :

कुड़ार, टीकमगढ़ जिला मुख्यालय से 107 किलोमीटर एवं निवाड़ी तहसील मुख्यालय से 22 किमी. की दूरी पर, जिला के उत्तरी अंचल में 25.30 उत्तरी अक्षांश एवं 28.57 पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। कुड़ार शब्द की व्युत्पत्ति बुुन्देली बोली के शब्द कुड़ार अर्थात बड़ा विशाल कूँड़ों से हुई है। तात्पर्य कि कुड़ार किला अपने चारों ओर के पहाड़-पहाड़ियों से घिरा हुआ है जिनके मध्य के एक ऊँचे पठार पर किला स्थापित है। जैसे कि कूँड़े की तलहटी गहरी होती है और उसकी औठीं-घेरा चारों ओर को ऊँची होती है। ऐसी ही (कूँड़े की बनावट की तरह) भौमिक संरचना के मध्य में कुड़ार किला है। जो अपने प्रकार का एकमात्र किला है, यह चारों ओर घेराबन्दी लिये पहाड़ों-पहाड़ियों के मध्य की नीची तलहटी के पठार पर निर्मित है तथा बहुत दूर से दिखता है और नजदीक से पहाड़ों की ओट के अंचल में छिप जाता है। इस किले का निर्माण चन्देल राजा यशोवर्मा (925-40 ई.) ने अपने दक्षिणी-पश्चिमी राज्य क्षेत्र की सुरक्षा व्यवस्था हेतु एक सुदृढ़ सैनिक केन्द्र के रूप में करवाया था जिसका दुर्गाध्यक्ष शिया जू परमार एवं नायब किलेदार खूब सिंह खगार था।

किला कुड़ार बन जाने एवं सूबाई मुख्यालय होने से किला नाम से बस्ती भी कुड़ार नाम से प्रसिद्ध हो गई थी। पहाड़-पहाड़ियों के मध्य विशाल बस्ती थी। मीलों के घेरे में बस्ती-बसाहट होने से यशोवर्मन चन्देल ने लोगों एवं सेना के लिये पीने के पानी एवं निस्तारू जल की व्यवस्था के लिये छोटे-बड़े अनेक तालाबों का निर्माण कराया था, जिनका विवरण निम्न प्रकार है-

1. सिन्दूर सागर (सिंह सागर)- कुड़ार नगर के उत्तरी-पूर्वी में अंचल एक बड़ा नाला (छोटी नदी) जिसे हाटी नदी कहते थे, जो देवी पहाड़ के पूर्वी पार्श्व से, दूर-दूर के पहाड़ों एवं मैदानों का बरसाती धरातलीय जल लेकर निकली थी, यशोवर्मा ने देवी पहाड़ के दक्षिणी छोर को जोड़ते हुए दक्षिणी भाग की पहाड़ी तक पत्थर की पैरियों एवं मिट्टी से विशाल बाँध बनवाकर सिन्दूर सागर नाम से विशाल तालाब तैयार करवा दिया था। इसमें पानी की आवक अधिक थी। पूर्ण भरने पर सिन्दूर सागर समुद्र की तरह दिखता था। कालान्तर में यह तालाब अधिक जल भराव के कारण उत्तरी-पश्चिमी किनारे से फूट गया था।

कालचक्र के घुमाव के साथ, बुन्देलखण्ड में चन्देल राज सत्ता अस्त व्यस्त हो गई जिस कारण बुन्देलों को अपनी सत्ता स्थापित करने का संयोग मिल गया था। चन्देलों की तरफ से कुड़ार किले का दुर्गाध्यक्ष शिया जू परमार था, जो 1182 ई. में चन्देल-चौहान (परमाल देव एवं पृथ्वीराज चौहान) के मध्य उरई के बैरागढ़ में होने वाले संग्राम में मारा गया था। उरई के बैरागढ़ युद्ध में चन्देली सत्ता अस्त-व्यस्त हो गई। उसके सभी लड़ाका योद्धा 1182 ई. के युद्ध में मारे गए थे। कुड़ार के किलेदार शिया जू परमार के मारे जाने पर नायब किलेदार खूब सिंह खंगार ने अवसर का लाभ उठाया और स्वयं कुड़ार का अधिपति बन गया था। इसी समय महौनी का अपदस्थ राजा सोहन पाल बुन्देला बेतवा के वनाच्छादित क्षेत्र में ससैन्य प्रविष्ट हुआ। जिसने सन 1257 ई. में कुड़ार पर आक्रमण कर खँगार राजा को परास्त कर कुड़ार में अपनी बुन्देली सत्ता स्थापित कर ली थी। कुड़ार में 1539 ई. तक राजधानी रही। तत्पश्चात ओरछा राजधानी स्थानान्तरित कर ली गई थी।

सोहनपाल बुन्देला ने सिन्दूर सागर के किनारे पहाड़ी के पूँछा पर अपनी आराध्य देवी गिद्ध वाहिनी देवी की स्थापना कर यहाँ का धार्मिक-सांस्कृतिक वैभव बढ़ाया था। कालान्तर में ओरछा में महान स्थापत्य प्रेमी महाराजा वीरसिंह देव प्रथम (1605-27 ई.) राजा हुए थे जिन्हें अनूठे दर्शनीय महत्त्वपूर्ण स्थापत्य निर्माण कार्य कराने का शौक था। उन्होंने अपने शासनकाल में कुड़ार के फूटे विशाल सरोवर का जीर्णोद्धार कराया था। यह जीर्णोद्धार कार्य चूना-पत्थर का दर्शनीय बाँध बनाकर पूर्ण हुआ जिसका नया नाम ‘सिंह सागर’ रखा था।

सिंह सरोवर बुन्देलखण्ड के दर्शनीय तालाबों में से एक है। यह सरोवर विशाल है, जिसका आधा बाँध-देवी मन्दिर से आधे तक पक्का पत्थर-चूने का बना हुआ है, और आधा भाग दक्षिणी पार्श्व वाला कच्चा पुराना चन्देल युगीन ही है। देवी मन्दिर से लगायत पूरे पक्के बाँध में, ऊपर से नीचे तक आने-जाने, नहाने धोने के लिये बड़े कलात्मक सुन्दर पक्के घाट बने हुए हैं। वर्षा ऋतु में जब यह तालाब लबालब पूरा भरता है और समुद्र की तरह जब ऊँची-ऊँची लहरें, हिड़ोलें हवा के तीव्र वेग के साथ बाँध से टकराती हैं तो भयावह आवाज आती है जिससे बाँध पर खड़े लोगों के रोंगटे खड़े हो जाते हैं, शरीर में कँपकँपी आ जाती है। आभास होने लगता है कि यह ऊँची-ऊँची लहरें, हिड़ोलें साँय-साँय करती बाँध से टकराती-फुफकारती क्रोधित होकर, उनको बाधित किए बाँध को उड़ा देना चाहती हैं।

सिंह सागर कुड़ार का पक्का बाँध लगभग साढ़े पाँच चेन है तथा इतना ही कच्चा पैरी वाला चन्देली बाँध है। इसका भराव क्षेत्र लगभग छह वर्ग मील है। इससे लगभग 525 हेक्टेयर (1300 एकड़) भूमि की सिंचाई होती है।

2. फुटेरा तालाब- कुड़ार के मुड़िया महल की पहाड़ी के दक्षिणी ओर एक चन्देली तालाब है जो फूटा हुआ है। इसी कारण इसे फुटेरा ताल कहा जाता है। यह तालाब भी चन्देली युगीन है। इस तालाब का भराव क्षेत्र लगभग 6 हेक्टेयर का है। यदि इसकी मरम्मत हो जाए तो 80 से 100 एकड़ तक की सिंचाई की जा सकती है।

3. पुरैनियाँ तालाब- पुरैनियाँ तालाब कुड़ार के पास निस्तारी तालाब है जिसमें कमल (पुरैन) अधिक होता रहा है, जिस कारण इसे पुरैनियाँ तालाब कहा जाता रहा है।

4. गंज तालाब- किला कुड़ार के दक्षिणी पार्श्व में गंज तालाब है। ओरछा नरेश महाराजा वीरसिंह देव (1605-27 ई.) ने गंज मुहल्ला कुड़ार में चूना-पत्थर से पक्का बाँध बनवाया था। इस तालाब का भराव क्षेत्र लगभग दो हेक्टेयर का है। तालाब के बाँध के पास गजानन देवी का मन्दिर है। तालाब के सुन्दर स्नान घाट बने हुए हैं। यह तालाब गंज के निवासियों के निस्तार के उपयोग में आता है। गंज क्षेत्र में कुड़ार के राजाओं, चन्देलों एवं बुन्देलों की सेना के घोड़ों के लिये घास की गंजी (गाँज) लगाई जाती थी जिसे गंज कहा जाता था। कालान्तर में मध्यकाल में यहाँ मुसलमानों की बस्ती स्थापित हो गई थी जिसे गंज ग्राम बस्ती नाम से जाना जाता है। वैसे यह कुड़ार का ही एक मुहल्ला है।

5. किला कुड़ार परकोटा के अन्दर एवं किला के पूर्वी-दक्षिणी किनारे पठार पर एक छोटा-सरोवर है, जिसमें किला परिसर का ही बरसाती धरातलीय जल भरता रहता है।

किला पहाड़ी के पठार के पश्चिमी पार्श्व में भी एक छोटा चन्देली तालाब था, जिसे सुजान सागर कहा जाता था, परन्तु वर्तमान में इसका अस्तित्व समाप्त हो चुका है।

6. डाबर झोर तालाब- कुड़ार दुर्ग के पास उत्तरी पार्श्व के जंगल में एक चन्देली तालाब है जो लगभग 5 एकड़ का है। इसके बाँध की लम्बाई लगभग 150 मीटर है। यह वन तालाब है।

7. यहाँ एक बरतला तालाब भी वन तालाब है, जो पहाड़ियों के मध्य जंगल में वन्य पशुओं के हितार्थ बनवाया गया था। यह चन्देला युगीन है।

8. वीर सागर तालाब, ग्राम वीर सागर (पृथ्वीपुर) Veer Sagar Pond, Village Veer Sagar (Prithivipur) :

वीर सागर तालाब, वीर सागर ग्राम में 25.12 उत्तरी अक्षांश एवं 78.45 पूर्वी देशान्तर पर, टीकमगढ़ जिला के उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र में, टीकमगढ़-झाँसी बस मार्ग के पृथ्वीपुर तहसीली मुख्यालय से पश्चिम में पृथ्वीपुर-सिमरा बस मार्ग पर पृथ्वीपुर से 7 किलोमीटर की दूरी पर पहाड़ियों के मध्य स्थित है। वीर सागर तालाब एक ऐतिहासिक दर्शनीय झील है जो बहुत गहरी है। जिसका जल स्वच्छ नीला बना रहता है। इसमें पहाड़ियों एवं पठारों का पानी झिर-झिर कर आता रहता है। बुन्देलखण्ड में बड़े-छोटे हजारों तालाब हैं, परन्तु वीर सागर तालाब की छटा एवं प्राकृतिक सौन्दर्य अद्भुत ही है। पर्यटकों एवं सैलानियों को इस वीर सागर तालाब की छटा का अवलोकन अवश्य करना चाहिए। यहाँ झाँसी, नौगाँव, छतरपुर, सागर, टीकमगढ़ से आने-जाने के लिये बस सेवा निरन्तर उपलब्ध रहती है। पृथ्वीपुर बस स्टॉप पर वीर सागर पहुँचने को टैक्सी उपलब्ध रहती हैं।

आचार्य केशवदास ओरछा ने अपने ‘कविप्रिया’ ग्रन्थ के दोहा 16 में तालाब सौन्दर्य का वर्णन इस प्रकार किया है-

“ललित लहर, खग पुष्प, पशु, सुरभि समीर तमाल।
करत केलि, पंथी प्रकट, जलचर वरनहु ताल।।”

वास्तव में आचार्य, कवि शिरोमणि केशवदासजी की कल्पना काव्योक्ति का साकार स्वरूप वीर सागर तालाब है जिसे देखने से मन प्रफुल्लित हो जाता है।

मढ़िया ग्राम की पहाड़ी के पश्चिमी पार्श्व में अछरू माता मन्दिर है। यह सिद्ध क्षेत्र है। यहाँ चारों ओर पठार ही पठार है। ऊपर पठार है तो पठार के नीचे लाल मुरम ककरीली मिट्टी है और यह स्थिति वीर सागर तक है। पहाड़-पहाड़ियों एवं पठार के नीचे का जल भंडार वीर सागर तालाब में रिस-झिर कर पहुँचता रहता है। झिर कर पानी से भरने के कारण यह वीर सागर सरोवर एक झील ही है। एक कहावत प्राचीन है कि, अछरू यादव नामक एक बरेदी अपने मवेशी इस पठारी क्षेत्र में चराया करता था। पठार में एक जलभरा गड्ढा था, जिसका वह दिन में पानी पिया करता था। एक दिन अछरू ने अपनी छोटी बाँस की लाठी गड्ढा नापने के लिये गड्ढे में डाली। लाठी गड्ढे में चली गई। कुछ दिन बाद अछरू मवेशी चराता हुआ वीर सागर तालाब के अगोर में जा पहुँचा। वहाँ उसने तालाब के पानी में तैरती हुई अपनी वह डंडिया (लाठी) देखी तो वह आश्चर्यचकित रह गया। बस अछरू यादव ने पठार के गड्ढे को देवी माता के रूप में आस्था रखना प्रारम्भ कर दिया और मान्यता इतनी बढ़ी की वह गड्ढा ‘अछरू माता’ के नाम से जग जाहिर हो गया था। लोग वहाँ आस्था के साथ पहुँचने लगे। नारियल फोड़कर गरी के टुकड़े कुंड रूपी गड्ढे में डालते और गरी के ऊपर आ जाने से उसे उठाकर खाते तथा मनोकामना पूरी होने को आश्वस्त हो जाते रहे हैं। यदि कुंड में डाली वस्तु ऊपर न आकर नीचे ही चली जाती तो देवी ने मनोकामना पूर्ण नहीं की।

झाँसी-टीकमगढ़ बस मार्ग पर स्थित पृथ्वीपुर कस्बा से एक पक्का बस मार्ग दक्षिण दिशा को जेरौन एवं सिमरा के लिये जाता है; परन्तु 3-4 किलोमीटर चलने पर करगुवां ग्राम मिलता है, जहाँ से एक बायाँ मार्ग जैरोन के लिये जबकि दूसरा दायां मार्ग करगुवा ग्राम में होकर वीर सागर एवं सिमरा के लिये जाता है। करगुवां ग्राम के बाहर निकलते वीर सागर तालाब की पाँखी अथवा उबेला की पुलिया है। यहाँ से पहाड़ पर होकर सीधा पैदल रास्ता वीर सागर तालाब पर पहुँचता है। जबकि दूसरा पक्का रास्ता उबेला की पुलिया से सीधा वीर सागर तालाब के बाँध पर पहाड़ के पिछवाड़े से पहुँचता है।

वीर सागर तालाब करगुवां ग्राम से ही लगा हुआ है। यह तालाब 5 कि.मी. लम्बा एवं 21/2 किलोमीटर चौड़ा है। बहुत ही गहरा है। बाँध के ऊपर से नीचे पानी देखने पर दिमाग चक्कर सा खाने लगता है। तालाब के चारों ओर गिरिमालाएँ श्रेणियाँ फैली-बिखरीं इसकी शोभा में चार चाँद लगा देती हैं। दो ऊँचे पहाड़ों के मध्य एक संकीर्ण दर्रा (खांद) था जिसमें से दक्षिणी-पूर्वी पहाड़-पहाड़ियों एवं टौरियों का जल बहता हुआ पश्चिमी मैदानी पार्श्व की ओर चला जाता था।

महाराजा वीरसिंह देव प्रथम (1605-27 ई.) ने दोनों पहाड़ों के मध्य की खन्दक (दर्रा) जो 50 फुट चौड़ा है, के आगे पूर्वी भाग में लगभग 100 मीटर लम्बा, 80 मीटर चौड़ा दोनों पहाड़ों को जोड़ते हुए, अर्ध चन्द्राकार चादौं बनवाकर यह विशाल रमणीक दर्शनीय सरोवर ‘वीर सागर’ का निर्माण कराया था। तालाब के उत्तरी पार्श्व के पहाड़ पर वीर सरोवर की छटा का रसपान करने हेतु एक कोठी भी बनवाई थी जो राजा की बैठक थी। चन्द्राकार चाँदव रूपी बाँध पर बाँके बिहारी (श्री कृष्ण) का बहुत सुन्दर मन्दिर बनवाया था। मन्दिर के प्रांगण में सुन्दर बगीचा है। इस तालाब को देखने मुगल सम्राट जहाँगीर भी आया था।

इस वीर सागर तालाब की महिमा एवं सौन्दर्य का आँखों देखा वर्णन, ओरछा के कविवर आचार्य श्री केशवदास जी ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘वीर सिंह चरित’ प्रकाश पन्द्रह में पद क्र. 3 से 22 तक में किया है। विशेष उल्लेखनीय बात यह है कि केशवदासजी ओरछेश महाराजा वीर सिंह देव प्रथम (1605-27 ई.) के राजदरबारी कवि थे जिन्होंने इस सरोवर को बनते, भरते एवं लोल लहरों से उफनाते, इठलाते हुए देखा था। भरे हुए वीर सागर तालाब को देखकर, तालाब की महिमा में निम्नांकित, काव्य भाव प्रस्फुटित हो गए थे-

वीर-वीर सागर को देख। वरनन लागे वचन विशेखि।।
अति आनंद भूतल जलखण्ड। अद्भुत अमल अगाध अखण्ड।।(3)

फूले फूलन को आवास। मानो सहित नक्षत्र अकास।।
अति सीतलता कैसो देश। ग्रीषम रितु पावत न प्रवेश।।(4)

शुभ सुगंधता कैसो ओक। मानहु सुन्दरता का लोक।।
जग सन्तापन को हरतार। मनहु चंडिका को अवतार।।(5)

तुंग तरंग धननि की राजि। बरखत पवन बुंद जल साजि।।
अरुन जोति दामिनि संचरे। जगत चिन्त की चिन्ता हरे।।(6)

नाचत नील कंठ चहु दिशा। बरखति बरखा वासर निसा।।
फूले पंडरीक चंद्रभान। स्वेताभ चंद्रिका समान।।(7)

हंसनीन संग सोहत हंस। बसत शरद सर सोभित अंस।।
सीतल जल अति सीतल बात। सीतल होत छुवत ही गात।।(8)

ऊपर लसत हंस सौ हंस। सरद बसन्त सिसर को अंस।। 
चंदन बन्दन कैसी धूरि। उड़ पराग दसौ दिसि पूरि।।(9)

करि करि सरवर में केलि। फूले फूल फाग सी खेल।।
बसत सरोवर में हेमंत। मुदित होत सब संग अनंग।।(10)

भ्रमत भंवर बग गज मैमत्त। पद्मिनी सोहे अति अनुरक्त।।
बोलत कल हंसी रस भरैं। जनु देवी देवनि अनुसरैं।।(11)

सोहत समर समेत बसन्त। विरही जन को दुख्ख अनंत।।
पाँचौ रितु मानहु सर बसै। सिगरे ग्रीषम रितु को हँसै।।(12)

फूले स्वेत कमल देखिये। सुन्दरता हिय से लेखिये।।
फूले नील कमल जल ऐन। मानहु सुन्दरता को नैन।।(13)

कुल कल्हार संगन्धित भनौ। सुभ सुगंधता के मुख मनौ।।
प्रफुलित सूर कोक नद किये। मानहु अनुरागिनि के हिये।(14)

पीत कमल देखत सुख भयौ। मनौ रूप के रूपक रयौ।।
रति नील कंज कर हाट। तापर सोहत जनु सुर राट।। (15) 

बैठे जुग आसन जुग रूप। सुर को करि सेवा अनुरूप।।
सोधि-सोधि सब तंत्र प्रसिद्ध। जल पर जपत मंत्र सो सिद्ध।।
पातक हरन काय मन राज। राजकीय बस कीवे काज।।(16) 

सुन्दर सेत सरोरुह में करहाटक हाटक की दुति सोहै।।
तापर भौंर भलौ मन रोचन लोक विलोचन की रूचि रोहै।।
देख दई उपमा जलदेविनि दीरघ देवन के मन मोहै।
केशव, केशवराय मनौ कमलासन के सिर ऊपर सोहै।।(17)

सोषन बन्धन मथन भय लै जनु मन-मन सोचि।
वीर सिंध सरवर बस्यो सिंधु सरीर सकोचि।।(18)

मगरमच्छ बहु कच्छप बसै। सारस हंस सरोवर लसै।।
चंचरीक बहु चक्र चकोर। कहुँ सुरभि मृग गन चित चोर।।(19) 

कहु गयंद कलोलनि करै। करि कलभनि के मन गन हरै।
वहु सुन्दर जल भरै। कहुँ महामुनि मौननि धरैं।।(20)

वीर सिंघ नर देव की सेवा करौ सभाग। 
बाँधे ही सम्पत्ति बढ़ै, देखहु बूझि तड़ाग।।(21)

जंबुक जमाति कोल कामिनी विभाति जहाँ,
करि कुल काम केलि प्रीति किलकति हैं।
जहाँ आँक कनक कमल कुबलय तहाँ,
गौधन के थल हंस हंसनी लसति हैं।
जहाँ भूत भामिनी समेत तहाँ केसौदास,
देवन सौं देवी जल केलि विलसति हैं।
देख वीर सागर कौं, नागर कहत यह,
सम्पति वीरेस जू कै बाँधे की बढ़त है।।(22)

9. बराना तालाब, बराना (बम्हौरी) Barana Pond, Barana (Bhamhouri) :

बराना तालाब टीकमगढ़ जिला मुख्यालय से 44 किलोमीटर की दूरी पर, जिला के उत्तरी-पश्चिमी पार्श्व में 25.3 उत्तरी अक्षांश एवं 78.53 पूर्वी देशान्तर पर स्थित है। यह तालाब टीकमगढ़ झाँसी बस मार्ग के बम्हौरी गाँव एवं लिघौरा झाँसी बस मार्ग के मुगलाई (छिपरी) गाँव के मध्य लगभग तीन किलो मीटर लम्बाई में है, जो सिंघाड़े के आकार का है। इसमें बम्हौरी भाटा, अपर्वल, मरगुआ एवं मजरा ग्रामों का बरसाती धरातलीय जल, सिमिट-सिमिटकर पटार एवं छिपरी नालों द्वारा संग्रहीत होता है। इसका भराव तीन ग्रामों बराना, पुरा एवं बम्हौरी तक है।

बराना तालाब का बाँध प्राकृतिक पहाड़-पहाड़ियों का है। केवल पुरा गाँव के पास 200 मीटर लम्बा एवं 40 मीटर चौड़ा बाँध (पाल) पत्थर की पैरियों एवं मिट्टी से बना हुआ है जो चन्देल युग का है। ऐसी लोग मान्यता है कि इस तालाब का निर्माण केवल नामक चन्देल ने कराया था, जिस कारण इसे केवलर्स झील भी कहा जाता है। पुरा गाँव के पास बाँध पर कैलाश वासी शिवजी का मन्दिर भी चन्देल युगीन है, जिस कारण इसे कैलाश सागर भी कहते हैं। चन्देला युग में बने इस तालाब से जल निकासी के लिये सुलूस (जल निकास द्वार ‘औनों’) नहीं था। हाँ, अतिरिक्त जल निकास के लिये पुरा एवं बराना के मध्य की पहाड़ियों की खाँद (खन्दक) को काटकर उबेला (पाँखी) बनाई गई थी जिससे अतिरिक्त जल उबेला से पश्चिम दिशा को निकलता हुआ नन्दनवारा तालाब में जा पहुँचता है। सन 1905 में ओरछा नरेश प्रताप सिंह ने तालाब के पानी का उपयोग कृषि विस्तार विकास में लेने के उद्देश्य से दो सुलूस बनवाये थे। प्रथम सुलूस पुरा के पास है जबकि दूसरा सुलूस पूरा एवं बराना के मध्य की पहाड़ी काटकर बनाया गया था, जो उबेला के पास है।

इस तालाब से बम्हौरी, लाखरौन, बराना, पुरा एवं प्रतापपुरा ग्रामों की भूमि को सिंचाई जल मिलता है। बराना तालाब के बाँध पर 3 दर्शनीय मन्दिर हैं-1. बर्छी बहादुर मन्दिर, बराना 2. नरसिंह मन्दिर (बड़ा मन्दिर), बराना एवं 3. शिव मन्दिर पुरा।

पहाड़ पर निर्मित निरसिंह मन्दिर अति भव्य एवं ऊँचा है। यह हमेशा शीतल सुखद हवा से लबरेज रहता है। सन 1835 के दिसम्बर माह की 11 तारीख को कर्नल स्लीमैन यहाँ ठहरा था जिसने यहाँ से नन्दनवारा तालाब के दर्शन किये थे। बराना तालाब और यहाँ का प्राकृतिक सौन्दर्य दर्शनीय है। इस तालाब में कमल के फूल, कमलगट्टा, मुरार एवं सिंघाड़ा खूब पैदा होता है।

टीकमगढ़ जिला (पूर्वकालिक ओरछा स्टेट) चन्देली तालाबों की बहुतायत के लिये प्रसिद्ध रहा है। सिंचाई सम्भाग टीकमगढ़ म.प्र., माह सितम्बर 1987 के एनेक्जर-1 के अनुसार, इस जिले में 962 तालाबों की सूची दर्शायी गई है। वैसे इस जिले में चन्देले एवं बुन्देले राजाओं के बनवाए हुए लगभग 1100 तालाब कहे-माने जाते हैं। चन्देली तालाब पत्थर की पैरीं एवं मिट्टी से बने हुए हैं जबकि बुन्देली तालाब पत्थर, मिट्टी एवं चूना का प्रयोग करते हुए बनाए गए हैं। इस जिले की भूमि रांकड़, पठारी, पथरीली, पहाड़ी ढालू, ऊँची-नीची वनाच्छादित रही है जिस पर बरसाती धरातलीय जल नालियों-नालों एवं नदियों द्वारा बहता हुआ क्षेत्र से बाहर चला जाता था। इस कारण क्षेत्र मात्र चरागाही ही था। लोग घमुन्तु जीवन बिताते हुए पशुपालन व्यवसाय करते थे। कभी इस पहाड़ी-पहाड़ की नालियाँ-नदियों के किनारे पशु चराते, पड़ाव डालते तो कभी उस पार पड़ाव डाल लेते थे। चन्देल राजाओं ने इस भूभाग को विकसित करने एवं स्थायी जन-बसाहट के लिये टौरियों-पहाड़ियों के मध्य की नीची पटारी नालियों-नालों द्वारा प्रवाहित होते जाते जल को स्थान-स्थान पर रोककर संग्रह करने के लिये तालाबों का निर्माण करा कर धरातलीय बरसाती प्रवाहित होते जल को थमा दिया था। क्षेत्र में जल थमा तो लोगों का घुमन्तू चरागाही जीवन थम गया। तालाब बने तो इस भूभाग सहित समूचा बुन्देलखण्ड जनजीवन के लिये जलाश्रय के थमने से, रहने, निवास करने लायक हो गया था क्योंकि जलाश्रय से ही मनुष्य ठहरता है। तालाब बने तो उनके पास और बाँधों पर भी बस्तियाँ बसीं। पशुपालन के साथ-साथ व्यक्ति ने तालाबों के निचली बाजुओं पर और तालाबों के पीछे के बहारू क्षेत्र में कृषि कर्म करना प्रारम्भ कर दिया था। चन्देलों एवं बुन्देला नरेशों ने इस जनविहीन-निर्जन क्षेत्र में तालाबों का निर्माण कराकर बस्तियाँ बसाईं। पानी हुआ तो खेती होने लगी। क्षेत्र विकसित हुआ।

यहाँ के बुन्देली एवं चन्देली तालाबों की उम्र सौ से पौन हजार वर्ष तक की हो चुकी है। दीर्घायु होने के कारण वे जर्जर हो चुके हैं। बिना गहरीकरण कराये एवं शासकीय और ग्राम समाज की उदासीनता-उपेक्षा के कारण तालाबों के बाँध खस्ता हाल में हैं। भराव क्षेत्र में गौंद, गौंड़र मिट्टी भर चुकी है। बाँधों में रिसन होने लगी है। कुछ के बाँध फूट चुके हैं जिनकी मरम्मत नहीं हई। सैकड़ों तालाबों में किसान खेती करने लगे हैं जिनमें अधिकांश को तो किसानों को मौरूसी पट्टों पर दे दिए गए हैं। जंगलों में जो तालाब थे, बाँधों की पैरियों-पत्थरों के चिन्हों-संकेतों के अलावा तालाब भूमि के समतल ही हो गए हैं। वह मिट्टी से पट चुके हैं।

अधिसंख्य सरोवर, ग्राम-बस्तियों के किनारे रहे हैं। ग्रामवासियों की अचेतनता, और उपेक्षा के कारण भी निस्तारी तालाब बड़े स्वरूप से लघु रूप पोखर-पुखरियों में बदल गए हैं। महिलाएं घरों का कचरा तालाबों में डाल देती रही हैं। कुछ लोगों ने तालाबों की भूमि पर मकानों का निर्माण कर लिया है। इस प्रकार इस जिले के 1100 तालाबों में से मात्र 176 तालाब ही कृषि सिंचाई के योग्य रह गए हैं। इन 176 सिंचाई तालाबों में से 58 तालाब ही ऐसे सक्षम तालाब हैं जो सौ एकड़ से अधिक की सिंचाई को जल देते हैं। शेष 118 तालाबों की जल धारण क्षमता मिट्टी, गौंड़र भर जाने से कम हो गई है। ऐसे तालाब दस से चालीस एकड़ तक की ही सिंचाई को बमुश्किल जलापूर्ति कर पाते हैं। शेष 924 तालाबों की स्थिति खराब है। उनमें गौंड़र मिट्टी भर गई है। कुछ फूट गए हैं अथवा लोगों ने कृषि के लालच में फोड़ लिये हैं। कुछ किसानों के कब्जे में हैं। कुछ वन तालाब आकार मात्र रह गए हैं।

टीकमगढ़ जिलान्तर्गत बड़े विशाल एवं दर्शनीय तालाब निम्नांकि हैं- 1. ग्वाल सागर बल्देवगढ़, 2. मदन सागर अहार, 3. खौड़ेरा तालाब, 4. पराई मार भितरवार, 5. बलवन्तपुरा तालाब, 6. सरकरनपुर तालाब, 7. देरी तालाब, 8. धनैरा तालाब, 9. कोटरा तालाब, 10 छिदारी तालाब, 11. ददगाँय तालाब, 12. डुड़ियन खेरा तालाब, 13. रतन सागर तालाब नारायणपुर, 14. मड़रखा तालाब, 15. नदनवारा तालाब नदनवारा, 16. बराना-बम्हौरी तालाब, 17. दुशियारा तालाब बिलगांय, 18. मोहनगढ़ तालाब, 19. कुम्हैड़ी तालाब, 20. अचर्रा तालाब, 21. पटैरिया तालाब गोर, 22. दरगांय खुर्द तालाब, 23. मदन सागर तालाब जतारा, 24. धर्म सागर थर, 25. पदमा सागर मुहारा, 26. मोर पहाड़ी तालाब मोर पहाड़ी, 27. खरौं तालाब खरौं, 28. फुटेरा तालाब खरौं, 29. राम सागर तालाब टीला लारौन, 30. घूरा तालाब घूरा, 31. बड़का मुर्राहा तालाब बड़का मुर्राहा, 32. पुरैनिया तालाब पुरैनिया, 33. गजाधर तालाब पलेरा, 34. कीरतवारी तालाब कमल नगर, 35. दीपसागर कारी, 36. महेन्द्र सागर टीकमगढ़, 37. राजेन्द्र सागर (नगदा) बम्हौरी, 38. अस्तौन तालाब, 39. हनुमान सागर हनुमान सागर (टीकमगढ़), 40. रईरा ताल मबई, 41. धमेला ताल लार बंजरया, 42. पोखना तालाब बड़ा गाँव धसान, 43. उपत सागर दरगुवां, 44. दन्नीटेरी तालाब नन्नीटेरी 45. डिकौली तालाब डिकौली, 46. सिद्ध खांद तालाब श्रीनगर, 47. मामौन तालाब मामौन, 48. बेला ताल सुन्दरपुर, 49. रिगौरा तालाब रिगौरा 50. सोन सागर हीरानगर बावरी, 51. प्रेम सागर मबई, 52. परा तालाब परा, 53. विन्ध्यवासिनी तालाब चन्दूली डुम्बार 54. जैरोन तालाब जैरोन, 55. वीर सागर तालाब, 56. दिगौड़ा तालाब दिगौड़ा, 57. फुटेर तालाब फुटेर, 58. खैरा ताल भेलसी, 59. रानी तालाब भेलसी।

इनके अतिरिक्त चालीस एकड़ तक अथवा कम सिंचाई करने वाले निम्नांकित तालाब हैं-

1. मातौल तालाब, 2. लखैरा तालाब भेलसी, 3. चन्दैरी तालाब चन्दैरी, 4. झिनगुवां तालाब झिनगुवां (झिनगुवां में सिंगा तालाब, फुटेरा तालाब, अमतला तालाब, फूटा तालाब एवं सौतेली तलइया जैसे 5 अन्य तालाब भी हैं जो फूटे हैं तथा काश्तकारी में प्रयुक्त हैं), 5. ऐरोरा तालाब, 6. शाहपुर तालाब, 7. चन्दैरा तालाब, 8. रामनगर तालाब, 9. समदुआ मुहारा, 10. अतरार तालाब, 11. छुटकी तालाब निवावरी 12. बहारू तालाब बहारू टानगा, 13. कंदवा तालाब, 14. बिलवारी तालाब मुहारा, 15. बैरवार तालाब बदरगुड़ा, 16. चतुरकारी तालाब चतुरकारी, 17. टुड़ियारा तालाब टुड़ियारा, 18. वृषभान पुरा तालाब, 19. गिदवासन तालाब मनियाँ, 20. दरगांय कला तालाब 21. मजल तालाब, 22. छोटा तालाब लछमनपुरा 23. सुनैरा तालाब माडूमर 24. चिता नाला तालाब खरों, 25. बेरमी नाला तालाब, 26. नहारुआ तालाब मुहारा, 28. हिरनी सागर सिमरा खुर्द, 29. गुरैरा तालाब कुड़याला, 30. लिधौरा तालाब, 31. लार बुजुर्ग तालाब, 32. गौना तालाब गौना, 33. चोर टानगा तालाब, 34. टौरिया तालाब टौरिया, 35. गोर तालाब गोर, 36. चमरा तालाब पड़वार गोर, 37. कौंड़िया तालाब गोर, 38. वर्मा तालाब वर्मा, 39. वनगांथ तालाब वनगांय, 40. ऊमरी तालाब ऊमरी (घूघसी), 41. सकेरा बड़ा तालाब सकेरा, 42. सकेरा छोटा तालाब सकेरा, 43. चन्दपुरा तालाब, 44. अस्तारी तालाब अस्तारी, 45. कन्धारी तालाब दुलावनी, 46. फुटेरा तालाब सादिक पुरा, 47. पराखेरा तालाब, 48. लड़वारी तालाब लड़वारी, 49. गिदखिनी तालाब, 50. असाटी ताल असाटी, 51. तरीचर तालाब तरीचर, 52. गुखरई तालाब गुखरई, 53. तालमऊ तालाब, 54. हटा तालाब, 55. गुना तालाब, 56. गोरा तालाब, 57. सुजानपुरा तालाब, 58. लुहर्रा तालाब, 59. देव तालाब वैसा खास, 60. बुपरा तालाब बैसा ऊगड़ 61. वृषभान पुरा तालाब, 62. बार तालाब बार (हीरापुर), 63. पुरैनिया तालाब पुरैनिया (हीरापुर), 64. हीरापुर तालाब हीरापुर, 65. गैंती तालाब गैंती, 66. खेरा ताल खेरा, 67. नारगुड़ा तालाब, नारगुड़ा, 68. महाराजपुरा तालाब महाराजपुरा, 69. पुरैनिया तालाब पुरैनिया (बुड़ेरा) 70. गैरोरा तालाब माडूमर 71. बुड़ेरा तालाब बुड़ेरा 72. बम्हौरी नकीवन तालाब बम्हौरी नकीवन, 73. विन्द्रावन तालाब टीकमगढ़, 74. मजना तालाब मजना, 75. नयागाँव तालाब नयागाँव (गुखरई) 76. सुनौनी तालाब रायपुर सुनौनी, 77. कुलुआ तालाब कुलुआ, 78. मकारा तालाब मकारा, 79. ओगरी तालाब ओगरी, 80. भमौरा तालाब, 81. पाराखेरा तालाब, 82. मड़िया तालाब मड़िया, 83. राधा सागर पृथ्वीपुर, 84. सौतेला तालाब, 85. जटेरा तालाब जटेरा, 86. पटारी तालाब महेवा 87. गोपरा तालाब महेवा 88. बनयारा तालाब महेवा एवं 89. रानी सागर महेवा। इस तालाब में कमल पुष्प खिले रहते हैं। यह छत्रसाल बुन्देला की जन्मभूमि है।

राधा सागर पृथ्वीपुर के तालाब का शिलालेख-

संवत सै दस अष्ट सप्त जुज ऊपर लहिये।
जेठ मास सिति पक्ष चौथ सनिवार जो कहिये।।
अम्बु अनुपम अमल सम पीवत लागै।
नर नारी अस्नान करत पातक सब भागै।।

दरस के लेत होत अति ही उदोत मन यहै जिय जानौ, छानौ तीरथ सवायो है।
ताके तीर करै नरनारी अस्नान ध्यान गान, मुनि गावै तौन देखैं छवि है।।

90. सुनौनिया तालाब पृथ्वीपुर, 91. यज्ञ सागर बिन्दुपुरा। ऐसी लोक धारणा है कि इस तालाब के मध्य में जनमेजय राजा ने यज्ञ कराया था। यज्ञ के लिये ही इसे बनवाया था। 92. रसोई तालाब 93. चौपरा तालाब, 94. ककखाहा तालाब, 95. धजरई तालाब, सिमरा तालाब सिमरा (जेरोन), 97. डिकौली तालाब, 98. मचखेरा तालाब, 99. रमन्ना (टीकमगढ़) में 6 तालाब सुधासागर, मगरा, मजैरा, भिलमा एवं भान तला, बगर (गौशाला) का तालाब, 100. परशुआ की तलैया 101. मोती सागर कुड़ार, 102. खरगापुर तालाब, 103. सूरजपुर तालाब, 104. जुगल सागर बल्देवगढ़, 105. धर्मसागर बल्देवगढ़, 106. देवपुर तालाब, 107. करमारी तालाब, 108. सागौनी तलइया, 109. लड़वारी (अहार) के दो तालाब माँझ का तालाब एवं छोड़ का तालाब, 110. बसतगुवाँ तालाब, 111. दर्रेठा ताल, 112. अतर्रा तालाब, 113. बनारसी तलैया, 114. मस्तापुर तालाब, 115. पठरा तालाब, 116, मोहनगढ़ भाटा तालाब, 117. प्रेमपुरा तालाब, 118. दरदौरा तालाब।

लगभग 40 तालाब टीकमगढ़ जिला के सघन वनों में वन्य जीवों के पानी पीने एवं आदिवासियों-वन संरक्षकों के निस्तार कि लिये चन्देलों एवं बुन्देले राजाओं के बनवाए हुए बतलाए-कहे जाते हैं जिनमें से जो देखे जा सके वह निम्नांकित हैं-

माचीगढ़, आलपुर, सूरन तालाब, कलोकिरा, भड़रा तालाब, झिंझा तालाब, चरी तालाब, चोर टांनगा तालाब, मड़खेरा तलइया, मछरया तालाब, ओगरी ताल, जावई डाबर, रमतला, सौतेली तलइया, सुनारवारी तलैया, रायपुर सुनौनी तलइया, सुकौरा तालाब, बड़माड़ई तलइया, चन्दपुरा तलइया, लठेरा तलइया, गुवरा तलइया, पठारी तलइया, पारागढ़ की तलइया मवई पारे की तलइया आदि।

सिंचाई विभाग टीकमगढ़ के तालाबों की जानकारी रिपोर्ट में परिशिष्ट IV में दर्शाए ये छोटे-छोटे तालाब भी हैं- गोदम तालाब, मत्सहार, बार तालाब, बैसा तालाब, तमोरा, तमोरम डूँड़ा जागीर, गहरन तलाब, मगर तालाब, सुरभी सागर, झिकनी तलैया मान सरोवर, वृषभानपुरा तलैया, कैलाश सागर, नया ताल, परशुआ तलइया, टुगदा तलैया, गढ़ी तलैया, गबरा तलैया, पीपरवाली तलैया सुरबारा तलइया, तिदारी तलइया, भुतई की तलैया, हम्मीर सिंह तलैया, पमार तलैया, ग्यास तलैया, लल्लू तलैया, सैलसागर तला, मातौली तलैया, पुरुषोत्तमगढ़ तला, मछरया तला, जतारा की तलैया, तलैया बैसा नगरा, नया ताल, रानीपुरा ताल, तुला की तलैया, चौपरा ताल, सुनवारा तालाब, बन्धी तालाब, बनयारा तालाब, मगरया तालाब, लखनारौ घाटन तलैया, मनैरा तालाब, मटिया तालाब, हिन्दी सागर, कुना तलइया, बारौ तालाब, समर्रा तालाब, हम्प तालाब, जमरदा तलइया, बिराउरी तलैया, काल्पी तालाब, नया तालाब, कुनार तलइया, सुंगरवा तालाब, चन्दैरा तलइया, बनखारी तालाब, मजगुँवा तालाब, बर्मा सड़क तालाब, श्याम सागर, कमल नगर तलैया, कपूली तलैया, बार तलैया, गुरेवा तालाब, उदिशपुरा तलैया, जरावली तलैया, नगैपा तलैया, जितकौरा तलैया, खट्टर तालाब, अबरल तालाब, बाबी तलैया, कैलास सागर, धरम सागर, जंगा सागर, उदैपुरा तालाब, मानसरोवर बाउनी तलैया, वृषभान सागर, दागौद खुर्द तालाब, खेवा तलइया, बारौतला, मिनौरा तलइया, करिया ताल, लैवेपुर तलैया, विद्यूसागर, चंपा तलइया, गोपरा ताल सौरई ताल, अलवैना ताल, बीरन ताल, बर्माडांग तलइया, गुर्दन पाली तलइया माची, बैंढ़न तलइया, खरौ तलइया, देवखा तलइया, खुरैल तलइया, रजपुरा तलैया, चिप्पोरी, मटयारी तलैया, भिटारी तलइया, निवाड़ी तलइया, गटोला लोना ताल, सुमेवा ताल, नीम तला, नैतला, घुमेवा, बूढ़ौ ताल, चमर तला पथेकारी तलइया, गवोदन तलइया, बजरंग ताल, नाम ताल, राजा ताल, वासौ ताल, पनयारा स्टाप डैम ताल।

ओरछा (टीकमगढ़) के महाराजा प्रताप सिंह (1874-1930) ने राज्य में जल प्रबन्धन पर विशेष ध्यान दिया था। वीरसिंह देव चरित्र अंग्रेजी चिरंजीलाल माथुर पृ. 2 पर उल्लेख है कि उन्होंने राज्य में 7086 कुआँ बावड़ी बनवाए थे, 73 तालाब स्टॉप डैम कृषि सिंचाई सुविधा के लिये खुदवाए थे तथा 450 प्राचीन चन्देली तालाबों की मरम्मत कराकर उनमें जल निकासी के लिये कुठियां, औनें एवं सुलूस बनवाए थे। तालाबों से खेतों तक नहरें खुदवाई थीं। इससे कृषि क्षेत्र में इजाफा हुआ था।

उपर्युक्त छोटी तलइयों के अतरिक्त ग्रामों में निस्तारी तालाब भी बनाए गए थे। ऐसे निस्तारी तालाबों से ग्राम-वासियों के दैनिक जल की आपूर्ति होती थी। लोगों का नहाना-धोना, पशुओं को पीने को पानी, यहाँ तक कि आवश्यकता के समय लोगों के पीने के पानी की आपूर्ति भी ऐसे निस्तारी तालाबों से होती थी। निस्तारी तालाब ग्रामों के नाम से प्रसिद्ध हैं जिनकी संख्या लगभग 500 तक है। जैसे बसगोई तालाब, जटउआ, राधापुर, हमोदी मड़िया, खिरिया घाट, धनवाहा, नैगुवाँ, खिरिया, पांड़ेर, चरपुआ, नीमखेरा, मिनौरा, जमडार, सावन्तनगर, सागौनी, पथौरा की तलइया, मधुवन, लधूरा, बहादुरपुर, रिगौरा, देवपुर, बुड़की खेरा महाराजपुरा में 2, हनुमान सागर में 2, हजूरी नगर, दुर्गापुर, रानी पुरा स्याग, प्रेमपुरा, जसात नगर, श्रीनगर, बड़ा गाँव खुर्द, तखा, पारी, सुनवाहा हरपुरा, आलमपुर, गर्रौली, भड़रा, रामपुरा, ककावनी, गोपालपुरा, बिहारीपुरा, धरमपुरा, जुड़ावन तलैया, कीरतपुरा, नचनवारा, दिगौड़ा धजरई तलइया, लछमनपुरा, नारायणपुर (हार) सुनौरा खिरिया, बड़ौरा सतगुवां, पहाड़ी खुर्द, कप्तान का मजरा का ताल, जसवंत नगर, कांटी, सुनार की बन्धिया, देवकी (मधुबन) राशन खेरा, भैलो, अटरिया, रजपुरा, ककरबाहा।

सकुलाई, ऊमरी हैदरपुर, भैंसवारी, मिथिलाखेरा मौखरा, कबराटा, सांपौन, अन्तौरा, जमुनिया खेरा, गनेशगंज, गोपालपुरा रतनगंज, हिरदैनगर, अजनौर, अमरपुर, परा, रमपुरा, डूड़ाटौरौ, कैनवांर, मैनवारी माते वाला, खुशीपुरा, सकेरा, गनेशनगर, पतारी डिकौली, सुजारा, डौगरपुर, बुड़ेरा में 3, हरपुरा, जलगुवां, हटा में 2, पटौरी कन्न्पुर, खरीला, करीला, सैपुरा, कड़वाहा, हीरापुर में 2, बुदौरा, दैवरदा में 2, बर्मा, चदैरी ऊगड़, कुड़ीला, दरेरा, जिनागढ़ भानपुरा, किटरा में 2, टीला शिवनगर, हृदय नगर में 3, देवपुर, गुना में 2, चौबारा में 2, तिगोड़ा पिपरा, वनपुरा सापौन, हीरापुर, बनयानी, भिलौनी पथरगुवा में 2, रामनगर, ददगांय, धरमपुरा, करमासन घाट, प्रतापपुरा, चन्दूली, डुम्बार, झिनगुवां में 3, दुर्गानार में 3, समर्रा पातर खेरा, बड़माड़ई, रसोई, दरी, श्यामपुरा, पुरैनिया में 2, मगराखेरा सुधा धरमपुरा, रामनगर खास, लक्ष्मणपुरा, भदौरा, चौपरा, कुँवरपुरा, पिपराहार, इकबाल पुरा, हनुपुरा, भासी हार, पिथनौरा कंजपुरा, थपरिया, धाना, सिद्ध गनेश, जेरा, केशवगढ़, खाकरौन, रानीगंज, बम्हौरी, बिदारी, बरेठी, बन्दा, मालपीथा, टपरियन, टौरिया में 2, मड़ोर में 3, पंचमपुरा, मस्तापुर, दरा, बिहारी पुरा, भमराई, जगत नगर, वीजौरपुरा, नंदपुरा, पुछी गोर चक्र 3, मौगना चक्र 1, मौगुवां चक्र 2, रतनगुवां, बदली हार, दिलन गांय जंगल 1, दिलनगांय जंगल चक्र 2, बछौंड़ा, बछौड़ा चक्र 2, देवपुर, माधौबुजुर्ग चक्र 1, माधौबुजुर्ग चक्र 2, सतराई, जनकपुर, ऊमरी कारीमल, खैरा, मड़खेरा, हसगोरा, शिवराजपुरा, रामनगर, धरमपुर खास, कुर्राई चक्र 2, अमरपुरा भाटा, सैमरखेरा, पूनौन, रिघा, गोर, पड़बार, फिहार, कचगुवां, बिजरावन, दिगौड़ा चक्र 1, दिगौड़ा चक्र 2, धामना, जनकपुर, खर्रौई, पड़ुआ, लुहरगुवाँ, धमना, भगवन्तपुरा टौरिया, मदनपुरा, जेवर, उपरारा हरकनपुरा, मैंदवारा, कछियागुड़ा, विशनपुरा, बनपुरा, महेवा चक्र 1, चक्र 2, चक्र 3, चक्र 4, चक्र 5, पैग खेरा, लड़ियापुरा, तगैड़ी, मदरई, उदैपुरा, बारी, बारौन, सौरई, छिपरी, गौटैट छत्रसाल टौरिया, वीरपुरा, मड़ोरी पैतपुरा, पटखिरका, दलपुरा खरौं चक्र 1, खरौं चक्र 2, अपर्वल, ईशौन, मातौल, सतगुवां, बिजैपुर, भूपगंज, पथरिया टौरिया, पैदपुरा चक्र 2, विजौली बैदौरा, सगरवारा, कौंदपुरा, चतुरकारी चक्र 3, पठरा चक्र 2, दिनउ की तलैया, नगारी, माखनपुरा, बम्हौरी कला चक्र 1, बम्हौरी कला चक्र 2, गब्दारी गंज, कटेरा, तिली, निबावरा, पटैलनगर, कलरा, कंजना, चंदैरा चक्र 1, चंदैरा मगासुर, जरया, किटाखेरा बैरबार, विक्रमपुरा, बदनगुड़ा, बाजीतपुरा, मिचौरा तलइया, पिपरट, बार, रघुनाथपुरा, सिमिरिया, रतवांस, मबई, इटायली, कचौरा, कपासी, गोदारी, दरदौरा, खजरी, छाउली, टौरिया, खैरा, अजोखर, गौना चक्र 2, करौला चक्र 2, बोल तलैया, लारौन चक्र 2, पडुआ, कुबदी, हनौता, पलेरा खास, पलेरा चक्र 3, देवराहा चक्र 2, बम्हौरी अब्दा चक्र 2, किशनपुरा तलैया, बन्नेबुजुर्ग, दंतागढ़, टौरी, परा, अलोपा, बसतगुवां मनेद्र महेबा, चोर टोनगा चक्र 2, गुआवा टौरिया, बखतपुरा चक्र 2, भगवन्तपुरा, टानगा, महादेव पुरा, टपरियां चौहान, पाली, रमपुरा निवारी चक्र 2, कंदेरी, रामगढ़ खरगूपुरा, निवावरा, जवाहरपुरा, खैरा, खुमानगंज, लार बुजुर्ग, छोटी बन्नै, बर्मा डॉग, बर्मा माँझ, बिजरौठा, करौली, मुहारा चक्र 4, मुहारा चक्र 5, मनेथा, चौमों, कुअरपुरा, विरौरा, जबेरा, चिकुटा, दहाड़ी, बंजारीपुरा, गोपालपुरा, अस्तारी, सोरका, गर्रौली, खिस्टौन, जलंधर, मबई, मड़िया, तिलपुरा, चिरपुरा, केशरीगंज, ककावनी मजल, जैरोन चक्र 2, रौतेरा, मुड़ेरी, डिरगुवां, खुरई, भेलसी, रमपुरा, बोरेश्वर, तातारपुरा, जिराबनी, गलूरा, सैतगारा, गतारा, करगुवां, तरीपुरा, बनियानी, सुनरई, चौर्रा, कोटी, हमीरपुरा, सरसौरा, नैगुवां खुर्द, पनियारी, मड़ोरी, अतर्रा, लड़वारी, चंदैरी हार, रजपुरा, मजरा माखेरा, सुनौनियां, बसन्तपुरा, भेलसा, मोहनपुरा, सुजानपुरा, डुलावनी, रमपुरा, हीरापुर, कनैरा, लठेसरा, पठारी, चकरपुर, रजपुरा महाराजपुरा, जमुनियां, कुमर्रा, रामनगर, बासौदा, जिजौरा, सीतापुर, घटवाहा, भोजपुरा तलैया, मख्ता, कठऊ पहारी, सैंदरी, शक्त भैरों, सकूली, दउअर, कुअरपुरा, सियामसी, बीजौर, बाघाट, पुछी करगुवां, मोहनपुरा, किशोरपुरा, तरीचरखुर्द, कलू तलैया, पठाराम, चचावली धामना, थौना, घूघसी, नौटा, जिखनगांव, उरदौरा, विनवारा, गितखिनी बावई, देवेन्द्रपुरा, कैना, मुड़ारा, चुरारा, बासवान, जुगयाई, असाटी, रासली, टीला, चंदपुरा, मड़िया तालाब, कुरेजा, कहेसरा तालाब, पक्षी तालाब, नीमखेरा, मछया ताल, सोरका ताल, गबरा ताल, कुड़ार ताल, तलैया बूढ़ापुरा, धमना, चोटल, धवा बजूरा ताल, बमरू ताल, वनसागर, चचावली, कालेवारी तलैया, गुंदरीड़ी तलैया मुरैनी तलैया, दरकेव तलैया।

जिला के लगभग 150 चन्देली तालाब खेती में प्रयुक्त हैं, जिनके पट्टे रियासती समय में रसूकदार किसानों को दे दिए गए थे। वर्तमान में 995 तालाब इस जिला में शासकीय हैं। इनके अतिरिक्त लगभग 600 कच्ची बन्धियां (तालाब) भी टीकमगढ़ जिला में हैं, जो किसानों ने निजी तौर पर अपनी मौरूसी पट्टे की भूमि पर बना रखी हैं जिनमें किसान रबी एवं खरीफ की फसल बोते रहे हैं।

इस प्रकार लगभग 1500 तालाब, तलैयां एवं बन्धियां इस टीकमगढ़ जिला में हैं। फिर भी यहाँ निरन्तर जलाभाव रहता है। जिसका मूल कारण तालाबों में मिट्टी, गौड़र भर जाना है। कुछ तालाबों के बाँधों में रिसन उत्पन्न हो गई है जिससे पानी रिस-रिस कर बाहर बह जाता है। कुछ तालाब पांखियों के पास से फूट गए हैं तो कुछ के बन्धानों (पाल) की पैरियां खिसक गई हैं। यदि यहाँ के सभी तालाबों का गहरीकरण करा दिया जाए, बाँधों की मरम्मत करा दी जाए एवं तालाबों की जनसमितियाँ अपने-अपने क्षेत्र के तालाबों की चौकसी करते रहते हुए, उनके भराव जलस्रोतों एवं स्वच्छता का पूरा-पूरा दायित्व निर्वहन करें तो जल समस्या दूर हो सकती है। जल के प्रश्न पर जन-चेतना अनिवार्य है।

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - हिन्दी साहित्य में रासो काव्य परम्परा (Raso poetry tradition in Hindi literature)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

हिन्दी साहित्य में रासो काव्य परम्परा (Raso poetry tradition in Hindi literature)

रासो (Raso) :

आदिकाल के हिन्दी-साहित्य में वीर गाथायें प्रमुख हैं। वीर गाथाओं के रुप में ही "रासो' ग्रन्थों की रचनायें हुई हैं।

हिन्दी साहित्य में "रास' या "रासक' का अर्थ लास्य से लिया गया है जो नृत्य का एक भेद है। अतः इसी अर्थ भेद के आधार पर गीत नृत्य परक रचनायें "रास' नाम से जानी जाती हैं "रासो' या "रासउ' में विभिन्न प्रकार के अडिल्ल, ढूसा, छप्पर, कुण्डलियां, पद्धटिका आदि छन्द प्रयुक्त होते हैं। इस कारण ऐसी रचनायें "रासो' के नाम से जानी जाती हैं।

"रासो' शब्द विद्वानों के लिए विवाद का विषय रहा है। इस पर किसी भी विद्वान का निश्चयात्मक एवं उपयुक्त मत प्रतीत नहीं होता। विभिन्न विद्वानों ने अनेक प्रकार से इस शब्द की व्याख्या करने का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों ने अनेक प्रकार से इस शब्द की व्याख्या करने का प्रयास किया है। कुछ विद्वानों ने "रासो' की व्युत्पत्ति "रहस्य' शब्द के "रसह' या "रहस्य' का प्राकृत रुप मालूम से मानी जाती है। श्री रामनारायण दूगड लिखते हैं- "रासो' या रासो शब्द "रहस' या "रहस्य' का प्राकृत रुप मालूम पड़ता है। इसका अर्थ गुप्त बात या भेद है। जैसे कि शिव रहस्य, देवी रहस्य आदि ग्रन्थों के नाम हैं, वैसे शुद्ध नाम पृथ्वीराज रहस्य है जोकि प्राकृत में पृथ्वीराज रास, रासा या रासो हो गया।

डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल और कविराज श्यामदास के अनुसार "रहस्य' पद का प्राकृत रुप रहस्सो बनता है, जिसका कालान्तर में उच्चारण भेद से बिगड़ता हुआ रुपान्तर रासो बन गया है। रहस्य रहस्सो रअस्सो रासो इसका विकास क्रम है।

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल "रासो' की व्युत्पत्ति "रसायण' से मानते हैं। डॉ उदयनारायण तिवारी "रासक शब्द से रासो' का उदभव मानते हैं।

वीसलदेव रासो में "रास' और "रासायण' शब्द का प्रयोग काव्य के लिए हुआ है। ""नाल्ह रसायण आरंभई'', एवं ""रास रसायण सुणै सब कोई'' आदि।

रस को उत्पन्न करने वाला काव्य रसायन है। वीसलदेव रासो में प्रयुक्त "रसायन' एवं "रसिय' शब्दों से "रासो' शब्द बना।

प्रो. ललिता प्रसाद सुकुल रसायण को रस की निष्पत्ति का आधार मानते हैं।

मुंशी देवी प्रसार के अनुसार-""रासो के मायने कथा के हैं, वह रुढि शब्द है। एक वचन "रासा' और बहुवचन "रासा' हैं। मेवाड, ढूढाड और मारवाड में झगड़ने को भी रासा कहते हैं। जैसे यदि कई आदमी झगड़ रहे हों, या वाद विवाद कर रहे हों, तो तीसरा आकर पूछेगा "कांई रासो है' है। लम्बी चौडी वार्ता को भी रासो और रसायण कहते हैं। बकवाद को भी रासा और रामायण ढूंढाण में बोलते हैं। कांई रामायण है? क्या बकवाद है? यह एक मुहावरा है। ऐसे ही रासो भी इस विषय में बोला जाता है, कांई रासो है?''

महामहोपाध्याय डॉ. हरप्रसाद शास्री-""राजस्थान के भाट चारण आदि रासा (क्रीडा या झगड़ा) शब्द से रासो का विकास बतलाते हैं।''

गार्सा-द तासी ने रासो शब्द राजसूय से निकला बतलाया है।

डॉ. ग्रियर्सन "रासो' का रुप रासा अथवा रासो मानते हैं तथा उसकी निष्पत्ति "राजादेश' से हुई बतलाते हैं। इनके अनुसार-""इस रासो शब्द की निष्पत्ति "राजादेश' से हुई है, क्योंकि आदेश का रुपान्तर आयसु है।''

महामहोपाध्याय डॉ गौरीशंकर हीराचन्द ओझा हिन्दी के "रासा' शब्द को संस्कृत के "रास' शब्द से अनुस्यूत कहते हैं। उनके मतानुसार-"" मैं रासा शब्द की उत्पत्ति संस्कृत के रास शब्द से मानता हँ। रास शब्द का अर्थ विलास भी होता है (शब्द कल्पदुम चतुर्थ काण्ड) और विलास शब्द चरित, इतिहास आदि के अर्थ में प्रचलित है।''

डॉ. ओझा जी ने अपने उपर्युक्त मत में रासा का अर्थ विलास बतलाया है जबकि श्री डी. आर. मंकड "रास' शब्द की उत्पत्ति तो संस्कृत की "रास' धातु से बतलाते हैं, पर इसका अर्थ उन्होंने जोर से चिल्लाना लिया है, विलास के अर्थ में नहीं।

डॉ. दशरथ शर्मा एवं डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी का कथन है कि "रास' परम्परा की गीत नृत्य परक रचनायें ही आगे चलकर वीर रस के पद्यात्मक इति वृत्तों में परिणत हो गई। ""रासो प्रधानतः गानयुक्त नृत्य विशेष से क्रमशः विकसित होते-होते उपरुपक और किंफर उपरुपक से वीर रस के पद्यात्मक प्रबन्धों में परिणत हो गया।''

""इस गेय नाट्यों का गीत भाग कालान्तर में क्रमशः स्वतन्त्र श्रव्य अथवा पाठ्य काव्य हो गया और इनके चरित नायकों के अनुसार इसमें युद्ध वर्णन का समावेश हुआ।''

पं. विन्ध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदी रासो शब्द को "राजयश' शब्द से विनिश्रत हुआ मानते हैं।
साहित्याचार्य मथुरा प्रसाद दीक्षित रासो पद का जन्म राज से बतलाते हैं।
इन अभिमतों के विश्लेषण का निष्कर्ष रासो शब्द "रास' का विकास है।

बुन्देलखण्ड में कुछ ऐसी उक्तियाँ भी पाई जाती है, जिनसे रासो शब्द के स्वरुप पर बहुत कुछ प्रकाश पड़ता है, जैसे ""होन लगे सास बहू के राछरे''। यह "राछरा' शब्द रासो से ही सम्बन्धित है। सास बहू के बीच होने वाले वाक्युद्ध को प्रकट करने वाला यह "राछरा' शब्द बड़ी स्वाभाविकता से रायसा या रासो के शाब्दिक महत्व को प्रगट करता है। वीर काव्य परम्परा में यह रासो शब्द युद्ध सम्बन्धी कविता के लिए ही प्रयुक्त हुआ है। इसका ही बुन्देलखण्डी संस्करण "राछरौ' है।

उपर्युक्त सभी मतों के निष्कर्षस्वरुप यह एक ऐसा काव्य है जिसमें राजाओं का यश वर्णन किया जाता है और यश वर्णन में युद्ध वर्णन स्वतः समाहित होता है।

परम्परा (Tradition) :

रासो काव्य परम्परा हिन्दी साहित्य की एक विशिष्ट काव्यधारा रही है, जो वीरगाथा काल में उत्पन्न होकर मध्य युग तक चली आई। कहना यों चाहिए कि आदि काल में जन्म लेने वाली इस विधा को मध्यकाल में विशेष पोषण मिला। पृथ्वीराज रासो' से प्रारम्भ होने वाली यह काव्य विधा देशी राज्यों में भी मिलती है। तत्कालीन कविगण अपने आश्रयदाताओं को युद्ध की प्रेरणा देने के लिए उनके बल पौरुष आदि का अतिरंजित वर्णन इन रासो काव्यों में करते रहे हैं।

रासो काव्य परम्परा में सर्वप्रथम ग्रन्थ "पृथ्वीराज रासो' माना जाता है। संस्कृत, जैन और बौद्ध साहित्य में "रास', "रासक' नाम की अनेक रचनायें लिखी गईं। गुर्जर एवं राजस्थानी साहित्य में तो इसकी एक लम्बी परम्परा पाई जाती है।

यह निर्विवाद सत्य है कि संस्कृत काव्य ग्रन्थों का हिन्दी साहित्य पर बहुत प्रभाव पड़ा। संस्कृत काव्य ग्रन्थों में वीर रस पूर्ण वर्णनों की कमी नहीं है। ॠगवेद में तथा शतपथ ब्राह्मण में युद्ध एवं वीरता सम्बन्धी सूक्त हैं। महाभारत तो वीर काव्य ही है। यहीं से सूत, मागध आदि द्वारा राजाओं की प्रशंसा का सूत्रपात हुआ जो आगे चलकर भाट, चारण, ढुलियों आदि द्वारा अतिरंजित रुप को प्राप्त कर सका। वीर काव्य की दृष्टि से "रामायण' में भी युद्ध के अतिशयोक्ति पूर्ण वर्णन हैं। "किरातार्जुनीय, में वीरोक्तियों द्वारावीर रस की सृष्टि बड़ी स्वाभाविक है। "उत्तर रामचरित' में जहाँ "एको रसः करुण एव' का प्रतिपदान है वहीं चन्द्रकेतु और लव के वीर रस से भरे वाद विवाद भी हैं। भ नारायण कृत "वेणी संहार' में वीर रस का अत्यन्त सुन्दर परिपाक हुआ है। इससे स्पष्ट है कि हिन्दी की वीर काव्य प्रवृति संस्कृत से ही विनिश्रित हुई है। डॉ. उदय नारायण तिवादी ने "वीर काव्य' में हिन्दी की वीर काव्यधारा का उद्गम संस्कृत की वरी रस रचनाओं से माना है।

रासो परम्परा दो रुपों में मिलती है-प्रबन्ध काव्य और वीरगीत। प्रबन्ध काव्य में "पृथ्वी राज रासो' तथा वीर गीत के रुप में "वीसलदेव रासो' जैसी रचनायें हैं। जगनिक का रासो अपने मूल रुप में तो अप्राप्त है किन्तु, आल्ह खण्ड' नाम की वीर रस रचना उसी का परिवर्तित रुप है। आल्हा, ऊदल एवं पृथ्वीराज की लड़ाइयों से सम्बन्धित वीर गीतों की यह रचना हिन्दी भाषा क्षेत्र के जनमानस में गूंज रही है।

आदि काल की प्रमुख रचनायें पृथ्वीराज रासो, खुमान ख्रासो एवं वीसलदेव रासो हैं। हिन्दी साहित्य के प्रारम्भ काल की ये रचनायें वीर रस एवं श्रृंगार रस का मिला-जुला रुप प्रस्तुत करती हैं।

जैन साहित्य में "रास' एवं "रासक' नम से अभिहित अनेक रचनायें हैं जिनमें सन्देश रासक, भरतेश्वर बाहुबलि रास, कच्छूलिरास आदि प्रतिनिधि हैं।
आदि काल की बहुत सी रचनायें तो अनुपलब्ध ही हैं। संकेत सूत्रों के आधर पर सूचना मात्र मिलती है अथवा काल क्रमानुसार कुछ रचनाओं का रुप ऐसा परिवर्तित हो गया है कि उनके मूल रुप का अनुमान भी लगाना कठिन हो गया है। "पृथ्वीराज रासो' जैसी वहदाकार रचनाओं की ऐतिहासिकता संदिग्ध है। उसकी तिथियों, घटनाओं आदि के विषय में विद्वानों में मतभेद हैं।

पृथ्वीराज रासो एवं वीसलदेव रासो को कुछ विद्वान सोलहवीं एवं सत्रहवीं शताब्दी की रचना मानते हैं। डॉ. माताप्रसाद गुप्त इन्हें १३ वीं १४ वीं शताब्दी का मानते हैं।

यह रासो परम्परा हिन्दी के जन्म से पूर्व अपभ्रंश में वर्तमान थी तथा हिन्दी की उत्पत्ति के साथ'साथ गुर्जर साहित्य में।

अपभ्रंश में "मु"जरास' तथा "सन्देश रासक' दो रचनायें हैं। इनमें से मुंजरास अनुपलब्ध है। केवल हेमचन्द्र के "सिद्ध हेम' व्याकरण ग्रन्थ में तथा मेरु तुंग के प्रबन्ध् चिन्तामणि में इसके कुछ छन्द उद्धृत किए गये हैं। डॉ. माता प्रसाद गुप्त "मुंजरास' की रचना काल १०५४ वि. और ११९७ वी. के बीच मानते हैं, क्योंकि मुंज का समय १००७ वि. से १०५४ वि. का है। "संदेश रासक' को विद्वानों ने १२०७ वि. की रचना माना है। पृथ्वीराज रासो की तरह "मुंजरास' एवं "संदेश रास भी प्रबन्ध रचनायें हैं। पृथ्वीराज रासो दुखान्त रचना है। वीसलदेव रासो सुखान्त रचना है एवं इसी तरह "संदेश रासकद्' सुखान्त एवं "मुंजरास' दुखान्त रचनायें हैं।

अपभ्रंश काल की एक और रचना जिन्दत्त सूरि का "उपदेश रसायन रास' है। यह भक्ति परक धार्मिक रचना है। डॉ. माता प्रसाद गुप्त जिनदत्त सूरि का स्वर्गवास सं. १२९५ वि. में मानते हैं। अतः रचना सं. १२९५ वि. के कुछ पूर्व की ही होनी चाहिए। अपभ्रशं की उपर्युक्त रचनायें रासो काव्य की मुख्य प्रवृत्तियों की पूर्ण अभिव्यक्ति नहीं करतीा

गुर्जर साहित्य में लिखी रासो रचनायें आकार में छोटी हैं। इनके रचयिता जैन कवि थे और उन्होंने इनकी रचना जैन धर्म सिद्धान्तों के अनुसार की।
सर्वप्रथम "शालिभ्रद सूरि' की "भरतेश्वर बाहुबलि रास' एवं "वद्धि रास' रचनायें उपलब्ध होती है। "भरतेश्वर बाहुबलि रास' राजसत्ता के लिए हुआ भरतेश्वर एवं बाहुबलि का संघर्ष है जो जैन तीथर्ंकर स्वामी ॠषभदेव के पुत्र थे। इसकी रचना वीर रस में हुई है। "बुद्धि रास' शान्त रस में लिखा गया उपदेश परक ग्रन्थ है। 

रासो या रासक रचनायें Raso or Rasak compositions) :

सन्देश रासक - यह अपभ्रंश की रचना है। रचियिता अब्दुल रहमान हैं। यह रचना मूल स्थान या मुल्तान के क्षेत्र से सम्बन्धित है। कुल छन्द संख्या २२३ है। यह रचना विप्रलम्भ श्रृंगार की है। इसमें विजय नगर की कोई वियोगिनी अपने पति को संदेश भेजने के लिए व्याकुल है तभ कोई पथिक आ जाता है और वह विरहिणी उसे अपने विरह जनित कष्टों को सुनाते लगती है। जब पथिक उससे पूछता है कि उसका पति कि ॠतु में गया है तो वह उत्तर में ग्रीष्म ॠतु से प्रारम्भ कर विभिन्न ॠतुओं के विरह जनित कष्टों का वर्णन करने लगती है। यह सब सुनकर जब पथिक चलने लगता है, तभी उसका प्रवासी पति आ जाता है। यह रचना सं ११०० वि. के पश्चातद्य की है।

मुंज रास(Munj Ras) :- यह अपभ्रंश की रचना है। इसमें लेखक का नाम कहीं नहीं दिया गया। रचना काल के विषय में कोई निश्चित मत नहीं मिलता। हेमचन्द्र की यह व्याकरण रचना सं. ११९० की है। मुंज का शासन काल १००० -१०५४ वि. माना जाता है। इसलिए यह रचना १०५४-११९० वि. के बीच कभी लिखी गई होगी। इसमें मुंज के जीवन की एक प्रणय कथा का चित्रण है। कर्नाटक के राजा तैलप के यहाँ बन्दी के रुप में मुंज का प्रेम तैलप की विधवा पुत्री मृणालवती से ही जाता है। मुंज उसको लेकर बन्दीगृह से भागने का प्रस्ताव करता है किन्त मृणालवती अपने प्रेमी को वहीं रखकर अपना प्रणय सम्बन्ध निभाना चाहती थी इसलिए उसने तैलप को भेद दे दिया जिसके परिणामस्वरुप क्रोधी तैलप ने मृणालवती के सामने ही उसके प्रेमी मुंज को हाथी से कुचलवाकर मार डाला। कथा सूत्र को देखते हुए रचना छोटी प्रतीत नहीं होती।

पृथ्वीराज रासो(Prithviraj Raso)- यह कवि चन्द की रचना है। इसमें दिल्लीश्वर पृथ्वीराज के जीवन की घटनाओं का विशद वर्णन है। यह एक विशाल महाकाव्य है। यह तेरहवीं शदी की रचना है। डा. माताप्रसाद गुप्त इसे १४०० वि. के लगभग की रचना मानते हैं। पृथ्वीराज रासो की एतिहासिकता विवादग्रस्त है।

हम्मीर रासो(Hammeer Raso) - इस रचना की कोई मूल प्रति नहीं मिलती है। इसका रचयिता शाङ्र्गधर माना जाता है। प्राकृत पैगलम में इसके कुछ छन्द उदाहरण के रुप में दिए गये है। ग्रन्थ की भाषा हम्मीर के समय के कुछ बाद की लगती है। अतः भाषा के आधार पर इसे हम्मीर के कुछ बाद का माना जा सकता है।

बुत्रद्ध रासो(Butraddh Raso)- इसका रचयिता जल्ह है जिसे पृथ्वीराज रासो का पूरक कवि भी माना गया है। कवि ने रचना में समय नहीं दिया है। इसे पृथ्वीराज रासो के बाद की रचना माना जाता है।

परमाल रासो(Parmal Raso)- इस ग्रन्थ की मूल प्रति कहीं नहीं मिलती। इसके रचयिता के बारे में भी विवाद है। पर इसका रचयिता ""महोबा खण्ड'' को सं. १९७६ वि. में डॉ. श्यामसुन्दर दास ने ""परमाल रासो'' के नाम से संपादित किया था। डॉ. माता प्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सोलहवीं शती विक्रमी की हो सकती है। इस रचना के सम्बन्ध में काफी मतभेद है। श्री रामचरण हयारण ""मित्र'' ने अपनी कृति ""बुन्देलखण्ड की संस्कृति और साहित्य'' मैं "परमाल रासो'' को चन्द की स्वतन्त्र रचना माना है। किन्तु भाषा शैली एवं छन्द में -महोवा खण्ड'' से यह काफी भिन्न है। उन्होंने टीकामगढ़ राज्य के वयोवृद्ध दरवारी कवि श्री ""अम्बिकेश'' से इस रचना के कंठस्थ छन्द लेकर अपनी कृति में उदाहरण स्वरुप दिए हैं। रचना के एक छन्द में समय की सूचना दी गई है जिसके अनुसार इसे १११५ वि. की रचना बताया गया है जो पृथ्वीराज एवं चन्द के समय की तिथियों से मेल नहीं खाती। इस आधार पर इसे चन्द की रचना कैसे माना जा सकता है। यह इसे परमाल चन्देल के दरवारी कवि जगानिक की रचना माने तो जगनिक का रासो कही भी उपलब्ध नहीं होता है।

स्वर्गीय महेन्द्रपाल सिंह ने अपेन एक लेख में लिखा है कि जगनिक का असली रासो अनुपलब्ध है। इसके कुछ हिस्से दतिया, समथर एवं चरखारी राज्यों में वर्तमान थे, जो अब नष्ट हो चुके हैं।

राउजैतसी रासो(Raujaitsi Raso)- इस रचना में कवि का नाम नहीं दिया गया है और न रचना तिथि का ही संकेत है। इसमें बीकानेर के शासक राउ जैतसी तथा हुमायूं के भाई कामरांन में हुए एक युद्ध का वर्णन हैं जैतसी का शासन काल सं. १५०३-१५१८ के आसपास रहा है। अत-यह रचना इसके कुछ पश्चात की ही रही होगी। इसकी कुल छन्द संख्या ९० है। इसे नरोत्तम स्वामी ने राजस्थान भारतीय में प्रकाशित कराया है।

विजय पाल रासो(Vijay pal Raso) - नल्ह सिह भाट कृत इस रचना के केवल ४२ छन्द उपलब्ध है। विजयपाल, विजयगढ़ करौली के यादव राजा थे। इसके आश्रित कवि के रुप में नल्ह सिह का नाम आता है। रचना की भाषा से यह १७ वीं शताब्दी से पूर्व की नहीं हो सकती है।

राम रासो(Ram Raso) - इसके रचयिता माधव चारण है। सं. १६७५ वि. रचना काल है। इस ग्रन्थ में रामचरित्र का वर्णन है तथा १६०० छन्द हैं।

राणा रासो(Rana Raso) - दयाल दास द्वारा विरचित इस ग्रन्थ में शीशौदिया वंश के राजाओं के युद्धें एवं जीवन की घटनाओं का विस्तार पूर्वक वर्णन १३७५-१३८१ के मध्य का हो सकता है। इसमें रतलाम के राजा रतनसिंह का वृत्त वर्णित किया गया है।

कायम रासो(Kayam Raso) - यह रासो ""न्यामत खाँ जान'' द्वारा रचा गया है। इसका रचना काल सं. १६९१ है किन्तु इसमें १७१० वि. की घअना वाला कुछ    अंश प्रक्षिप्त है क्योंकि यदि कवि इस समय तक जीवित था तो उसने पूर्व तिथि सूचक क्यों बदला। यह वैसा का वैसा ही लिखा है इसमें राजस्थान के कायमखानी वंश का इतिहास वर्णित है।

शत्रु साल रासो(Shatrusal Raso)- रचयिता डूंगरसी कवि। इसका रचना काल सं. १७१० माना गया है। छंद संख्या लगभग ५०० है। इसमें बूंदी के राव शत्रुसाल का वृत्त वर्णित किया गया है। 

आंकण रासो(Ankan Raso) - यह एक प्रकार का हास्य रासो है। इसमें खटमल के जीवन चरित्र का वर्णन किया गया है। इसका रचयिता कीर्तिसुन्दर है। रचना सं. १७५७ वि. की है। इसकी कुल छन्द संख ३९ है।

सागत सिंह रासो(Sagar Singh Raso)- यह गिरधर चारण द्वारा लिखा गया है। इसमें शक्तिसिंह एवं उनके वंशजों का वृत्त वर्णन किया गया है। श्री अगरचन्द्र श्री अगरचन्द नाहटा इसका रचना काल सं. १७५५ के पश्चात का मानते हैं। इसकी छन्द संख्या ९४३ है।

हम्मीर रासो(Hammeer Raso)- इसके रचयिता महेश कवि है। यह रचना जोधराज कृत्त हम्मीर रासो के पहले की है। छन्द संख्या लगभग ३०० है इसमें रणथंभौर के राणा हम्मीर का चरित्र वर्णन है।

खम्माण रासो(Khammad Raso) - इसकी रचना कवि दलपति विजय ने की है। इसे खुमाण के समकालीन अर्थातद्य सं. ७९० सं. ८९० वि. माना गया है किन्तु इसकी प्रतियों में राणा संग्राम सिंह द्वितीय के समय १७६०-१७९० के पूर्व की नहीं होनी चाहिए। डॉ. उदयनारायण तिवारी ने श्री अगरचन्द नाहटा के एक लेख के अनुसार इसे सं. १७३०-१७६० के मध्य लिखा बताया गया है। जबकि श्री रामचन्द्र शुक्ल इसे सं. ९६९-सं. ८९९ के बीच की रचना मानते हैं। उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे सं. १७३०-७९० के मध्य लिखा माना जा सकता है।

रासा भगवन्तसिंह(Rasa Bhagvant singh) - सदानन्द द्वारा विरचित है। इसमें भगवन्तसिंह खीची के १७९७ वि. के एक युद्ध का वर्णन है। डॉ. माताप्रसाद गुप्त के अनुसार यह रचना सं. १७९७ के पश्चात की है। इसमें कुल १०० छन्द है।

करहिया की रायसौ(Karahiya ki Raysao) - यह सं. १९३४ की रचना है। इसके रचयिता कवि गुलाब हैं, जिनके श्वंशज माथुर चतुर्वेदी चतुर्भुज वैद्य आंतरी जिला ग्वालियर में निवास करते थे। श्री चतुर्भुज जी के वंशज श्री रघुनन्दन चतुर्वेदी आज भी आन्तरी ग्वालिया में ही निवास करते हैं, जिनके पास इस ग्ररन्थ की एक प्रति वर्तमान है। इसमें करहिया के पमारों एवं भरतपुराधीश जवाहरसिंह के बीच हुए एक युद्ध का वर्णन है।

रासो भइया बहादुरसिंह(Raso bhaiya Bahadur singh)- इस ग्रन्थ की रचना तिथि अनिश्चित है, परन्तु इसमें वर्णित घटना सं. १८५३ के एक युत्र की है, इसी के आधार पर विद्वानों ने इसका रचना काल सं. १८५३ के आसपास बतलाया है। इसके रचयिता शिवनाथ है।

रायचसा(Raychasa) - यह भी शिवनाथ की रचना है। इसमें भी रचना काल नहीं दिया है। उपर्युक्त ""रासा भइया बहादुर सिंह'' के आधार पर ही इसे भी सं. १८५३ के आसपास का ही माना जा सकता है, इसमें धारा के जसवंतसिंह और रीवां के अजीतसिंह के मध्य हुए एक युद्ध का वर्णन है।

कलियंग रासो(Kaliyang Raso) - इसमें कलियुगका वर्णन है। यह अलि रासिक गोविन्द की रचना हैं। इसकी रचना तिथि सं. १८३५ तथा छन्द संख्या ७० है।

वलपतिराव रायसा(Valpatirao Raysa) - इसके रचयिता कवि जोगींदास भाण्डेरी हैं। इसमें महाराज दलपतिराव के जीवन काल के विभिन्न युद्धों की घटनाओं का वर्णन किया गया है। कवि ने दलपति राव के अन्तिम युद्ध जाजऊ सं. १७६४ वि. में उसकी वीरगति के पश्चात् रायसा लिखने का संकेत दिया है। इसलिये यह रचना सं. १४६४ की ही मानी जानी चाहिए। रासो के अध्ययन से ऐसा लगता है कि कवि महाराजा दलपतिराव का समकालीन था। इस ग्रन्थ में दलपतिराव के पिता शुभकर्ण का भी वृत्त वर्णित है। अतः यह दो रायसों का सम्मिलित संस्करण है। इसकी कुल छन्द संख्या ३१३ हैं। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने किया है, तथा "कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ, आगरा नसे भारतीय साहित्य के मुन्शी अभिनन्दन अंक में इसे प्रकाशित किया गया है।

शत्रु जीत रायसा(Shatrujeet Raysa) - बुन्देली भाषा के इस दूसरे रायसे के रचयिता किशुनेश भाट है। इसकी छन्द संख्या ४२६ है। इस रचना के छन्द ४२५ वें के अनुसार इसका रचना काल सं. १८५८ वि. ठहरता है। दतिया नरेश शत्रु जीत का समय सं. १८१९ सं. १९४८ वि. तदनुसार सनद्य १७६२ से १८०१ तक रहा है। यह रचना महाराजा शत्रुजीत सिंह के जीवन की एक अन्तिम घटना से सम्बन्धित है। इसमें ग्वालियर के वसन्धिया महाराजा दौलतराय के फ्रान्सीसी सेनापति पीरु और शत्रुजीत सिंह के मध्य सेवढ़ा के निकट हुए एक युद्ध का सविस्तार वर्णन है। इसका संपादन श्री हरि मोहनलाल श्रीवास्तव ने किया, तथा इसे ""भारतीय साहित्य'' में कन्हैयालालमुन्शी हिदी विद्यापीठ आगरा द्वारा प्रकाशित किया गया है।

गढ़ पथैना रासो(Gadh Pathaina Raso)- रचयिता कवि चतुरानन। इसमें १८३३ वि. के एक युद्ध का वर्णन किया गया है। छन्द संख्या ३१९ है। इसमें वर्णित युद्ध आधुनिक भरतपुर नगर से ३२ मील पूर्व पथैना ग्राम में वहां के वीरों और सहादत अली के मध्य लड़ा गया था। भरतपुर के राजा सुजारनसिंह के अंगरक्षक शार्दूलसिंह के पूत्रों के अदम्य उत्साह एवं वीरता का वर्णन किया गया है। बाबू वृन्दावनदास अभिनन्दन ग्रन्थ में सन् १९७५ में हिन्दी साहित्य सम्मेलन इलाहाबाद द्वारा इसका विवरण प्रकाशित किया गया।

पारीछत रायसा(Parichhat Raysa) - इसके रचयिता श्रीधर कवि है। रायसो में दतिया के वयोवृद्ध नरेश पारीछत की सेना एवं टीकामगढ़ के राजा विक्रमाजीतसिंह के बाघाट स्थित दीवान गन्धर्वसिंह के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है। युद्ध की तिथि सं. १८७३ दी गई है। अतएव यह रचना सं. १८७३ के पश्चात् की ही रही होगी। इसका सम्पादन श्री हरिमोहन लाल श्रीवासतव के द्वारा किया गया तथा भारतीय साहित्य सनद्य १९५९ में कन्हैयालाल मुन्शी, हिन्दी विद्यापीठ आगरा द्वारा इसे प्रकाशित किया गया।

बाघाट रासो(Baghat Raso) - इसके रचयिता प्रधान आनन्दसिंह कुड़रा है। इसमें ओरछा एवं दतिया राज्यों के सीमा सम्बन्धी तनाव के कारण हुए एक छोटे से युद्ध का वर्णन किया गया है। इस रचना में पद्य के साथ बुन्देली गद्य की भी सुन्दर बानगी मिलती है। बाघाट रासो में बुन्देली बोली का प्रचलित रुप पाया जाता है। कवि द्वारा दिया गया समय बैसाख सुदि १५ संवत् १८७३ विक्रमी अमल संवत १८७२ दिया गया है। इसे श्री हरिमोहनलाल श्रीवास्तव द्वारा सम्पादित किया गया तथा यह भारतीय साहित्य में मुद्रित है। इसे ""बाघाइट कौ राइसो'' के नाम से ""विंध्य शिक्षा'' नाम की पत्रिका में भी प्रकाशित किया गया है।

झाँसी की रायसी(Jhansi ki Raysi) - इसके रचनाकार प्रधान कल्याणिंसह कुड़रा है। इसकी छन्द संख्या लगभग २०० है। उपलब्ध पुस्तक में छन्द गणना के लिए छन्दों पर क्रमांक नहीं डाले गये हैं। इसमें झांसी की रानी लक्ष्मीबाई तथा टेहरी ओरछा वाली रानी लिड़ई सरकार के दीवान नत्थे खां के साथ हुए युद्ध का विस्तृत वर्णन किया गया है। झांसी की रानी तथा अंग्रेजों के मध्य हुए झांसी कालपी, कौंच तथा ग्वालियर के युद्धों का भी वर्णन संक्षिप्त रुप में इसमें पाया जाता है। इसका रचना काल सं. १९२६ तदनुसार १९६९ ई. है। अर्थातद्य सन् १९५७ के जन-आन्दोलन के कुल १२ वर्ष की समयावधि के पश्चात् की रचना है। इसे श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव दतिया ने ""वीरांगना लक्ष्मीबाई'' रासो और कहानी नाम से सम्पादित कर 
सहयोगी प्रकाशन मन्दिर लि. दतिया से प्रकाशित कराया है।

लक्ष्मीबाई रासो(Laxmibai Raso) - इसके रचयिता पं. मदन मोहन द्विवेदी ""मदनेश'' है। कवि की जन्मभूमि झांसी है। इस रचना का संपादन डॉ. भगवानदास माहौर ने किया है। यह रचना प्रयाग साहित्य सम्मेलन की ""साहित्य-महोपाध्याय'' की उपाधि के लिए भी सवीकृत हो चुकी है। इस कृति का रचनाकाल डॉ. भगवानदास माहौर ने सं. १९६१ के पूर्व का माना है। इसके एक भाग की समाप्ति पुष्पिका में रचना तिथि सं. १९६१ दी गई है। रचना खण्डित उपलब्ध हुई है, जिसे ज्यों का त्यों प्रकाशित किया गया है। विचित्रता यह है कि इसमें कल्याणसिंह कुड़रा कृत ""झांसी कौ रायसो'' के कुछ छन्द ज्यों के त्यों कवि ने रख दिये हैं। कुल उपलब्ध छन्द संख्या ३४९ हैं। आठवें भाग में समाप्ति पुष्पिका नहीं दी गई है, जिससे स्पष्ट है कि रचना अभी पूर्ण नहीं है। इसका शेष हिस्सा उपलब्ध नहीं हो सका है। कल्याण सिंह कुड़रा कृत रासो और इस रासो की कथा लगभग एक सी ही है, पर मदनेश कृत रासो में रानी लक्ष्मीवाई के ऐतिहासिक एवं सामाजिक जीवन का विशद चित्रण मिलता है।

छछूंदर रायसा(Chhachhundar Raysa) - बुन्देली बोली में लिखी गई यह एक छोटी रचना है। छछूंदर रायसे की प्रेरणा का स्रोत एक लोकोक्ति को माना जा सकता है- ""भई गति सांप छछूंदर केरी।'' इस रचना में हास्य के नाम पर जातीय द्वेषभाव की झलक देखने को मिलती है। दतिया राजकीय पुस्तकालय में मिली खण्डित प्रति से न तो सही छन्द संख्या ज्ञात हो सकी और न कवि के सम्बन्ध में ही कुछ जानकारी उपलब्ध हो सकीफ रचना की भाषा मंजी हुई बुन्देली है। अवश्य ही ऐसी रचनाएं दरबारी कवियों द्वारा अपने आश्रयदाता को प्रसन्न करने अथवा कायर क्षत्रियत्व पर व्यंग्य के लिये लिखी गई होगी।

घूस रासा(Ghoos Rasa) - यह भी बुन्देली की एक छोटी सी रचना है। इसमें हास्य के साथ व्यंग्य का भी पुट है। रचनाकार को काव्य शिल्प की दृष्टि से अभूतपूर्व सफलता प्राप्त हुई है। छन्दों के बंध, भाषा व शैली पर कवि का पूर्ण अधिकार है। उपलब्ध छन्द संख्या कुल ३१ है। प्रतिपूर्ण लगती है। यह भी दतिया राज्य पुस्तकालय की हस्तलिखित प्रतियों में प्राप्त हुई है। रचना के एक छन्द द्वारा कवि का नाम पृथीराज दिया गया है, परवर्ती रचना है। रचना काल अज्ञात है।

कटक रचनाऐं(Katak compositions) :

पारीछत कौ कटक - यह श्री द्विज किशोर द्वारा विरचित बुन्देली की छोटी सी रचना है। यह ""बेला ताल कौ साकौ'' के नाम से भी प्रसिद्ध है क्योंकि इस काव्य में बेला ताल की लड़ाई का वर्णन है। इस रचना में जैतपुर के महाराज परीछत के व्यक्तित्व और उनके द्वारा प्रदर्शित वीरता का वर्णन किया गया है। सन् १८५७ से भी पहले महाराज पारीछत ने अंग्रेजी शासन के विरुद स्वाधीनता का बिगुल बजाया था। ""पारीछत कौ कटक'' अधिकतर जनवाणी में सुरक्षित रहा। सम्भवतः अग्रेजी शासन के भय से इसे लिपि वद्ध न किया जा सका होगा। लोक रागिनी में कई छन्द लुप्त होते चले गये हों तो आश्चर्य क्या। 

झांसी की कटक - यह झांसी के तात्कालीन अखाड़िया कवि ""भागी दाऊजी ""श्याम'' विरचित है। जो १८५७ की क्रान्ति के प्रत्यक्षदर्शी थे। डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा ने अपेन प्रसिद्ध उपन्यास ''झांसी की रानी'' के समकालीन कवियों में भग्गी दाऊजू का उल्लेख किया है। यह कक डॉ. भगवानदास माहौर झांसी द्वारा संपादित ""लक्ष्मीबाई रासो'' के परिशिष्ट में दिया गया है। कटक बीच में दो स्थानों पर खण्डित है। १ से ३३ तक छन्दों के बाद ३६ से ३८ छन्द तक है। ३९ वाँ छन्द अधूरा है फिर प्रति खण्डित है। फिर ४० से ४२ तक छन्द है। यहीं ""कटक्'' समाप्त हो गया है। समाप्ति पुष्पिका इस प्रकार दी गई है--

भिलमलसांय की कटक - इसके रचनाकार कवि भैरोंलाल हैं। बुन्देल वैभाव सं. गौरीशंकर द्विवेदी ""शंकर'' झांसी में कवि का जन्म स्थान श्रीनगर बताया गया है। श्रीनगर बुन्देलखण्ड के किसी साधारण ग्राम का नाम रहा होगाा संभव है, कवि ने और भी रचनायें लिखी हों। द्विवेदी जी के अनुसार भैरोंलाल का जन्म सं. १७७० में हुआ तथा इनका कविता काल सं. १८०० विक्रमी थाा इस रचना में अजयगढ़ राज्य के दीवान केशरी सिंह और बाधेल वीर रणमतसिंह के युद्ध का वर्णन दिया गया है। बाबा रणतसिंह ने सन् १८५७ में स्वतन्त्रता संग्राम में अंग्रेजी शासन का डटकर विरोध किया था/ यह रचना भी उस समय अधिकतर जनवाणी में ही सुरक्षित रही, परन्तु अजयगढ़ राज्य के एक नरेश श्री रणजोर सिंह ने ""भिलसांय को कटक'' अपनी एक पुस्तक के परिशिष्ट के रुप में मुद्रित कराया है जो आज भी अजयगढ़ राज्य पुस्तकालय में सुरक्षित है। इस रचना को उपलब्ध कराने का श्रेय श्री अम्बिकाप्रसाद ""दिव्य'' अजयगढ़ को है। रचना छोटी है पर भाषा, छन्द एवं विषय की दृष्टि से महत्वूपर्ण है।

महत्व
रास तथा रासो या रासक रचनायें प्रमुखतः दो रुपों में उपलब्ध होती है। १. धार्मिक रचनायें २. ऐतिहासिक कोटि की रचनाएं। धार्मिक रचनाओं के अनतर्गत रास ग्रन्थों में जैन कवियों द्वारा लिखित जैन धर्म से सम्बन्धित रचनायें आती हैं। इन रचनाओं में जन तीर्थकरों तथा जैन धर्म के सिव्द्धान्तों के धार्मिक विश्वासों आचार एवं व्यवहारों पर प्रकाश डालती हैं तथा जैन साहित्य को भी इन रचनाओं के द्वारा पर्याप्त संरक्षण प्राप्त हुआ है। धार्मिक रचनाओं के ही अन्तर्गत दूसरा स्थान बौद्ध सिद्धान्तों का विवचेन किया गया है। इसके अतिरिक्त पौराणिक आधार पर स्थित -पंच पाण्डव रास' पाँचों पाण्डवों के सम्बन्ध में लिखा गया है। ऐतिहासिक कोटि में आने वाले रासो या रासक ग्रन्थों के वर्ण्य विषय भी विभिन्न दिखलाई पड़ते हैं। कुछ रचनाओं में शृंगार रस को प्रधानता मिली है, जैसे सन्देश रासक मुंजरास तथा वीसलदेव रास। इन ग्रन्थों का कथानक किसी न किसी प्रमाख्यान से सम्बन्धित है। मांकण रासो, छछूंदर रायसा, गाडर रायसा व धूस रायसा हास्य रस की राचनायें हैं, परन्तु अधिकता वीर रस की रचनाओं की ही है। युग विशेष की संस्कृति, धर्म, इतिहासतथा राजनीति आदि की परिस्थितियों का एक लिपिबद्ध विवरण प्रस्तुत करने में इन रासो ग्रन्थों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।

रासो कावें का मूल प्रतिपाद्य (Rasa cawen's original rendering) :

सामाजिक - देश के अधिकांश भूभाग पर मुगल सत्ता का प्रभाव था। चंपत राय और छत्रासाल जैसे थोड़े क्षत्रिय थे, जो सुख-वैभव का त्याग कर तथा भारी कष्ट झेलकर आजीवन मुगलों से लोहा लेते रहे। अधिकांश राजवंशों में फूट एवं वैमनस्य था, जिससे वे आपस में लड़कर नष्ट होते रहते थे।

अधिकांश क्षत्रिय राजाओं और सामन्तों पर मुस्लिम शासकों की संप्रभुता का प्रभाव छा चुका था। अपने सीमित स्वार्थों की सुरक्षा के लिए विदेशियों के प्रति अटल और असीम निष्ठा पर वे गर्व करते थे। साम्राजय की रक्षा के लिए वे सुदूर दक्षिण में तथा उतर में बलख-बदख्शां तक भी रक्त का बहाना अपना वीरोचित धर्म समझते थे। बुन्देला राजपूतों में एक उल्लेखनीय विशेषता यह अवश्य रही कि वे अपने रक्त सम्बन्ध पर गर्व करते रहे। यहाँ मुसलमानों से वैवाहिक सम्बन्ध स्थापित किये जाने जैसे किसी भी उदाहरण का नितान्त अभाव है। बलात् धर्म-परिवर्तन की धटनायें भी नगण्य ही रहीं। टिकैत मधुकर शाह जैसे कुछ उदाहरण भी पाये जाते हैं, जिनमें मुगल दरबार के प्रति भक्ति के साथ ही स्वधर्म पालन के प्रति कट्टरता का अच्छा निर्देशन हुआ है। शुभकरन और दलपतिराव जैसे सामन्त किन्हां अवसरों पर मुगल सेना के प्रभावशाली नायकों से खुलकर मतभेद प्रकट कर सकते थे। अधिकांश अवसरों पर सम्राट बुन्देली आनबान का ध्यान रखते हुए उनका विरोध करने का साहस नहीं कर पाते थे।

बुन्देलखण्ड के सभी राज्यों में मुगलों के समान शान शौकत एवं विलास-प्रियता का दौर था। यह प्रभाव उनके अन्तःपुरों में एक से अधिक रानियों के परिवारों में कभी कुछ स्प्श्ट देखने को मिल जाता था। गृह कलह् भी देखा जाता था। सामान्ती वातावराण के राज्य-कर्मचारी विलासमय जीवन बिताते थे। निम्न वर्ग की जनता की दशा सोचनीय थी। समाज के गरीब तबके के लोग सुखी न थे, परन्तु किसी प्रकार निर्वाह करते जाने को ही भाग्य-विधान मानते थे। अधिकांश लोग राजा की नौकरी करना पसन्द करते थे, जिससे उनहें अर्पेक्षाकृत अधिक सुविधायें मिल सकें। मध्यम वर्ग सुखी था। हिन्दू समाज में बाल विवाह प्रचलित था। सती प्रथा भी थी। उच्च घरानों में पर्दा प्रथा भी प्रवेश पा चुकी थी।

युद्धों के समय मंहगाई हो जाती थी। रासो ग्रन्थों में कहीं-कहीं इसका उल्लेख मिलता है-

""तेरह दिनानों भयौ नाज तीन रुपै सेर,
पानी घास मिलै नाहीं कीनौ दष्षिनीन घेर।
करत विचार तहाँ भए हैं मुकाम तीन,
डेरन पे सत्रसेन रही चहुँ ओर फेर।।''
एक अन्य उदाहरण-
""मरे ऊट अरु बाज मिले आनउन घास तहं।
पानी के आगे नहिं सपावै उसांस तहं।।

उपर्युक्त विवरण के अनुसार स्पष्ट होता है कि राजाओं तथा सामान्त, सरदारों का जीवन अधिकांशतः युद्धों में उलझा रहता था। सामान्य जनता के कष्टों की ओर दृष्टिपात करने का प्रायः उन्हें कम ही अवसर प्राप्त होता था।

राज्य कर्मचारी सुखमय जीवन व्यतीत करते हुये, साधारण प्रजा के साथ मनमाना व्यवहार करते थे। समाज में विभिन्न प्रकार की प्रथायें तथा लोक रीतियाँ भी प्रचलित थीं।

 

धार्मिक - उत्तर भारत में भक्ति युग में एक लम्बी सनत परम्परा रही है, जिसका देश के अन्य भागों पर भी स्पष्ट प्रभाव पड़ा इस समय में अनेक सम्प्रदायों की स्थापना की गई। साधु संतों के वाद-विवादों के अखाड़े हुआ करते थे, जहाँ खण्डन मण्डन की रीतियों द्वारा अपने सम्प्रदाय को श्रेष्ठ सिद्ध किया जाता था। लोगों में अन्ध विश्वास बहुत था।

बुन्देलखण्ड में उत्त्र मध्यकाल में अनेक प्रसिद्ध सन्त हुए, जिन्हें राज्याश्रय भी प्राप्त था। महात्मा अक्षर अनन्य योग और वेदान्त के अच्छे ज्ञाता थे। राजयोग के उनके उपदेश का ही परिणाम था कि सेंवढ़ा नरेश राजा पृथ्वीसिंह ने कर्मयोग स्वीकार करते हुए वैराग्य का विचार त्याग दिया। यही पृथ्वीसिंह हिन्दी साहित्य में "रतन हजारा' के रचयिता "रसनिधिद्ध कवि के नाम से विख्यात हुए। इन्होंने अपने काव्य में प्रेम योग की एक सुन्दर धारा वहाई है। अनन्य जी एक बोर किसी बात पर रुष्ट होकर वन में चले गये। राजा पृथ्वीसिंह उनसे क्षमा मांगने पहू#ुाचे, परन्तु उन्हें एक झाड़ी के पास बड़े आराम से लेटा हुआ देखा, तो अपना अपमान समझकर पूछा-""पाँव पसारा कब से'' उत्तर मिला-""हाथ समेटा तब से''।

अनन्य जी ने इसी समय से वैराग्य ले लिया, पर राजा का मन रखने के लिए वचन दिया कि वे विचरते हुए कभी'कभी दर्शन देंगे। पश्चात् बुन्देल केशरी छत्रसाल से भी उनकी भेंट हुई। महाराज छत्रसाल और अक्षर-अनन्य के बीच पत्राचार की बात प्रसिद्ध है। अनन्य जी के लिखे हुए चिट्ठे ऐतिहासिक महत्व से परिपूण्र हैं। निर्गुण मागीं सन्त कवियों में अनन्य का अपना स्थान है। उनकी रचा शैली थोड़े में बहुत कुछ बता देती है। उदाहरण-

""आवै सुगन्ध कुरंग की नाभि कुरंग न सो समुझै मनमाही।
दूध सुधाहिं धरै सुरभी, न सवाद लळे सुरभीतिहिठाही।।
जान कों सार असार अजान कौं, जाने बिना सब बात वृथा हीं।।
ईश्वर आप अनन्य भने इमिहै सबमें सब जानत नाहीं।।''

स्वामी प्राणनाथ धामी प्रणामी सम्प्रदाय के प्रवर्तक हुए हैं जिन्होंने बुन्देल केशरी छत्रसाल को अपना शिष्य बनाते हुए आशीर्वाद दिया कि वे औरंगजेब के विरुद्ध अपने अभियान में स्थाई सफलता प्राप्त करें, उनके राज्य में सुख समृद्धि की कभी कोई कमी न हो और हिन्दुत्व की रक्षा में उनका नाम अमर हो। सर्व साधारण में यह विश्वास प्रचलित है कि पन्ना नगरीमें हीरों का पाया जाना स्वामी प्राणनाथ के आशीर्वाद का ही परिणाम था, जिससे महाराज को अपनी लड़ाइयों के लिए तथा प्रजा पालन एवं दान शीलता आदि कर्तव्यों के लिए धन की कमी न होने पावे। बताया जाता है कि स्वामी प्राणनाथ जी की सेवा में दक्षिणा भेंट करते हुए छत्रसाल ने निम्नलिखित दोहा कहा-

""यह टीका यह पांवड़वो, यही निछावर आय।
प्राननाथ के चरन पर, छत्ता बलिबलि जाय।।

राजा की नीति धर्म समन्वित थी। राजा लोग राज्य के कार्यों में भी अपने धर्म गुरुओं से सलाह लेते थे। इस युग में ब्राह्मण धर्म का ही बोल बाला था। ब्राह्मणों के आशीर्वाद और प्रचार से ही राजा आन्तरिक व्यवस्था में स्वतंत्र थे। नरेशों के व्यवहार का प्रभाव साधारण जनता पर भी विशेष रुप से व्यक्त होता था। उसमें भी धर्म भीरुता, दानशीलता की प्रवृतियाँ बनी हुई थीं। नरेशों में राज धर्म के अनुसार अन्य सम्प्रदायों के प्रति धार्मिक उदारता का भाव बना हुआ था।

शरणागत वत्सलता का भाव अधिकांश बुन्देला नरेशों में विद्यमान था। उनकी आपसी लड़ाइयों का एक बड़ा कारण यह भी रहा है कि वे किसी के पीछे संधर्ष मोल लेने से नहीं चूकते थे। छोटे से दतिया राज्य के अधिकपत्य शत्रुजीत ने महादजी की विधवा बाईयों का पक्ष लेकर अपने से कहीं बड़े वैभव से टक्कर ली थी।

 

राजनैतिक - बुन्देला राजवंश का इतिहास मुख्यत मुगलों के उत्कर्ष से ही प्रारम्भ होता है। मुगलों का तृतीय सम्राट अकबर जिस समय सिंहासन पर बैठा, उस समय भारत छोटे-छोटे अनेक स्वतन्त्र राज्यों में विभाजित था। अकबर ने कई स्वतन्त्र राज्यों पर विजय पाते हुए मुगल साम्राज्य को सुदृढ़ बनाया। उसने बिखरे हुए इन राज्यों को राजनैतिक एकता में बाँधकर देश में शान्ति और सुव्यवस्था की स्थापना का प्रयास किया। बुन्देलखण्ड को भी उसने राजस्थान, उत्तर-पश्चिम-सीमान्त-प्रदेश, गोंडवान आदि के साथ अपने साम्राज्य का अंग बनाया। यहाँ बुन्देलखण्ड में उसने प्रत्यक्ष अधिकार जमाने की विशेष चिंता नहीं की। राजधानी आगरा का निकटवर्ती यह प्रदेश दक्षिण के उसके अभियानों के लिए सहज सीधा मार्ग था। अतएव उसने ओरछा के बुदेला शासक से मैत्री स्थापित करने में ही अपने उद्देश्य की पूर्ति देखी। मधुकर शाह और वीरसिंह देव जेसे बुन्देलखण्ड का राज्य कई जागीरों में बँट गया। स्वभावतः इन छोटे राजाओं के स्वार्थ मुगलसत्ता से मिलकरचलने में ही पूरे हो सकते थे। अतः ये राज्य साम्राजय की शक्ति पर अधिक निर्भर रहने लगे और इस प्रकारइनकी दासता का अध्याय प्रारम्भ हुआ। अधिकांश बुन्देला राजाओं ने मुगल साम्राज्य के प्रति वफादारी को अपना राजनीतिक धर्म मानकर उसके लिए गर्व करने की नीति अपनाई।

प्रबल प्रतापी वीरसिंह देव एक अत्यन्त महत्वकांक्षी योद्धा थे। बादशाह अकबर और शाहजादा सलीम में जब मतभेद उभर कर प्रकटहुए और सलीम ने अकबर के अत्यन्त विश्वासपात्र मंत्री और सेनापति अबुल फजल को अपने मार्ग की एक बड़ी बाधा समझा, तो सलीम को वीरसिंह देव का ही एकमात्र सहारा समझ पड़ा। उसने अबुल फजल को मार डालने के लिए वीकिंरसह देव से सम्पर्क स्थापित किया। बुन्देलों की प्रधान गद्दी ओरछा पर अधिकार पाने की महत्वाकांक्षा लेकर वीरसिंह देव ने सहज ही यह काम कर डाला। अबुल फजल का वध करने के पश्चात् उन्होंने उसका सिर काटकर जहाँगीर के पास इलाहाबाद भेज दिया। सलीम फूला न समाया। उसने अपने मित्र वीरसिंह देव को भरपूर पुरस्कार देने की नीति बना ली। परन्तु सम्राट अकबर के जीवन काल में वीरसिंह देव को उसके रोष का सामना करते हुए अनेक कठिनाइयों को झेलना पड़ा। सलीम जब जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठा, तो उसने वीरसिंह देव को पुरस्कृत करने में कमी नहीं की। कालान्तर में वीरसिंह देव के उत्तराधिकारी सम्राट से मैत्री के इस आदर्श के नाम पर हीं मुगलों के ऊपर अधिकाधिक निर्भर रहने लगे। वीरसिंह देव के बड़े बेटे तथा ओरछा के राजा जुझारसिंह को साम्राज्य की दासता कुछ अखरने लगी। उन्होंने शाहजहाँ के शासन काल में दो बार मुगल सम्राट के विरुद्ध विद्रोह भी खड़ा किया, परन्तु वे बुरी तरह परासत हुए। संभवतः इसीलिए आगे के अन्य राजाओं ने मुगलों से बनाये रखने में ही कुशलता समझी।

शाहजहाँ में धार्मिक कट्टरता का अंश अवश्य था। तभी जुझारसिंह को विद्रोह करने की आवश्यकता पड़ी, परनतु उसके बाद औरंगजेब ने सम्राट बनते ही अकबर के समय से चली आने वाली नीतियों को एकदम बदल दिया। कट्टर सुन्नी मुसलमान औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीतियों को एकदम बदल दिया। कट्टर सुन्नी मुसलमान औरंगजेब की हिन्दू विरोधी नीतियों ने उत्तर में सिक्खों से लेकर दक्षिण में मराठों तक ग्रान्ति कीचिनगारी प्रज्जवलित कर दी। सिक्ख, मराठा और सतनामी मुगल साम्राज्य के प्रलि बैरी बन बैठै। तभी राजा चम्पतराय और उनके पुत्र छत्रसाल नामक बुन्देला वीरों ने हिन्दुत्व की रक्षा के लिए मुगल सत्ता को उखाड़ फेंकने का व्रत लिया। वीर छत्रसाल तो छत्रपति शिवाजी के आदर्श से विशेष रुप से अनुप्राणित थे। अपने पिता चम्तराय से भी अधिक नाम उन्होंने पाया है। बुन्देलखण्ड की स्वाधीनता के लिए उनका योगदान किसी प्रकार कम नही। अपने ही वंश के कुछ अन्य शासकों से बुन्देल केशरी छत्रसाल को समुचित सहयोग मिल पाता, तो इस मध्यवर्ती भूभाग से मुगलों की सत्ता कभी की उठ गई होती। महाराज छत्रराज ने अपना प्रभाव क्षेत्र बढ़ाया, परन्तु अपने वंश के अन्य नरेशों के प्रति विशेज्ञ सख्ती नहीं बरती। यपि औरंगजेव के बाद मुगल साम्राज्य दिन प्रतिदिन अशक्त होता गया, तथापि ओरछा, दतिया आदि के राजघराने मुगलों के आश्रित बने रहे।

मुहम्मद खाँ वंगश के आक्रमणों का सफल प्रतिरोध करने के लिए महाराजा छत्रसाल ने वृद्धावस्था के अन्तिम दिनों में पेशवा बाजीराव से सहायता चाही। पेशवा को अपना तीसरा बेटा मानते हुए उन्होंने अपने राज्य का एक तिहाई भाग भी सौंप दिया था। फलतः इस भूभाग में मराठों को पैर जमाने का अवसर मिल गया। झांसी और ग्वालियर मराठों की, इस क्षेत्र में दो बड़ी राजधानियाँ स्थापित हुई। इन राज्यों से बुन्देलखण्ड के नरेशों के सम्बन्ध बनते और बिगड़ते रहे। कभी किसी राजा का व्यवहार मैत्रीपूर्ण होता और कभी कोई शत्रुता मानता। समय-समय पर कोई मराठा सरदार इन राज्यों पर छापा मारते रहते।

शृंगारिक - रासो काव्यों की परम्परा में कुछ ऐसे रासो ग्रन्थ है जिनका वर्ण्य-विषय ही शृंगार-परक रहा है। वीसल देव रासो एवं सन्देश रासक तो पूर्णतया शृंगार रचनायें ही है, जैसा पहले रासो काव्य परम्परा में लिखा जा चुका है। वीसलदेव रासो में वीसलदेव के जीवन के १२ वर्षों के कालखण्ड का वर्णन किया गया है। वीसलदेव अपनी रानी की एक व्यंग्योक्ति पर उत्तेजित होकर लम्बी यात्रा पर चला गया और एक राजा की रजाकुमारी के साथ विवाह करके भोग विलास के जीवन में निरत हो गया। इस प्रकार इस ग्रंथ शृंगार के दोनों ही पक्षों का सुन्दर समन्वय है। वियोग शृंगार एवं संयोग शृंगार का अच्छज्ञ चित्रण इस काव्य ग्रन्थ में किया गया है।

पृथ्वीराज रासो को पढ़ने से ज्ञात होता है कि महाराजा पृथ्वीराज चौहान ने जितनी भी लड़ाइयाँ लड़ीं, उन सबका प्रमुख उद्देश्य राजकुमारियों के साथ विवाह और अपहरण ही दिखाई पड़ता है। इंछिनी विवाह, पह्मावती समया, संयोगिता विवाह आदि अनेकों प्रमाण पृथ्वीराज रासो में पृथ्वीराज की शृंगार एवं विलासप्रियता की ओर संकेत करते हैं। मुंजरास में मुंज और तैलप की विधवा बहिन मृणालवती ही प्रणय कथा शृंगार का अनुपम उदाहरण ही है।

उपर्युक्त विवरणों से स्पष्ट होता है कि रासो काव्यों में वर्णित सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिक एवं शृंगारिक प्रवृतियाँ विविधता से पूर्ण थीं। 

कटक ग्रन्थ (Katak Volume) :

परिचय
वीर काव्य के अन्तर्गत रासो ग्रन्थों का प्रमुख स्थान है। आकार की बात इतनी नहीं है जितनी वर्णन की विशदता की है। छोटे से छोटे आकार से लेकर कई कई ""समयों'' अध्यायों में समाप्त होने वाले रासो ग्रन्थ हिन्दी साहित्य में वर्तमान हैं। सबसे भारी भरकम रासो ग्रन्थ, सिने अधिकांश कवियों को रासो लिखने के लिये प्रेरित किया, चन्द वरदाई कृत पृथ्वीराज रासो है। इससे बहुत छोटे पा#्रयः तीन सौ चार छन्दों में समाप्त होने वाले रासो नामधारी वीर काव्य भी हैं, जो किन्हीं सर्गो या अध्यायों में भी नहीं बांटे गये हैं- ये केवल एक क्रमबद्ध विवरण के रुप में ही लिखे गये हैं।

रासों ग्रन्थों की परम्परा में ही ""कटक'' लिखे जाने की शैली ने जन्म पाया। कटक नामधारी तीन महत्वपूर्ण काव्य हमारी शोध् में प्रापत हुये हें। बहुत सम्भव है कि इस ढंग के और भी कुछ कटक लिखे गये हों, परन्तु वे काल के प्रभाव से बच नहीं सके। कटक नाम के ये काव्य नायक या नायिका के चरित का विशद वर्णन नहीं करते, प्रत्युत किसी एक उल्लेखनीय संग्राम का विवरण प्रस्तुत करते हुए नायक के वीरत्व का बखान करते हैं।

ऐतिहासिक कालक्रम के अनुसार सर्वप्रथम हम श्री द्विज किशोर विरचित ""पारीछत को कटक'' की चर्चा करना चाहेंगे। ये पारीछत महाराज बुन्देल केशरी छत्रसाल के वंश में हुए, जैतपुर के महाराजा के रुप में इन्होंने सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम से बहुत पहले विदेशी शासकों से लोहा लेते हुये सराहनीय राष्ट्भक्ति का परिचय दिया। ""पारीछत को कटक"" आकार में बहुत छोटा है। यह ""बेलाताल को साकौ'' के नाम से भी प्रसिद्ध है। स्पष्ट है कि इस काव्य में बेला ताल की लड़ाई का वर्णन है। जैतपुर के महाराज पारीछत के व्यक्तित्व और उनके द्वारा प्रदर्शित वीरता के विषय में निम्नलिखित विवरण पठनीय है-

महाराज छत्रसाल के पुत्र जगतराज जैतपुर की गद्दी पर आसीन हुए थे। जगतराज के मंझले पुत्र पहाड़सिंह की चौथी पीढ़ी के केशरी सिंह के पुत्र महाराज पारीछत जैतपुर को गद्दी के अधिकारी हुए। इन्हीं महाराज पारीछत ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सत्ता के विरुद्ध सन् १८५७ से बहुत पहले विन्ध्यप्रदेश में प्रथम बार स्वाधीनता का बिगुल बजाया। महाराज पारीछत की धमनियों में बुन्देल केसरी महाराज छत्रसाल का रक्त वे#्र से प्रवाहित हो उठा, और वे यह सहन न कर सके कि उनके यशस्वी पूर्वज ने अपनी वृद्धावस्था में पेशवा को जो जागीर प्रदान की थी, उसे व्यापारियों की एक टोली उनके मराठा भाइयों से छीनकर बुन्छेलखण्ड पर अपना अधिकार जमावे। महाराज पारीछत ने कई बार और कई वर्ष तक अंग्रेंजों की कम्पनी सरकार को काफी परेशान किया, और उन्होंने झल्लाकर उन्हें लुटेरे की संज्ञा दे डाली।

जान सोर, एजेन्ट ने मध्यप्रदेश में विजयराघव गढ़ राज्य के तत्कालीन नरेश ठाकुर प्रागदास को २० जनवरी, सन् १८३७ ई. को उर्दू में जो पत्र लिखा, उससे विदित होता हे कि महाराज पारीछत १८५७ की क्रान्ति से कम से कम २० वर्ष पूर्व विद्रोह का झण्डा ऊंचा उठा चुके थे। उक्त पत्र के अनुसार ठाकुर प्रागदास ने पारीछत को परास्त करते हुए उन्हें अंग्रेज अधिकारियों को सौंपा, जिसके पुरस्कार स्वरुप उन्हें अंग्रेजों ने तोप और पाँच सौा पथरकला के अतिरिक्त पान के लिए बिल्हारी जागीर और जैतपुर का इलाका प्रदान किया।

ऐसा अनुमान किया जा सकता है कि महाराज पारीछत चुप नहीं बैठै। उन्होंने फिर भी सिर उठाया, और इस बार कुछ और भी हैरान किया। उर्दू में एक इश्तहार कचहरी एजेन्सी मुल्क बुन्देलखण्ड, मुकाम जबलपुर खाम तारीख २७ जनवरी सन् १८५७ ई. पाया जाता है, जिसमें पारीछत, साविक राजा जैतपुर और उनके हमाराही पहलवान सिंह के भी नाम है।

उर्दू में ही एक रुपकार कचहरी अर्जेन्टी मुल्के बुन्देलखण्ड इजलास कर्नल विलियम हैनरी स्लीमान साहब अर्जेन्ट नवाब गवर्नर जनरल बहादुर बाके २४ दिसम्बर, सन् १८५७ के अनुसार- ""अरसा करीब २ साल तक कम व वैस पारीछत खारिजुल रियासत जैतपुर किया गया। सर व फशाद मचाये रहा और रियाया कम्पनी अंग्रेज बहादुर को पताया किया और बाजजूद ताकीदाद मुकर्रर सिकर्रर निस्वत सब रईसों के कुछ उसका तदारुक किसी रईस ने न किया हालांकि बिल तहकीक मालूम हुआ कि उसने रियासत ओरछा में आकर पनाह पाई''। इस रुपकार के अनुसार पारीछत के भाईयां में से कुंवर मजबूत सिंह और कुंवर जालिम सिंह की योजना से राजा पारीछत स्वयं अपने साथी पहलवानसिंह पर पाँच हजार रुपया इनाम घोषित किया था। राजा पारीछत को दो हजार रुपया मासिक पेंशन देकर सन् १८४२ में कानपुर निर्वासित कर दिया गया। कुछ दिनों बादवे परमधाम को सिधार गये। उनकी वीरता की अकथ कहानियाँ लोकगीतों के माध्यम से आज भी भली प्रकार सुरक्षित हैं। इन्हीं में ""पारीछत कौ कटक'' नामक काव्यमय वर्णन भी उपलब्ध है।

सन् १८५७ की क्रान्ति में लखैरी छतरपुर के दिमान देशपत बुन्देला ने महाराज पारीछत की विधवा महारानी का पक्ष लेकर युद्ध छेड़ दिया और वे कुछ समय तक के लिये जैतपुर लेने में भी सफल हुए। दिमान देशपत की हत्या का बदला लेने के लिए अक्टूबर १९६७ में उनके भतीजे रघुनाथसिंह ने कमर कसी।

 ""पारीछत कौ कटक'' अधिकतर जनवाणी में सुरक्षित रहा। ऐसा जान पड़ता है कि इसे लिपितबद्ध करने के लिए रियासती जनता परवर्ती ब्रिथ्टिश दबदबे के कारण घबराती रही। लोक रागिनी में पारीछत के गुणगान के कतने ही छन्द क्रमशः लुप्त होते चले गये हों, तो क्या अचरज है। कवि की वर्णन शैली से प्रकट है कि उसने प्रचलित बुन्देली बोली में नायक की वीरता का सशक्त वर्णन किया है। महाराज पारीछत के हाथी का वर्णन करते हुए वह कहता है-

""ज्यों पाठे में झरना झरत नइयां,
त्यों पारीछत कौ हाथी टरत नइया।।

पाठे का अर्थ है एक सपाट बड़ी चट्टान। शुद्ध बुन्देली शब्दावली में ""नइयाँ'' नहीं है की मधुरता लेकर कवि ने जो समता दिखाई है, वह सर्वथा मौलिक है, और महाराज पारीछत के हाथी को किसी बुन्देलखण्उ#ी पाठे जैसी दृढ़ता से सम्पन्न बतलाती है।

चरित नायक महाराज पारीछत की वीरता और आत्म निर्भरता से शत्रु का दंग रह जाना अत्यन्त सरल शब्दावली में निरुपित हुआ हैं।

""जब आन पड़ी सर पै को न भओ संगी।
अर्जन्ट खात जक्का है राजा जौ जंगी।।''

बुन्देली बोली से तनिक भी लगाव रखने वाले हिन्दी भाषी सहज ममें समझ सकेंगे कि पोलिटिकल एजेन्ट का भारतीय करण ""अर्जन्ट'' शब्द से हुआ है। जक्का खाना एक बुन्देली मुहावरा है जिसका बहुत मौजूं उपयुक्त प्रयोग हुआ है- "चकित रह जाना' से कहीं अधिक जोर दंग रह जाने में माना जा सकता है, परन्तु हमारी समझ में जक्का खाना में भय और विस्मय की सम्मिलित मात्रा सविशेष है।

पारीछत नरेश में वंशगत वीरता का निम्न पंक्तियों में सुन्दर चित्रण हुआ है।

""बसत सरसुती कंठ में, जस अपजस कवि कांह।
छत्रसाल के छत्र की पारीछत पै छांह।।''

पारीछत के कटक का निम्नलिखित छन्द वर्णन शैली का भली प्रकार परिचायक है-

""कर कूंच जैतपुर से बगौरा में मेले।
चौगान पकर गये मन्त्र अच्छौ खेले।।
बकसीस भई ज्वानन खाँ पगड़ी सेले।
सब राजा दगा दै गये नृप लड़े अकेले।।
कर कुमुक जैतपुर पै चढ़ आऔ फिरंगी।
हुसयार रहो राजा दुनियाँ है दुरंगी।।
जब आन परी सिर पै कोऊ न भऔ संगी।
अर्जन्ट खात जक्का है राजा जौ जंगी।।
एक कोद अर्जन्ट गऔ, एकवोर जन्डैल।
डांग बगोरा की घनी, भागत मिलै न गैल।।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता है कि ""पारीछत को कटक'' का बुन्देली रचनाओं में महत्वपूर्ण स्थान है। ऐतिहासिक दृष्टि से इस रचना का हिन्दी साहित्य में विशिष्ट महत्व है।

झांसी को कटक (Jhansi ke Katak) :

दूसरा महत्वपूर्ण कटक भग्गी दाऊजू "श्याम' कृत "झांसी कौ कटक' है। भग्गी दाऊजू झांसी के जनकवि थे, जो सन् १८५७ की क्रान्ति के प्रत्यक्षदर्शी थे। स्व् डॉ. वृन्दावन लाल वर्मा ने अपने प्रसिद्ध उपन्यास ""झांसी की रानी'' में महारानी लक्ष्मीबाई के समकालीन कवियों में इनका उल्लेख किया है। डॉ. भगवानदास माहौर ने "मनदेश' कृत "लक्ष्मीबाई रासो ' नामक ग्रन्थ में इनके सम्बन्ध में विस्तृत प्रकाश डाला है। भगगी दाऊजू जू एक अखाड़िया उस्ताद कवि विख्यात थे। कहा जाता है कि भग्गी दाऊजू ने राजनी लक्ष्मीबाई के विषय में पूरा रायसा लिखा थ, परन्तु ""रायसा'' कहा जाय अथवा उसका छोटा रुप ""कटक'' उसके केवल ४ छन्द विनाश से बच सके हैं। जितना कुछ अंश एक खझण्डत प्रति से श्री भगवानदास माहौर को उपलब्ध हो सका है, उससे तो यह एक ""कटक'' ही सिद्ध होता है- ""रायसा'' नहीं ""इति कटक संपूर्ण। पौष सुदी १४ संवत १९५७ मु. झाँसी महारानी के समकालीन इस जनकवि ने चार चरण वाले ""मंज'' छन्द में जितना भी कुछ गेय प्रबन्ध रचा होगा वह रानी लक्ष्मीबाई तथा ओराछा के दीवान नत्ये खाँ के बीच होने वाले युत्द्ध के तुरन्त बाद रचा गया होगा-

""धन्य प्रताप श्री बाई साव कौ ऐसो नाव निकारौ।''

इस पंक्ति के पश्चात् यह रचना खण्डित है। संभवतः बाद की रचना में कवि ने १८५७ के स्वातनत्र्य युद्ध का थोड़ा बहुत वर्णन अवश्य किया होगा, परन्तु वह सब लुप्त हो चुका है। "भग्गी दाऊजू' के कटक का बहुत कुछ अंश हमारे अनुमान से बहुत समय तक उनके द्वारा अथवा उनके शिष्यों के द्वारा मौखिक रुप से सुनाया जाता रहा होगा। स्मृति में जो कुद सुरक्षित रह सका, उसे लिपिबद्ध करने का प्रयास उनके बाद ही किसी भक्त द्वारा हुआ है। खेद है कि वह प्रितिलिपि भी केवल खण्डित रुप में बच पाई। कवि ने झाँसी की भूमि के प्रति अपने ममत्व का बहुत ओजपूर्ण वर्णन किया है। अधिकांश छन्दों की समाप्ति का चौथा चरण कवि की भावना का परिचय देते हुए अपने आप में बहुत कुछ बता देता है-

""जो झाँसी की लटी तकै सुन ताय कालिका खाई।''

"लटी का अथ्र् है अवनति, "तकै' का अर्थ है देखना, छन्द की मात्रा के विचार से सनु' शब्द का प्रयोग हुआ है। इस प्रकार कवि की घोषणा है कि जो भी कोई झाँसी की अवनति देखना या सुनना चाहेगा, उसे कालिका खायेगी अर्थांत वह जगदम्बा का कोप भाजन होगा।

"कटक' में झाँसी के बसाये जाने का भी उल्लेख कवि ने बड़े स्वाभिमान से किया है-

""जा झाँसी सिव राव हरी की अतिशुभ घरी बसाई।''

अर्थात् झाँसी को शिव राव हरी नेवालकर नाम के एक मराठा सरदार ने बसाया था।

नत्थे खाँ द्वारा सागर पर अधिकार करने के कारण पर "भग्गी दाऊ जू' नत्थे खाँ को सागर पर विजय प्रापत हुई।

कटक ग्रंथ में झाँसी के प्रमुख सरदारों की वीरता का कवि ने अत्यन्त ओज पूर्ण वर्णन किया है।अपने पक्ष की बढ़ती तथा शत्रु पक्ष की दीनता का निम्न पंक्तियों में वर्णन देखने योग्य है-

""इतै चैन दिन रैन ज्वान सब खाते माल मिठाई।
उतै खपरियन में लयै महुआ भूंजत फिरै सिपाई।।

इस कटक में युद्ध क्षेत्र की संक्षिप्त सी मारकाट का वर्णन है एवं वीभत्स चित्रणों का भी प्रायः अभाव ही है। फिर भी सम्पूर्ण रचना ओज से पूर्ण है।

बुन्देली शब्दों के प्रयोग की दृष्टि से झाँसी कौ कटक एक समृद्ध रचना है। बुन्देली बोली के कुछ शब्द बड़ी स्वाभाविकता तथा उपयुक्ता के साथ प्रयुक्त किए गए हैं, जैसे -ठक्का ठाई लड़ाई, ठकुरास क्षत्रियत्व, खपरियन फूटे घड़ों के नीये के अर्ध वृर्त्ताकार टुकड़े, धुकाई धोकना, न्याउ युद्ध, बकबकाय क्रोधित होकर, मिसमिसाय दांत पीसकर क्रोधित होते हुए लसगरी लश्करी, सेना के अर्थ में, झींकत परेशान होते हुए, डिगरत "डगर' का कर्ता, चलने के अर्थ में झड़झड़ात ध्वन्यार्थक शब्द, सुमर स्मरण, अगारी अग्र भाग, जड़के कसकर मारने के अर्थ में आदि।

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि झाँसी कौ कटक भाषा, शब्द प्रयोग, छन्द शैली आदि दृष्टियों से एक विशिष्ट रचना है। इसके साथ ही स्वातन्त्र्योन्मुख जन भावना तथा वीरता बढ़ाने वाली प्रेरणा उत्पन्न करने में इस रचना जैसी काव्य कृतियों का हिन्दी साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान है।

 

भिलसांय कौ कटक

बुन्देलखण्ड के उपलब्ध "कटक' ग्रंथों में "झाँसी कौ कटक' के पश्चात् "भिलसांय कौ कटक' आता है। इसके रचयिता भैरों लाल हैं। ये जाति के ब्राह्मण थे। इनके पिता का नाम द्विज दुर्गा प्रसाद है। भैरों लाल का जनम बुन्देलखण्ड में महोबा, जिला हमीरपुर के निकट श्रीनगर नामक ग्राम में हुआ था। "भिलसांय कौ कटक' में इन्होंने अपना परिचय निम्न प्रकार दिया है-

""दुज दुरगा परसाद के सुत कवि भैरो लाल।
जन्म भूमि श्रीनगर है, सुखद विशाल।। ""

उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि भैरोलाल अजयगढ़ दरबार में जाकर रहे और अजयपाल महाराज की प्रशंसा में काव्य रचना की। "भिलसांय कौ कटक' की भाषा प्रवणता देखकर यह कहा जा सकता है कि भैरोलाल एक सिद्धहस्त कवि थे। अवश्य ही इन्होंने "भिलसांय कौ कटक' के अतिरिकत और भी रचनायें लिखी होंगी। इन्होंने "भिलसांय कौ कटक' के अतिरिक्त और भी रचनायें लिखी होंगी। इनकी काव्य भाषा संस्कृत निष्ठ खड़ी बोली से प्रभावित बुन्देली है। कहीं-कहीं एकाध शब्द अवधि का भी मिल जाता है।

"भिलसांय कौ कटक' अन्य कटक ग्रन्थों की अपेक्षा आकार में कुछ बड़ा है। जन कवियों की ये रचनायें अधिकतर लोगों के द्वारा सुनी सुनाई जाकर, केवल कण्ठ पर विद्यमान रही। बहुत पीछे उनका संकलन किया गया। यही कारण है कि बहुत कम रचनायें अपने मूल रुप में उपलब्ध हो सकी हैं। अजयगढ़ के नरेश रणजोर सिंह ने "भिलसांय कौ कटक' अपनी एक पुस्तक के परिशिष्ट में मुद्रित कराते हुए उसे भली प्रकार सुरक्षित कर दिया है।

"भिलसांय कौ कटक' में बुन्देलों और बघेलों की पारस्परिक शत्रुता का वर्णन किया गया है। इसमें कुटरा नामक स्थान पर हुए युद्ध का वर्णन है तथा कवि ने अर्जुनसिंह दीवान की आज्ञा से इस युद्ध का विवरण लिपिबद्ध किया जैसा कि प्रसतुत कटक के एक छन्द से ज्ञात होता है-

सुकवि सो भैरोलाल को-हुकुम दियो सुख पाय।
कुटरे कौ संग्राम यह-कहै विचिर्त बनाय।।
अर्जुन सिह दिमान की, सुन आयसु अनुकूल,
वीर बुन्देल बघेल कर, सुयश कहौं सुख मूल।।''

भिलसांय कौ कटक में अजय गढ़ के दीवान केशरी सिंह और बाघेल वीर रणमतसिंह के युद्ध का वर्णन किया गया है। बाबा रणमतसिंह बधेलखण्ड क्षेत्र के माने हुए क्रान्तिकारी थे। ये कोठी, जिला सतना के निकटवर्ती एक ग्राम "मनकहरी' के रहने वाले थे, जहाँ इनकी गढ़ी का ध्वंस आज भी विद्यमान है। सन् १८५७ के प्रथम भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में इन्होंने अत्यन्त नृशंसतापूर्वक अंग्रेजों का वध किया था। जब ब्रिटिश सरकार ने इनके द्वारा किये जाने वाले अत्याचारों का उततरदायित्व रीवा महाराज पर डाला तो वहाँ के दीवान दीनबन्धु ने इन्हें आत्म समपंण के लिए बाध्य कर दिया था। बाबा रणमतसिंह और उनके कतिपय साथियों को ब्रिटिश सरकार ने प्राण दण्ड दिया था। अजयगढ़ के बुन्देली राज्य से रणमत सिंह की लड़ाई काव्य के अन्तर्साक्ष्य के अनुसार इन्हीं दिनों की है। "भिलसांय कौ कटक' में युद्ध तिथि एक छन्द में निम्न प्रकार दी हुई है-

""संवत् उन्नीस सै सुनौ- शुभ चौदहा की साल।
कुटरे के मैदान में, ऐसौ बीतौ हाल।।''

अर्थात् यह युद्ध संवत् १९१८ विक्रमी तदनुसार सन् १९५७ ई में कुटरे के मैदान में हुआ था। इस लड़ाई में जीत अजयगढ़ की ही हुई थी। बाद में अंग्रेजों ने भी बाघेल वीर रणमतसिंह को दण्ड दिया था। वर्तमान में बाबा रणमतसिंह को बघेलखझ क्षेत्र में एक महान स्वतन्त्रता सेनानी के रुप में स्मरण किया जाता है।

भिलसांय कौ कटक में कवि द्वारा अजयगढ़ की सेना तथा रणमतसिंह की सेना, दोनों का ही वर्णन किया गया है, पर अजयगढ़ की सेना की कुछ अधिक प्रशंसा की गई है। इस रचना में युद्धस्थल की मारकाट के वर्णन का साधारण रुप ही देखने को मिलता है फिर भी कवि ने प्रमुख सरदारों और सामन्तों के नामों का विवरण दिया ही है। सेना प्रयाण के समय ललकारते हुए, उत्साह भरे वीरों से युक्त का वर्णन निम्न छन्द में देखिये-

""कर शोर महा घनघोर घनो ललकार परी अलवेलन की।
भर बांह तिवालन भालन सौं बगमेल चली हटहेलन की।
भट हांकत हूंकत हूलत सूलत रुलन रेल सकेलन की।
रणधीर बुन्देल अधीर भए, लख धावन वीर बघेलन की।।''

उपर्युक्त छन्द में अन्तिम पंक्ति में कवि ने बघेला वीरों की भी प्रशंसा कर दी है। ऐसे वर्णनों की इस रचना में कमी नहीं है।
"भिलसांय कौ कटक' भाषा प्रयोग एवं छन्द विधान की दृष्टियों से, "पारीछत कौ कटक' तथा "झाँसी कौ कटक' की अपेक्षा उत्कृष्ट रचना है। रचना को और अधिक विस्तार देकर कवि इसे एक रासो का रुप भी दे सकता था। "पारीछत कौ कटक' तथा "झाँसी कौ कटक' जन गीतात्मक शैली में लिखे गए काव्य हैं, परन्तु "भिलसांय कौ कटक' में दोहा, कवित्त, छप्पय, कुण्डलियाँ, घनाक्षरी, सवैया, सोरठा तथा मंज आदि छन्द प्रयुक्त किए गए हैं तथा इसे इतिवृत्तात्मक शैली में लिखा गया है। निष्कर्ष रुप में कहा जाता है कि "भिलसांय कौ कटक' ऐतिसाहिसक एवं साहित्यिक महत्व की रचना है।

हास्य रासो (Comic raso):

परिचय
रासो काव्यों का प्रमुख उद्देश्य है, समर भूमि में चरित्र-नायक के शैर्य का उच्चतम निदर्शन। उनका प्रमुख लक्षण है नायक द्वारा शत्रु को पराजित करने के प्रयासों के साथ युद्ध भूमि में स्वयं सो जाना। परन्तु हास्य रायसे दुखानत न होकर सुखान्त ही होते हैं। वीरता के जोशीले वर्णन सुनते सुनाते हुए बुन्देली रसज्ञों में ऐसा अनूठा जोश उमड़ा कि उन्होंने असम्भव को सम्भव कर दिखाया। रामायण की लोकप्रियता से रीझ कर जिस प्रकार लोगों ने मनोरंजन के लिए कुछ विशेष चौपाइयों की पैरोडी के द्वारा गड़बड़ रामायण की सृष्टि की, उसी प्रकार बुन्देलखण्ड के कुछ थोड़े से रचनाकारो ने ""हास्ये-रासो'' के रुप में एक नवीनता की सृष्टि की। आचार्यो ने वीर रस और हास्य रस के बीच प्रबल विरोध माना है, परन्तु हास्य रासो में दोनों के समन्वय का प्रयत्न किया गया है। उत्साह यदि धमनियों में रक्त का संचार बढ़ा सकता है, तो हास समस्त जीवन का पौष्टिक है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी ""हास्य'' जीवन के लिये अत्यन्त आवश्यक है। कोई भी व्यक्ति कैसे भी चिन्तित अवस्था में क्यों न हो, हास्य का पुट अवश्य ही कुछ समय के लिये उसे अपना दु:ख भुलाकर प्रसन्नता प्रदान करता है। इसी महत्वपूर्ण उद्देश्य की पूर्ति के लिये संस्कृत नाटकों में विदूषक नाम के एक पात्र की योजना की गई है। इसके अतिरिक्त बड़े बड़े महाकाव्यों, नाटकों ,उपन्यासों व चलचित्रों आदि में बीच-बी में हास्य का थोड़ा बहुत विधान उ#ुबे हुए पाठकों व दर्शकों के मन को जाजगी व शक्ति देने के लिए किया गया है। मानसिक थकान के साथ-साथ शारीरिक थकान को भी दूर करने में हास्य रस का अपना महत्वपूर्ण स्थान है।

बुन्देली बोली में लिख गये छोटे बड़ तीन हास्य रासो उपलब्ध हुए हैं। 

छछूंदर रायसा

गाडर रायसा एवं

धूस रायसा

यह रासो ग्रन्थ हास्य रस के सुन्दर परिपाक से युक्त किसी सरस कथानक के साथ रचे गये हैं।

इन बुन्देली प्रतीक रचनाओं में बुन्देली कवियों द्वारा ""वीरता'' और ""हास्य'' का अद्भूत समन्वय बड़ी मौलिक सूझ-बूझ के साथ किया गया है। इनके सम्बन्ध में श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव लिखते है-""विरोधों को चुनौती देते हुए बुन्देली कवियों ने पिछले समय में ""छछूंदर रायसो, गाडर रायसो, और घूंस रायसो नामक कृतियों द्वारा मौलिक सूझ-बूझ का परिचय दिया।'' वह वरीता का युग था। सर्वत्र वीरतापूर्ण कार्यों की चर्चा एक आम जन भावना बन गई थी। आधुनिक फैशन की भाँति उस युग में शौर्य वर्णन भी एक आम फैशन की तरह हो गया था।

हास्य रासो ग्रन्थों में जो प्रतीक अपनाये गये हैं और जिस प्रकार के कथानक की सृष्टि की गई है, उससे वीरत्व का उपहास भले होता है, पर प्रबुद्ध वर्ग के लिए वे स्वस्थ मनोरंजन हैं एवं रासो काव्य रचना प्रियता के स्पष्ट प्रमाण भी हैं। उपलब्ध रासो काव्यों पर पृथक-पृथक विवेचन निम्नानुसार प्रस्तुत किया जा रहा है-

छछूंदर रायसा

छछूंदर रायसा आकार में बहुत ही छोटा है। इस रचना के लगभग ७-८ छन्द ही उपलब्ध हैं जिनमें इसका कथानक पूर्ण हो गया है। छछूंदर एक घृणा पैदा करने वाला प्राणी है जो एक विशेष प्रकार की दुगर्ंध छोड़ता है। इस व्यंग्य रचना में एक लोकोक्ति ""भई गति सांप छछूंदर केरी।'' को आधार माना गया है। छछूंदर की यह विशेषता है कि यदि सांप उसे निगल ले तो या तो वह अन्धा हो जाता है अथवा मर जाता है, तो दांतों की विशेष बनावट के कारण छछूंदर की बाहर उगल नहीं सकता एवं प्राण हानि के भय से वह उसे निगलना भी नहीं चाहता ऐसी परिस्थिति में फंसे साँप की गति को समान परिस्थितियों में फंसे व्यक्ति की तुलना में प्रतीक माना जाता है। गोस्वामी तुलसीदास ने इस लोकोक्ति को अपने रामचरित मानस में द्विविधा की स्थिति में फंसी कौशिल्या के लिय प्रयुक्त किया है। तुलसी के शब्दों में -

""धरम सनेह उभय मति घेरी। भइ गति साँप छछूंदर केरी।
राखउ सुतहिं करउं अनुरोधू। धरम जाइ अरु बन्धु विरोघू।।''

धर्म और स्नेह के बीच कौशिल्या की बुद्धि घिरी हुई थी और उनकी दशा साँप छछूंदर जैसी हो रही थी। यदि वे हठपूर्वक राम को वन जाने से रोक लेती तो धर्म चला जाता और भाइयों से विरोध होता और यदि वे उन्हें वन जाने के लिए कहती तो इसमें बड़ी हानि थी। यह स्थिति बड़े धर्म संकट की थी। अतः साँप छछूंदर की गति वाली कहावत धर्म संकट की स्थिति के लिए ही उपयुक्त प्रतीत होती है।

""छछूंदर रायसा'' में भी छछूंदर एक ऐसे विजातीय किन्तु शक्ति सम्पन्न सामन्त अथवा सरदार का प्रतीक होता है जो किसी गढ़ में सुरक्षित होकर रह गया था किन्तु अपनी कुटिलता की विषाक्त गन्ध से शासक वर्ग को प्रभावित करता रहता था। पर यहाँ इस रायसे के प्रारम्भ की पंक्तियों से विदित होता है कि छछूंदर कुए में गिर पड़ी उसे बाहर कौन निकाले किसकी भुजाओं में इतनी शक्ति है

""गिरी छछूंदर कूप में भयौ चहूं दिसि सोर।
जो बाहर काड़ै कुआ को है भुजबल जोर।।''

धर्मपाल नामक व्याल छछूंदर से युद्ध करने को तैयार होता है। यहाँ पर धर्मपाल साँप के स्वभाव वाले किसी व्यक्ति का प्रतीक है। छछूंदर कुएं में गिरे तो यह स्पष्ट ही है कि वह पानी में भंग जायेगी तथा यह चूहे की तरह का ही प्राणी है अतः पानी में गिरते ही शक्ति हीन हो जाता है जबकि सपं पानी में भी शक्ति सम्पन्न रहता है। इस प्रकार सपं के स्वभाव वाले किसी सामन्त द्वारा कुंए में पड़ी हुई अशक्त छछूंदर के समान किसी दूसरे सरदार परविजय पा लेने के प्रसंग पर ""छछूंदर रायसा'' तीव्र व्यंग्य है। झूठी प्रशंसा के युग में जब कविता भाजी रोटी हो गई थी ऐसे समय में इन हास्य रचनाओं के रचनाकारों द्वारा उन कवियों और कुपात्र शासकों पर कठोर व्यंग्य है।

युद्धस्थल में दो वीरो के युद्ध के साथी भी होते हैं। छछूंदर रायसे में साँप और छछूंदर के मध्य हुए युद्ध के गवाह मेंढ़क और कैंकड़े हैं। कुएं में पड़ा हुआ मेंढ़क -""कूप मूण्डूक'' विवेहीनता या सीमित ज्ञान के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता है। इस व्यंग्य रचना में भी कवि का यही दृष्टिकोण प्रतीत होता है। अर्थात् साँप और छछूंदर के स्वभाव वाले दो शासकों के इस युद्ध के साक्षी विवेक रहित या अल्पज्ञ व्यक्ति ही रहे होंगे।

छछूंदर पर विजय प्राप्त करने धर्मपाल व्याल कुंए से बाहर निकला तो सारे जहान में सह संवाद फैल गया। उस समय धर्मपाल की स्थिति काली नाग को नाथ कर यमुना से बाहर निकले कृष्ण के समान थी। रासो की पंक्तियां इस प्रकार हैं-

""धरम पाल बाहर कढ़ौ, जानी सकल जहांन।
ज्यों काली कौ नाथ के, बाहिर आयौ कान।।''

परन्तु उपर्युक्त पंक्तियों में भी विजेता के ऊपर तीक्ष्ण व्यंग्य है। छछूंदर के समान दुर्बल एंव बल वैभव रहित किसी छोटे-छोटे मोटे सामंत को विजित कर लेने पर धर्मपाल व्याल के प्रतीक व्यक्ति के किसी खुशामदी कवि द्वारा उसकी विजय का अत्यन्त अतिरंजित वर्णन किया गया होगा। यहाँ खुशामदी कवि द्वारा उसकी विजय का अत्यन्त अतिरंजित वर्णन किया गया होगा। यहाँ इस रचना में धर्मपाल को अपना धर्म पालन करने अर्थात् छछूंदर के ऊपर विजय प्राप्त करने में श्रीकृष्ण तथा छछूंदर को काली नाग की उपमा देने में रचनाकार का झूठा विरुद ढोने वाले किसी व्यक्ति के ऊपर करारा व्यंग्य है। सम्पूर्ण उक्ति अभिधा में न होकर शुद्ध व्यंजना में है।

छछूंदर रायसे के रचनाकार के जीवन वृत्त एवं उसकी जाति-पांति के विषय में बहुत प्रयास किए जाने पर भी कुछ पता नहीं चल सका। परन्तु धर्मपाल नामक कवि के कल्पित व्याल को प्रधान वंश का बली बताया जाना सुरुचि का परिचायक नहीं है। यहाँ बुन्देलखण्ड में प्रधान वंश का आशय कायस्थ जाति से ग्रहण किया जाता है, और पिछले समय में कायस्थ प्रतीक रहा है अधिकारी वर्ग का जन साधारण को अधिकारी वर्ग से सामान्यत- एक खीझ रही है। बहुत सम्भव है कि रचनाकार को राज्य शासन से कुछ विशेष चिढ़ रही हो। 

गाडर रायसा

""छछूंदर रायसा'' के पश्चात हास्य रासो क्रम में ""गाडर रायसा'' है। बुन्देली बोली में ""गाडर'' शब्द ""भेड़'' के लिये प्रयोग किया जाता है। भेड़ एक नितान्त कायर, शक्ति हीन और अहिंसक पशु होता है। तथा यह समूहगामी प्राणी भी है। भेड़ की इसी प्रवृत्ति को लेकर ""भेड़ियाधसान'' मुहावरा बना।

""गाडर रायसा'' एक व्यंग्यात्मक हास्य रचना है। रचनाकार का मूल उद्देश्य बुन्देलखण्ड के किसी बनिया स्वभाव वाले ठाकुर पर व्यंग्य करना है। प्रारम्भ से लेकर अन्त तक सम्पूर्ण कथानक व्यंग्य से पूर्ण है। ""गाडर'' किसी शक्तिहीन सामन्त का प्रतीक है, तथा बनियां निर्बल ठाकुरों का प्रतीक है, जो अपनी मि प्रशंसा के आदी हो चुके थे। ऐसे ठाकुरों को यहाँ बुन्देलखण्ड में बनिया ठाकुर कहा जाता था। जाति शूर होने का उन्हें कोरा ही दंभ था पर सचमुच वे बनिया जाति की भाँति कायर थे। इस रायसा में वैश्य जाति के जो आस्पद चुने गए हैं उनका भी एक विशेष अर्थ है, ""गाडर'' के विरुद्ध बनियों की जो फैज तैयार हुई, उसमें मोर कीसी सजगता व तीक्ष्णता वाले ""मोर'', बिलैया जैसी चालाकी वाले ""बिलेया'', नाहर जैसी शक्ति के प्रतीक ""नाहर'' तथा इसी भाँति गंधी, नगरिया आदि विशेष वर्ग के वैश्य थे। ये सभी वैश्य जातियां ठाकुरों की विशेष उपजातियों पर व्यंग्य हैं। वीरता क्षत्रियों का स्वाभाविक गुण माना जा सकता है पर नाम और जाति से भी वीरता का बाना धारण करते हुए कायरता दिखलाने वाले ठाकुर को यहाँ व्यंगय का विषय बनाया गया है।

श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव इसे कोरा हास्य एवं मात्र मनोरंजन मानते हैं। इनका मत है-""हमारा तो विश्वास यही हे कि वीरता जैसे किसी भी सद्गुण पर किसी जाति-उपजाति का एकाधिकार नहीं। परन्तु वैश्यों की व्यवसायिक शांतिप्रियता का किसी अज्ञात पुराने कवि ने मखौल उड़ाने के लिये ही उनके द्वारा इस प्रकार युद्ध का रुपक रच डाला है, जो मात्र मनोरंजक के नाते क्षम्य है।''

""गाडर रायसा'' को ""मजाकिया रायसा'' कहा जाना भी उपयुक्त नहीं है, जैसा कि श्री हरिमोहन लाल जी ने लिखा है। और न यह मखौल उड़ाने के लिये लिखा गया मनोरंजन काव्य है। बुन्देलखण्ड के इतिहास में अवश्य ही ऐसी कोई घटना घटित हुई होगी, जिसमें किसी भेड़ शक्तिहीन समान्त ने बनिया जैसे निर्बल और डरपोक ठाकुरों पर आक्रमण किया हो और उन बनिया ठाकुरों ने उससे टक्कर लेने के लिए अपनी सेना इकट्ठी की हो, परंतु फिर भी पराजय हाथ लगी हो, और डाड़ चुकाना पड़ गया हो।

गाडर रायसा में बनिया ठाकुरों की वीरता एवं सेना का जो चित्रण कवि द्वारा किया गया है, वह इस प्रकार है-

""जहं कौन की है बात, उठ सेर मारे प्रात।
लीनी सवारी वेस, ओढ़ चिलता खेस।।
जुर चले सजकै सेन, कासी कहै जब वैन।
अब खबर ले अमगाइ, हुन नाउऔ पइवाइ।।''

भला बनिया ठाकुर प्रातः काल उठकर शेर मार सकता है, उपर्युक्त पंक्तियों में व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण है। गाडर जैसे निरीह प्राणी के लिऐ ऐसे-ऐसे व्यक्तियों का सेना सजाकर जाना जो शेर मारने की शक्ति रखते हों। ऐसे लोग भी लड़ने की योजना पर घर के कोने में बैइकर काना फूसी करें। ""ठाकुर और चाकर'' सब एक स्वरुप दिखलाई पड़ते हैं। अर्थात् वैश्य वर्ग की पोषाक लगभग उस जमाने में एक सी ही हुआ करती थी। नीचे लिखी पंक्तियों कमें यह विवरण देखिये।

रासो में एक स्थान पर कवि ने बगली, कतैया, पाग या पगड़ी, तथा धोती आदि वस्रों की चर्चा भी की है। बगली व कतैया नाम का ढीलाढाला कुर्ता आमतौर पर बुन्देलखण्ड के बनियों द्वारा पहना जाता था।

""ठाकुर चाकर चीन न परें, एक रुप पनमेसुर करे।
लरबे की मसलत सब ध्रै, काना फूसी बैठे करे।।''

इस प्रकार लड़ने का कोरा दंभ रखने वाले झूठी प्रशंसा चाहने वाले कायर और सामर्यिहीन लोग ही कोने में बैठकर कानाफूसी करने वाले होते हैं। जब ये बनिया ठाकुर ""गाडर'' से युद्ध के लिए प्रस्थान करते है, तब कुंजो नाम की स्री भूमियां नामक स्थानीय देवता से प्रर्थाना करती है, कि जब साहु बनिया ठाकुर जीत कर घर आवेंगे तो गुरया को रोट चढ़ा गा-बजाकर सती की पूजा कर्रूंगी, ""आसो'' की पूजा उसारकर रख दूगी। इस प्रकार अपने गुरु के चरणों की वन्दना करके परतैया नामक वयक्ति के नायकत्व में बनिया ठाकुरों की वह सेना जब सरकती हुई ""गाडर'' की तरफ जाती है, तब तक "विघना'' भेड़िया गाडर पर हमला कर देते हैं। ""विघना'' यहाँ तीसरे किसी अधिक शक्ति सामन्त का प्रतीक है, जिसके अचानक आक्रमण से ""गाडर'' के प्रतीक सामन्त मैदान छोड़कर भाग निकलते हैं। इस स्थिति को बनिया ठाकुर अपने ऊपर गाडरों का हमला समझ बैठे और घबड़ा कर इधर-उधर भागने लगे।

""गाडर रायसा'' में इस स्थिति का वर्णन निम्न पंक्तियों में देखिए-

""सरकत चले बानियां जबै,
सरकौआं दृग मूंदे तबै।
जै लौ विघना परै बजाई,
गाडर रा भागै अकुलाई।
झपट गई भरका की गैल,
परी बानियन के दल ऐल।।''

गाडर तो विघना के डर से भाग रही थी पर बनियों के समूह में खलबली मच गई। गाडरों ने तो मनुष्य समझकर सहारे की कामना से बनिया ठाकुरों का सामीप्य पकड़ा था।

""मानस जान आसरौ लयौ।
बनियन पसर जान भगदयौ।।''

परन्तु ये बनिया ठाकुर इतने भीरु थे कि स्वयं भी इतने भयभीत हो गये कि वे कुंए में गिर पड़े और ""विघना'' के डर के से ""गाडर'' भी ऊपर से गिर पड़ी। कुएं में पड़े हुए बनिया ठाकुरों की दयनीय दशा का कवि ने बहुत ही रोचक चित्रण किया है।

""लख कासी रोवन जब लागौ,
बचौ कुआ न इनपै भागौ।
हाथ जोर जब ही चिचियाई,
आज न बा दल के हम आई।।'

उपर्युक्त पंथ्कतयों में बनिया ठाकुर गाडर से प्रार्थना करता है कि मुझे बचने दो मैं उस दल का नहीं हूं। यहाँ उस दल से अभिप्राय गाडर से युद्ध करने आई बनिया ठाकुरों की सेना से हैं।

गाडर कुंए के जल में स्वयं भयभीत होकर तैर रही थी और बनिया ठाकुर करुणा कर के उसके पैरों पर गिर रहा था तभी-

""चरन छुवत गाडर सिर चढ़ी,
बिनवत करुना करके बड़ी।।''

गाडर बनिया ठाकुर के सिर पर च्ढ़गई और वह अपने पुत्र की सौगन्ध खाकर पुनः कहने लगा कि मैं उस दल का नहीं हूं। इस पंक्तियों में कायरता की पराकाष्ठा है। वह "गाडर राय' से दण्ड भरने के लिए कहता है। तब गड़रिया आकर रस्सा का फँदा बनाकर गाडर को कुंए से निकाल लेता है तथा बनिया ठाकुरों को निकाल देता है। बहुत पुराने समय से ही बुन्देल खण्ड के राज्यों में दण्ड भरने या चौथ वसूल करने की प्रथा विद्यमान थी। पराजित शासक विजेता राजा को चौथ देना स्वीकार कर सन्धि कर लेता था और एक-दूसरे के सहयोगी हो जाते थे। "गाडर रायसा' में भी कवि ने ऐसा ही वर्णन उपस्थिति किया है।
कवि के द्वारा दिया गया विवरण निम्न प्रकार है-

""घर तै ले रुपया जब दये,
मिला वेग परताई लये।
न मिलक सबहीविधि करी,
हिए भक्ति गाडर की परी,
करी खातरी धिक जब, बसौ खुसी सों जाइ।
पटी हमारी में बसौ, बाखर लेउ बनाय।।

"गाडर रायसा' विशुद्ध बुन्देली बोली में लिखा गया है। लिपिकारों ने अज्ञातवश इस रचना के कुछ शब्दों में मनमाने हेर फेर कर लिए हैं, जिनकी पाठ शुद्धि आवश्यक है। उदाहरण के लिए "दगली' शब्द अशुद्ध है, इसके स्थान पर "बगलीद्ध शब्द होने चाहिए, जिसका अर्थ एक वस्र विशेष से है, जो पुराने लोग "कतैया' नाम के वस्र की तरह प्रयोग करते थे। इसी तरह "दहेड़ा' का "दहोंड़ा' गहरा भरा हुआ पानी का स्थान, "बाजियों का "बानियों' बनियो का बहुवचन क्योंकि बुन्देली में "बाजियों' कोई शब्द नहीं है, होना चाहिए। एक शब्द "धूं का' जिसका अर्थ श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव ने "धक्का' से लिया है ,जबकि यह शब्द विशुद्ध बुन्देली की बोली का है और इसका अर्थ एक "जोरदार आवाज' है, जो गड़रियो लोग प्राय- भेड़ों को हांकने के लिए प्रयोग करते हैं। ठेठ बुन्देली के कुछ शब्द सरसता और माधुर्य के साथ कवि द्वारा ओचित्यपूर्ण ढंग से प्रयुक्त किए हैं, जैसे-"खेसन के टूंका हो गए' अर्थात् "खेस७ नामक वस्रों के टुकड़े-टुकड़े हो गए। "खेस' बिल्कुल ग्रामीण बोली का शब्द हेफ इसी प्रकार "सरकौआ' सरकते हुए, किंरगचले' चल दिए, "भरका' बीहड़ में टीलों के बीच की ऊबड़ खाबड़ ऊँची नीची जगह, "आसरौ' सहारा, "पसर आदि शब्द हैं, जो बड़ी स्वाभाविका के साथ प्रयुक्त हुए हैं।

घूस रायसा

गाडर रायसा के पश्चात् घूस रायसा भी बुन्देली की एक व्यंग्य कृति ही है। इसके रचनाकार के विषय में कुछ भी विवरण उपलब्ध नहीं हो सका है, पर रासो की एक पंक्ति ""को बरनै पृथीराज कहि, फिरकै निकसी घूंस'' के अनुसार "पृथीराज' को इसका कवि माना जाना चाहिए। यह किसी कवि द्वारा धारण किया हुआ कलिपत नाम भी हो सकता है। इस सम्बन्ध में श्री हरिमोहन लाल श्रीवास्तव का मत निम्नानुसार है-""यह "घूंस रायसा' "पिछले समय में लिखे गए "गाडर रायसा' के कवि की एक अन्य रचना है, जिसमें कुंजों नामक बुन्देलीखण्डी स्री और कासी नामक सेठ के प्रतापी पुत्र "परतैंया' के शौर्य का ही वर्णन है, इस कवि का असली नाम तो हमें विदित नहीं हो सका, परन्तु उसने "रासो' काव्य को मजाक का विषय बनाते हुए "पृथीराज' का कल्पित नाम भी धारण कर रखा था।'' परन्तु "घूस रायसा' के कवि की अन्य रचना होने में सन्देह है, क्योंकि एक तो गाडर रायसा में कवि के कल्पित नाम "पृथीराज' का कहीं उल्लेख नहीं पाया जाता, दूसरे भाषा एवं छन्द शैली में भी दोना#े#ं रचनाओं में पर्याप्त अन्तर है। गाडर रायसा तथा घूस रायसा एक ही काल में लिखी गई रचनायें तो हो सकती हैं, पर यह दोनों एक ही कवि की दो रचनायें नहीं सकतीं। दोनों कृतियों में पात्रों के नाम के साम्य के कारण ही श्री हरिमोहन लाल ने इन्हें एक ही कवि के द्वारा लिखी गई माना है पर एक कवि के द्वारा चुने गए नामों को किसी अन्य कवि द्वारा भी तो अपनाया जाना सम्भव है।
घूस रायसा भी छोटी रचना ही है। इसमें कुल ३१ छन्द है। घूस चूहे के आकार का एक बड़ा जन्तु होता है। घूस के विकराल स्वरुप व उसके उत्पातों का वर्णना करके, कुंजोंनाम की स्री और परताईं नामक वेश्य का जो कथानक इसके साथ जोड़ा गया है, उसमें हास्य की अपेक्षा व्यंग्य ही अधिक है। उस युग में जबकि हर आम व खास में युद्ध व युद्ध की चर्चायें मानव जीवन का प्रमुख अंग थीं, प्रत्येक सामन्त, सरदार अथवा क्षत्रिय को युद्ध लड़ने ही पड़ते थे। युद्धों में मारकाट की भयंकरता कायरों को युद्ध क्षेत्र से भागने के लिए विवश कर देती थी, क्योंकि सभी क्षत्रिय शूप सूपत नहीं होते थे। बहुत से कायर सरदारों के युद्ध छोड़कर भागने के उदाहरण इतिहास में मिल जायेंगे। घूस रायसा में परतैयां को ऐसे ही किसी भगोड़े सरदार का प्रतीक माना गया है, जो शत्रु का सामना न कर पीठ देकर भागा हो।

रायसे में कवि ने कुंजों के द्वारा अपने पति की वीरता पर किए गए व्यंग्य को निम्न प्रकार चित्रित किया है-

""पिया अधिक सुकुमार,
करौ घूंस सौं रार जिन।
खाल डार है फार,
तुम रोवत लम्पा लगे।।''

उपर्युक्त पंक्तियों में कायर क्षत्रियत्व पर तीव्र व्यंगय है। भारी-भारी हथियार धारण करने वाले तथा दुर्दान्त शत्रुओं का सामना करने वाले क्षत्रियों और सरदारों को कोमलता नहीं कठोरता शोभा देती है। परतांई की तरह वे लम्पा लगने पर रोते नहीं हैं। हथियारों के व खाकर वे मुस्कराते हैं पर कुंजो के सामने निरीह परताई भी अपनी बाहदुरी का सिक्का जमाना चाहता है। ऐसे लोगों को घर का शेर कहते हैं। अपने घर में बैठकर दुनियाँ को जीतने की योजनायें गढ़ेंगे, पर मोर्चे पर जाने में इनकी पिंडलियाँ काँपती हैं। ऐसे लोग अपने घर की स्रियों पर ही रोब जमा लेते हैं। घूस रायसा में कवि ने इस स्थिति को इस प्रकार स्पष्ट किया है-

""सुन दौकरन नारी सौ लगौ,
कबै देख संग्राम में भगौा''

उपर्युक्त उदाहरण की दूसरी पंक्ति से यह स्पष्ट होता हे कि परताई अपनी पत्नी पर रौब जमाता हुआ कहता है कि संग्राम को देखकर मैं कब भागा हूँ यहाँ अप्रत्यक्ष रुप से युद्ध से भागने की स्थिति पर ही व्यंग्य है।

घूंस रायसे में युद्ध का वर्णन भी बड़ा विचित्र एवं व्यंग्यपूर्ण है। जब "दौआ' एक विशिष्ट व्यक्ति या मुखिया, जो प्राययः अहीर या यादव जाति से सम्बन्ध रखता है से पुकार की गई, तो तलवारें ले लेकर घूस को मारने के लिए मर्द वीर पुरुष दौड़ पड़े। बड़े-बड़े मंच बनाकर उन पर योद्धा लोग डट गए और पनालों की राह रोकरकर बैठ गए। इसी समय दीपक बुझ गया और घूसों का "घेरा प् गया, अर्थात् घूसों ने निकल कर हमला कर दिया। परिणाम यह हुआ कि सारे योद्धा एक-दूसरे को रगड़ने और कुचलने लगे। वे सब लोग आपस में ही लड़ बैठे। यहाँ पर व्यंग्यात्मक दृष्टिकोण यह है कि जब विवेक का दिया दीपक बुझ गया तो वे सब योद्धा घर में आकर आपस में ही लड़ मरे। रायसे में उल्लिखित पंक्तियाँ निम्नानुसार हैं-

"दिया बुझौ तिहि बार''
""आपसु ही में लर मरे,
हम घर ही में आइ।''
और आगे कवि लिखता है-
""राइकपरिया झूट,
कहा करतार बनाई।
आपुस ही में लर मरे,
मूंढ़ बानि में मूंस।''

उपर्युक्त पंक्तियों में किन्हीं सामन्तों, सरदारों आदि की विवेक शून्यता पर स्पष्ट व्यंग्य है।

रायसो के अन्तिम वर्णन में दिखलाया गया है कि दोनों पक्षों में सुलह हो गई। घूस कृपाल हो गई। उसने साहु को पगड़ी दी। जमीन दी और अभय किया। सहुआइन मीदिन को रेशमी लंहगा तथा चुनरी दी।

घूस रायसे में कवि को भाषा में पर्याप्त सफलता मिली है। कुछ बुन्देली के ग्रामीण माधुर्य युक्त सम्बोधन बड़ी स्वाभाविकता से प्रयुक्त किए गए हैं- जैसे मोदिन साहु अर्थांत वैश्या की पत्नी लांगा लहंगा गदवद शीघ्रता पूर्वक, चियांइ चिल्लाये आदि। इसी प्रकार कुछ पंक्तियों में भी अर्थवत्ता एवं भाषा सौन्दर्य देखा जा सकता है। जैसे -

 . ""तुम रोवत लंपा लगे।''
२. ""मेरा परे जुझार।''
३. ""मसडद्या मैड़ी भई।'' आदि

निष्कर्ष रुप में यह कहा जा सकता है कि हास्य व्यंग्य काव्य की दृष्टि से छछूंदर रायसा, गाडर रायसा तथा घूंस रायसा का महत्वपूर्ण स्थान है।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - चन्देलयुगीन ललित कलाएँ (Chandel Eugenic Fine Arts)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

चन्देलयुगीन ललित कलाएँ (Chandel Eugenic Fine Arts)

चन्देलों ने लगभग चार शताब्दियों तक बुन्देलखण्ड में शासन किया। वे केवल महान् विजेता तथा सफल शासक ही न थे। अपितु ललित कलाओं के प्रसार तथा संरक्षण में भी वे पूर्ण दक्ष थे। उनकेशान्तिपूर्ण शासन तथा देश की भौगोलिक स्थिति ने भी इस दिशा में पूर्ण योग दिया और खजुराहो के मंदिरों के रुप में कला अपने चरम लक्ष्य तक पहुंच गई थी। चन्देल काल में जनता की समृद्धि ने ललित कलाओं के इतिहास में एक अमिट छाप डाल दी थी। चन्देल युग में वास्तुकला तथा मूर्तिकला उन्नति के चरमबिन्दु पर पहुँच गई थी और उनके उत्कृष्ट नमूनों का बुन्देलखण्ड में बाहुल्य है।

स्थापत्य कला

सुप्रसिद्ध कला मर्मज्ञ परसी ब्राउन का मत है कि कला में भारतीयों के आदर्श विशिष्ट रुप से प्रतिस्फुटित होते हैं और चन्देल ललित कलायें इसकी अपवाद नहीं हैं। स्थापत्य कला के प्रत्येक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक विकास में कोई-न-कोई महत्वपूर्ण अनुभूत सिद्धान्त निहित है। ग्रीक के लोग उसके सौष्ठवपूर्ण पूर्ति पर अधिक बल देते हैं। रोमन वैज्ञानिक कौशल तथा इटैलियन, विद्वत्ता पर अधिक जोर देते हैं। किन्तु भारतीय आध्यात्मिक तुष्टि पर विशेष बल देते हैं। भारतीय कलाकृतियाँ भारतीयों की धार्मिक भावनाओं से ओतप्रोप हैं। भारतीय स्थापत्य कला की इस विशेषता के कारण भारत में असंख्य मंदिरों का निर्माण हुआ और इसी कारण बुन्देलखण्ड में भी मंदिरों का बाहुल्य है।

चन्देल नरेश निर्माण की ओर विशेष ध्यान देते थे और उनके अधिकारी तथा जनता भी उनके आदर्शों का अनुसरण करती थी। किन्तु चन्देलों का निर्माण केवल मंदिरों तक ही सीमित न था। भवनों, तड़ागों तथा सैनिक-स्थापत्य कला की ओर भी उनकी विशेष रुचि थी। अध्ययन की सुगमता की दृष्टि से चन्देल स्थापत्य कला के निम्नलिखित विभाग किये जाते हैं--

धार्मिक स्थापत्य कला

चन्देल स्वयं ब्राह्मण धर्म के समर्थक थे, किन्तु अन्य धर्मों के प्रति वे सहिष्णु थे। विभिन्न धर्मों के अनुयायियों को अपने-अपने धर्मों के प्रसार एवं प्रचार की पूर्ण स्वतन्त्रता थी। इसी कारण विभिन्न धर्मों के मंदिर समस्त बुन्देलखण्ड में पाये जाते हैं। धार्मिक स्थापत्य कला पुनः (अ) ब्राह्मण स्थापत्य कला, (ब) बौद्ध स्थापत्य कला तथा (स) जैन स्थापत्य कला में विभक्त की जा सकती है:

(अ) ब्राह्मण स्थापत्य कला

ब्राह्मण स्थापत्य कला भी तीन भागों में विभक्त की जा सकती है। इस युग में ब्राह्मण धर्म के अन्तर्गत अनेक देवताओं का प्रादुर्भाव हो चुका था। अस्तु, इसी के आधार पर शैव, वैष्णव तथा सूर्य, दुर्गा, महेश्वरी आदि अन्य देवताओं के मंदिरों का निर्माण हुआ।
धार्मिक स्थापत्य कला में प्राधान्य मंदिरों का ही है। अस्तु, भारतीय कला के उत्कृष्ट नमूनों में मंदिरों का प्रमुख स्थान है। यद्यपि ये मंदिर समस्त बुन्देलखण्ड में पाये जाते हैं, किन्तु चन्देलों की धार्मिक राजधानी खजुराहो में हिन्दू तथा जैन मंदिरों के उत्कृष्ट नमूने हैं, जिनकी अपनी स्वयं की श्रेणी है। ये मंदिर चहारदीवारी (परिधि) के अन्दर नहीं हैं बल्कि प्रत्येक मंदिर एक ठोस तथा ऊँचे चबूतरे पर स्थित है। ये मंदिर अपनी विशालता के लिए ही प्रसिद्ध नहीं हैं। क्योंकि उनमें सर्वोच्च मंदिर सौ फीट से कुछ ही अधिक ऊँचा है। बल्कि इन मंदिरों की ख्याति इनकी कलापूर्ण कृति पर ही अवलम्बित है।

इन मंदिरों के तीन मुख्य भाग हैं १. गर्भगृह, २. मण्डप तथा ३. अर्द्ध मण्डप। इनके अतिरिक्त कुछ मंदिरों में अन्तराल का भी प्राविधान होता था और कुछ बड़े मंदिरों में महामण्डप तथा गर्भगृह की परिक्रमा का भी विधान था। प्रत्येक भाग की स्वतन्त्र अलग-अलग गोलाकार छत होती थी जो समान रुप से अर्द्ध मण्डप की छत से प्रारम्भ होकर गर्भगृह के उच्चतम शिखर तक जाती है। ये मंदिर अन्दर तथा बाहर दोनों ओर अलंकृत किये जाते थे। ये अलंकारिक मूर्तियाँ यद्यपि विशाल एवं सुन्दर होती थीं, किन्तु कभी-कभी उनसे अश्लीलता टपकती थी।

शैव मन्दिर

विष्णु मंदिर

ब्रह्मा मंदिर

शाक्त मंदिर

सूर्योपासना

जैन-मंदिर

शैव मन्दिर

१. कन्दरीय महादेव

खजुराहो के मंदिरों में यह सबसे विशाल है। यह १०९ फीट लम्बा तथा ९ फीट चौड़ा है। भूमि की सतह से इसकी ऊंचाई ११६ फीट तथा मंदिर के फर्श से इसकी ऊंचाई ८८ फीट है। इसमें अर्द्धमण्डप, मंडप, महामंडप, अन्तराल तथा गर्भगृह हैं और सभी के आमलक शिखर हैं। इन शिखरों का तारतम्य सिंहद्वार के शिखर से प्रारम्भ होकर गर्भगृह के उच्चतम शिखर तक जाता है। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणापत्थ है जो दीपकों से प्रकाशित होता था। इस मन्दिर की छतें बहुत सुन्दर हैं। छतों तथा मंदिर की दीवारों पर हिन्दू देवी-देवताओं की बहुसंख्यक मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मंदिर की कुर्सी १३ फीट ऊंची है और बड़े तथा मजबूत पत्थरों से बनी है। यह चौकी ऊपर की ओर ढालू होती गई है। कुर्सी के ऊपर मूर्तियों की तीन चौड़ी पट्टियां हैं जो मन्दिर के चारों ओर हैं। उत्कीर्ण मूर्तियों का यह सिलसिला शिखर तक जाता है। मूलतः यह शिव मन्दिर है और इसमें साढ़े चार फीट घेरे का संगमरमर का शिव लिंगम् है। इस मन्दिर के तिथि निर्धारण के सम्बन्ध में कोई शिलालेख नहीं है। किन्तु ग्यारहवीं शताब्दी के कुटिल लिपि में प्राप्त कुछ वर्णों से प्रतीत होता है कि इस मन्दिर का निर्माण काल लगभग ग्यारहवीं शताब्दी रहा होगा।

२. खजुराहो का महादेव मन्दिर

कंदरीय मन्दिर के निकट जीर्णावस्था में एक छोटा शिव मंदिर है जिसकी विगत शताब्दी में महाराजा छतरपुर ने जीर्णोद्धार कराया था। वर्तमान मंदिर देखने से यह नहीं ज्ञात होता कि इसके तीन भाग थे अथवा पांच। सिंहद्वार के मध्य में शिव प्रतिमा है और उसके दाहिने तथा बाईं ओर ब्रह्मा तथा विष्णु की मूर्तियाँ हैं।

३. खजुराहो का विश्वनाथ मंदिर

प्राचीन शिवसागर के पूर्वी किनारे में यह मंदिर स्थित है। इसके पांच भाग हैं और इसकी निर्माण कला कन्दरीय मन्दिर की ही भांति है। यह ८७ फीट लम्बा ४६ फीट चौड़ा तथा भूमि से १०३ फीट ऊंचा है। मंदिर के मण्डप में चार चौकोर स्तम्भ हैं और उन्हीं के आधार पर छत बनी हुई है। मंदिर की ३/४ ऊंचाई पर समान रुप से आठ दीवारगीर हैं। जिनमें स्री तथा सिंह की प्रतिमाएँ हैं। अब केवल दो प्रतिमायें शेष रह गयी हैं। खम्भों के ऊपर स्तम्भ शीर्ष अलंकृत किये गये हैं। उनके ऊपर चार बड़ी-बड़ी दीवारगीरें हैं जिनके आधार पर मेहराव बने हुए हैं कोनों की ओर चार छोटी-छोटी दीवारगीरें हैं, और उन्हीं के आधार पर चार नारी प्रतिमायें हैं। गर्भगृह की प्रवेशवद भी दो स्तम्भों पर आधारित है, किन्तु उनके ऊपरी भाग में कोई मूर्ति नहीं है। उनमें उसी प्रकार के चार दीवारगीर स्तम्भ हैं, जिनमें चार बड़े दीवारगीर मेहराव के लिए हैं और चार छोटे दीवारगीरों पर चार नारी प्रतिमायें हैं, किन्तु अब केवल तीन प्रतिमायें ही शेष बची हैं। मंडप की छत इस प्रकार बनी है मानो एक के बाद दूसरा पत्थर रख दिया गया हो। सिंहद्वार की छत दो वर्गों में विभक्त है और उसमें अनेक मूर्तियां उत्कीर्ण हैं।

यह मंदिर अच्छी दशा में है और इसमें पांच उपमन्दिर चार मुख्य मंदिर के चारों कोनों पर और एक सिंहद्वार के सामने अब भी विद्यमान है। गर्भगृह के मुख्यद्वार में नन्दी पर आरुढ़ भगवान शिव की मूर्ति है। इस मूर्ति के दाहिनी ओर हंसयुक्त ब्रह्मा तथा बाईं ओर गरुड़ युक्त भगवान विष्णु की मूर्ति है। मंदिर के अन्दर शिवलिंगम् भी है और मंदिर बहुसंख्यक मूर्तियों से अलंकृत है। इस मंदिर का शिखर एक बहुत बड़े आमलक के सदृश है और उसके चारों ओर अनेक छोटे-छोटे आमलक हैं। इस मंदिर में विक्रमाब्द १०५६ अथवा ९९९ ई. का धंगदेव का शिलालेख है। इस लेख का यह निर्देश है कि धंगदेव ने इस मंदिर का निर्माण किया था। यह मंदिर प्रमथनाथ के नाम से प्रसिद्ध था, किन्तु अब विश्वनाथ मंदिर केनाम से सम्बोधित किया जाता है। शिलालेख में उल्लिखित मरकत शिवलिंगम् अब उपलब्ध नहीं है, किन्तु मदिर अच्छी दशा में है।

४. विश्वनाथ मंदिर

दक्षिणी-पश्चिमी कोने पर भगवान् शिव का एक छोटा मंदिर और है। जिसके गर्भगृह के मुख्यद्वार पर भगवान् शिव की प्रतिमा है।

५. मृतंग अथवा मृत्युंजय महादेव मंदिर

यह चतुर्भुज मंदिर के समीप स्थित है और यह अन्दर से २४ वर्ग फीट है और बाहर से ३५ वर्ग फीट है। इसके ओसारे की लम्बाई १८ फीट तथा चौड़ाई ९ फीट है। इसकी छत पिरामिड के रुप में त्रिकोणाकार है जो धीरे-धीरे कम चौड़ी होती गयी है। इसके ऊपर स्वर्ण कलश बने हुए हैं। इस मंदिर में इतनी अधिक पुताई हुई है कि दीवारों तथा छतों की मूर्तिकला लुप्तप्राय है।

६. महोबा का नीलकण्ठ मंदिर

इस मंदिर का ध्वंसावशेष मात्र है। इसे सामने का भाग गिर गया है। केवल गर्भगृह मात्र शेष है। गर्भगृह के मुख्यद्वार 
पर शिव की मूर्ति है और उसके दाहिने तथा बायें ब्रह्मा तथा विष्णु की मूर्तियाँ हैं। गर्भगृह के अन्दर अर्घ भी अच्छी दशा में है। इस मंदिर में वि. ११७४ अथवा १११७ ई. का एक शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। इसके कायस्थ नाजुक द्वारा भगवान् गौर अथवा शिव की पूजा का उल्लेख है।

७. कुँवर मठ

यह मंदिर बाहर से ६६ फीट लम्बा तथा ३३ फीट चौड़ा है और अन्दर से इसकी लम्बाई ४९ फीट तथा चौड़ाई २९ फीट है। इस मंदिर में पांचों भाग हैं, पर इसके छत का अलंकरण अन्य मंदिरों के अलंकरण से भिन्न है। इसकी छत के निर्माण में एक के बाद दूसरा पत्थर इस प्रकार रखा गया है कि इसके बड़े वृत्त धीरे-धीरे छोटे होते गये हैं। अन्य मंदिरों की भांति इसमें छोटे वृतों का विभाजन नहीं हुआ है। यह मंदिर कुँवर मठ के नाम से प्रसिद्ध है। गर्भगृह के मुख्य द्वार पर ब्रह्मा तथा विष्णु के बीच भगवान् शिव की प्रतिमा है। जनरल कनिंघम की धारणा है कि संभवतः इस मंदिर का निर्माण किसी चन्देल वंशीय कुमार ने किया था, जिससे यह कुँवर मठ के नाम से प्रसिद्ध है। राजगीर के चिह्मों से प्रतीत होता है कि इसका निर्माण १०वीं अथवा ११वीं शताब्दी में हुआ था। इस मंदिर की गणना खजुराहो के सर्वोत्तम मंदिरों में होती हैं।

८. जतकरी का शिव मंदिर

खजुराहो से १ मील दूर एक शिव मंदिर का भग्नावशेष है। इस मंदिर के अंदर संगमरमर का शिवलिंगम् विद्यमान है। जीर्ण-शीर्ण अवस्था में होने के कारण मंदिर के अन्य विवरण उपलब्ध नहीं हैं।

९. महोबा का ककरामठ अथवा ककरा मंदिर

मदनसागर के उत्तरी-पश्चिमी तट पर यह मंदिर एक शिला पर स्थित है। यह १०३ फीट लम्बा तथा ४२ फीट चौड़ा है। यह सख्त पत्थर से बना है अतः खजुराहो के अन्य मंदिरों की भाँति इसमें सजावट नहीं है। इसमें ५ भाग थे, किन्तु इसका महामंडप ाजुराहो के अन्य मंदिरों से बड़ा है। गर्भगृह के बाहर की ओर मूर्तियों को रखने के लिए तीन स्थान बने हुए हैं, किन्तु अब उन स्थानों में वे मूर्तियाँ प्राप्त नहीं 
हैं।

१०. दौनी का शिवमंदिर

इस मंदिर का ध्वंसावशेष मात्र है। इसका शिवलिंगम् भी अपने मूल स्थान से किंचित् हटा हुआ है। इसमें ५ भाग हैं, पर इसकी छत खजुराहो के मंदिरों की भाँति नहीं है। इसके मेहराब के ऊपर लम्बी शिलायें रखी हुई हैं, जिनमें किसी प्रकार की सजावट नहीं है। इसके स्तम्भ लगभग सादे हैं किन्तु बीच के खम्भे चार-चार मूर्तियों से अलंकृत हैं।

विष्णु मंदिर

चन्देल राज्यकाल में वैष्णव धर्म का भी बड़ा प्रचार था, किन्तु विष्णु की पूजा के साथ-ही-साथ उसके अवतारों की पूजा का भी प्रचार हो चुका था। अतः चन्देलकालीन मन्दिरों में विष्णु तथा उनके अवतार, दोनों के मंदिर पाये जाते हैं। कुछ विशिष्ट विष्णु मंदिरों का उल्लेख नीचे किया जाता है।

१. देवी जगदम्बी मंदिर

वास्तव में यह एक विष्णु मंदिर है, क्योंकि इसके गर्भगृह के मुख्य द्वार पर विष्णु की मूर्ति प्रतिष्ठित है, और उसके दाहिने ओर शिव तथा बाईं ओर ब्रह्मा की मूर्ति है। गर्भगृह के अन्दर भगवती लक्ष्मी की ५ फीट ८ इंच ऊंची विशाल मूर्ति भी है और संभवतः इसी कारण यह देवी जगदम्बी का मंदिर कहलाता है। इसमें चार भाग हैं, अर्द्ध मण्डप इस मंदिर में नहीं है। कन्दरीय मन्दिर की भाँति गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणापथ भी इसमें नहीं है। यह मंदिर ७७ फीट लम्बा तथा ४९ फीट चौड़ा है। यह बहुत अधिक अलंकृत है। राजगीर के चिह्मों से यह अनुमान किया जाता है कि इसका निर्माण १०वीं शताब्दी अथवा ११वीं शताब्दी में हुआ था।

२. खजुराहो का चतुर्भुज मंदिर

यह रामचन्द्र अथवा लक्ष्मण जी के मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है, किन्तु वास्तव में इसे चतुर्भुज मंदिर ही कहना अधिक उपर्युक्त है, क्योंकि इसमें भगवान् विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति है। यह पच्चासी फीट चार इंच लम्बा तथा चौबालीस फीट चौड़ा है। खजुराहो के विश्वनाथ मंदिर की भांति इसमें पांच भाग हैं और इससे सम्बद्ध पांच उपमंदिर हैं। चार मंदिर इसके चारों कोनों में तथा पांचवां मन्दिर मुख्य द्वार के सामने स्थित है। यह मंदिर उत्कीर्ण मूर्तियों से बहुत अलंकृत है और इसमें चार फीट एक इंच ऊंची मूर्ति है। यह मूर्ति चतुर्भुजी है, उसके तीन सिर हैं। बीच का सिर मनुष्य का है, और शेष दो सिर सिंह के हैं। कुटिल अक्षरों में राजगीर के चिह्मों से ज्ञात होता है कि इसका निर्माण १०वीं अथवा ११वीं शताब्दी में हुआ था। चारों कोनों के मंदिरों का "विष्णु-मंदिर' रुप है। उनके मुख्य द्वार पर विष्णु की प्रतिमाएँ हैं। प्रत्येक मंदिर अठारह फीट लम्बा तथा ११ फीट चौड़ा है। प्रत्येक मंदिर के सामने दो खम्भों वाला एक-एक छोटा बरामदा है।

३. खजुराहो का वाराह मंदिर

यह चतुर्भुज मंदिर के पूर्व की ओर स्थित है। और इसमें भगवान् विष्णु के वाराह अवतार की एक विशाल मूर्ति है। यह एक छोटा मंदिर है। इसकी लम्बाई साढ़े बीस फीट है तथा चौड़ाई १६ फीट है। इसके प्रत्येक कोने में तीन-तीन स्तम्भ तथा पश्चिम की ओर दो स्तम्भ हैं, जिसके आश्रय से एक बरामदा तथा एक रास्ता बना हुआ है। इसकी छत एक के बाद दूसरे वर्गाकार पत्थर रखकर बनाई गई है। वाराह मूर्ति ८ फीट ९ इंच लम्बी तथा ५ फीट ६ इंच ऊंची है। इसमें खड़े हुए वाराह की मूर्ति है, जिसके दो पैर मूर्ति की पीठिका पर दिखलाये गये हैं। वाराह की मूर्ति के नीचे कुंडली बांधे हुए सपं की मूर्ति है, जिसकी पूंछ पर वाराह की पूंछ रखी हुई है और उसका सिर किसी बैठे हुए व्यक्ति द्वारा दब-सा गया है।

४. खजुराहो का वामन मंदिर

यह मंदिर खजुराहो ग्राम के उत्तरी किनारे पर स्थित है और यह ६० फीट लम्बा तथा ३८ फीट चौड़ा है। इस मंदिर की वाराह मूर्ति ४ फीट ८ इंच ऊंची है। खजुराहो के मन्दिरों के पश्चिमी मंदिर समूह की तुलना में इस मंदिर की अलंकारिता साधारण है और इसमें उत्कीर्ण मूर्तियाँ भी कम हैं। कुटिल वर्णों में कारीगरी के चिह्मों से इस मंदिर का निर्माण काल १०वीं अथवा ११वीं शताब्दी निश्चित किया जाता है।

५. खजुराहो का जबरा मंदिर

यह मंदिर खजुराहो के पूर्वी किनारे पर एक टीले पर बना हुआ है। यह ३८ फीट लम्बा तथा २६ फीट चौड़ा है। इसे ठाकुर जी तथा लक्ष्मण जी के मंदिर के नाम से पुकारा जाता है। जनरल कनिंघम का विचार है कि जब भूमि में स्थित होने के कारण यह जबरा मंदिर कहलाता है। इस मंदिर में खड़े हुए भगवान् विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति है। इस मंदिर में बहुत थोड़ा अलंकरण है।

६. खजुराहो का ब्रह्मा अथवा गदाधर मंदिर

यह खजूरसागर के पूर्वी किनारे में स्थित एक छोटा सूची स्तम्भाकार मंदिर है। मंदिर में चतुर्मुखी मूर्ति प्रतिष्ठित होने के कारण यह ब्रह्मा के मंदिर के नाम से प्रसिद्ध है। जनरल कनिंघम का विचार है कि यह विष्णु का मंदिर है, क्योंकि गदाधर की मूर्ति मुख्य द्वार के मध्य में स्थित है। यह मंदिर १९ वर्ग फीट है और अन्दर से इसका विस्तार १० वर्ग फीट है। इसकी छत सूची स्तंभाकार है जिस पर गुम्बज बने हुए हैं। यह मंदिर कड़ी चट्टानों तथा बालुका प्रस्तर से बनी है और पश्चिमी खजुराहो के मंदिरों से अलंकरण में भिन्न हैं। अत- जनरल कनिंघम का अनुमान है कि यह प्राचीन मंदिर है और इसका निर्माण ८वीं तथा नवीं शताब्दी में हुआ था।

७. खजुराहो का लक्ष्मीनाथ मंदिर

यह ८३ फीट लम्बा तथा ४५ फीट चौड़ा है और इसकी शैली प्राचीन चन्देल मंदिरों की भांति है। इस मंदिर में बड़ी अच्छी सजावट है और इसमें विक्रमाब्द १०११ अथवा सन् ९५४ ई. का बंगदेव का शिलालेख है।

८. जतकरी का चतुर्भुज मंदिर

जतकरी ग्राम खजुराहो से लगभग १ मील दूर है और वहीं पर यह मंदिर ध्वंसावशेष के रुप में स्थित है। यह ४० फीट लम्बा तथा २० फीट चौड़ा है। इसकी ऊंचाई ४४ फीट है। गर्भगृह के मध्य में विष्णु की मूर्ति है और उसके दोनों ओर ब्रह्मा तथा शिव की मूर्ति है। विष्णु की विशाल मूर्ति ९ फीट ऊंची है और उसका शिर नग्न है। मंदिर की छत तथा दीवारें अनेक मूर्तियां से अलंकृत है। जनश्रुति के आधार पर बनाकर सरदार आल्हा के भांजे सूजा ने इसका निर्माण किया था।

९. महोबा का मदारि मंदिर

यह महोबा के एक चट्टानी भाग पर स्थित है और अब यह भग्नावशेष मात्र है। यह १०७ फीट लम्बा तथा ७५ फीट 
चौड़ा है। यह मदारि कृष्ण के नाम से विख्यात है इसके पूर्वी द्वार के सामने एक अन्य मंदिर की नींव है जो १६ वर्ग फीट की है। कनिंघम का अनुमान है कि यह उपमंदिर वस्तुतः वाराह मंदिर था।

१०. गोंड का विष्णु मंदिर

यह ग्राम बाँदा जिले के अन्तर्गत कर्बी से तेरह मील दूर है। इस गांव में अनेक मंदिर हैं जो चन्देल मंदिर कहलाते हैं। ऐसा कहा जाता है कि उन मंदिरों को आल्हा-ऊदल तथा राजा परमाल ने बनवाया था। इनमें सबसे बडे मंदिर में अर्द्ध-मंडप तथा गर्भगृह हैं। इसका मुख्य द्वार पूर्व की ओर है। वस्तुतः यह विष्णु मंदिर है, क्योंकि इसके मुख्य द्वार पर विष्णु की मूर्ति प्रतिष्ठित है। इसी के निकट एक छोटा मंदिर है जो भगवती लक्ष्मी का है। मुख्य विष्णु मंदिर का शिखर अब भी सुरक्षित है, जिसमें केवल कलश मात्र शेष है। यह मुख्य मंदिर ५५ फीट लम्बा, ४८ फीट ९ इंच चौड़ा और ४० फीट ऊंचा है।

११. विलहरिया का विष्णु मंदिर

यह ग्राम बांदा जिले में रसिन ग्राम से दस मील दूर है। यह मंदिर एक छोटी पहाड़ी पर बना हुआ है जो लगभग ७० फीट ऊंची है। यह एक छोटा मंदिर है किन्तु इसका अलंकरण बहुत सुन्दर है। इस मंदिर की उत्तम स्थिति ने इसे बड़ा आकर्षक बना दिया है इसमें केवल गर्भगृह हैं और उसके सामने ९ वर्ग फीट का बरामदा है। गर्भगृह बाहर से ११ फीट लम्बा तथा ४ फीट चौड़ा है। उसका शिखर अब भी मौजूद है, किन्तु उसका ऊपरी भाग नष्ट हो गया है। यह विष्णु मंदिर है। मंदिर के मुख्य द्वार में विष्णु की मूर्ति है और दाहिने तथा बाईं ओर क्रमशः ब्रह्मा तथा शिव की मूर्तियाँ हैं।

इन मंदिरों के अतिरिक्त और भी अनेक विष्णु मंदिर हैं, जिनके ध्वंसावशेष मात्र रह गये हैं। यह भग्नावशेष अजयगढ़, बिलहरिया, चांदपुर, दुघई तथा मदनपुर आदि स्थानों में पाये जाते हैं।

ब्रह्मा मंदिर

चन्देल काल में ब्रह्मा की पूजा का अधिक प्रचार न था और इसी कारण ब्रह्मा के मंदिरों की संख्या भी कम है। फिर भी कुछ उल्लेखनीय मंदिरों का विवरण नीचे दिया जाता है।

१. खजुराहो का ब्रह्मा मंदिर

यह खजुराहो का एक पुराना मंदिर है और यह एक झील के किनारे पर स्थित है। यह वर्गाकार छोटा मंदिर लाल पत्थर की कड़ी चट्टानों से बना है। जीर्ण-शीर्ण होने के कारण इस मन्दिर के अन्य विवरण संभव नहीं है।

२. दुघई का ब्रह्मा मंदिर

यह मन्दिर अन्य चन्देल मंदिरों की भांति है। इसमें सिंहद्वार, अर्द्धमंडप, महामंडप, अन्तराल, गर्भगृह आदि है। यह ४२ फीट लम्बा तथा २५ फीट चौड़ा है। इसका अलंकरण सुन्दर है। प्रत्येक मेहराब अनेक प्रकार की सुन्दर खुदाई से युक्त है तथा छत अनेक प्रकार के षट्कोणों से अलंकृत है। महामंडप के बीच के चारों स्तम्भ बहुत ही सुन्दर हैं, किन्तु वे एक छोटे मंदिर के लिए ऊंचाई में बहुत बड़े हैं फिर भी मंदिर सर्वांगीण सुन्दर हैं। गर्भगृह के मुख्यद्वार के मध्य में दाढ़ी युक्त त्रिशिर भगवान् ब्रह्मा की मूर्ति है और उसके साथ हंस की भी मूर्ति है। यह मूर्ति नवगृह के ऊपर है, चार गृह एक ओर तथा पांच गृह दूसरी ओर हैं। इस मंदिर में प्राप्त लेखों से ज्ञात होता है कि यशोवर्मन के पौत्र तथा कृष्ण के पुत्र देवलब्धि ने इस मंदिर का निर्माण किया था।

शाक्त मंदिर

ब्राह्मण धर्म में त्रिदेवों की पूजा के अतिरिक्त उनकी शक्तियों की भी उपासना होती थी, अतः उनके भी मंदिरों का निर्माण हुआ। इसके अतिरिक्त कुछ अन्य देवी-देवताओं की भी पूजा होती थी, जिनके मंदिरों का भी निर्माण उस युग में हुआ।

१. खजुराहो का पार्वती मंदिर

यह विश्वनाथ मंदिर के दक्षिण की ओर स्थित है। यह एक छोटा मंदिर है और अब ध्वंसावशेष मात्र रह गया है। मंदिर के अन्दर ५ फीट ऊंची खड़ी हुई चतुर्भुजी देवी की मूर्ति है। यह पार्वती की मूर्ति कही जाती है किन्तु कनिंघम का अनुमान है कि लक्ष्मी की मूर्ति है, क्योंकि इस मूर्ति के शिर के ऊपर विष्णु की एक छोटी मूर्ति है।

२. खजुराहो का लक्ष्मी देवी मंदिर

खजुराहो में वाराह मंदिर के निकट स्थित एक छोटा मन्दिर है। इसमें चतुर्भुजी देवी की मूर्ति है। गर्भगृह के मुख्यद्वार के ऊपर विष्णु की मूर्ति है और उसके दाहिनी तथा बाईं ओर शिव और ब्रह्मा की मूर्ति है।

३. खजुराहो का देवी जगदम्बी मंदिर

यह एक बड़ा मंदिर है इसकी लंबाई ७७ फीट तथा चौड़ाई ४९ फीट है। मंदिर के अंदर हाथ में कमल लिये हुए, ५ फीट ८ इंच ऊंची खड़ी हुई चतुर्भुजी देवी की मूर्ति है। इस मंदिर में चार भाग हैं और इसकी पच्चीकारी बड़ी सुन्दर है। कनिंघम का अनुमान है कि यह विष्णु मंदिर है, क्योंकि गर्भगृह के मुख्यद्वार के मध्य में विष्णु की मूर्ति है और उसके दाहिनी और बाईं ओर शिव तथा ब्रह्मा की मूर्तियाँ हैं।

४. खजुराहो का दुर्गा मंदिर

वास्तव में यह एक शिव मंदिर था, क्योंकि गर्भगृह के मुख्य द्वार पर शिव की मूर्ति प्रतिष्ठित है। मंदिर के अन्दर त्रिशूल तथा खप्पर लिए हुए अष्टभुजी दुर्गा की मूति है।

५. चौंसठ-योगिनी मंदिर

खजुराहो का यह प्राचीन मन्दिर है। यह शिवसागर के दक्षिण-पश्चिम २५ फीट ऊंची चट्टान पर स्थित है। यह मंदिर कड़ी चट्टानों के पत्थर से बना है और अब ध्वंसावशेष मात्र रह गया है। इसकी चहारदीवारी में मूर्तियों को रखने के लिए ६४ छोटी-छोटी कोठरियाँ बनी हुई हैं। इसका सहन आयताकार है और इसकी लम्बाई १०२ फीट तथा चौड़ाई ५९ फीट है। इसमें ६४ कोठरियां चारों दीवारों पर बनी हुई हैं। पिछली दीवार के मध्य में एक बड़ी कोठरी है। प्रत्येक कोठरी २ फीट ४ इंच चौड़ी तथा ३ फीट ९ इंच गहरी है। इनका प्रवेशद्वार ३२ इंच ऊंचा तथा १६ इंच चौड़ा था और इसमें लकड़ी के दरवाजे थे जिनके अब चिह्म मात्र रह गये हैं प्रत्येक कोठरी की छत सूची स्तम्भाकार है जो ऊपर को संकरी होती चली गई है और उसके बाद एक के बाद दूसरे ३ आमलक तथा उसके ऊपर शिखर है। इस प्रकार प्रत्येक कोठरी की अपनी मंदिर रुपी सत्ता है। प्रत्येक मंदिर में एक योगिनी की मूर्ति थी। अब अधिकांश मूर्तियाँ उपलब्ध नहीं हैं। जनरल कनिंघम को सन् १८८३-८४ ई. की अध्ययन यात्रा में केवल तीन मूर्तियां प्राप्त हुई थीं, जिनमें सबसे बड़ी मूर्ति ३ फीट ऊंची और शेष दो में से प्रत्येक २ पीट ३ इंच ऊंची थी। बड़ी मूर्ति की आठ भुजायें थीं और भैंसासुरी देवी की मूर्ति थी, जो महिषासुर का वध करते हुए दिखलाई गई थी। मूर्ति के पाद पीठ के लेख की लिपि एवं जिस सामग्री से मंदिर का निर्माण हुआ है उसके विवेचन से स्पष्ट है कि यह खजुराहो का सबसे प्राचीन मंदिर है। जनरल कनिंघम का अनुमान है कि चौंसठ योगिनी मंदिर का निर्माण चन्देल-राज्य की स्थापना के समय अथवा नवीं शताब्दी के प्रारम्भ में हुआ था।

६. मनिया देवी का मंदिर

मनिया देवी चन्देलों की कुल देवी थीं। कनिंघम का अनुमान है कि मनिया देवी में भगवती पार्वती तथा गोडों में पूजित नग्नदेवी का सम्मिश्रण है। यह मंदिर केन नदी के तट पर स्थित मनिया गढ़ में ध्वंसावशेष के रुप में विद्यमान है। यह एक साधारण मंदिर है। इसमें खड्ग-धारिणी मनिया देवी की मूर्ति है। मंदिर के ध्वंसावशेष में बिना छत की कोठरी तथा अनेक मेहराब हैं। दौनी के जैन मंदिर की भांति इस मंदिर का गर्भगृह आयताकार है। मंदिर के निर्माण काल के सम्बन्ध में कोई साक्ष्य नहीं है। किन्तु यह सर्वमान्य है कि मनियादेवी चन्देलों की कुल देवी है। अस्तु, यह मन्दिर चन्देल-राज्य स्थापना के पूर्व अथवा उसी के आसपास बना होगा।

७. मैहर की शारदा देवी का मंदिर

यह मंदिर मैहर में एक छोटी पहाड़ी की चोटी पर स्थित है। इसकी दशा बड़ी जीर्ण है मुख्य मूर्ति एक छोटे टीले पर रक्खी हुई है और वहां तक पहुँचने के लिए सीढियां बनी हुई है। मंदिर के सहन में एक वृक्ष है, जिसके चारों ओर एक कच्ची दीवार है जिस पर अनेक टूटी-फूटी मूर्तियां रखी हुई हैं और सहस्रों यात्री उनकी पूजा करते हैं। मुख्य मूर्ति तक जानेवाली सीढियों के लिए पत्थर पर खजुराहो शिलालेख की भांति कुटिल लिपि में एक लेख है।

८. रसिन का चण्ड-माहेश्वरी मंदिर

रसिन से एक मील पूर्व जंगल में एक पहाड़ी की चोटी पर यह मंदिर स्थित है। इसका मंडप १८ फीट ८ इंच लम्बा तथा १७ फीट ७ इंच चौड़ा है। यह दो ओर से खुला हुआ है। सामने की ओर ९ फीट लम्बा तथा ६ फीट चौड़ा एक छोटा बरामदा है। इसका गर्भगृह आठ फीट लम्बा तथा ७ फीट चौड़ा है, जिसमें २ फीट ऊंची भगवती चण्ड-माहेश्वरी की चतुर्भुजी मूर्ति है। मंदिर के निकट ही एक तालाब है, जो चट्टान काटकर बनाया गया है। यह ८० फीट लम्बा तथा ५० फीट चौड़ा है।

सूर्योपासना

बुन्देलखण्ड में सूर्योपासना का अधिक प्रचार न था। अस्तु, वहाँ सूर्य मंदिरों का नितान्त अभाव है। केवल खजुराहो में एक उल्लेखनीय सूर्य मंदिर है।

खजुराहो का "छत्र को पत्र' मंदिर    यह मंदिर शिवसागर के पश्चिम में स्थित है और "छत्र को पत्र' नाम से प्रसिद्ध है। यह ८७ फीट लम्बा तथा ५८ फीट चौड़ा है। इसका मूल प्रवेश द्वार गिर गया था, किन्तु मोटे गारे से उसका जीर्णोद्धार किया गया है। इसके महामण्डप की बनावट अन्य मंदिरों से भिन्न है। इसके किनारों को काटकर बीच के चार खम्भों के चारों ओर कष्टकोण बनाए गए हैं। इन खम्भों को सजावट छेनी से की गयी है और ऐसा प्रतीत होता है कि यह सजावट कारीगर की इच्छानुकूल पूर्ण नहीं हो सकी। मदिर के बाहर नींव के ऊपर मूर्तियों की तीन पंक्तियां हैं।

यह सूर्य मंदिर है। गर्भगृह के मुख्यद्वार पर सूर्य की तीन मूर्तियां हैं। मंदिर के अन्दर ८ फीट ऊंचा एक विशाल मूर्तिपट है, जिसमें एक पुरुष के रुप में सूर्य की मूर्ति है। यह मूर्ति ५ फीट ऊंची है और उसके दोनों हाथों में कमल के पुष्प हैं। मूर्ति की पीठिका में उसके रथ के सप्ताश्वीं की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। इसके अतिरिक्त उसमें और भी छोटी-छोटी मूर्तियाँ हैं। जिनमें ब्रह्मा और सरस्वती, शिव और पार्वती तथा विष्णु और लक्ष्मी विशेष उल्लेखनीय हैं। राजगीर के चिह्मों तथा कुटिल वर्णों में यात्रियों के नामांकन से प्रतीत होता है कि इस मंदिर का निर्माण १०वीं अथवा ११वीं शताब्दी में हुआ था।

जैन -मंदिर

चन्देल-काल में हिन्दू-धर्म के बाद जैनमत का ही प्रबल प्रचार था। अस्तु, उस युग में वहां अनेक जैन मंदिरों का निर्माण हुआ, जो समस्त बुन्देलखण्ड में पाये जाते हैं, किन्तु खजुराहो में प्राप्त जैन मंदिर अधिक उल्लेखनीय है। अनेक विशाल मंदिरों को मुस्लिम विजेताओं ने मस्जिदों में परिवर्तित कर दिया था और अनेक मंदिर प्रकृति ने नष्ट कर दिये।

जैन मंदिर अपनी बनावट में ब्राह्मण मंदिरों से भिन्न हैं। जैन मंदिरों में गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणापथ होता है। उनमें मंडप अन्तराल तथा गर्भगृह सब एक ही नाप के होते हैं। साधारण बनावट में जैन मंदिर के प्रत्येक अष्टकोण स्तम्भों में तीन दीवारगीरें होती हैं। इस प्रकार सभी जैन तीथर्ंकरों की मूर्ति रखने के लिए २४ दीवारगीरों का विधान जैन मंदिरों में होता है।

१. खजुराहों का घंटई मंदिर

अब यह खुले हुए स्तम्भों का मन्दिर है जो ४२ फीट साढ़े दस इंच लम्बा तथा २१ फीच साढ़े छः इंच चौड़ा है। किन्तु मंदिर के चारों ओर दीवारों के चिह्म पाये जाते हैं। मुख्य द्वार के मध्य में एक चतुर्भुजी देवी की मूर्ति है और उसके दोनों ओर एक नग्नपुरुष की छोटी प्रतिमा है। मंदिर के अंदर की बनावट तथा वहाँ की मूर्तिकला के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि यह जैन मंदिर है। इसमें आठ अष्टकोण स्तम्भ हैं, जिनकी ऊंचाई १४ फीट ६ इंच है और उनकी सजावट बड़ी सुन्दर है।

२. खजुराहो का पार्श्वनाथ मंदिर

यह मंदिर बड़ी ही जीर्णशीर्ण अवस्था में है और मूल मंदिर का गर्भगृह मात्र शेष है। गर्भगृह के द्वार के बाईं ओर एक नग्न पुरुष की प्रतिमा तथा दाहिनी ओर एक नग्न नारी प्रतिमा है और मध्य में तीन बैठी हुई नारी मूर्तियां हैं। गर्भगृह के अन्दर २३वें तीथर्ंर पार्श्वनाथ #ी एक छोटी मूर्ति है। मंदिर का बाहरी भाग छोटी मूर्तियों की तीन पंक्तियों से अलंकृत है। यात्रियों के लेखों की लिपि से यह अनुमान है कि मूल मंदिर का निर्माण १०वीं तथा ११वीं शताब्दी में हुआ था।

३. खजुराहो का जिननाथ मंदिर

यह खजुराहो समूह के जैन मंदिरों में सर्वाधिक विशाल एवं सुन्दर मंदिर है। इसकी लम्बाई ६० फीट तथा चौड़ाई ३० 
फीट है। सम्पूर्ण मंदिर का निर्माण विचित्र एवं आकर्षक है। मंदिर के भीतरी भाग में तीन कमरे, मंडप, अन्तराल तथा गर्भगृह हैं और इन तीनों के चारों ओर प्रदक्षिणा मार्ग है। मंदिर का बाहरी भाग अनेक उभरी हुई मूर्तियों से सुशोभित है और उसमें घंटई मंदिर की भाँति मूर्तियों की तीन पंक्तियाँ हैं। गर्भगृह के मुख्यद्वार पर एक बैठी हुई नग्नमूर्ति है और इसके दोनों ओर खड़ी हुई दो नग्न मूर्तियाँ हैं। इस मदिर के निर्माण काल का कोई अभिलेख नहीं है। किन्तु, विक्रमाब्द ११०१ अथवा सन् ९५४ ई. के पहिले के लेख से--जिसमें उसके दान में दिए हुए अनेक उद्यानों का विवरण है--स्पष्ट है कि इस मंदिर का निर्माण सन् ९५४ के पूर्व हुआ था।

४. खजुराहो का सेतनाथ मंदिर

यह एक प्राचीन जैन मंदिर है, जिसका हाल ही में जीर्णोद्धार हुआ है। इस मंदिर की मुख्य प्रतिमा आदिनाथ की है, जो १४ फीट ऊंची है। यह विशाल मूर्ति सेतनाथ के नाम से विख्यात है। इस मूर्ति की पीठिका में विक्रमाब्द १०५५ अथवा सन् १०२८ ई. का अभलेख है।

५. खजुराहो का आदिनाथ मंदिर

यह एक छोटा प्रचीन मंदिर है, जो आदिनाथ मंदिर कहलाता है। मंदिर के बाहर की ओर मूर्तियों की केवल एक पंक्ति है, जिनमें कुछ नारी प्रतिमाएँ भी हैं। इस मंदिर का अलंकरण बहुत साधारण है।

६. दौनी का जैन मंदिर

बाहर से यह मंदिर आयताकार है और इसमें केवल मंडप तथा गर्भगृह है। मंदिर के अंदर शान्तिनाथ की मूर्ति है, जिसकी पीठिका में एक तिथियुक्त लेख है। इससे ज्ञात होता है कि यह मन्दिर १३वीं शताब्दी में बना था। इसका गर्भगृह छिन्न-भिन्न हो चुका है और मुख्य मूर्ति के दोनों ओर अन्य मूर्तियाँ भी हैं।

७. दुधई का जैन मंदिर

इस मंदिर की निर्माण कला बड़ी विचित्र है। देखने में यह गुणा चिह्म (न्) की भाँति है, जिसकी दो भुजाएँ मध्य में मिलती हैं। मध्य भाग में दो कमरे हैं जो एक दरवाजे से संयुक्त हैं। इस कारण इसमें पीछे वाली दीवार नहीं है, जहां मूर्ति रखी जा सके। इस मंदिर की लम्बाई ५२ फीट तथा चौड़ाई ३० फीट है। ऊंचाई इसकी लम्बाई से भी अधिक है।

८. कुण्डलपुर का नेमिनाथ मंदिर

हाटा के निकट ही कुण्डलपुर जैनियों का एक तीर्थ स्थान है। वहां बहोरी वन में एक पहाड़ी की चोटी पर कुछ जैन मंदिर हैं। मुख्यमंदिर में नेमिनाथ की एक विशाल मूर्ति है, मंदिर में पहुँचने के लिए सीढियां बनी हुई हैं। यह मंदिर बटियों के पत्थर तथा गारे से बना हुआ है। मोटी पुताई के कारण दीवारों पर उत्कीर्ण मूर्तियों के सम्बन्ध में कोई प्रकाश नहीं पड़ता है।

९. मदनपुर का जैन मंदिर

मदनपुर में तीन प्राचीन मंदिर हैं जो छिन्न-भिन्न दशा में हैं। इसमें मुख्य जैनमंदिर ३० फीट ८ इंच लम्बा तथा १४ फीच २ इंच चौड़ा है। इसमें दो अन्तराल हैं। गर्भगृह अन्दर से ८ फीट लम्बा तथा ८ फीट चौड़ा है। उसमें एक नग्नमूर्ति है और उसकी पीठिका में विक्रमाब्द १२१२ अथवा सन् ११५५ ई. का एक लेख है। निकट ही एक अन्य जैन मंदिर है, जिसमें पांच जैन मूर्तियां हैं और उनमें से तीन मूर्तियाँ क्रमश- आदिनाथ, तारा तथा शंभुनाथ की हैं।

१०. चांदपुर का जैन मंदिर

चांदपुर में भी अनेक जैन मंदिरों के चिह्म पाये जाते हैं किन्तु वे सभी अब नष्ट हो चुके हैं। एक छोटे कमरे में एक विशाल नग्न मूर्ति रखी है और उसकी चहारदीवारी में असंख्य जैन मूर्तियाँ हैं।

नागरिक स्थापत्यकला

चन्देलों ने पूर्णवैभव के साथ चिरकाल तक राज्य किया। उन्होंने अनेक आततायी शत्रुओं का दमन कर शांति एवं सुव्यवस्था स्थापित की। विदेशी आक्रमणों तथा आन्तरिक उपद्रवों के समय राष्ट्र की समग्र शक्तियाँ दुर्गों के निर्माण तथा उनके जीणोद्धार में लगी थीं, किन्तु जब देश में शांति तथा सुव्यवस्था का राज्य था उस समय राष्ट्र का धन तथा ध्यान मन्दिर तथा 
भवनों के निर्माण की ओर उन्मुख हुआ। तत्कालीन मध्य युग में धार्मिकता अपनी चरमसीमा पर थी और लोग धर्म को तर्क से अधिक श्रेयस्कर समझते थे। तत्कालीन दृष्टिकोण पत्थर में मूर्तिमान हो उठा। फलतः विभिन्न मतों के विशाल मंदिर अपनी विविधताओं के साथ सर्वत्र ही बहुतायत से पाये जाते हैं। परन्तु राजप्रासादों तथा अन्य भवनों की भी कमी नहीं है। चन्देल नरेश अनेक प्रकार की सुख-सुविधाओं से युक्त सुन्दर प्रासादों में निवास करते थे। उस समय प्रासादों को बैठक भी कहते थ्ज्ञे। अनेक प्रासादों के चिह्म आज भी पाये जाते हैं। अनेक प्रासाद प्रकृति के थपेडों को सह न पाने से विलीन हो गये। कुछ प्रासादों को मुस्लिम विजेताओं ने नष्ट-भ्रष्ट कर दिया और कुछ मस्जिद में परिवर्तित कर दिये गये। फिर भी जो प्रासाद बचे हैं, उनसे चन्देल नरेशों की रुचि तथा तत्कालीन कारीगरी के कौशल का बोध होता है। चन्देल-युग में अनेक तड़ागों का भी निर्माण हुआ और वे नागरिक वास्तुकला के मुख्य अंग हैं। इसके अतिरिक्त अनेक स्तम्भों का भी निर्माण हुआ। अस्तु, चन्देल नागरिक स्थापत्य-कला तीन भागों में विभक्त की जाती हैं- 

प्रासाद अथवा बैठक

चन्देल प्रासादों का निर्माण आयोजन साधारणतः एक ही प्रकार था। एक खुले आंगन के चारों ओर कमरे बने होते थे। उनमें खुले हुए स्तम्भ युक्त बरामदे भी होते थे। राज महिषियों के एकान्त के विचार से लकड़ी अथवा कपड़े के पर्दे का प्रबन्ध किया जाता था, जिसके चिह्म अब परिलक्षित नहीं होते हैं।

१. महोबा का राजप्रसाद

महोबा परवर्ती चन्देल नरेशों की राजधानी थी। अस्तु, वहां मन्दिरों तथा भवनों का बाहुल्य था, किन्तु प्रकृति के प्रतिरोध में न ठहर सकने के कारण परमर्दिदेव के पूर्व की कोई भी इमारत उपलब्ध नहीं है। महोबे में एक प्रासाद था, जिसे मुस्लिम विजेताओं का कोपभाजन बनना पड़ा। कहा जाता है कि यह परमर्दिदेव का राज प्रासाद था। यह दुर्ग की पहाड़ी पर स्थित है और अब उसका भग्नावशेष मात्र रह गया है। इसमें केवल एक बारादरी है जो ८० फीट लम्बी तथा २५ फीट चौड़ी है। बाद में यह मस्जिद में परिवर्तित कर दिया गया था। उसके खम्भे अब भी सुरक्षित हैं। ये पत्थर से काटकर बनाये गये हैं और इनकी ऊंचाई १२ फीट है। ये अनेक मूर्तियों तथा ज्यामितीय चित्रों से अलंकृत हैं। भवन की लम्बाई में इस प्रकार के स्तम्भों की ८ पंक्तियां तथा चौड़ाई में तीन पंक्तियां हैं। उनसे मस्जिद के अग्रभाग के सात दरवाजों का निर्माण होता है।

२. जबलपुर का मदन महल

यह चन्देल नरेश मदनवर्मन का राजप्रसाद कहा जाता है, किन्तु यह अत्यन्त साधारण भवन है। यह एक बड़ी गोल चट्टान पर बना हुआ है। इसमें अनेक छोटे-छोटे कमरे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि इस भवन में दो खण्ड थे। इसमें एक आंगन था और उसके चारों ओर साधरण कमरे थे। अब आंगन के केवल दो ओर कमरे बचे हैं। छत की छपाई उत्तर है और उसमें सुन्दर चित्रकारी है। यह छत फलक युक्त वर्गाकार स्तम्भों पर आश्रित है।

३. गढ़कोट महल

गढ़कोट नामक दुर्ग में यह महल जीर्ण-शीर्ण दशा में स्थित है। महल में जाने का मार्ग लम्बा, संकरा तथा वक्र है। अस्तु, आक्रमण आदि के समय सुरक्षा के विचार से इसकी स्थिति बड़ी उत्तम है। यह महल किले की उच्चतम भूमि पर बना है। महल की दो चहारदीवारें ईंट तथा पत्थर की बनी है और शेष दो ओर सोन तथा उसकी सहायक नदियाँ उसकी सुरक्षा करती है।

४. हाटा के दो बाराखम्भा महल

ये दोनों महल प्राचीन है। हिन्दू तथा मुसलमान दोनों इस पर अपना स्वत्व प्रकट करते हैं। इसके कमरे अब छत विहीन हैं और केवल स्तम्भ मात्र शेष है। स्तम्भ अपने मूल-स्थान पर ही प्रतीत होते हैं। खम्भे तथा उनके फलक सुरक्षित हैं। सूक्ष्म निरीक्षण से प्रतीत होता है कि सभी स्तम्भों के फलक समान माप के नहीं हैं।

५. मदनपुर बारादरी

मदनपुर नगर की सबसे अधिक महत्वपूर्ण इमारत यह बारादरी है। इसमें पृथ्वीराज चौहान का शिलालेख है जिसमें उसकी विजय तथा परमर्दिदेव की पराजय का उल्लेख है। यह एक छोटी तथा खुली हुई बारादरी है, जिसमें छह स्तम्भ हैं।

६. हाटा का महल

यह महल हाटा दुर्ग के अन्दर है।। इसमें पत्थर के वर्गाकार ऊंचे स्तम्भ हैं, जो अलंकृत नहीं हैं। इन स्तम्भों पर मेहराव बना हुआ है और इसके खुले हुए आँगन के चारों ओर कमरे हैं।

७. चिल्ला का महल

यमुना के दाहिने किनारे में इलाहाबाद से १० मील पश्चिम चिल्ला एक छोटा-सा गांव है। यहां बनाफर सरदार आल्हा-ऊदल के महल थे।। यह महल एक सुरक्षित चहारदीवारी में है, जिसको कोट कहते हैं। इस कोट की दीवार मिट्टी की बनी हुई है पर बाहर तथा अन्दर की दीवार का अग्रभाग पत्थर से बना हुआ है। इस कोट के चोरों कोनों पर बुर्ज बने हुए हैं। यह महल ४६ वर्ग फीट है और इसकी प्रत्येक भुजा स्तम्भों तथा दीवारों से विभक्त है। दोनों ओर पांच-पांच पंक्तियाँ होने के कारण उसमें पच्चीस खुले स्थान हैं। उत्तर की ओर मुख्यद्वार हैं, जिसके दोनों ओर पत्थर की एक-एक बैठक बनी हुई है और उनमें छोटे-छोटे स्तम्भों पर आश्रित नीची छतें हैं। मध्य में एक खुला हुआ आंगन है और उसके चोरों ओर कमरे हैं। प्रत्येक ओरपांच कमरे हैं, जिनके दरवाजे अलग-अलग हैं। कमरों को प्रकाशित करने के लिए दीपदान बने हुए हैं, जिनमें से प्रत्येक ८ फीट १० इंच ऊंचा है।
इसकी छत चौरस है। चार स्तम्भ छत के कुछ टूटे हुए भाग को संभाले हुए हैं। सभी दरवाजे, देहली तथा स्तम्भ थोड़े बहुत अलंकृत हैं। इस भवन का महत्व इसलिए है कि यह प्राचीन भारतीय साधारण भवन का एक उदाहरण है। विजेताओं की विध्वंसक नीति के कारण ऐसे भवन कम पाये जाते हैं।

चन्देल -स्तम्भ

देश के इतिहास में स्तम्भों का विशिष्ट स्थान होता है और इसी कारण उनकी रक्षा अतीत काल से होती चली आई है। मौर्य तथा गुप्त स्तम्भों की भाँति चन्देल स्तम्भों का बुन्देलखण्ड के इतिहास में बड़ा महत्व है उनका प्रयोग जय-स्तम्भ, तीर्थ स्तम्भ तथा सीमा द्योतक चिह्मों के रुप में होता था।

जय-स्तम्भ

जय स्तम्भों की स्थापना विजेताओं की कृतिओं को अमरत्व प्रदान करने की दृष्टि से होती है यद्यपि इस प्रकार के अधिकांश चन्देल स्तम्भ अब सुरक्षित नहीं हैं, फिर भी इस कोटि के प्राप्त एक स्तम्भ का निर्देश आवश्यक है।

१. अकोरी का जयस्तम्भ

अकोरी ग्राम उरई के निकट स्थित है। वहाँ पृथ्वीराज तथा परमर्दिदेव का भयंकर युद्ध हुआ था जनश्रुतियों के आधार पर ज्ञात होता है कि वहां पर एक जयखम्भा अथवा जयस्तम्भ था, किन्तु अब उस स्तम्भ के कोई चिह्म प्राप्त नहीं हैं। यह बतलाया जाता है कि इस जयस्तम्भ को पृथ्वीराज ने स्थापित किया था। अब उसके स्थान पर एक नीम का वृक्ष है, जिसे यात्री लोग अपनी पूजा समर्पित करते हैं।

तीर्थ-स्तम्भ

ये स्तम्भ किसी तीर्थ अथवा मंदिर आदि के सूचक होते हैं और ये बहुतायत से पाये जाते हैं। बुन्देलखण्ड में अनेक झील तथा तालाब हैं और प्रत्येक नवनिर्मित तड़ाग के पास स्तम्भ स्थापित करने की प्रथा थी। इनमें से अधिकांश स्तम्भ अब नष्टप्राय हैं, लेकिन थोड़े-से स्तम्भ अपने मूल स्थान में अब भी स्थित हैं।

१. महोबा का दिया अथवा दीवट

झील के उत्तरी किनारे पर स्थित मनियादेवी मंदिर के सामने एक पाषाण स्तम्भ है। यह दिया अथवा दीवट इसलिए कहा जाता है कि निर्धारित तिथियों में इसकी चोटी पर दीपक रखने की प्रथा है, किन्तु यह इस स्तम्भ का मूल उद्देश्य नहीं प्रतीत होता, क्योंकि इसमें दीपक रखने का एक भी स्थान नहीं है। यह स्तम्भ १८ फीट ऊंचा तथा आधार १ वर्ग फीट है। इसका मध्यभाग अष्टकोण है, किन्तु ऊपर जाकर यह गोल हो गया है। स्तम्भ का आधार तथा मध्यभाग बिल्कुल सादा है, किन्तु ऊपरी भाग बहुत अलंकृत है। इसके फलक के नीचे चार सिंहों के शिरों में बंधी हुई चार घंटियां उत्कीर्ण हैं। स्तम्भों के ऊपर चौड़ा तथा उठा हुआ चारस फलक है।

२. चांदपुर का गज-स्तम्भ

चांदपुर दुबई के सात मील उत्तर-पश्चिम में स्थित है। यह स्तम्भ ब्रह्मानन्द मण्डप नामक शिव मंदिर के सम्मुख स्थित है। आधार पर यह १ फीट ८ वर्ग इंच है। ऊपर ३ फीट की ऊंचाई पर यह अष्टकोण में परिवर्तित हो जाता है और फिर ३ फीट की ऊंचाई पर षट्कोण हो जाता है और पुनः तीन फीट की ऊंच�ब्र्ऱ्ह पर गोल हो जाता है। स्तम्भ की पूरी लम्बाई १४ फीट है। यह गज स्तम्भ कहलाता है और यह बिल्कुल सादा है। आधार के समीप के एक वर्ग में इसके निर्माण कर्ता की प्रशस्ति है। लेख का प्रारम्भ ""ओम् नमः शिवाय ब्रह्माण्ड मंडप'' से होता है। इस लेख की लिपि से अनुमान यह है कि यह स्तम्भ ११वीं अथवा १२वीं शताब्दी में स्थापित किया गया था।

अन्य स्तम्भ

उपर्युक्त दो प्रकार के स्तम्भों के अतिरिक्त अन्य प्रकार के भी स्तम्भ पाये जाते हैं जिनका उद्देश्य भली भाँति ज्ञात नहीं होता है। सम्भवतः उनका उपयोग सीमा द्योतक चिह्मों तथा अन्य इसी प्रकार के कार्यों के लिए होता था।

१. आल्हा की गिल्ली

महोबा का दक्षिणी-पूर्वी भाग दरीबा कहलाता है। वहीं एक स्तम्भ है जो ""आल्हा की लाट'' अथवा ""आल्हा की गिल्ली'' कहलाता है। यह लाट अथवा गिल्ली ९ फीट ऊंची तथा इसका व्यास १३ इंच है। यह एक चट्टान में कटे हुएचौकोर छिद्र में इस प्रकार रक्खा हुआ है कि तनिक से स्पर्श मात्र से यह घूमने लगता है।
इस स्तम्भ के सम्बन्ध में एक किम्वदन्ती है। जिसके आधार पर कहा जाता है कि जब आल्हा आगरा अथवा मथुरा में गिल्ली खेल रहा था तब अपने डंडे से इतने जोर से मारा कि गिल्ली महोबे में उसके अकवाड़े में गिरी यह भी कहा जाता है कि जिस डंडे से आल्हा ने गिल्ली मारी वह इस स्तम्भ से कहीं बड़ा है, और वह आगरा अथवा मथुरा में है, किन्तु वहां इस डंडे अथवा स्तम्भ का कोई चिह्म नहीं है।

२. महोबे का चण्ड मतावर

यह स्तम्भ आल्हा की गिल्ली के निकट ही है। यह भूमि के अन्दर गड़ा हुआ है और दो वर्ग फीट है। इसमें एक अश्वारोही की मूर्ति है जो चंड मतावर कहलाता है। उसकी पूजा भी अब होती है, किन्तु इस स्तम्भ का उद्देश्य ज्ञात नहीं है।

चन्देल तड़ाग

बुन्देलखण्ड में अनेक तालाब और झील हैं और इनकी बहुलता का एक कारण भी है। यद्यपि बुन्देलखण्ड में अनेक छोटी नदियाँ हैं, पर वहाँ वर्षा की कमी होत है। अस्तु अनावृष्टि आदि उत्पातों से मुक्ति पाने के लिए चन्देल नरेशों ने अनेक तड़ागों का निर्माण किया। सौभाग्य से बुन्देलखण्ड एक पहाड़ी देश है और वहां तड़ाग निर्माण के सभ्ज्ञी साधन सुलभ हैं। अस्तु, प्रत्येक मंदिर के साथ एक तड़ाग का निर्माण उस युग में एक नियम-सा बन गया था, मानो दर्शनार्थियों को मंदिर प्रवेश के पूर्व पाद-प्रक्षालन के लिए ये निर्मित हुए हों। इस प्रकार का प्रबन्ध दक्षिण भारत के कुछ मंदिरों में है। मैदान तथा पहाड़ियों में समान रुप से बुन्देलखण्ड भर में तालाब पाये जाते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि चन्देलों के पास अनेक कुशल शिल्पी थे, जिनकी सेवाओं का उपयोग उन्होंने जिस क्षेत्र में भी चाहा, सफलतापूर्वक किया।

चन्देल तड़ागों की मुख्य विशेषता उनका मंदिरों से संयोजन था। इन तड़ागों में गढ़े हुए पत्थरों का उपयोग किया गया है। अधिकांश तड़ाग किसी-न-किसी देवी-देवताओं के नाम से प्रसिद्ध हैं, जैसे "शिवसागर', "रामसागर' आदि। किन्तु ऐसे भी तड़ाग हैं, जो अपने निर्माणकर्त्ता अथवा जिस स्थान में स्थित हैं, उसके नाम से प्रसिद्ध हैं। बुन्देलखण्ड में अनेक तड़ागों में से कुछ विशेष उल्लेखनीय तड़ागों का वर्णन नीचे दिया जा रहा है।

१. खजूर सागर

यह नैनोरी ताल के नाम से भी पुकारा जाता है। यह एक मील लम्बा और पौन मील चौड़ा है। यह खजुराहो के समीप स्थित है। गर्मियों में इसका क्षेत्रफल बहुत कम हो जाता है और यह अपने मूल क्षेत्रफल के केवल आधे में रह जाता है।

२. शिवसागर

यह उत्तर से दक्षिण तक लगभग पौन मील लम्बा और खजुराहो से लगभग पौन मील ही दूर है। गर्मियों में यह लगभग ६०० वर्ग फीट रह जाता है। खजुराहो के पश्चिमी समूह के हिन्दू मंदिर इसी के तट पर स्थित है।

३. मदन सागर

महोबा नगर के दक्षिण चन्देल नरेश मदनवर्मन द्वारा निर्मित "मदन सागर' स्थित है। यह लगभग ३ मील के घेरे में है। यह अपनी निर्माण कला के लिए प्रसिद्ध है। यह बुन्देलखण्ड का सर्वाधिक सुन्दर एवं विशिष्ट तड़ाग है। इसके पश्चिम में गोकर पहाड़ी है। दक्षिण-पूर्व की ओर तीन अन्य पहाड़ी श्रेणियां हैं। ये श्रेणियां मध्य झील में बाहर निकल आई है। इस झील का उत्तरी किनारा घाटों तथा मंदिरों से अलंकृत है। झील के मध्य में "ककरामढ़ा' नामक मंदिर है।

२. शिवसागर

यह उत्तर से दक्षिण लगभग पौन मील लम्बा और खजुराहो से लगभग पौन मील ही दूर है। गर्मियों में यह लगभग ६०० वर्ग फीट रह जाता है। खजुराहो के पश्चिमी समूह के हिन्दू मंदिर इसी के तट पर स्थित हैं।

३. मदन सागर

महोबा नगर के दक्षिण चन्देल नरेश मदनवर्मन द्वारा निर्मित "मदन सागर' स्थित है। यह लगभग ३ मील के घेरे में है। यह अपनी निर्माण कला के लिए प्रसिद्ध है। यह बुन्देलखण्ड का सर्वाधिक सुन्दर एवं विशिष्ट तड़ाग है। इसके पश्चिम में गोकर पहाड़ी है। दक्षिण-पूर्व की ओर तीन अन्य पहाड़ी श्रेणियाँ हैं। ये श्रेणियाँ मध्य झील में बाहर निकल आई हैं। इस झील का उत्तरी किनारा घाटों तथा मंदिरों से अलंकृत है। झील के मध्य में "ककरामढ़ा' नामक मंदिर है।

४. कीरत सागर

महोबा नगर के पश्चिम कीर्तिसागर है, इसे महाराज कीर्तिवर्मन ने बनवाया था। इसका घेरा लगभग डेढ़ मील है।

५. कल्याण सागर

महोबा के पूर्व एक छोटी झील है, जिसे राहिल सागर कहते हैं। इसकी निर्माण शैली साधारण है।

६. विजय सागर

यह कल्याण सागर के पूर्व में स्थित है और इसका निर्माण चन्देल नरेश विजयपाल ने करवाया था। इसका घेरा लगभग ४ मील है और यह महोबे की सबसे बड़ी झील है।

७. राहिल ताल

यह तालाब राहिल अथवा राहिल्य नगर में स्थित है। चन्देल नरेश राहिल्य वर्मन ने इस तालाब का निर्माण किया और उसने राहिल्य नगर भी बसाया था जो अब उजड़े हुए ग्राम के रुप में शेष रह गया है। चन्दबरदाई का कथन है कि इस तालाब का निर्माण बनाफर सदार आल्हा-ऊदल के पिता दशरथ अथवा दस्सराज ने किया था, किन्तु इस कथन की पुष्टि का कोई प्रमाण नहीं है।

८. रसिन का अधिक ताल

बांदा से २९ मील पूर्व एक छोटी पहाड़ी पर स्थित रसिन एक छोटा ग्राम है। वहां अनेक सुन्दर तालाब हैं। किम्बदन्ती के आधार पर वहां ८० तालाब थे। जनरल कनिंघम ने अपनी रिपोर्ट में १९ तालाबों की एक अपूर्ण सूची दी थी। उन सबमें "अधिक ताल' अति प्रसिद्ध है। इन तड़ागों के निर्माण कर्ता के सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं है, किन्तु निश्चय है कि चन्देल राज्य में रसिन एक महत्वपूर्ण स्थान था।

९. अजयगढ़ के तड़ाग

अजयगढ़ में भी अनेक तड़ाग हैं। इनमें सबसे बड़ा तालाब एक ठोस चट्टान काटकर बनाया गया है और वह टेढ़ा-मेढ़ा है। अनुमान यह है कि भवनों के निर्माण के लिए खोदकर पत्थर निकाले जाने से यह तालाब अपने आप बन गया था। यह तालाब कभी सूखता नहीं है और सदा १० फीट से अधिक पानी रहता है। इसके तटों पर अनेक क्षत-विक्षत मूर्तियां बिखरी पड़ी हैं।

१०. दुधई का रामसागर

यह एक बड़ी झील है जो लगभग एक मील लम्बी तथा आधा मील चौड़ी है। यह पूर्व की ओर डुंग्रिया झील तक फैली हुई है। यह एक कृत्रिम झील है और विशाल बांधों द्वारा बनाई गयी है। बाँध के नीचे एक कुआं है जिसमें से पानी निकलता है और यही कुआं झील के पानी का स्रोत है।

११. कलिं का स्वर्गारोहन ताल

यह तालाब कालिं के नीलकण्ठ मंदिर के मण्डप के बाहर स्थित है। वास्तव में यह एक कुण्ड है तो पहाड़ की चट्टान काटकर बनाया गया और स्वर्गारोहण के नाम से प्रसिद्ध है। कुण्ड के दाहिनी ओर काल भैरव की एक विशाल मूर्ति है। मूर्ति २४ फीट ऊंची है और उसके दोनों पैर पानी के अन्दर है। यह तालाब १७ फीट चौड़ा है। इसका वर्णन अबुल फ़ज़ल ने भी किया है। इसके अतिरिक्त वहां काली की भी एक मूर्ति है। जो लम्बी ४ फीट की है और पानी के अन्दर है। इस मूर्ति का केवल एक फुट हिस्सा पानी के बाहर है। पानी ऊपर से निकलकर इन मूर्तियों में गिरता है।

१२. पाताल गंगा

यह कालिं में एक चट्टान में कटा हुआ गहरा कूप है। इससे निरन्तर पानी निकलता रहता है और छत तथा चारों ओर की दीवारों में टकराता है।

१३. कालिं का पाण्डु कुण्ड

यह एक छिछला गोलाकार तालाब है, जिसका व्यास १३ फीट है। चट्टान की तिरछी सतह की दरारों से इसमें पानी आता है।

१४. कालिं का बूढ़ी अथवा बुढिया ताल

एक चट्टान की सतह में यह बावली के रुप में बना है और इसमें पहुंचने के लिए चारों ओर सीढियां बनी हुई हैं।

१५. कालिं की मृगधारा

कालिं दुर्ग की चहारदीवारी के अन्दर यह एक छोटा तालाब है। जिसमें पत्थर के मृग के मुँह से निरन्तर पानी निकलता रहता है।

१६. कालिं का कोट तीर्थ

यह एक बड़ा तालाब है जो लगभग १०० गज लम्बा है। इसमें पहुंचने के लिए अनेक घाट तथा सीढियां हैं यह तालाब कालिं दुर्ग के अन्दर स्थित है।

इन तालाबों के अतिरिक्त जयपुर, सिरवा, बरांव, मैहर, मऊ, कांच, कालिं तथा अन्य स्थानों में अनेक तालाब हैं।

सैनिक स्थापत्य कला 

चन्देलकालीन मूर्तिकला

जिस युग में चन्देल सत्ता का उत्थान तथा पतन हुआ, वह मध्यकालीन शौर्य तथा पराक्रम का युग था। उस युग में देश में अनेक छोटे-बड़े राज्य थे, जिनमें एक-दूसरे से बढ़ जाने की प्रतिद्वन्द्विता थी। उन दिनों विशाल एवं एकान्त दुर्गों का बड़ा महत्व था। उनमें किसी राज्य के बनाने तथा बिगाड़ने की सामर्थ्य थी। गुप्त तथा वर्द्धन नरेशों के बाद उत्तरी भारत में चन्देल अग्रणी बने, क्योंकि उनके पास कालिं सदृश अजेय दुर्ग थे, जिसकी ख्याति दूर-दूर फैली हुई थी। इसके अतिरिक्त चन्देलों के पास अन्य अनेक दुर्ग थे क्योंकि उनके राज्य की भौगोलिक स्थिति दुर्ग-निर्माण में सहायक थी। जनश्रुति के आधार पर चन्देलों के पास आठ प्रसिद्ध दुर्ग थे, किन्तु इनके अतिरिक्त और भी दुर्ग बुन्देलखण्ड में पाये जाते हैं। उनमें से कुछ सुरक्षित हैं, पर अधिकांश के भग्नावशेष मात्र हैं और जंगलों से भरे पड़े हैं, जिनमें पशु निवास करते हैं। कुछ प्रसिद्ध दुर्गों का विवरण नीचे दिया जाता है।

जनश्रुति के आधार पर चन्देलों के मुख्य दुर्ग वारीगढ़, कालिंजर, अजयगढ़, मनियागढ़, मुड़फा, कालपी तथा गढ़ा में थे। उनके अतिरिक्त देवगढ़, महोबा, रावतपुर तथा जैतपुर के भी दुर्ग उल्लेखनीय हैं।

१. कलिं दुर्ग

समस्त चन्देल दुर्गों में कालिंजर-दुर्ग का विशिष्ट स्थान है। मध्य युगीन-भारत में यह अद्वितीय माना जाता है। यह इलाहाबाद से ९० मील दक्षिण-पश्चिम एक पहाड़ी की चौरस चोटी पर है। यह दुर्ग आयताकार है और इसकी लम्बाई एक मील तथा चौड़ाई आधा मील है। किले के दो मुख्यद्वार हैं, उनमें से प्रधान द्वार नगर की ओर उत्तराभिमुख है। दूसरा द्वार दक्षिण-पूर्व के कोने में पन्ना की ओर है इनके अतिरिक्त इसमें सात द्वार और हैं:--

१. आदम अथवा आलमगीर अथवा सूर्यद्वार
२. गणेश द्वार
३. चाँदी अथवा चाँद बुर्ज द्वार अथवा स्वर्गारोहण द्वार
४. बुधभद्र द्वार
५. हनुमान द्वार
६. लाल दरवाजा
७. बड़ा दरवाजा

मूलतः इस दुर्ग में छह द्वार थे। बाद में आलगीर औरंगजेब के राजत्वकाल में "आलम-गीर दरवाजा' और जोड़ दिया गया था। इस दरवाजे में तीन पंक्तियों में फारसी का एक पद्यात्मक लेख है, जिसमें यह अंकित है कि इस द्वार का निर्माण राजकुमार मुराद ने सन् १०८४ हि. अथवा १६७३ में किया था।

सबसे निचले अथवा आलमगीर द्वार तक पहुंचने के लिये २०० फीट की चढ़ाई पार करनी पड़ती है। इसके बाद एक दुर्गम चढ़ाई है। उसको पार करने के उपरान्त द्वितीय द्वार अथवा गणेश द्वार मिलता है। कुछ और ऊपर चढ़ने पर सड़क के मोड़ पर चाँदी दरवाजा अथवा स्वर्गारोहण द्वार है। फिर ऊपर चढ़ने पर बुधभद्र द्वार तथा हनुमान द्वार मिलते हैं। हनुमान दरवाजे में एक पत्थर पर हनुमान की पत्थर में कटी हुई मूत्ति एक अन्य चट्टान के सहारे रक्खी हुई है। वहाँ हनुमान कुंड नामक एक तालाब भी है। छठा दरवाजा पुनः कुछ और ऊपर चढ़ने पर मिलता है। यह लाल पत्थर से निर्मित होने के कारण लाल दरवाजा कहलाता है। कुछ थोड़ी और चढ़ाई पार करने पर सातवाँ तथा अन्तिम दरवाजा मिलता है। यह बड़ा दरवाजा कहलाता है और यह दुर्ग का मुख्य द्वार है।

इस दुर्ग में पानी का उत्तम प्रबन्ध है। दुर्ग के अन्दर अनेक जलकुण्ड हैं। यथा: पाताल गंगा, पाण्डु-कुण्ड, बुढिया ताल, मृगधारा, कोटतीर्थ आदि। कालिं हिन्दुओं का तीर्थ स्थान भी है। वेदों में इसका निर्देश तपस्या-स्थान के रुप में हुआ है। महाभारत में यह उल्लेख है कि जो व्यक्ति कालिं में स्नान करता है उसे सहस्त्र गोदान का फल मिलता है। पद्मपुरान में यह वर्णन है कि कालिंजर उत्तर भारत के नौ तीर्थों में से एक है और अब भी वहां अनेक यात्री जाते हैं।

२. अजयगढ़ दुर्ग

यह कालिंजर से २० मील दक्षिण-पश्चिम एक पहाड़ी की चोटी पर बना हुआ है। यह उत्तर से दक्षिण एक मील लम्बा और लगभग इतना ही पश्चिम से पूर्व को चौड़ा है। यह त्रिभुजाकार है और इसका घेरा लगभग ३ मील है। कहा जाता है कि इस दुर्ग का निर्माण किसी राजा अजयपाल ने करवाया था, किन्तु इस तथ्य के पुष्टीकरण का कोई प्रमाण नहीं है। शिलालेखों में इसका उल्लेख जयपुर दुर्ग के नाम से मिलता है। 
इस दुर्ग में केवल दो द्वार हैं। प्रथम द्वार तरोहनी द्वार कहलाता है, क्योंकि वहां से पहाड़ी के नीचे स्थित तरोहनी ग्राम को मार्ग जाता है। दूसरा द्वार केवल दरवाजा कहलाता है। संभवतः यह शिलालेखों में उल्लिखित कालिं दरवाजा हो, क्योंकि वहां से कालिं दुर्ग को रास्ता जाता है। इस दुर्ग में भी पानी का उत्तम प्रबन्ध है।

३. मड़फा दुर्ग

यह विशाल दुर्ग एक ऊंची पहाड़ी पर स्थित है और कालिंजर से उत्तर-पूर्व १२ मील की दूरी पर है। इस किले का उल्लेख किसी भी मुस्लिम इतिहासकार ने नहीं किया। इस तथ्य के आधार पर कनिंघम का अनुमान है कि कलिं के पतन के पश्चात् ही इसकी ख्याति हुई। अब यह दुर्ग निर्जन है और वहां जंगल है।

४. मनियागढ़

केन नदी के पश्चिमी तट पर ६०० फीट से ७०० फीट की ऊंची एक छोटी पहाड़ी के ऊपर यह दुर्ग बना हुआ है। यह एक प्राचीन दुर्ग है और वहीं चन्देलों की कुलदेवी मनिया देवी का मंदिर है। अब वह भग्नावशेष मात्र है और जंगलों से भरा पड़ा है।

५. कालपी दुर्ग

इस दुर्ग की स्थिति बड़ी महत्वपूर्ण थी। इतिहासकार फरिश्ता का अनुमान है कि कन्नौज के राजा वासुदेव ने इसका निर्माण करवाया था, किन्तु स्थानीय जनश्रूतियों में यह प्रचलित है कि इसका निर्माण किसी प्राचीन राजा कालिदेव ने करवाया था। यह बाहर से १२५ फीट और इसकी ऊंचाई ८० फीट है। यह सम्पूर्ण दुर्ग शतरंज की गोट की भांति है और इसकी छत चौरस है। इसके मध्य के चार स्तम्भ भी नहीं हैं और इस प्रकार जो जगह बची है वह विशाल गुम्बज से ढ़की हुई है। यह गुम्बज मुख्य इमारत की छत से लगभग ६० फीट ऊंचा है। इसके चारों कोनों पर चार छोटे-छोटे बुर्ज हैं। मध्य का बुर्ज छत से लगभग ४० फीट ऊंचा है।

६. महोबा दुर्ग

चन्देल राजधानी महोबे का प्राचीन दुर्ग मदनसागर से उत्तर एक छोटी पहाड़ी पर स्थित है। इसकी लम्बाई १६२५ फीट तथा चौड़ाई लगभग ६०० फीट है। इसके दो मुख्य द्वारों में भैंसा दरवाजा पश्चिम की ओर है और दरीवा-दरवाजा पूर्व की ओर है। इसकी दीवार कटे हुए चौकोर पत्थरों से बनी है।

७. हाटा दुर्ग

इसकी निर्माण शैली अन्य दुर्गों की ही भाँति है, किन्तु इसके शिखर बहत हैं, जो ऊपर की ओर नुकीले होते चले गए हैं। शिखर तथा दीवारें (युद्धक चहारदीवारी) से ढकी हुई हैं और गारे तथा बटियों के पत्थर से बनी है। इस दुर्ग के अन्दर एक राज-प्रसाद का भग्नावशेष भी है।

८. गढ़ा दुर्ग

बहुत दिन पूर्व यह दुर्ग गिरा दिया गया था और इसकी सामग्री रेलवे कम्पनी ने इस्तेमाल कर ली है।
इन दुर्गों के अतिरिक्त रावतपुर, जैतपुर, राजगढ़, कुंडलपुर तथा अन्य स्थानों पर भी चन्देल दुर्गों के चिह्म पाये जाते हैं, जो चन्देलों की सैनिक प्रवृत्ति के प्रतीक हैं।

चन्देलकालीन मूर्तिकला

जिस प्रकार उत्तरी भारत में चन्देल मंदिर बेजोड़ हैं, उसी प्रकार उनकी मूर्तिकला भी बेजोड़ है। चन्देल शासकों के अन्तर्गत राष्ट्र की बढ़ी हुई समृद्धि से देश की ललितकला के प्रसार में बड़ा योग मिला। गुप्तकाल की मूर्तिकला में विदेशी छाप जाती रही थी। उस युग में मथुरा तथा गान्धार कला-केन्दों का पतन हो चुका था और उनके स्थान पर सारनाथ तथा पाटलिपुत्र के कला-केन्द्रों का विकास हो रहा था। दोनों प्राचीन कला केन्द्रों में केवल बुद्ध तथा बोधिसत्व की ही मूर्तियों का निर्माण होता था। किन्तु नूतन कलाकेन्द्रों के विकास से इस स्थिति में पर्याप्त परिवर्तन हो गया था। बौद्ध धर्म के देवी-देवताओं का स्थान हिन्दुओं के पौराणिक देवी-देवताओं ने ग्रहण कर लिया। दोनों कलाकेन्द्रों ने आशातीत सफलता प्राप्त की और कुछ समय पश्चात् उन्होंने तीन मध्ययुगीन कला-केन्द्रों को जन्म दिया- १. बंगाल तथा बिहार का पूर्वीय 
कला केन्द्र, २. मध्य भारत का चन्देल चेदि कलाकेन्द्र तथा ३. मालवा का धारा-कला-केन्द्र।

बुन्देलखण्ड में चन्देल चेदि कला-केन्द्र की मूर्तिकला अपनी पूर्णता को पहुंच गई थी। अंग विन्यास, मुख की भाव-भंगिमा तथा शरीर के व्यापारों के निर्दोष कृतित्व में शिल्पकारों ने पूर्ण निपुणता प्राप्त कर ली थी। अधिकांश मूर्तियों में महोबा में प्राप्त काले संगमरमर का प्रयोग हुआ है, किन्तु विन्ध्य पर्वत से प्राप्त लाल-पत्थर का भी पर्याप्त प्रयोग हुआ है, क्योंकि इस पत्थर में भी सुन्दर ओप होती है।

खजुराहों तथा अन्य स्थानों में शायद ही कोई मंदिर हो, जो विशिष्ट मूर्तियों से न अलंकृत हो। चन्देल मूर्तिकला दो मुख्य भागों में विभाजित की जाती है: १. धार्मिक तथा २. धर्मनिरपेक्ष।

१. धार्मिक मूर्तिकला

इसका पुनः तीन विभागों में वर्गीकरण किया जाता है:

१. हिन्दू मूर्तिकला , 

२. जैन मूर्तिकला तथा 

३. बौद्ध मूर्तिकला


१.१ हिन्दू मूर्तिकला : 

कन्दरीय महादेव मन्दिर

कन्दरीय महादेव मंदिर में मूर्तिकला का बाहुल्य है। जनरल कनिंघम की गणना के अनुसार इस मदिर के अन्दर २२६ मूर्तियाँ तथा तथा मंदिर के बाहर ६४६ मूर्तियाँ हैं। मंदिर में शायद ही कोई स्थान हो जो मूर्तियों से अलंकृत न हो। दीवारें, दीवारगीरें, स्तंभ आदि सभी स्थान मूर्ति-समूहों से अलंकृत हैं। मंदिर की कुर्सी के ऊपर मंदिर के चारों ओर मूर्तियों की तीन पट्टियां हैं। इन मूर्तियों में अधिकांश हिन्दू देवी-देवताओं की हैं, किन्तु कुछ अश्लील मूर्तियां भी हैं। इन पट्टियों के ऊपर उभरी 
हुई तथा आगे बढ़ी हुई मूर्तियां मंदिर के चारों ओर हैं और इनके ऊपर अनेक विशिष्ट मूर्तियां हैं। इन विशिष्ट एवं बहुसंख्यक मूर्तियों का प्रभाव हर्षातिरेक उत्पन्न करता है और मूर्तियों के विवरणों की विविधता से आंखें चकाचौंध हो जाती हैं। मंदिर की छत भी बड़ी मनोरम एवं विविध मूर्तियों से सुसज्जित है।

गर्भगृह के मध्य में साढ़े चार फीट के घेरे का संगमरमर का शिवलिंग है और उसके दाहिनी तथा बाईं ओर शिव तथा ब्रह्मा की मूर्तियां हैं।

विश्वनाथ मन्दिर

खजुराहो के विश्वनाथ मंदिर में मूर्तिला के उत्कृष्ट नमूने हैं। मंदिर के अन्दर तथा बाहर बहुसंख्यक मूर्तियाँ हैं। मंदिर की बाहरी दीवार में मूर्तियों की तीन पट्टियाँ हैं। इनके मध्य का मूर्ति-समूह अन्य मंदिरों की मूर्तियों की भांति आकर्षक है। अपने वस्रों को गिराती हुई अनेक नारी प्रतिमायें बनी हुई हैं, मानों वे जानबूझ कर अपने अंगों का प्रदर्शन कर रही हों। अन्य मन्दिरों की भाँति इस मंदिर के भीतरी भाग के अलंकरण में भी बहुलता तथा विविधता है। इसकी छत भी बहुत अलंकृत है। मंदिर के मुख्यद्वार के सामने एक छोटा मंदिर है, जिसमें नन्दी की एक विशाल मूर्ति है। इसकी कुर्सी हाथियों की मूर्तियों की एक पंक्ति से अलंकृत है। प्रत्येक हाथी सामने की ओर मुँह किये हुए दो नर मूर्तियों के मध्य में है।

खजुराहो का चतुर्भुज मंदिर

यह मंदिर भी बाहर तथा अन्दर बहुत अधिक अलंकृत है। इसमें शूकर के आखेट, हाथी, घोड़ों तथा विभिन्न शस्रास्रों से सुसज्जित सैनिकों के जुलूसों के मनोरम चित्रण हैं। मंदिर के अन्दर ४ फीट १ इंच ऊँची खड़ी हुई चतुर्भुजी मूर्ति है। उसके तीन शिर हैं, जिनमें से बीच का शिर सिंह का तथा शेष दो शिर मनुष्य के हैं।

खजुराहो का लक्ष्मीनाथ अथवा विष्णु मन्दिर

इस मंदिर के महामंडप के स्तम्भ अन्य खजुराहों मंदिरों की भांति अलंकृत है। उसकी आठ दीवारगीरें नारियों तथा सिंहों की मूर्तियों से सुसज्जित हैं। प्रवेश द्वार के स्तम्भ का काम आश्चर्यजनक रुप से सुन्दर है। प्रत्येक फलक के नीचे से मुंह खोले हुए नक्र का आविर्भाव होता है और नक्र के खुले हुए मुँह से एक अलंकृत नाल नीचे की ओर मुड़ती है और आन्त में दो नलिकायें निकलती हैं और वह ऊपर मेहराव से जा मिलती है। प्रत्येक नलिका नीचे की ओर मुड़ती है और अन्त में दो नलिकायें मध्यके खुले हुये भाग में मिल जाती है। नाल के उद्भव बिंदु से हाथ के बल से लटकती हुई नारी मूर्ति है, जिसके उभय पद नक्र के मुख पर स्थित हैं, मानों उनका भी आविर्भाव नाल के साथ ही हुआ हो। कनिंघम इस अलंकरण की अस्वाभाविकता की आलोचना करते हैं। उनका मत है कि दोनों नक्रों के शिरों का कोई आधार नहीं हैं, वेस्तम्भों से प्रादुर्भूत हैं। उनका मत है कि नक्रों के शिरों का आधार दीवारगीर होने चाहिए। अन्य मन्दिरों की भांति मंदिर का भीतरी भाग मूर्तियों की दो पंक्तियों से अलंकृत है।

कुँवर मठ

इस मंदिर का अलंकरण प्रायः उसी कलात्मक ढंग से हुआ है, जैसा कि चतुर्भुज मंदिर में। निचला अष्टकोणात्मक मार्ग अनेक स्थलों पर हाथी, घोड़े तथा शास्रास्रों से सुसज्जित सैनिकों के जुलूस सम्बन्धी मूर्तियों से अलंकृत हैं। अष्टभुज क्षेत्र के कोणों पर नारी मूर्तियाँ हैं, जो दीवारगीरों पर आधारित हैं। इसके अतिरिक्त गायकों तथा नर्तकों के भी चित्र हैं।

जतकरा का चतुर्भुज मंदिर

इस मंदिर का अलंकरण खजुराहो कला के आधार पर हुआ है, किन्तु इसकी कुछ मूर्तियाँ विशेष उल्लेखनीय है। मंडप की मूर्ति पंक्ति की मुख्य मूर्ति जो दक्षिण की ओर है, वह अर्द्धनारी की बैठी हुई मूर्ति है। उसके ऊपर त्रिशूल अथवा सपंयुक्त भगवान् शिव की चतुर्भुजी मूर्ति है। उसके नीचे रथारुढ़ सूर्य की मूर्ति है। पीठिका में सप्ताश्वों की मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। मध्यपंक्ति की मुख्य मूर्ति के उत्तर की ओर सिंह के शिर वाली नारी मूर्ति है। उसके नीचे गदा तथा शंख युक्त बैठे हुए भगवान् विष्णु की मूर्ति है।

छत्र को पत्र अथवा खजुराहो का सूर्य मंदिर

मंदिर के भीतर आठ फीट की ऊँचाई तक विभिन्न मूर्तियाँ हैं। उनमें पाँच फीट ऊँची द्विभुज सूर्य की मूर्ति हैं, जिसके करयुग्मों में कमल तथा पुष्प हैं। पीठिका में उसके रथ के सप्ताश्वों की मूर्तियाँ हैं। मण्डप के स्तम्भों के अलंकरण का केवल रेखांकन ही संभव हो पाया था, और शिल्पी संभवतः अपनी इच्छानुकूल उसकी पूर्ति न कर पाया था। मंदिर का बाहरी भाग 
अन्य मंदिरों की भाँति मूर्ति समूह की तीन पंक्तियों से अलंकृत है।

खजुराहो का वाराह मन्दिर

यह भगवान विष्णु के अवतार वाराह देव का मंदिर है। वाराह मूर्ति की लम्बाई ८ फीट ९ इंच तथा ऊंचाई ५ फीट ९ इंच है। यह खड़ी मुद्रा में है, जिसके दो पैर आगे की ओर बढ़े हुए हैं। पीठिका में कुंडली बाँधे हुए एक बड़े नाग की मूर्ति है। उसकी पूंछ पर वाराह की पूंछ आधारित है। वाराह का शिर एक बैठी हुई नर मूर्ति के आधार पर टिका हुआ है। नाग के शिर के निकट नर मूर्ति के दो पैर हैं, जो भगवती पृथ्वी के पद कहे जाते हैं। क्योंकि उसके हाथ के चिह्म वाराह की गर्दन पर भी पाये जाते हैं। वाराह का शरीर एवं गर्दन बाहर से छोटी-छोटी नर मूर्तियों से अलंकृत हैं।

मदनपुर का वाराह मन्दिर

इस मंदिर में ६ फीट २ इंच लम्बी एक विशाल मूर्ति है, जिसके साथ ही इस मूर्ति के दोनों ओर छोटी मूर्तियों की छह-छह पंक्तियां हैं। इस मूर्ति की पीठिका टूटी हुई है, किन्तु एक पिछला पैर अब भी वैसा ही है एक बहुत बड़ा नाग भी उत्कीर्ण है। यह नाग समुद्र का द्योतक है, जिससे वाराह ने नारी-रुप पृथ्वी का उद्धार किया था।

कालिं का कालभैरव मन्दिर

कालिं दुर्ग के स्वर्गारोहण कुण्ड में खड़ी हुई मुद्रा में २४ फीट ऊंची कालभैरव की विशाल मूर्ति है, जो दो फीट गहरे पानी में खड़ी हुई है। यह मूर्ति अष्टादश भुजी है। यह नरमुण्डों की माला, नाग के बाल तथा भुजबन्ध धारण किये हुए है। एक नाग इस मूर्ति के गले में लिपटा हुआ है। इस मूर्ति के हाथ में अनेक वस्तुएं हैं, जिनमें से कृपाण खप्पर आदि विशेष उल्लेखनीय हैं। इस विशाल मूर्ति के निकट ४ फीट ऊंची काली की मूर्ति है। वह मूर्ति भी नरमुण्ड माला धारण किये हुए हैं।

रसिन का काली मन्दिर

बांदा जिले में रसिन के एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर में काली की एक टूटी हुई मूर्ति है। यह मूर्ति दीवाल में उत्कीर्ण एक अन्य से दण्डवत करती हुई मूर्ति के ऊपर खड़ी है। यह ८ फीट ऊंची और ४ फीट चौडी है, इसकी २४ भुजाएँ हैं और इसके चारों ओर भगवती काली की छोटी-छोटी मूर्तियाँ हैं। मुख्य मूर्ति का उदर बहुत बैठा हुआ है और पसलियों के मध्य में बड़ी पूंछवाला विच्छू अंकित किया गया है।
इस मंदिर की अन्य मूर्तियों में दशभुजी दुर्गा, महिषासुरी हनुमान आदि की मूर्तियां विशेष उल्लेखनीय है।

अन्य हिन्दू मूर्तियां

कालिं में दुर्गा की एक अन्य मूर्ति है, जो अष्टभुजी है और त्रिशूल तथा खप्पर धारण किये हुए है। अजयगढ़ के तरोहिणी द्वार में देवियों की मूर्तियों की ८ पंक्तियाँ हैं, जिनमें सात बैठी हुई मुद्रा में, और एक खड़ी हुई मुद्रा में है। उनमें से प्रत्येक ३ फीट ऊंची तथा ३ फीट १० इंच चौड़ी और उनकी पीठिका भी अलग-अलग है। रोरा में एक शिव मंदिर है। वहां अनेक मूर्तियां उपलब्ध हैं। विशाल शिवलिंग के अतिरिक्त वहां मूषक-युक्त गणेश की मूर्ति, मयूरवाहिनी देवी, तथा वृषारुढ़ पार्वती की मूर्तियाँ हैं। इनके अतिरिक्त एक द्विमुखी नारी तथा कुछ अन्य छोटी मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। मंदिर के बाहर एक टूटी हुई मूर्ति है, उसमें गले में माला धारण किये हुए एक चतुर्भुजी नारी मूर्ति है।

१.२ जैन मूर्तिकला

जिस भांति हिन्दू तथा जैन मंदिरों की योजना में अन्तर है, उसी प्रकार दोनों धर्मों की मूर्तिकला में भी कुछ अन्तर है। जैन मन्दिरों का अलंकरण हिन्दू मंदिरों की परिपटी पर हुआ है। अन्तर केवल यह है कि जैन मंदिरों के अलंकरण में केवल जैन देवी-देवताओं की मूर्तियों को ही उपकरण बनाया गया है।

खजुराहो समूह के जैन मंदिरों में सर्वोत्कृष्ट जैन मंदिर जिननाथ का है। यह अनेक मूर्तियों से अलंकत है। इसमें छोटी मूर्तियों की तीन पंक्तियाँ हैं। जिनमें दो नीचे की पंक्तियों में मूर्तियां खड़ी हुई मुद्रा में हैं और सर्वोपरि पं की मूर्तियां बैठी हुई अथवा उड़ती हुई मुद्रा में दिखलाई गई हैं। गर्भगृह के द्वार पर खड़ी हुई मुद्रा में एक नग्न मूर्ति है। मुख्य द्वार की सीढियों में समुद्रमन्थन का दृश्य उत्कीर्ण है।

जैन मंन्दिरों के अलंकरण की यह सर्वग्राह्य शैली थी। प्रायः सभी जैन मंदिरों में इसी शैली का अनुकरण हुआ है। जनरल कनिंघम को अपनी यात्रा के सिलसिले में १३ जैन मूर्तियां मिली थीं, जो कभी खजुराहो के घंटई मंदिर के अलंकरण की प्रसाधन थीं। उन मूर्तियों का विवरण नीचे दिया जाता है:

घुटनों पर बैठे हुए मुद्रा में ६ फीट ३ इंच ऊंची तथा ३ फीट एक इंच चौड़ी नर मूर्ति, जिसकी गर्दन तनी हुई है। इस मूर्ति की पीठिका में एक चक्र उत्कीर्ण है।

खड़ी हुई मुद्रा में दो फीट ५ इंच की एक नग्न मूर्ति।

उसी प्रकार की एक छोटी मूर्ति।

उसी प्रकार की मूर्ति और उसके पीछे कुंडली बांधे हुए सपं की मूर्ति।

घुटनों के बल बैठी हुई मुद्रा में २ फीट १० इंच की नग्न मूर्ति, जिसकी पीठिका में चक्र उत्कीर्ण हैं।

घुटनों पर बैठी हुई मुद्रा में ४ फीट ६ इंच ऊंची २ फीट चौड़ी मूर्ति, जिसकी पीठिका में वृषभ उत्कीर्ण है।

मध्यम कद की खड़ी हुई नग्नमूर्ति, जिसकी पीठिका में चंद्र अंकित है।

घुटनों पर बैठी हुई नग्न मूर्ति तथा पीठिका में टूटे हुए बैल की मूर्ति।

घुटनों पर बैठी हुई ३ फीट ऊंची मूर्ति, जिसकी पीठिका में चक्र बना है।

घुटनों पर बैठी हुई ४ फीट ऊंच तथा २ फीट १० इंच चौड़ी मूर्ति।

घुटनों पर बैठी हुई नग्न मूर्ति।

सिंह पर बैठी हुई चतुर्भुजी देवी की मूर्ति, जिसके एक फुट ७ इंच चौड़ी पीठिका पर शंख तथा पद्म उत्कीर्ण हैं।

गरुड़ पर बैठी हुई चतुर्भुजी देवी की मूर्ति तथा जिसकी एक फुट ७ इंच चौड़ी पीठिका पर फल तथा शंख की मूर्ति उत्कीर्ण है


अंतिम दो मूर्तियां हिन्दू-धर्म की हैं, किन्तु अपने लघु आकार के कारण ये मूर्तियां अन्य मूर्तियों की सहायक मूर्तियां प्रतीत होती हैं। शेष ११ मूर्तियां जैन-धर्म के दिगम्बर सम्प्रदाय की हैं।  खजुराहो के पार्श्वनाथ मंदिर में जैनियों के २३ वें तीथर्ंकर पार्श्वनाथ की मूर्ति प्रतिष्ठित है। यह नग्न पुरुष मूर्ति है और इसके दोनों ओर नग्न नारी प्रतिमायें हैं। खजुराहो के अन्य जैन मंदिरों में आदिनाथ, जिननाथ, सेतनाथ आदि अन्य तीथर्ंकरों की भी मूर्तियां हैं।

मदनपुर का जैन मंदिर

मदनपुर में दो जैन मंदिर हैं। उनमें से बड़े मंदिर में खड़ी हुई मुद्रा में एक विशाल नग्न मूर्ति है। दूसरा मंदिर भग्नावशेष मात्र हैं और वहां निम्नलिखित तीन मूर्तियां उपलब्ध हैं:

१. आदिनाथ, जिनकी पीठिका में वृषभ उत्कीर्ण है।
२. शंभुनाथ, जिनकी पीठिका में अश्व अंकित है।
३. चन्द्रप्रभा, जिनकी पीठिका में वक्रचन्द्र की मूर्ति अंकित है।

दौनी के जैन मंदिर में शान्तनाथ की मूर्ति है और उस मूर्ति की पीठिका में दो हिरणों की मूर्ति उत्कीर्ण है। पीठिका में १३वीं विक्रम शताब्दी का एक लेख भी है। यह मूर्ति टूटी हुई है। इसकी दो भुजायें खण्डित हैं। इसके अतिरिक्त अन्य छोटी-छोटी मूर्तियां भी टूटी-फूटी दशा में हैं। जैनियों के तीर्थथान कुण्डलग्राम में नेमिनाथ की एक विशाल मूर्ति है। दुधई में भी दो जैन मंदिर हैं। एक मंदिर में खडी हुई मुद्रा में १२ फीट ऊँची मूर्ति है, जिसकी गर्दन तनी हुई है। दूसरे मंदिर में घुटनों में बैठी हुई पांच फीट की एक मूर्ति है। उसके दोनों ओर एक-एक खड़ी हुई नग्न प्रतिमायें हैं। अजयगढ़ के तरोहिनी द्वार में भी बैठी हुई मुद्रा में अनेक जैन मूर्तियां हैं, जिनके हाथ उनकी गोदी में रक्खे हुए हैं। उनके निकट एक गाय तथा बछड़े और बैठी हुई मुद्रा में चतुर्भुजी देवी की मूर्ति है, जिसकी गोद में एक बच्चा है और उसकी बाईं ओर एक के ऊपर दूसरा इस प्रकार आठ शूकर-शावकों के जोड़े हैं। यह शक्ति की मूर्ति है जो समृद्धि की देवी है।

३. बौद्ध मूर्तिकला

बहुत दिनों तक लोगों का यह अनुमान था कि चन्देलों के समय में बौद्ध-धर्म का प्रचार न था, किन्तु महोबा में प्राप्त ६ बौद्ध प्रतिमाओं ने इस संदेह का निराकरण कर दिया। दो मूर्तियों की पीठिका के लेख से ज्ञात होता है कि उनका निर्माण ११वीं अथवा १२वीं शताब्दी में हुआ था। इन मूर्तियों से स्पष्ट होता है कि हिन्दू तथा जैन-धर्म के साथ ही साथ बौद्ध धर्म का भी प्रचार था।

सिंहनाद अवलोकितेश्वर की मूर्ति

यह मूर्ति २ फीट ८ इंच ऊंची तथा एक फुट १० इंच चौड़ी है। यह भारतीय मूर्तिकला की सर्वोत्कृष्ट मूर्तियों में से है। बैठे हुए राजलीला मुद्रा में इस मूर्ति का निर्माण हुआ है। इसका दाहिना घुटना ऊपर की ओर सटा हुआ है और उस पर दाहिना 
हाथ रक्खा हुआ है तथा उसमें एक माला है। बोधिसत्व के नीचे एक गदद्यदी है और उसके नीचे सीधे कमलासन में मुंह खोले हुए सिंह की मूर्ति है जो बोधिसत्व की ओर देख रही है। देवी का दाहिना हाथ बायें घुटने के पीछे गदद्यदी पर रखा हुआ है और कमलदण्ड धारण किये हुए है। दाहिने हाथ के पीछे उसका त्रिशूल है, जो चारों ओर से नाग से घिरा हुआ है। उसके केश घुंघराले हैं और उनमें से कुछ उसके कंधों पर लटक रहे हैं तथा शेष केशराशि जटा-जूट के रुप में सुशोभित हैं।
शरीर के ऊपरी हिस्से का कुछ भाग वस्र से ढका हुआ है और अधोवस्र जांघ तक है। मूर्ति के पीछे पत्थर में कमल पुष्प के रुप में उसके शिर के पीछे प्रकाश-चन्द्र है और उसके दोनों ओर करबद्ध उपासकों की मूर्तियाँ हैं। इस मूर्ति के सिंहासन में ११वीं शताब्दी के वर्णों में एक लेख भी है।

बोधिसत्व अवलोकितेश्वर की मूर्ति

यह मूर्ति पद्मपाणि के नाम से विख्यात है। इसकी ऊंचाई २ फीट २ इंच तथा चौड़ाई १ फीट १ इंच है। यह कमलासन में राजलीला मुद्रा में है। इसका बाँया हाथ बाईं जांघ के पीछे सिंहासन पर है। दाहिना हाथ घुटनों से दाहिनी जाँध पर टिका हुआ है। बाँयें हाथ में कमल-दण्ड है। बोधिसत्व की मूर्ति के एक ओर एक लम्बे कमलनाल युत कमल-पुष्प हैं। सिंहनाद की मूर्ति की भाँति इस मूर्ति के सिर पर भी जटाजूट हैं। इसकी पोशाक भी अन्य बोधिसत्वों के मूर्ति की भांति सर्वथा पूर्ण है। पीठिका के पश्चिमी भाग में नतमस्तक किए हुए एक मूर्ति हैं, जो सम्भवतः समपंण कर्ता की मूति है। कमलासन, जिस पर यह मूर्ति स्थापित है, वह तीन मूर्तियों पर आधारित है।

बौद्धदेवी तारा की मूर्ति : (ऊंचाई १ फीट ९ इंच, चौड़ाई ११)

गन्धर्व-गृहीत कमल पर बज्रासन में बैठी हुई यह भगवती तारा की मूर्ति है, जिसका बाँया हाथ वितर्क मुद्रा में तथा दाहिना हाथ वरद मुद्रा में है। बाँए हाथ में कमलनाल तथा दाहिने हाथ में संभवतः वज्र है। पीछे के पत्थर के सिरे में ५ ध्यानी बौद्धों की मूर्तियाँ विभिन्न मुद्राओं में हैं। देवी के बांए एक नारी प्रतिमा है। पीठिका में ११वीं शताब्दी का एक लेख है।

गौतम बुद्ध की मूर्ति

यह मूर्ति भूमिस्पर्श मुद्रा में है। इसके घुंघराले बालों की जटाएँ हैं। कान के निचले हिस्से बढ़े हुए हैं और शिर में उष्णीष हैं। भगवान बुद्ध कमलासन में बैठे हुए हैं। सिंहासन के नीचे दीपक रखने का स्थान है। हाथी, दो सिंह तथा दो गन्धर्वों� की उत्कीर्ण मूर्तियों पर यह सिंहासन आधारित है।

धर्म निरपेक्ष मूर्तियाँ

इस प्रकार की मूर्तियों का बुन्देलखण्ड में नितान्त अभाव है। यद्यपि प्रत्येक खजुराहो मंदिर में कामक्रीड़ा में रत स्री-पुरुषों के चित्र उत्कीर्ण किये गये हैं, फिर भी अजयगढ़ की काले संगमरमर की अजयपाल की मूर्ति के सदृश नर मूर्तियों का अभाव है। इस प्रकार की पशुओं की कुछ मूर्तियाँ अवश्य हैं।

नर मूर्तियाँ

खजुराहो के विश्वनाथ मंदिर में मनुष्य के आकार की कामक्रीड़ा में रत स्री-पुरुषों की मूर्तियाँ हैं। घुँघराले काले बालों तथा माला धारण किये हुए बाईं ओर पुरुष तथा दाहिनी ओर एक नारी की मूर्ति है, जो इस मैथुन को देख रही है, किन्तु अपनी आंखों के ऊपर एक हाथ रख कर मानों इस काम क्रीड़ा को न देखने का अभिनय कर रही हो।
खजुराहो के लक्ष्मीनाथ मदिर में मनुष्य के आकार की स्री-पुरुष की मूर्तियों का एक जोड़ा है, जो वस्राभूषण से अलंकृत तथा शिर की पोशाक धारण किये हुए परस्पर चुम्बन करते हुए दिखलाये गये हैं। खजुराहो के काली मंदिर में मनुष्य के आकार की पुरुष की मूर्तियों का एक जोड़ा परस्पर आलिंगन करता हुआ दिखलाया गया है। नारी मूर्ति के दोनों हाथ पुरुष मूर्ति की गर्दन पर दिखलाये गये हैं। उनके नेत्र अर्द्ध निमीलित अवस्था में हैं, बाल घुँघराले हैं और वे कड़ा धारण किये हुए हैं।

पशुओं की मूर्तियाँ

हिन्दू-धर्म के विभिन्न देवी-देवताओं के साथ उनके वाहन के रुप में विभिन्न पशुओं का उल्लेख होता है और उसके साथ-ही-साथ उनके पशु-वाहनों की भी मूर्तियाँ मिलती हैं, उदाहरणार्थ सिंह, वृषभ, मयूर, गरुड़, हंस, मूषक आदि की मूर्तियाँ शिव, पार्वती, स्वामी कार्तिकेय, विष्णु, ब्रह्मा तथा गणेश की मूर्तियों के साथ पाई जाती हैं। किन्तु इनके अतिरिक्त भी अन्य पशुओं की मूर्तियाँ मिलती हैं, जिनका प्रयोजन कुछ और ही था।

महोबा की हस्ति-मूर्ति

महोबा की एक झील में सजीव हाथियों के आकार की पांच हस्ति-मूर्तियां हैं। यह मूर्तियाँ लाल पत्थर की बनी हुई है। उनकी औसत लम्बाई तथा उनके शरीर का औसत घेरा १२ फीट है। पांचों हाथियों के पैर टूटे हुए हैं। वे प्राप्त भी नहीं हैं। उनका शरीर झूल से अलंकृत है। यद्यपि उनके महावत का पता नहीं है, फिर भी उन मूर्तियों की पीठ और गर्दन के खुरदुरेपन से महावत के बैठने के स्थान का बोध होता है। इन मूर्तियों के मूल स्थान के सम्बन्ध में कुछ भी ज्ञात नहीं है, फिर भी अनुमान यही है कि मदिर के तीनों दरवाजों में प्रत्येक द्वार पर दो-दो मूर्तियाँ रही होंगी।

विश्वनाथ मंदिर में सजीव हाथियों के आकार की १० हाथियों की मूर्तियाँ हैं। ये मूर्तियां एक पत्थर से संलग्न हैं और गर्भगृह तथा अन्तराल के पांच स्तम्भों वाले छज्जे के ऊपर की छत के १० कोणों से निकल-सी रही हैं। इलाहाबाद से ४३ मील दक्षिण-पश्चिम बाँदा जिले में लोखरी नामक स्थान पर हाथी की एक विशाल मूर्ति है, जो ७ फीट लम्बी और ३ फीट चौड़ी है तथा सिर तक ५ फीट ऊंची है। यह मूर्ति एक तालाब के किनारे स्थित है और उसमें हाल का ही एक शिलालेख है।

मदनपुर के खंडहरों में एक वृषभ की मूर्ति प्राप्त हुई है, जो तीन फुट १० इंच लंबी है। चार-चार फीट ऊँचे दो सिंह की मूर्तियाँ भी वहां प्राप्त हुई हैं।
खजुराहो में विश्वनाथ मंदिर के सामने एक छोटा मंदिर है, जिसमें ७ फीट ऊंची एक विशाल वृषभ मूर्ति है। इस मूर्ति की पालिश बहुत ही सुन्दर है। इस मूर्ति के सींग तथा पैर टूट गये हैं तथा प्लास्टर से उनकी मरम्मत कर दी गयी है। मूर्ति की पीठिका में वृषभ के सिर के नीचे बैठी हुई एक नारी प्रतिमा के चिह्म हैं।

खजुराहो-मूर्तिकला में अश्लीलता

मध्ययुगीन अन्य मंदिरों की भांति खजुराहो के मंदिरों के अलंकरण में भी अश्लील मूर्तियों का प्रयोग किया गया है। इन मूर्तियों के निर्माण में अद्भुत कौशल का प्रदर्शन हुआ है किन्तु अंग्रेज लेखकों ने इन मूर्तियों तथा मंदिरों को सदाचार के प्रतिकूल मानकर इनका उल्लेख नहीं किया और अपनी प्रदर्शिका पुस्तकों में यह निर्देश किया है कि इन स्थानों पर बच्चों तथा स्रियों को न जाना चाहिए। एलियाँ डेलाँ नामक फ्रुेंच विद्वान ने इन मूर्तियों के पक्ष में कहा है कि मध्ययुगीन मंदिरों के निर्माता किसी भी भांति असभ्य न थे। उनके विचारों को हमें गर्व के साथ ठुकरा नहीं देना चाहिए। उनमें अद्वितीय सूक्ष्म निरीक्षण तथा अपार ज्ञान था। उन्होंने मानव विचारों के सभी पहलुओं में सम्यक् सफलता प्राप्त की थी। प्रेम क्रीड़ाओं के अंकन से उनकी असभ्यता का नहीं, बल्कि उनके मनोविज्ञान तथा प्रतीकवादिता का बोध होता है। उन्होंने इन मूर्तियों के माध्यम से अपने मनोरम मनोभावों तथा दार्शनिक सिद्धान्तों को व्यक्त किया है। मनुष्य जीवन में प्रेम का बड़ा महत्व है। प्रेम सर्वदा ही सक्रिय तथा सृजन की ओर उन्मुख रहता है। इस तथ्य का साक्ष्य वेदों में भी है। ""एकोहं बहु स्याम्'' का सिद्धान्त ब्रह्म की सृजन इच्छा का ही प्रतीक है और सृजन की इस इच्छा के स्थूल रुप ही नरनारी हैं। प्रजा-जनन के हेतु जिस प्रकार ब्रह्म तथा प्रकृति का एकीकरण होता है, उसी भांति नरनारी का भी मिलन होता है। मनुष्य जीवन के कार्य धर्म के अंग हैं और सत्पुरुष के व्यापार ही यज्ञ हैं: मिथुन का लैंगिक कार्य भी यज्ञ है, क्योंकि इससे जीवन का आविर्भाव होता है। छान्दोग्य उपनिषद् में यह निर्देश है कि : ""नारी अग्नि है, उसका गर्भाशय ईंधन है, पुरुष का निमंत्रण ही धूम्र है, कर्त्ता ही लपट तथा तद्जन्य आनन्द ही अग्नि है। इस अग्नि में देवता हव्य डालते हैं और इस हव्य से ही जीवोत्पत्ति होती है।'' मिथुन का एकीकरण ही ओम का प्रतीक है। जिस भांति मिथुन परस्पर मिलन में आनन्द का उपभोग करते हुए एक-दूसरे की इच्छा पूर्ति करते हैं, उसी प्रकार ओम का प्रतीत भी पदार्थों के संयोग से अपनी इच्छा की पूर्ति करता है। मन्दिरों की ये तथाकथित अश्लील मूर्तियां भी उसी परमानन्द की प्रतक हैं।

सत्यान्वेषी ऐहिक सुखों से अपने को अलग रखता है, क्योंकि उसका सच्चा सुख तभी है: जब वह स्वयं को भूलकर परब्रह्म में लीन हो जाये। परमानन्द का वर्णन शब्दों द्वारा सम्भव नहीं। हमारा महानतम सुख उसकी प्रतिच्छाया मात्र है। प्रेम के व्यापार ही उस चरम लक्ष्य के प्रतीक हैं और इसी भावना से प्रेरित होकर सभी मानव प्रेम व्यापार मन्दिरों में मूर्तिमान कर कामशास्र के ८४ आसनों का उनमें सन्निवेश किया गया है। ८४ आसनों को मंदिरों में उत्कीर्ण कराने का मुख्य उद्देश्य यही था कि लोग उनसे सुपरिचित हों, जिससे उन्हें सांसारिक जीवन में पूर्णता प्राप्त करने के साथ-ही-साथ उनके अनुषंगी ८४ योगिक आसनों के ज्ञानार्जन में सुविधा हो। मन्दिरों में इन आसनों के उत्कीर्ण कराने का यह भी प्रयोजन था कि मंदिर में प्रवेश करनेवाले भक्त की परीक्षा भी हो जाय कि उसे हर वस्तु में ईश्वरत्व का बोध है अथवा नहीं, क्योंकि द्वेैत में परमात्मा की प्राप्ति संभव नहीं।

हिन्दू धर्मशास्रों में यह उपदेश है कि ईश्वर सर्वमय है और इसकी वास्तविक सफलता तभी है, जबकि उन प्रवृत्तियों में भी ईश्वर की झलक प्राप्त हो, जिनमें स्वभावतः ईश्वर का विस्मरण होता है। ये मूर्तियाँ संन्यास की भी कसौटी है। किसी वस्तु का त्याग संभव नहीं, यदि उसका स्वामित्व प्राप्त न हो। इस भांति त्याग भी अनुभूति के बिना संभव नहीं। समस्त ऐहिक सुखों का पूर्ण अनुभव तथा ज्ञान प्राप्त करने के पश्चात् ही ॠषिगण उनका त्याग करते थे, क्योंकि बिना किसी वस्तु के अनुभव किये उसका परित्याग भयावह है। इस सत्य का निर्देश कामसूत्र में भी है। मोक्षार्थी अपने उद्देश्य की पूर्ति वैराग्य द्वारा ही कर सकता है और वैराग्य अनुराग के पश्चात् ही संभव है, क्योंकि मनुष्य की बुद्धि स्वभावतः विषयानुवर्तिनी होती है।

मनुष्य जीवन का उद्देश्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति है। धर्मार्थ-काम-मोक्ष का विभाजन दो श्रेणियों में किया जाता है।

१. भौतिक २. आध्यात्मिक

भौतिक श्रेणी में अर्थ और काम तथा आध्यात्मिक श्रेणी में धर्म और मोक्ष की गणना है। भौतिक सुखानुभूति आध्यात्मिक आनन्द का प्रतिबिम्ब मात्र है। अस्तु, स्पष्ट है कि धर्म का प्रतिबिम्ब अर्थ तथा मोक्ष का प्रतिबिम्ब काम है। इस भांति प्रथम युग्म बन्धन की ओर तथा द्वितीय युग्य मोक्ष की ओर प्रेरित करता है। धर्म तथा अर्थ के प्रेमी सांसारिकता में लीन होते हैं, किन्तु मुमुक्षु उनसे विरक्त होता है।

यह देखा गया है कि बड़े-बड़े सन्त प्रायः अपने प्रारम्भिक जीवन में काम के वशीभूत थे। ऐसे पुरुष सरलता से सांसारिक अनुराग त्याग कर परमात्मा के प्रेम में लीन हो जाते हैं। इस प्रकार सम्भोग-सुख परमानन्द की प्रतिच्छाया मात्र ही नहीं, अपितु वह परमानन्द की ओर प्रेरित भी करता है। सम्भोग-सुख के हर संभव रुप की मूर्तियों द्वारा ज्ञान मस्तिष्क शुद्धि का एक लाभदायक उपाय है, क्योंकि बिना मस्तिष्क की शुद्धि के परमानन्द की अनुभूति सम्भव नहीं। इन्द्रियजन्य सुख में लीन दर्शक को भी ये मूर्तियां आकर्षित करती हैं। वह अपनी मनचाही मूर्ति को देखने हेतु मंदिर के अंधेरे कोने में जाता है और अपने इस प्रयत्न के क्रम में वह स्तम्भों तथा देव-मूर्ति के चारों ओर भी जाता है और तब बहुत संभव है कि वह पुष्प तथा हव्य पदार्थों की सुगन्धि एवं पूजन वाद्यों से प्रभावित मंदिर के वातावरण में भी आकर्षित हो। प्रथम बार वह व्यावहारिक दृष्टि से देवमूर्ति को प्रणाम करेगा, किन्तु बाद में वह क्रमशः मंदिर की बाहरी मूर्तियों का देखना भूलकर देवाराधन में रुचि लेने लगेगा। ये मूर्तियां उन प्रलोभनों की भी भाँति है जो तपश्चर्या से विमुख करते हैं। इनसे भक्त की परीक्षा भी होती है, जो बाहरी मुर्तियों से बिना प्रभावित हुए मंदिर में प्रवेश करता है।

इस भाँति ये मूर्तियाँ यद्यपि देखने में अश्लील हं, किन्तु उनकी अपनी निज की विशेषता है। उनकी दार्शनिक गहराई तथा उनका गूढ़ विवेचन प्रशंसनीय है।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड का मूर्ति शिल्प (Sculpture of Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड का मूर्ति शिल्प (Sculpture of Bundelkhand)

मूर्ति शिल्प के क्षेत्र में बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण योगदान है। गुप्तयुगीन मूर्तियां सीमित मात्रा में प्राप्त हैं। इस युग की मूर्तियों में प्राचीनतम् रामकथा के दृश्य तथा शिवगणों की सुन्दर मूर्तियों नचना कुठार --पन्ना-- में प्राप्त हुई हैं। विष्णु, नृवाराह तथा पशुवाराह की गुप्तयुगीन मूर्तिया ऐरण में मिली हैं। देवगढ़ से शेषशायी विष्णु, नर-नारायण, गजेन्द्र मोक्ष तथा राम और रामायण कथाओं के गुप्त युगीन सुन्दर अंकन मिले हैं। इन मूर्तियों में संतुलित शरीर सौष्ठव, सुन्दर केश विन्यास, झीनें वस्र सूक्ष्म अलंकरण तथा गतिशीलता के दर्शन होते हैं।

प्रतिहार कालीन मूर्तियां बुन्देलखण्ड में प्राप्त हैं। इन मूर्तियों का शरीर सोष्ठव संतुलित है तथा अलंकरण का प्रयोग कम है। बरुवासागर के जरायमठ के प्रवेश द्वार तथा बाह्य दीवारों पर उत्कीर्ण मूर्तियां, देवगढ़ तथा सिरोनखुर्द से प्राप्त मूत्रियों में अंग-प्रत्यंगों का सुचारु प्रदर्शन तथा भावों की अभिव्यक्ति दर्शनीय है।

बुन्देलखण्ड में प्राप्त अधिकांश मध्यकालीन मूर्तियाँ शिला-पटों पर उकेर कर बनाई गयी है। गोलाई में उकेरी मूर्तियां कम हैं। प्रमुख मूर्ति के दोनों ओर के किनारे शार्दूल, मकर आदि से सुसज्जित हैं। इनके प्रभा मण्डल विविध प्रकार के हैं। दोनों ओर विद्याधरों को प्रदर्शित किया गया है। देवों की प्रतिमाएं अलंकृत, रिथिकाओं के अन्तर्गत प्रदर्शित हैं।

बुन्देलखण्ड में ब्राह्मण धर्म की मूर्तियां सबसे अधिक प्राप्त हैं। जैन धर्म की मूर्तियां पर्याप्त संख्या में प्राप्त हुई हैं। बौद्ध धर्म की मूर्तियां कम हैं। आसन, स्थानक तथा शयन तीनों प्रकार की विष्णु मूर्तियां बुन्देलखण्ड में मिली हैं। आसन मूर्तियों में गरुड़ासन, लक्ष्मीनारायण तथा गरुड़ारुढ़ विष्णु की मूर्तियां प्रमुख है। योगासीन विष्णु की मूर्तियां भी प्राप्त हैं। विष्णु की स्थानिक मूर्तियां या तो एकाकी हैं अथवा देव परिवार के साथ। शेषशायी विष्णु की सुन्दर मूर्तियां देवगढ़ तथा बांनपुर में प्राप्त हैं। देवगढ़ में विष्णु के दशावतार तथा वाराह मन्दिर थे। सिरोनखुर्द में वामनावतार की अनेक मूर्तियां मिली हैं। एरन में नृवाराह तथा पशुवाराह की मूर्तियां प्राप्त हैं। पशुवाराह की मूर्तियां झांसी चांदपुर तथा खजुराहों में मिली हैं। चांदपुर की एक मूर्ति में नृसिंह को हिरण्यकश्यप से युद्ध करते दिखाया गया है। वामन अवतार की दो मूर्तियां प्राप्त हैं जो शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए हैं, दूसरी मूर्ति छत्रधारी हैं। त्रिविक्रम की मूर्ति भी बुन्देलखण्ड में प्राप्त हैं। राम की स्वतंत्र मूर्तियां बुन्देलखण्ड में प्राप्त हैं। राम और कृष्ण की लीलाओं से अंकित शिलाप अनेक स्थानों में मिलते हैं इनमें नचना तथा देवगढ़ प्रमुख है। देवगढ़ के दशावतार मन्दिर से विष्णु तथा नर नारायण रुप का सुन्दर अंकन मिला है। सिरोनखुर्द के मन्दिर में हनुमान की प्रतिमा प्राप्त हुई हैं। इसमें हनुमान का मुख विस्फरित है। वे वितर्क मुद्रा में दिखाए गये हैं।

शिवमूर्तियाँ

बुन्देलखण्ड में शिव की मूर्तियां बहुत अधिक मात्रा में मिली हुई हैं। इनमें सामान्य शिव लिंग, मुख लिंग, तथा सहस्त्र लिंग प्राप्त हुए हैं। कालीं की अनेक मूर्तियों में शैव धर्म प्रकट हुआ है। शिव की सौम्य तथा रौद्र दोनों प्रकार की मूर्तियां बुन्देलखण्ड में प्राप्त हैं। चांदपुर में नटराज प्रतिमा अद्वितीय है। चन्देलकालीन मूर्तिकारों ने रावणानुग्रह मूर्ति को प्रभावोत्पादक शैली में रुपायित किया है। शिव-पार्वती की वैवाहित मूर्ति का भी इस क्षेत्र में रुपांकन हुआ है। शिव की गजासुरवध मूर्ति, भैरव तथा नन्दिकेश्वर की प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं। बुन्देलखण्ड में गणेश का अंकन गुप्तकाल से प्रारम्भ हो गया था। देवगढ़ के दशावतार मन्दिर में गणेश की मूर्तियां उकीर्ण हैं। नृत्य गणेश की अनेक प्रतिमाएं बुन्देलखण्ड के संग्रहालयों में हैं। चतुर्भुज गणेश की मूर्ति झांसी संग्रहालय में है। कतिपय मूर्तियों में गणेश को विध्नेश्वरी के साथ आलिंगन मुद्रा में दिखाया गया है।

बुन्देलखण्ड में देवियों की अनेक मूर्तियां मिली हैं। यहां अनेक सप्तमातृका प प्राप्त हुए हैं। ब्रह्माणी, वष्णवी, वाराही, चामुण्डा, वैनायिकी, नरसिंही की स्वतन्त्र मूर्तियां भी प्राप्त हैं। लक्ष्मी, सरस्वती, दुर्गा, पार्वती, गंगा तथा यमुना की मूर्तियां मिली हैं। सिरोनखुर्द में लक्ष्मी की एक स्थानक प्रतिमा प्राप्त है जिसमें अपने दो हाथों में कमल लिए हुए हैं और कमल पर खड़ी हैं। दूधई चांदपुर तथा खजुराहो में सरस्वती की प्रतिमाएं प्राप्त हैं। प्रतिहारयुगीन महिषमर्दिन की अनेक प्रतिमाएं जरायमठ बरुवासागर में है। उत्तर गुप्तयुगीन दुर्गा की एक मूर्ति देवगढ़ की सिद्ध घाटी में विद्यमान है। तपस्वनी पार्वती की अनेक मूर्तियां बुन्देलखण्ड में मिली हैं। आधे पशु और आधी स्रियों की देवी प्रतिमाएं लोखरी --बांदा-- में सैकड़ों की संख्या पर प्राप्त है जो कला की अद्भुत प्रतीक हैं।

सूर्य की पूजा बुन्देलखण्ड में प्रचलित थी। सूर्य की अनेक स्थानक तथा आसन प्रतिमाएं इस क्षेत्र में मिली हैं। खजुराहो, उमरी, मड़खेरा, रहलिया तथा रहली में सूर्य मन्दिर स्थित हैं। सूर्य के अनुचर पिंगल तथा दण्डी के स्वतन्त्र मूर्तियां मिली हैं। एक मूर्ति में सूर्य पुत्र रेवन्त को पिंगल के साथ अवश्वारुढ़ दिखाया गया है। ब्रह्मा की अनेक मूर्तियां एकाकी शक्ति के साथ आलिंगन मुद्रा में प्राप्त हैं। खजुराहो में ब्रह्मा की अनेक मूर्तियां हैं इस क्षेत्र में नवग्रह के प प्रतिहार कालीन तथा मध्य कालीन हैं। अष्टदिक्पालों की अनेक मूर्तियां मन्दिर के जंघा भाग में अंकित हैं कार्तिकेय की मूर्तियां भी मिली हैं। इनमें इन्हें त्रिमुख दिखाया गया है। सामूहित देवांकन में पंचगणेश तथा द्वादशादित्य उल्लेखनीय है। कतिपय मूर्तियां मातृ तथा शिशु की भी प्राप्त हैं। बुन्देलखण्ड में समन्वयात्मक प्रतिमाएं भी प्राप्त हैं। हरिहर, अर्द्धनारीश्वर, हरिहर पितामह, हरिहर हिरण्यगर्भ सूर्य की प्रतिमाएं खजुराहों तथा अन्य स्थानों पर प्राप्त हैं।

बुन्देलखण्ड में जैन धर्म का काफी प्रसार हुआ है। दूधई चांदपुर, सिरोनखुर्द, बानपुर, मदनपुर, पावागिरि तथा खजुराहों में आसन तथा स्थानिक तीर्थकंर प्रतिमाएं प्राप्त हैं। कतिपय मूर्तियों में चमकदार ओष भी है। ॠषभनाथ, पार्श्वनाथ तथा महावीर की मूर्तियों के अतिरिक्त अम्बिका तथा चक्रेश्वरी की प्रतिमाएं अधिक मिली है। देवगढ़ में बाहुबली की प्रतिमाएं मिली हैं। दिगम्बर तथा श्वेताम्बर दोनों सम्प्रदाय प्रभावशाली रहे। लक्ष्मी तथा सरस्वती की प्रतिमाएं जैन धर्म में सम्मिलित कर ली गयी थीं। महोबा में सिंहनाद अवलोकितेश्वर, पद्मपाणि अवलोकितेश्वर तथा देवी तारा की प्रतिमाएं मिली हैं। खजुराहो में बुद्ध प्रतिमाएं प्राप्त हुए हैं जो कमल पर पद्मासन में स्पर्श मुद्रा में विराजमान हैं।

खजुराहों की शार्दूल तथा व्याल मूर्तियां उल्लेखनीय हैं। नृत्य, संगीत, कामकला तथा लोकजीवन के अनेक दृश्यों का बुन्देलखण्ड की मूर्तिकला का रुपांकन हुआ है। कार्यरत शिल्पियों का सुन्दर अंकन एक शिलाप पर प्राप्त हुआ है। मिथुन तथा दम्पति आकृतियां सुर-सुन्दरी की अनेकानेक प्रतिमाएं, सती स्तम्भ आदि भी मिले हैं। बुन्देलखण्ड मूर्तिकला रुपांकन में अनन्यतम स्थान प्राप्त किये हुए हैं। जराय मन्दिर बरुवा सागर की पट्टिका में एक नायिका अपने केशों को निचोड़ रही हैं और उससे गिरती हुई मोती जैसी बूंदों को हंस मुक्ता समझकर पान कर रहा है। इस अंकन की यहां कई बार पुनरावृत्ति की गयी है। पंख फैलाकर नृत्य करते हुए मयूर से बना कला अभिनय विशेष रुप से दृष्टव्य है। 

बुन्देलखण्ड की चित्रकला

चित्रकला के क्षेत्र में बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण योगदान है। प्रागैतिहासिक चित्र केन, बेतवा, बागें आदि नदियों के तट के अतिरिक्त पर्वतीय उपत्यकाओं में भारी संख्या में प्राप्त हैं। पुरातात्विक उत्खननों में मृत्पात्रों पर विभिन्न आकृतियों का चित्रण प्राप्त है। भित्ति और कागज पर भी चित्र अंकित किए जाते थे। यहां की चित्रकला पर बूंदी कोटा --राजस्थान-- चित्रशैली का प्रभाव है। इसका कारण यह है कि बुन्देल राजाओं का राजस्थानी राजपरिवारों से सम्बद्ध रहा है तथा कदाचित राजस्थान के कतिपय चित्रकार यहां आये हों। बुन्देलखण्ड में महाकवि केशवदास की रसिकप्रिया, कविप्रिया तथा मतिराम के रसराज का चित्रांकण हुआ है। बुन्देलखण्ड की चित्रकला पर मालवा का भी प्रभाव है।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड की वास्तुकला (Architecture of Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड की वास्तुकला (Architecture of Bundelkhand)

बुन्देलखण्ड में वास्तुकला का विकास दुर्गवास्तु तथा मन्दिरवास्तु के रुप में हुआ। कालीं तथा एरण दुर्ग का निर्माण ईसा की प्रथम शती में अनुमानतः प्रारम्भ हुआ। गुप्त युग में अनेक मन्दिरों का निर्माण हुआ। पन्ना जिले के नचना ग्राम में स्थित पार्वती मन्दिर का निर्माण पांचवी शती में हुआ। यह एक उच्च जगती पर स्थित है तथा इसके गर्भ गृह का द्वार पश्चिम की ओर है इसके द्वार में अलंकरणों के अतिरिक्त गंगा और यमुना की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। गर्भ गृह की छत सपाट है। द्वार के सम्मुख वर्गाकार खुला हुआ स्थान है। गर्भ गृह में प्रकाश तथा वायु के प्रवेश के लिए उत्तरी तथा दक्षिणी दीवालों में जालीदार गवाक्ष हैं। गर्भ गृह की ऊपरी मंजिल सादी है। सागर जिले के ऐरण नामक स्थान में वाराह, विष्णु तथा नरसिंह मन्दिर स्थित हुए। भू विन्यास में वाराह मन्दिर का गर्भ गृह एक मण्डप से युक्त था। छत सपाट रही होगी। विष्णु मन्दिर चार ऊँचे स्तम्भों पर आश्रित है, इसमें गंगा और यमुना को गर्भगृह द्वार में दिखाया गया है। नरसिंह मन्दिर भी भग्नावस्था में है। ललितपुर जनपद के देवगढ़ में दो गुप्तयुगीन मन्दिर हैं। प्रथम वाराह को समर्पित है। इसके गर्भगृह में नृवाराह की मूर्ति प्रतिष्ठित है। इसका निर्माण दशावतार मन्दिर से पूर्व अनुमानित है। दूसरा मन्दिर विष्णु को समर्पित है, यह विस्तृत जगती पर निर्मित है। गर्भ गृह वर्गाकार ९'९'' है। छत सपाट शिखर से मण्डित हैं, गर्भगृह द्वार में प्रतिहारी मिथुनाकृतियां गण आदि उत्कीर्ण हैं। ऊपर गंगा तथा यमुना प्रतिष्ठित है। ललाट बिन्दु पर विष्णु की मूर्ति है। यह मन्दिर गुप्तकालीन वास्तुकला की परिपक्वता का प्रतीक है। इसका निर्माणकाल छठी शती ईसा है। पन्ना जिले में चतुर्मुख का मन्दिर गुप्तोत्तर युगीन - सातवीं शती का है। इसका गर्भगृह साढ़े तेरह फीट वर्गाकार है। गर्भ गृह में चतुर्मुखी शिवलिंग प्रतिष्ठित है, इसके ऊपर ऊँचा शिखर है।

बुन्देलखण्ड में दशार्ण शैली का विकास हुआ। ऐरण की गुप्तयुगीन विष्णु प्रतिमा में गोलाकार प्रभा मण्डल, शैल के विकसित स्वरुप का प्रतीक है। बुन्देलखण्ड में गुर्जर प्रतिहार युगीन अनेक मन्दिर हैं। प्रारम्भ के मन्दिरों में अन्तराल के साथ मुख मण्डप भी सम्बद्ध हैं। मण्डप में वातायन भी हैं। प्रारम्भिक मन्दिर सपाट थे किन्तु उत्तरकालीन मन्दिरों में क्षिप्तवितान बनाये गये। छत भी शिखराकार उठती हुई अलंकृत है, शिखर के शीर्ष पर चन्द्रिका कलश है। ललितपुर जिले में कुरईया वीर का मन्दिर प्राचीनतम है। वर्तमान में यहाँ कोई मूर्ति प्रतिष्ठित नहीं है। गर्भ गृह के पश्चिमी दीवार में मयूर पर विराजमान कार्तिकेय की मूर्ति लगी है। इस काल का भव्य मन्दिर वरुवासागर के समीप देवी को समर्पित है। मन्दिर में वर्गाकार गर्भगृह अन्तराल तथा मण्डप से विनिर्मित है, गर्भगृह पंचरथ है। मन्दिर पंचायतन शैली का था। गर्भगृह की छत क्षिप्तवितान प्रकार की है। गर्भगृह द्वार अलंकरणों से सुसज्जित है। मन्दिर का द्वार नवीं शती में बना हुआ है। प्रतिहार युगीन मन्दिर टीकमगढ़ जनपद के मड़खेरा में प्राप्त है। मन्दिर सूर्य को समर्पित है। भू विन्यास में गर्भगृह अन्तराल तथा मण्डप से विनिर्मित हैं, इसका मुख पूर्व की ओर है। शिखर के ऊपर आमलक है। जगती के ऊपर इसकी ऊँचाई ७० फीट है। इसी प्रकार का मन्दिर उमरई में भी प्राप्त है। ललितपुर के निकट देवगढ़ में दो मन्दिर प्रतिहार युगीन हैं। गर्भगृह के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ है। गर्भगृह द्वारा देवों तथा देवियों से अलंकृत है। मन्दिर की ऊँचाई ६० फीट है। दूसरा मन्दिर अपेक्षाकृत छोटा है। गर्भगृह में खडगासन तथा कायोत्सर्ग मुद्रा में तीर्थकर प्रतिमा प्रतिष्ठित है। ११वीं शदी मे कक्षपघातों ने मन्दिरों का निर्माण कराया।
एरक्ष की मस्जिद इस्लामी कला का सुन्दर नमूना है। इसके बीच के बड़े गुम्बद के चारों ओर छोटे गुम्बद है, बड़ा गुम्द स्तम्भों पर आधारित है। मस्जिद पर अभिलेख के अनुसार इसकी नींव ७११ हिजरी में पड़ी थी। चन्देरी का बादल महल, मदरसा तथा शहजादी का रोजा भी इस्लामी वास्तुकला की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं।

बुन्देली स्थापत्य शैली का प्रारम्भ महाराज वीरसिंह देव ने किया उन्होंने ओरछा तथा दतिया में राजमहलों का निर्माण कराया। उनकी परम्परा को महाराज क्षत्रसाल ने आगे बढ़ाया। बुन्देलील स्थापत्य शैली में हिन्दू एवं मुस्लिम कला का सुन्दर सम्मिश्रण है। (जहांगीर) महल ओरछा, दतिया का महल, धुवेला में महाराज छत्रसाल तथा महारानी कमलावती की समाधि। पन्ना में छात्रसाल उद्यान के पीछे बुन्देली राजाओं की समाधियां आदि बुन्देलखण्ड की मौलिक कला के प्रतिरुप हैं। महामति प्राणनाथ के मन्दिर भी इसी शैली को अपनाया गया। शिखर, कोनों में सहायक गुम्बद तथा गुम्बदों के नीचे पालकी के आकार का तोरण विशुद्ध रुप से बुन्देली शैली का प्रस्तुतीकरण है। गुम्बदों के किनारे चारों ओर से मेहराबदार सज्जा गुम्बदों, के सौंदर्य को द्विगुणित करती है। तल के मुख्य द्वार पर ज्यामितीय आकृतियां फूल पत्ते बेलें आदि निर्मित हैं। दतिया स्थापत्य कला की निम्न विशेषताएं हैं। १. वर्गाकार भवन, २. सिंहपौर - कई मंजिला भवन, ३. बड़े प्रकोष्ठ, खुली दालान, ४. सिंहपौर, ५. चौकोर आंगन, ६. धनुषाकार कंगूरे, ७. जालीदार झिंझरी।
गोविन्द मन्दिर दतिया --नरसिंहदेव महल-- सतमंजिला है। ८४ गज लम्बा उतना ही चौड़ा है। इसमें २६ प्रवेश द्वार, १६ आंगन तथा ४४० कमरे हैं। दो मंजिलें जमीन के नीचे है। दक्षिण में विशाल कर्णसागर झील है। जहाँगीर महल --ओरझा-- तीन मंजिला है। इसमें अष्टकोणीय आठ स्तूप हैं।

--संकलित- 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - आल्हाखंड और अल्हैत (Alha-khand and Alhayait)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

आल्हाखंड और अल्हैत (Alha khand and Alhayait)

जगनिक, जगनायक, जगतसिंह की जन्मभूमि सकोहा --जगनेर-- तहसील हटा --दमोह-- में मानी जाती है। इनका काव्य काल ११६५ ई: से १२०३ ई. है। जगनिक भाट चन्देल नरेश परिमर्दि --परमाल-- के आश्रित थे। इनके दो ग्रन्थ "आल्हाखण्ड तथा परमाल रासो' लोक भाषा के प्रथम मौखिक काव्य माने जाते हैं। इनका लिखित स्वरुप परिमार्जित होता गया। इसकी प्राचीनतम लिखित प्रति फर्रुखाबाद के कलेक्टर सर चाल्र्स इलियट को सन् १८६५ ई. में प्राप्त हुई। इसमें २३ खण्ड तथा ५२ युद्धों का वर्णन है। आल्हा का पाठ करने वाले अल्हैत कहलाते हैं। मदनपुर --झांसी-- के मंदिर में प्राप्त शिलालेख से पता चलता है कि वीर आल्हा सं. १२३५ --११७८ ई.-- में विद्यमान थे। बुन्देलखण्ड में आल्हाखण्ड का पाठ प्रायः सावन के महीने में गांव के चौपालों में होता है जब बादल घिरे रहते हैं और वर्षा होती रहती है।

आल्हा खण्ड की रचना सन् ११४० ई. मानी जाती है। इस ग्रन्थ से प्रेरणा पाकर लगातार आठ सौ वर्षों तक आल्हा पर आधारित ग्रन्थों की रचना होती रही जिनमें से कतिपय ग्रन्थ निम्नांकित हैं।

१. कजरियन को राछरो - १३वीं १४वीं शती
. महोबा रासो - १५२६ ई.
. आल्हा राईसो - १७वीं शती
. वीर विलास --ज्ञानी जू राइसो-- - १७४१ ई.
. पृथ्वीराज दरेरो - १८वीं शती
. आल्हा --शिवदयाल "शिबू दा' कमरियाकृत--
. पृथ्वीराज राईसो तिलक --दिशाराम भट्ट-- १९१९ ई.
८. आल्हा रासौ --लाला जानकीदास, टीकमगढ़ से प्राप्त-- - सं. १९१८ ई.

आल्हा गायक पीरखां --मूसानगर कानपुर-- कालीसिंह, तांती सिंह ने आल्हा गायकी का विकास किया। बरेला --हमीरपुर-- के गायक कानपुर के रामखिलावन मिश्र, उन्नाव के लल्लू राम बाजपेयी, हमीरपुर के काशीराम प्रसिद्ध आल्हा गायक हैं। श्री बच्चा सिंह द्वारा महोबा में आल्हा गायन प्रशिक्षण विद्यालय "जगनिक शोध संस्थान' द्वारा स्थापित है। उन्नाव के लालू बाजपेयी ने गायकी को प्रदर्शनकारी कला बनाया है।

म.प्र. आदिवासी लोक कला परिषद भोपाल ने तीन वर्ष में आल्हा खण्ड के पैंतिस पाठों का दस्तावेजीकरण किया है। सन् १९९३ में आल्हागायकी की चारशैली - महोबा, दतिया, सागर और नरसिंहपुर गायकों की प्रचलित पाई गई। इनके द्वारा गाये १४ युद्धों का संकलन तैयार किया गया। दतिया गायकी के प्रणेता स्व. श्री गंगोले थे। उन्होंने गायकी को शास्रीय संगत का पुट दिया। गायकी की शैली के दूसरे चरण में २१ ऐतिहासिक लड़ाइर्यों का दस्तावेजीकरण हो रहा है। भोजपुर --बिहार-- क्षेत्र में आल्हा अत्यन्त लोकप्रिय वीर रस प्रधान लोक गाथा है। छिन्वाड़ा म.प्र. में आल्हा-ऊदल माहिल आदि की सवारियां घोड़ों पर कजलियों के मेले के अवसर पर निकलती है तथा आल्हा का गायन सामूहिक रुप से होता है।

अ.    चढ़ी पालकी मल्हना रानी, जगनेरी में पहुँची जाये
गओ हरकारा जगनायक पै, जगनिक सो कही सुनाय
मल्हना आई दरवाजे पै जल्दी चलो हमारे साथ
जगनिक आये और द्वार पै मल्हना छाती लियो लगाय
रो रो मल्हना बात सुनाई हम पै चढ़ै पिथौरा राय
नगर महोबा उन धिरवा लओ फाटक बन्द दये करवाय
विपत्ति हमारी मेटन के हित तुम आल्हा को ल्यावो मनाय
मल्हना बोली कातर हुई के, जगनिक संकट होय सहाय
धन्य जनम है वा क्षत्री को परहित सीस देव कटवाय
जग में सुख के साथी सब ही दुख में बिरलेहोय सहाय
पवन बछैरा हरनागर दो तो हम आल्हा पै चलि जाय
मल्हना जगनिक के संग लौटी ब्रह्मानन्द को लियो बुलाय
जगनिक साजै घोड़ा साजो आरति करी मल्हन के नार
लाज काज सब हाथ तुम्हारे नैइया खेय लगइयो पार
फॉदि बछेड़ा पर चढ़ बैठे मनियादेव के चरण मनाय
सबै देवतन को सुमिरनकर जगनिक कूच कियो करवाय

ब.    बारह बरस लौ कुकूर जीवै और तेरा लै जियै सियार।
बरिस अठारह क्षत्री जीवै, आगे जीवन को धिक्कार।

१. "आल्हा वीरत्व की मनोरम गाथा है जिसमें उत्साह गौरव और मर्यादा की सुन्दर अभिव्यक्ति हुई है। आल्हा मूलतः सामान्य लोगों के शौर्य, आत्मत्याग, उत्सर्ग व पौरुष का अद्भुत चित्रण करता है। इन युद्धों में पांच नेगी - ब्राह्मण, बारी, नाई, धोबी और माली शौर्य दिखाते हैं। आल्हा प्रेम सौहार्द्र, एकात्म और सद्भावना का संदेश देता है। साम्प्रदायी सौहार्द्र का अनुपम उदाहरण है। आल्हा की सम्प्रेषणीयता का रहस्य इसकी जनभाषा में निहित है। इसी कारण शताब्दियों से लोक कंठ और लोक स्मृतियों में अक्षुण्ण है उसका कलेवर और कथा बदलती रही फिर भी उसकी लोकप्रियता रामचरित मानस से किसी प्रकार कम नहीं है।' इसमें निम्नवर्ग का उच्च वर्ग के प्रति विद्रोही चेतना का स्वर गुंजित होता है।

- गोविन्दरजनीश

२. आल्हाखण्ड औरतों के लिये पुरुषों द्वारा लड़ी गयी लड़ाइयों का काव्य है।

३. हिन्दी लोकसाहित्य में रामचरित मानस के उपरान्त किसी अन्य काव्य को आल्हाखण्ड के समान लोकप्रियता प्राप्त नहीं है।

- पं. परमानन्द 

 

ईसुरी

हरताल ईसुरी का जन्म चैत्र शुक्ल १० सं. १८९८ वि. में ग्राम मेढ़की जिला झांसी में हुआ था। इनके पिता का नाम भोलेराम अरजरिया था। वे कारिन्दा स्वरुप चतुर्भुज जमींदार के पास कार्य करते थे। उन्हें बगौरा बहुत प्रिय था। उनका निधन अगहन शुक्ल ६ सं. १९६६ वि. --सन १९०९-- में हुआ था। ईसुरी स्वयं फाग रचते व गाते थे। सुन्दरियां एवं गंगिया --द्वय रंगरेजियन बहिने-- नाचती थी। फाग का नामी गवैया धीरे पंडा था।
ईसुरी भारतेन्दु युग के लोकप्रिय कवि तथा पं. गंगाधर व्यास के समकालीन थे। ग्राम्य संस्कृति एवं सौन्दर्य का वास्तविक चित्रण उनकी चौकड़ियों में प्रतिबिम्बित है जो नरेन्द्र नामक छन्दों में लिखे गये हैं। रजऊ उनकी काल्पनिक प्रेमिका-सामान्य सजनी का प्रतीक है। वे प्रेम के अप्रतिभ कलाकार हैं। पं. गौरी शंकर द्विवेदी ने उनकी फागों का प्रथम संकलन तैयार किया था। पेकिंग --चीन-- विश्वविद्यालय में ईसुरी पर शोध कार्य --निर्देशक डा. ओ.पी. सिंघल, दिल्ली विश्वविद्यालय-- सम्पन्न हुआ है।

जो तुम छैल छला हो जाते परै उँगलियां राते
मौ पूछत गालन खो लगते कजरा देख दिखाते
घड़ी-घड़ी घूंघट खोलन में न सामने राते
मैं चाहत नख में बिन्दते हाथ जाइ खा लाते
ईश्वर दूर दरस के लाने ऐसे काय ललाते।।१।।
बखरी रइयत है भाड़े की, दई प्रिया प्यारे की।
कच्ची भीत उठी माटी की, छाई फूस चारे की।।२।।
आसौं दे खओ साल करौटा, करो खाओ सब खौटा
गोऊ पिसौ को गिरुवा गगओ महुअन लग गओ लौका
ककना, दौरी सब घर खाये रै गयो फखत अनोटा
कहति ईसुरी बाँधे लइयों जबर गाँठ कौ खोटा।।३।।
यारो इतना जस कर लीजो चित्त अंत न कीजो
गंगा जू लौ मरे ईसुरी दाग बगौरा दीजो।।४।।

रामायण तुलसी कही, तानसेन ज्यों राग
साई या कलिकाल में, कही ईसुरी फाग
फागैं ईसुरी जैसी नोनी, भई न आगे होनी
बानी ऐसा सब कोई समझे, बातें हियो गड़ोनी


रस भीगे

- श्री शोभाराम श्रीवास्त

डॉ. ब्रजभूषण सिंह "आदर्श' के अनुसार भारतेन्दु युग में लोककवि ईसुरी को बुन्देलखण्ड में जितनी ख्याति प्राप्त हुई उतनी अन्य किसी कवि को नहीं। श्री राजेन्द्र श्रीवास्तव ने बुन्देलखण्ड के फाग गीत शीर्षक लेख में लिखा "ग्राम्य संस्कृति का पूरा इतिहास केवल ईसुरी के फागों में मिलता है। प्रेम, श्रृंगार, करुणा, सहानुभूति, हृदय की कसक एवं मार्मिक अनुभूतियों का सजीव चित्रण ईसुरी की फागों में मिलता है। दिल को छूने और गुदगुदानें की अद्भुत क्षमता ईसुरी के फागों में है। नायिका के रुप वर्णन का रस फागों में सर्वत्र बिखरा है।

१.    हमका बिसरत नई बिसारी, हेरन हंसी तुम्हारी।
जुवन विशाल चाल मतवारी, पतरी कमर इकारी।
भौंअ कमान बना के ताने, न तिरीछी मारी।
ईसुर कांत हमारे को दौ, तनक हेर लौ प्यारी।

प्रिय मैं तुम्हारी मुस्कुराती हुई नजर भुलाना चाहते हुए भी नहीं भुला पा रहा हूँ। तुम्हारे विशाल पयोधर, मतवाली चाल और इकहरी पतली कमर है। तुम्हारी भौयें धनुष-बाण सी तनी हुई है जिनसे तुम तिरछी नजर मारती हो। हे प्रिय एक बार मेरी ओर भी इसी मुस्कुराती हुई न से देखो।

२. श्रीफल धरै फरै चोली में, मदरस चुअत लली को।
लेत पराग अधर के ऊपर, विकसों कमल कली को।
ईसुर कान्त बचायों रहियो छिये न छेल गली को।

यह तनी रुपी बगीचा प्रियतम के लिए है इसे सुहाग के अमृत से सींचा गया है। चोली में श्रीफल रुपी उरोज फले हैं जिनसे मदन रस टपकता है। कमल के फूल के समान अधरों से पराग लिया जाता है। ईसुरी कहते हैं इन उरोजों और अधरों को गली के रसिकों से बचाये रखना वे इन्हें छू न पायें।

३.    जोवन मढियादार कलश भरे कारे बूंदा के।

नायिका के कुच छोटे मन्दिर के समान हैं। जिनमें कलश के रुप में काले रंग का बूंदा --बिन्दी का र्पुिंल्लग-- रखा हुआ है। --कवि का संकेत कुचाग्रों की ओर है।--

४.    जोअना दैय राम ने तोरे, सब कोई आवत दौरे।
आय नहीं खॉड़ के धुल्ला पिये लेत न घोरे।
का भओ जात हाथ के फेरे, लेत नहीं कछु तोरे।
पंछी पिये घटे नहीं जाती, ईसुरी प्रेम हिलोरें।

ईश्वर ने तुम्हें उरोजों का उपहार दिया है। इन्हें के कारण लोग तुम्हारे पास दौड़े-दौड़े आते हैं। ये शक्कर के चने खिलौने नहीं हैं कि कोई इन्हें घोलकरपी जायेगा। इन पर जरा हाथ फेरने से क्या होगा, कोई इन्हें तोड़ तो नहीं लेगा, ईसुरी कहते हैं कि पक्षी के जल पीने से समुद्र की हिलोरें कम नहीं होती।

५. फूट जात नैचे की कलिया, टूट जाय दो कोने।
जौन वसत को गुदरी सौ, भौ ऊखौ उखरी होने।
अबई विशाल छाल हो जाने, जै गालन के कोने।
सबरे मन्त्र सासरे ईश्वर, जान न देत निरोने।

जब तक रजऊ --काल्पनिक नायिका-- ससुराल नहीं गई हे तभी तक उसके उरोज ठीक है। गौना होते ही उसकी नीचे की कलियाँ फूट जयेगी और कुचाग्र टूट जायेंगे। अंगूठी की मुंह जैसी वस्तु उखरी बन जायेगी। गाल फैलकर चौड़े हो जायेंगे। ईसुरी कहते हैं कि ससुराल जाने पर नायिका की कोई भी चीज साबित नहीं रहती है।

६.    जुबना बीते जात लली के, पड़ गै हाथ छली के।
कसे रैत चोली के भीतर, जैसे फूल कली के।
कात ईसुरी मसके मोहन, जे है कोउ भली के।

नायिका के उरोज लटकने लगे हैं वे किसी छलिया के हाथ पड़ गये हैं, वह उन्हें मुहल्ला गली में चाहे जब मसकता रहता है, इससे वे नीचे को ढलने लगे। वह तो उन्हें अपनी चोली में कसकर छिपाये रहती है जिस प्रकार कली चटकने पर फूल खिलता है। उसी प्रकार चोली खोलने पर सारा यौवन उमड़ पड़ता है। ईसुरी कहते हैं कि ये उरोज इतने अच्दे हैं कि मोहन --रसिक-- के मसलने काबिल हैं, किसी छलिया के नहीं। ये किसी संभ्रात महिला के हैं।

७. रोजऊ हँस-हँस के मन भरती, कबहुँ न मन की करती।
देती नहीं दगाबाजी की, जेई बात अखरती।
हमसे सदा अदैनी राती औरउ रोज बितरती।
छिपा न राखी खुलकै कै दो, कौन बात खाँ डरतीं।
तुममें प्रान अटक रय ईसुर, आंखन से न टरतीं।

तुम रोज हंस-हंस के मेरा मन भरती हों पर मेरे मन की इच्छा कभी नहीं पूरी करती तुम मुझे देती नहीं हो तुम्हारी ये दगाबाजी हमेशा अखरती रहती है, तुम मुझसे रोज छरकती रहती हो और दूसरों को रोज बांटती हो तुम खुलकर मुझे बताओ कि तुम्हें काहे का डर है। ईसुरी कहते हैं कि मेरे प्रान तो तुम पर अटके हैं तुम मेरी आंखों से दूर नहीं होतीं।

८.    हमसे चुमवा लो जा मुइया, फिर पछतैहो गुइयां।
प्यारे लगे कपोल गोल दो, परे हसत में कुइयां।
चार दिना की जा फुलवारी, हो न जाय उजरैयां।
ईसुर कहत कहुँ बैठी देखी है, सूखे आम पै टुइयां।

हे प्यारी, हमसे एक बार अपना मुंह चुमवा लो। तुम्हारे दोनो गोल-गोल गाल बड़े प्यारे लगते हैं जब तुम हंसती हो, तो इनमें गड़ढे पड़ जाते हैं इसे उजड़ने न दो। यौवन की ये फुलवारी चार दिन की है। ईसुरी कहते हैं कि तुमने कहीं सूखे आम पर मैना बैठी देखी है। यौवन की ये फुलवारी उजड़ गयी तो कोई पूछने वाला नहीं है।

९.    इनको गरब करो सो नाहक, जे न भये किसी के।
ऐसे बिला जात हैं जैसे, बलबूला पानी के।
ईसुर मजा लूट लो ईसे, अपनी इस ज्वानी के।

किसी का यौवन सदा नहीं रहा। अगर किसी का रहा होय तो हमें बताओ इस यौवन पर घमण्ड नहीं करना चाहिए। यह किसी का नहीं, यह ऐसे समाप्त हो जाता है जैसे पानी का बुलबुला। ईसुरी कहते हैं कि अपनी इस जवानी का भरपूर मजा लूट लो।

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - मंदिरों की तालिका (Table of temples)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

मंदिरों की तालिका (Table of temples)

क्र.

मंदिरों के नाम संबद्ध संप्रदाय निर्माण काल निर्माण सामग्री

स्थिति

1. कंदरिया महादेव शिव १००० ई. कणाश्म लाल बलुआ पत्थर  
2. चौसठ योगिनी मंदिर   ७वीं ८वीं के बीच स्थानीय कणाश्म पत्थर

दक्षिण पश्चिम

3. विश्वनाथ मंदिर शिव १००२- ०३ ई.  

उत्तर पूर्व

4. मातंगगेश्वर मंदिर शिव ९५०- १००२ ई.  

उत्तर किनारे

5. वराह मंदिर वैष्णव ९५०- १००२ ई. कणाश्म पत्थर  
6. लालगुआं महादेव शिव ८वीं शताब्दी बलुआ पत्थर कणाश्म

दक्षिण समूह

7. घंटाई मंदिर जैन १०८५ ई. बलूआ पत्थर  
8. आदिनाथ मंदिर जैन १००० ई. बलूआ पत्थर  
9. पार्श्वनाथ मंदिर जैन ९५४ ई. बलूआ पत्थर

पूर्वी समूह

10. शांतिनाथ मंदिर जैन १०२८ ई. बलूआ पत्थर

पूर्वी समूह

11. देवी जगदंबीका मंदिर
 
वैष्णव ९७५ ई. बलूआ पत्थर

पूर्वी समूह

12. चित्रगुप्त मंदिर सूर्य ९७५ ई. कणाश्म लाल पत्थर

पूर्वी समूह

13. लक्ष्मण मंदिर वैष्णव ९५४ ई. खार पत्थर

पश्चिमी समूह

14. महादेव मंदिर शैव ९५०- १००८ई. कणाश्म पत्थर

पश्चिमी समूह

15. देवी मंदिर वैष्णव ९५०- १००२ ई. बलुआ पत्थर

पश्चिमी समूह

16. नंदी मंदिर
 
वैष्णव २००२ ई.
 
बलुआ पत्थर
 

पश्चिमी समूह

17. पार्वती मंदिर
 
वैष्णव ९५०- १००२ ई.
 
बलुआ पत्थर
 

उत्तर पूर्व

18. ब्रह्मा मंदिर
 
वैष्णव ९२५ ई.
 
धार- खार शिला
 

पूर्वी किनारे

19. जवारी मंदिर
 
वैष्णव
 
९५०- ९७५ ई.
 
बलुआ पत्थर
 

उत्तर की ओर

20. चतुर्भुज मंदिर
 
वैष्णव १००० ई.
 
बलुआ पत्थर
 

खुंडर नदी केपास

21. दुल्हादेव मंदिर
 
शैव १००० ई.
 
बलुआ पत्थर
 

पश्चिम की ओर

22. खकरामठ मंदिर
 
वैष्णव
 
९५०- १०५० ई.
 
धारशिला बलुआ पत्थर
 

पूर्व की ओर

23. हनुमान मंदिर
 
वैष्णव ९२२ ई.
 
धार शिला बलुआ पत्थर
 

पूर्व की ओर

 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड के लोक-देवता (Bundelkhand's folk deities)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड के लोक-देवता (Bundelkhand's folk deities)

लोक देवताओं में बुन्देलखण्ड में सर्वाध्कि समावृत और पूज्य हरदौल का स्मरण यहाँ के प्रत्येक परिवार में विवाह के अवसर पर अवश्य किया जाता है, उन्हें आमंत्रित किया जाता है। गांव-गांव में उनके चबूतरे बने हुए हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी को देवशयनी एकादशी कहा जाता है। यहां उस दिन साभी देवी-देवताओं को पूजने का प्रचलन बहुत प्राचीनकाल से चला आ रहा है। उस दिन हरदौल की भी पूजा की जाती है। हरदौल औरछा नरेश वीरसिंह देव बुन्देला के पुत्र थे। इनके बड़े भाई जुझार सिंह जब ओरछा की गद्दी पर आसीन हुए तो राज्य का सारा काम उनके छोटे भाई हरदौल ही देखा करते थे। वे उस समय के अप्रतिम वीर, सच्चरित्र तथा न्यायपरायण व्यक्ति थे। बुन्देलखण्ड में राजा के छोटे भाई को दीवान कहा जाता है। दीवान हरदौल की इस कीर्ति से जकर किसी चुगलखोर ने राजा जुझार सिंह से शिकायत की कि दीवार हरदौल के रानी से अनुचित सम्बन्ध हैं। राजा को चुगलखोर की यह बात सच प्रतीत हुई। वास्तव में विनाशकाले विपरीत बुद्धि हो ही जाती है। इन्होंने अपनी रानी को आदेश दिया कि वह अपने को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए हरदौल को अपने हाथ से विषाक्त भोजन का थाल प्रस्तुत करे। नारी के सतीत्व और गरिमा के कोमल तन्तु कितने क्षीण होते हैं कि सन्देह के श्वास से ही छिन्न-भिन्न होने लगते हैं पर हरदौल तो लक्ष्मण के समान अपनी मातृ स्वरुपा भावज के लिए सदा से ही नित्य पादाभिवन्दन के समय नूपुरों से ऊपर कभी उकनी दृष्टि गई ही नहीं, उठी ही नहीं। अतः उन्होंने अपनी भावज को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए हलाहल का पान कर प्राणोत्सर्ग किया। वे मानव की कोटि से ऊपर उठकर देवकोटि में प्रतिष्ठित हुए। उनके साथ उनके अनुचर मेहतर ने भी प्रतिदिन की भांति उस दिन भी उनके जूठे प्रसाद को पाकर अमरत्व और देवत्व प्राप्त किया। जहाँ जहाँ हरदौल के चबूतरे बने हैं, उसके समीप ही मेहतर बाबा का छोटा चबूतरा भी पूज्य बन गया है। इस प्रकार बुन्देलखण्ड में ही समता का वह चरम उत्कर्ष देखने को मलता है कि जहां श्वपच भी वन्दनीय हैं, देवत्य को प्राप्त हैं। यहां कहा जाता है कि हरदौल ने अपनी बहिन कुंजाबाई की पुत्री के विवाह के समय अदृष्ट रहकर भात दिया था। विवाह के समय मामा की ओर से जो सामग्री अन्न-वस्र आदि दिये जाते हैं। उन्हें यहाँ लोकभाषा में "भात' देना कहते हैं। यह किंवदन्ती कहाँ तक सच है, यह तो नहीं कहा जा सकता, पर आज से चालीस वर्ष पूर्व जब सेंवढ़ा से लेकर दतिया तक महामारी का प्रचण्ड प्रकोप हुआ था जिसमें प्रतिदिन र्तृकड़ों व्यक्ति मर रहे थें, परिवार के परिवार उजड़ गये थे, लाशों को ठिकाने लगाने के लिए लोग नहीं मिलते थे, उस समय सेंवढ़ा के अनेक परिवार उस विनाश लीला से बचने के लिए सेंवढ़ा से जाकर महल-बाग के पास बने हरदौल के चबूतरे के आस-पास खुले आसमान के नीचे बिताने को विवश हो गये थे। विज्ञान का यह सत्य उस समय धूमिल पड़ गया था कि हैजा संक्रामक रोग है। हरदौल के चबूतरे के आसपास शरण लेने वाले एक भी व्यक्ति को हैजा नहीं हुआ जबकि अन्य मुहल्ले के लोग मरते रहे और उन्हीं में से भागकर लोग वहां शरण ले रहे थे।

कुँबर साहब

बुन्देलखण्ड के प्रायः प्रत्येक गांव में, गांवके बाहर अथवा भीतर एक चबूतरे पर दो ईंटें रखी रहती हैं जिन्हें कुंवर साहब का चबूतरा कहा जाता है। इन्हें जनमानस में लोक देवता के रुप में प्रतिष्ठा प्राप्त है। सामान्य व्यक्तियों को इनके सम्बन्ध में केवल इतना ही बात है कि ये कोई राजपुत्र थे। अनेक स्थानों पर बहुत प्राचीन सपं के रुप में भी ये दिखाई देते हैं। उस समय एक दूध का कटोरा रख देने से ये अदृश्य हो जाते हैं। ऐसा लोगों का विश्वास है।

रतनागिरी की माता और कुँवर साहब

दतिया जिला के सेंवढ़ा से आठ मील दक्षिण पश्चिम की ओर रतनगढ़ नामक एक स्थान है। यहां कोई गांव नहीं है। एक ऊंची पहाड़ी पर दुर्ग के अवशेष मिलते हैं। दुर्ग सम्पूर्ण पत्थर का रहा होगा, जिसकी दीवारों की मोटाई बारह फीट के लगभग है। यह पहाड़ी तीन ओर से सिन्धु नदी की धारा से सुरक्षित है। इसी विचार से यहदुर्ग बनाया गया होगा। स्थान अतयन्त ही रमणीक रहा होगा। घने जंगल के बीच में है। यहां उस पहाड़ी पर एक देवी का मंदिर बना हुआ है जिसे रतनगढ़ की माता के नाम से जाना जाता है। गत दो दशकों तक दस्युओं के आंतक के कारण यहां लोगों का आना जाना कम ही हो गया था। कार्तिक शुक्ल द्वितीया को यहां एक मेला भरता है जिसमें अनेक व्यक्ति देवी की मनौती मनाने के लिए आते हैं, जिसकी कामना पूर्ण हो जाती है, वे देवी को प्रसाद चढ़ाने, ब्राह्मण को भोजन कराने और देवी की आराधना में बोये हुए यवांकुर चढ़ाने के लिए आते हैं। इस स्थान की ख्याति दूर-दूर तक एक सिद्ध पीठ के रुप में है। यहां से सात आठ मील की दूरी पर ही देवगढ़ का किला है जो बहुत कुछ ठीक स्थिति में है। किले के अनेक कमरों में ताले पड़े हुए हैं जिन्हें कदाचित शताब्दियों से नहीं खोला गया। कहते हैं कि इस स्थान पर रात को कोई ठहर नहीं सकता जिन्होंने ठहरने का दु:स्साहस किया, उनके शव ही दूसरे दिन पाये गये। रतनगढ़ के राजा रतन सिंह के सात राजकुमार और एक पुत्री थी। पुत्री अत्यन्त सुन्दरी थी उसकी सुन्दरता की ख्याति से आकर्षित होकर उलाउद्दीन खिलजी ने उसे पाने के लिए रतनगढ़ की ओर सेना सहित प्रस्थान किया। घमासान युद्ध हुआ जिसमें रतन सिंह और उनके छः पुत्र मारे गये। सातवें पुत्र को बहिन ने तिलक करके तलवार देकर रणभूमि में युद्ध के लिए बिदा किया। राजकुमारों ने भाई की पराजय और मृत्यु का समाचार पाते ही माता वसुन्धरा से अपनी गोद में स्थान देने की प्रार्थना की। जिस प्रकार सीता जी के लिए माँ धरित्री ने शरण दी थीं, उसी प्रकार इस राजकुमारी के लिए भी उस पहाड़ के पत्थरों में एक विवर दिखाई दिया जिसमें वह राजकुमारी समा गई/ उसी राजकुमारी की यहां माता के रुप में पूजा होती है। यहां यह विवर आज भी देखा जा सकता है। मुसलमानों से युद्ध का स्मारक हजीरा पास में ही बना हुआ है। हजीरा उस स्थान को कहते हैं जहां हजार से अधिक मुसलमान एक साथ दफनाये गये हों। विन्सेण्ट स्मिथ ने इस देवगढ़ का उल्लेख किया है जो ग्वालियर से दस मील की दूरी पर है। युद्ध में मारे जाने वाले राजकुमार का चबूतरा भी यहां बना हुआ है जिसे कुंवर साहब का चबूतरा कहा जाता है।

किसी भी पुरुष अथवा पशु को सांप काटने पर प्रायः कुँवर साहब के नाम का बंध लगा दिया जाता है जिससे विष का प्रभाव सारे शरीर में व्याप्त नहीं होता। यह बंध कोई धागा आदि नहीं होता जिसे बांधा जाता हो। केवल कूँवर साहब की आन देकर उस स्थान के चारों ओर उंगली फेर देते हैं, इसी को बंध कहा जाता है। दीपावली के पश्चात पड़ने वाली द्वितीया के मेले में इस चबूतरे के पास सपं दंश वाले ऐसे लोगों और गाय, बैल, भैंस आदि के बंध काटे जाते हैं। विचित्र बात तो यह कि पुजारी के बंध काटते हो उस व्यक्ति को मूर्छा आती है, उसे चबूतरे का परिक्रमा कराकर घर जाने दिया जाता है। लेखक को एक बार अपने कुछ साथियों सहित इस चमत्कार को देखने का अवसर प्राप्त हुआ। एक के बाद एक इस प्रकार के अनेक स्री पुरुष जाते गये और बंध काटने के समय उन्हें उनके साथी सहारा देकर चबूतरे की परिक्रमा कराते रहे। पर जब एक बैल का बंध काटने के पश्चात वह चक्कर खाकर गिर पड़ा तो इस चमत्कार को देखकर हम लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। हम लोग भी कुँवर साहब के इस प्रभाव के सामने सिर झुकाकर चले आये।

कारसदेव

इस क्षेत्र में प्रायः अनेक गाँवों में कारसदेव के चबूतरे बने हुए हैं। यहाँ पतिमास की चतुर्थी को रात के समय गोपालक तथा अन्य व्यक्ति इकट्ठे होकर ढाक ढक्का बजाते हैं। यह डमरु के आकार का एक वाद्य होता है जिसे बजाते समय पैरों का उसी प्रकार उपयोग करना पड़ता है जिस प्रकार हाथ से कपड़ा बुनते समय साथ ही पैर भी चलाने पड़ते हैं। वैसे तो ढाक जब पूरे जोर पर और अधिक गति से बजने लगाता है तो किसी व्यक्ति विशेष पर इनका आवेश होता है जो लोगों के दु:ख दर्द सुनकर उनके समाधान का उपाय बताता है। जब कोई दुधारु पशु, दूध कम देने लगता है, दूध दुहने ही नहीं देता, अपने बछड़े को नहीं पिलाता अथवा दूध में रक्त आने लगताह #ैतो इनके चबूतरे पर दूध चढ़ाने से ही ठीक होता है। इसलिए इन्हें यदि पशुओं का देवता कहा जाता तो कुछ अधिक असंगत नहीं होगा।

अजयपाल

बुन्देलखण्ड में झाड़-फूंक के अनेक शाबर मंत्र प्रचलित हैं जिसमें अजैपाल की आन धराई जाती है। ये सभी मन्त्र सद्य: प्रभावकारी हैं। अजयपाल का संबन्ध देवी भागवत की एक कथा से जोड़ा जाता है। सेवढ़ा में सिन्ध नदी के तट पर अजयपाल का एक पुराना स्थान जंगल में है, जहां कोई मर्ति नहीं है। उसे अजयपाल का किला समझा जाता है। यहां वर्ष में एक बार दूर-दूर से लोग आकर अजयपाल की पूजा करते हैं।

कुलदेवता

बुन्देलखण्ड में कुलदेवता की पूजा को बाबू की पूजा कहा जाता है। यहां प्रत्येक जाति और वर्ग में भिन्न-भिन्न तिथियों में बाबू की पूजा की जाती है। किसी के यहां माघ मास की शुक्ल पक्ष की द्वितीया को यह पूजा संपन्न होती है तो किसी के यहां मार्गशीर्ष द्वितीया अथवा फाल्गुन शुक्ल पक्ष की द्वितीया को। परिवार में किसी पुरुष का विवाह होने पर जब नव वधू घर में जाती है तो उस अवसर पर बिना किसी तिथी का विचार किए बाबू की पूजा की जाती है। यह एक प्रकार से अन्य कुल से आने वाली वधू का स्वकुल में लेना कहा जा सकता है। इस पूजा में केवल वही लोग सम्मिलित किए जाते हैं जो स्वगोत्र होते हैं, यहाँ तक की अपनी लड़की तक को इसमें सम्मिलित किए जाते हैं जो स्वगोत्र होते हैं, यहाँ तक की अपनी लड़की तक को इसमें सम्मिलित नहीं करते, न बाबू की पूजा का प्रसाद ही किसी अन्य को दिया जाता है।

मातृका-पूजन

शास्रों में गौर्यादि षोडशमात्रिका, सप्तधृत मातृका का उल्लेख आता है, मांगलिक असर पर इनके आवाहन पूजन के मन्त्र भी हैं जिनसे इनकी पूजा की जाती है। बुन्देलखण्ड में स्रियाँ किसी भी स्थान पर पुतलियों के चित्र बनाकर इनकी पूजा करती है। इसे माय पूजा कहा जाता है। माँगलिक अवसर पर कल्याण प्राप्ति और कार्य की निर्विघ्न सम्पन्नता के लिए कहीं गोबर तो कहीं मिट्टी अथवा शक्कर की पुतलियां बनाकर उनकी प्रतिष्ठा और पूजा की जाती है। विवाह आदि कार्य सम्पन्न हो जाने पर इन्हें विदा किया जाता है। कुल देवता और मातृका को मिला कर सायं-बाबू की पूजा कहा जाता है अथवा निषेधपरक अर्थ में देवी-बाबू भी कहा जाता है। सहयोग के लिए कहा जाता है - हमारे उनके माय-बाबू एक ही है। असहयोग के लिए कहा जाता है - हमारे उनके देवी-बाबू अलग अलग हैं।

इस प्रकार बुन्देलखण्ड में आस्था और विश्वास के प्रतीक पशुपति कारसदेव के रुप में पूजित हैं तो कुल देवता और मातृका मायंबाबू के रुप में पूज्य है।

इतै कृष्ण रणछोड़ कहाए ढुकत फिरै ओली में। मिश्री सी है घुरै इतै की बुन्देली बोली में।।
त्रेता को औतार डांग में पर्ण कुटी सिंगारै। वीर भूमि बुन्देलखण्ड को सबरो देश निहारे।।
चन्देरी शिशुपाल से कृष्णचन्द्र की ठनी रही, भले प्रान की हानि हो गयी। आन शान की बनी रही,
झब्बूदार पनइया देखों जिसकी मुकुट निशानी में, बुन्देलों की सुनो कहानी, बुन्देलों की बानी में, पानी
दार यहां का पानी, आग यहां के पानी में#े, बुन्देलों की सुनो कहानी...

चम्बल केन यमुना के तीर, नर्मदा वेत्रवती के नीर।
विन्ध्य घाटी की स्वस्थ समीर, हमें ई जान से प्यारी है।
मातृभूमि बुन्देलखण्ड भगवान से प्यारी है।
धूल इन खोरन की, है काजल कोरन की।

-राजा संतोष सिंह "बुन्देला' 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड की दिवारी (Diwari of Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड की दिवारी (Diwari of Bundelkhand)

बुन्देलखण्ड की मिट्टी में अभी भी पुरातन परम्पराओं की महक रची बसी है। बुन्देलखण्ड की दिवारी समूचे देश में अनूठी है। इसमें गोवंश की सुरक्षा, संरक्षण, संवद्धन, पालन के संकल्प का इस दिन कठिन ब्रत लिया जाता है।

पौराणिक किवदंतियों से जुड़ी धार्मिक पवरम्पराओं के परिवेश में पूरे बुन्देलखण्ड में दीमालिका पर्व पर दीवारी गायन-नृत्य और मौन चराने की अनूठी परंपरा देखती ही बनती है। यहां दीवाली के मौके पर मौन चराने वाले "मौनिया" ही सर्वाधिक आकर्षण का केन्द्र होते हैं। मौन चराने वाले मौनियों के अनुसार द्वापर युग से प्रचलित इस परम्परा के अनुसार विपत्तियों को दूर करने के लिए ग्वाले मौन चराने का कठिन व्रत रखते हैं। यह मौन व्रत बारह वर्ष तक रखना पड़ता है। तेरहवें वर्ष में मथुरा व वृंदावन जाकर मौन चराना पड़ता है, वहां यमुना नदी के तट पर बसे विश्राम घाट में पूजन का व्रत तोड़ना पड़ता है।

शुरुआत में पांच मोर पंख लेने पड़ते हैं प्रतिवर्ष पांच-पांच पंख जुड़ते रहते हैं। इस प्रकार उनके मुट्ठे में बारह वर्ष में साठ मोर पंखों का जोड़ इकट्ठा हो जाता है। परम्परा के अनुसार मौन चराने वाले लोग दीपावली के दिन यमुना घाट में स्नान करते हैं। कुछ लोग यमुना-बेतबा के संगम स्थल में स्नान करने टेन से जाते हैं फिर विधि पूर्वक पूजन कर पूरे नगर में ढोल नगाड़ों की थाप पर दीवारी गाते, नृत्ये करते हुए उछलते-घूमते हुए अपने गंतव्य को जाते हैं। इस दिन मौनिया श्वेत धोती ही पहनते हैं और मोर पंख के साथ-साथ बांसुरी भी लिए रहते हैं। मौनिया बारह वर्षों तक मांस व शराब आदि का सेवन नहीं करते हैं। मौनियों का एक गुरु होता है जो इन्हें अनुशासन में रखता है।

मौनिया व्रत की शुरुआत सुबह गौ (बछिया) पूजन से होती है। इसके बाद वे गौ-माता व श्रीकृष्ण भगवान का जयकारा लगाकर मौन धारण कर लेते हैं फिर गोधूलि बेला में गायों को चराते हुए वापस नगर-गांव पहुंचते हैं। यहाँ विपरीत दिशा से आ रहे गांव/नगर के ही मौनियों के दूसरे समूह से भेंट करते हैं और फिर सभी को लाई-दाना व गरी बतासा-गट्टा का प्रसाद सभी श्रद्धालुओं को वितरित करते हैं।
कई क्षेत्रों में मौनिया व्रत की शुरुआत गौ-क्रीड़ा से करते हैं गौ-क्रीड़ा में गाय को रंग और वस्रों से सजाकर एक बड़े पैमाने के घर में सुअर से लड़ाया जाता है। इसके बाद दिन भर मौन चारने के बाद शाम को गायों को लेकर सभी मौनिया गांव पहुंचते हैं और सामूहिक रुप से व्रत तोड़ते हैं।

प्रकाश-पर्व में ही दीवारी गाने और दीवारी नृत्य की अपनी अनूठी परंपरा है। दीवारी गाने व खेलने वालों में मुख्यतः अहीर, गड़रिया, आरख केवट आदि जातियों के युवक ज्यादा रुचि रखते हैं। प्रमुख रुप से गाई जाने वाली दीवारी में:-

"बाबा नंद के छौना' तुमने भली डराई रीति, कातिक के महीना मां घर-घर दीन सूचना,
व देश दीवारी दो दिना, मथुरा बारह मास, नित राही गोवर्धन धरे, कान्हा खिलावें गाय',

आदि उल्लेखनीय हैं।

दूसरे दिन दीवारी गाने वाले सैकड़ों ग्वाले लोग गांव नगर के संभ्रांत लोगों के दरवाजे पर पहुंचकर कड़ु़वा तेल पियाई चमचमाती मजबूत लाठियों से दीवारी खेलते हैं। उस समय युद्ध का सा दृश्य न आता है। एक आदमी पर एक साथ १८-२० लोग एक साथ लाठी से प्रहार करते हैं, और वह अकेला पटेबाज खिलाड़ी इन सभी के वारों को अपनी एक लाठी से रोक लेता है। इसके बाद फिर लोगों को उसके प्रहारों को झेलना होता है। चट-चटाचट चटकती लाठियों के बीच दीवारी गायक जोर-जोर से दीवारी --गीत-- गाते हैं और ढ़ोल बजाकर वीर रस से युक्त ओजपूर्ण नृत्य का प्रदर्शन करते हैं। पाई डण्डा नृत्य ८-१० व्यक्तियों के समूह में विभिन्न प्रकार के करतब्य मजीरा-नगड़ियां के साथ दिखाते हैं।

नृत्य में धोखा होने से कई बार लोग चुटहिल भी हो जाते हैं। ज्यादातर चुटहिल होने वालों में "नैसिखुवा' होते हैं। लेकिन परम्पराओं से बंधे ये लोग इसका कतई बुरा नहीं मानते हैं और पूरे उन्माद के साथ दीवारी का प्रदर्शन करते हैं। इन्हीं अनूठी परम्पराओं के चलते बुन्देलखण्ड की दीवारी का पूरे देश में विशिष्ट स्थान व अनूठी पहचान है। 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देली संस्कृति का लोकोत्सव नौरता (Bundeli culture folk festival Nourta)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देली संस्कृति का लोकोत्सव नौरता (Bundeli culture folk festival Nourta)

अश्वनि शुक्ल प्रतिपदा से पूरे नौ दिन तक ब्रह्ममुहूर्त में गांव की चौपालों या नगरों के बड़े चबूतरों पर अविवाहित बड़ी बेटियों द्वारा सरजित एक रंग बिरंगा ऐसा संसार दिखता है जिसमें एक व्यवस्था होती है, संस्कार होते हैं। रागरंग और लोकचित्रों में बुन्देली गरिमा होती है। हमारी बेटियां एक साथ गीत संगीत, नृत्य चित्रकला और मूर्ति कला, साफ-सफाई संस्कारों से मिश्रित लोकोत्सव नौरता मनाती है। चौरस लकड़ी के तख्ते पर या दीवार पर अथवा नीम के ही मोटे तने पर मिट्टी से बनाई गयी एक विराट दैतयाकार प्रतिमा जिसका श्रृंगार चने की दाल, ज्वार के दाने, चावल, गुलाबास के फूलों से सजाया और अलंकृत किया जाता है। इसके चबूतरे की रंगोली के समान निर्मित दुदी एवं सूखे रंगों से चौक पूरा जाता है। लड़कियों की स्वर लहरी फूट पड़ती है।

"नाय हिमांचल जू की कुंवर लडॉयती,
नारे सुअटा, गौरा देवी क्वांरे में नेहा तोरा।

बुन्देली में सुअटा का अर्थ बेएंगा है। शिवजी का स्वरुप बेढव है। यह लोकोत्सव बुन्देलखण्ड की मात्र कुआँरी कन्याओं के लिए आरक्षित है। इसमें देवी पार्वती की आराधना का स्वरुप कुंआरी अवस्था का ही है।

सामान्य रुप से नौरता का अर्थ एक दैत्य था (सुअटा का भूत) जो कुंआरी कन्याओं को खा जाता था। लड़कियों ने उससे प्राण बचाने के लिए माता पार्वती की आराधना नवरात्रि में की और वे सुरक्षित हो गयीं। यह कुंवारी कन्याओं का ही पर्व है। गौर का ही कुंवारा स्वरुप इसमें आया है। सामान्य गीतों में ""नारे सुअटा"" में वही भूतनाथ का विचित्र स्वरुप है जो गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्री रामचरित मानस में शिव विवाह के वर्णन में दूल्हारुपी शिव का लिखा है।

""मूंगा मुसैला, चनन कैसी घैंटी, सजन ऐवी, बेटी।
दूर दिसंतर दई है गौरा बेटी, को तोय लियावन जैहे।
बुलावन जैहे, ले पियरी पहरावन जैहें।


मामुलिया :

क्वाँर मास के कृष्ण पक्ष में क्वाँरी कन्याएं मामुलिया, महबुलिया या माबुरिया खेलती है। कन्याएं बेरी की कांटेदार शाख लेकर, उसे विभिन्न प्रकार के पुष्पों से सजाकर, फल मेवादि खोंसकर लंहगा और ओढ़नी में मानवीकृत कर देती हैं। लिपे स्थान पर चौक पूर कर उसे प्रतिष्ठित करने के बाद हल्दी, अक्षत, पुष्पादि से पूजती हैं और अठवां पंजीरी, हुलआ फलादि का भोद लगाती है, तब वे देवी सिद्ध होती हैं और पूरा खेल उनकी उपासना हो जाता है, अतएव मामुलिया की पहचान एक प्रमुख समस्या हैत्र यदि वह नारी रुपा मानवी है, तो यह निश्चित है कि कन्याएँ उसकी पूजा नहीं कर सकतीं, क्योंकि बुन्देलखण्ड में कन्या के चरणस्पर्श सभी स्री-पुरुष करते हैं। यह बात अलग है कि मामुलिया कोई सती या विशिट आदर्श का प्रतीक नारी हो जैसा कि एक गीत की पंक्ति से लगता है ""मामुलिया के आ गये लिवौआ, झमक चली मोरी मामुलिया""।

मामुलिया में नारीत्व की प्रतीकात्मक हे, जैसे पुष्पों की कोमलता, सुन्दरता और प्रफुल्लता, कांटो की प्रखरता,संघर्षशीलता औरवेदना तथा फलों की संघर्षशीलता और वेदना तथा फलों की सृजनशीलता, उदारता और कल्याण की भावना सब नारी में निहित है। इन गुणों के साथ उसमें पातिव्रत्य की साधना के लिए पूरी-पूरी तत्परता है। सतीत्व की संकल्पधर्मिता के कारण वह नारी का अनुकरणी मॉडल बन जाती है। इस प्रकार समन्विता नारी मूर्ति देवी ही है। संज्ञा या संजा को देवी रुप माना गया है, इस दृष्टि से मामुलिया को देवी की लोकमान्यता निश्चित ही मिली थी।

एक प्रतीकात्मकता यह भी है कि पुष्प रुपी सुख और काँटे रुपी दुख से यह जीवन बना है। जीवन का जब तक श्रृंगार होता है, तब तक उसके लिबौआ (विदा कराने वाले) आ जाते हैं। यह क्षण भंगुरता, जीवन की अस्थिरता को संकेतित करती है। इस प्रकार मामुलिया में दार्शनिक महाबोल (आर्ष सत्य) की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति हुई है, इसीलिए इसे बहाबुलिया, माबुलिया, मामुलिया कहा जाता है।

(डॉ नर्मदा प्रसाद गुप्त "बुन्देलखण्ड के लाकोत्सव") 

 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड के त्यौहार (Festivals of Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड के त्यौहार (Festivals of Bundelkhand)

भारत एक बहुत बड़ा देश है। यहाँ हर प्रदेश की वेशभूषा तथा भाषा में बहुत बड़ा अन्तर दिखायी देता है। इतनी बड़ी भिन्नता होते हुए भी एक समानता है जो देश को एक सूत्र में पिरोये हुए है। वह है यहां की सांस्कृतिक-एकता तथा त्यौहार। स्वभाव से ही मनुष्य उत्सव-प्रिय है, महाकवि कालिदास ने ठीक ही कहा है - "उत्सव प्रियः मानवा:'। पर्व हमारे जीवन में उत्साह, उल्लास व उमंग की पूर्ति करते हैं।

हमारे बुन्देलखण्ड के पर्वों की अपनी ऐतिहासिकता है। उनका पौराणिक व आध्यात्मिक महत्व है और ये हमारी संस्कृतिक विरासत के अंग हैं। कुछ अत्यन्त महत्वपूर्ण त्यौहारों का विवेचन हिन्दी मासों के अनुसार किया जा रहा है।

गनगौर - यह पर्व चैत्र शक्ल तीज को होता है। यह व्रत सुहागिन स्रियाँ ही करती हैं। इस त्यौहार में स्रियाँ पार्वती जी की पूजा करती हैं व --प्रसाद-- नैवेद्य में गनगौर बनाये जाते हैं। यह प्रसाद पुरुषों को नहं दिया जाता है। सौभाग्य की कामना करने वाली हर स्री इस व्रत को बुन्देलखण्ड की धरती पर अनन्त काल से करती आ रही है।

चैती पूनै - चैत्र की पूर्णिमा को बुन्देलखण्ड में चैती पूने के नाम से यह पर्व मनाया जाता है।
विधि :- पाँच या सात मटकियों को चूना या खड़िया से रंग कर पोत दिया जाता है। एक करवा रखा जाता है। करवे पर दो माताओं की प्रतिमा और एक पजून-कुमार की प्रतिमा बनायी जाती है। सभी घड़ों --मटकियों-- में लड्डू भरकर व चौक पूर कर मटकियों को रखकर विधिपूर्वक पूजा की जाती है। कहानी होती है। इसके बाद परिवार का लड़का मटकियों को हिलाकर करवे में से लड्डू निकाल कर माँ की झोली में डालता है। माँ लड़के को लड्डू खिलाती है। प्रसाद वितरण करते समय "पूजन के लडुआ पजनै खायें, दौड़-दौड़ वह कोठरी में जाँय'' कहना चाहिए।

असमाई - यह पर्व बैसाख की दोज को मनाया जाता है। यह कार्य सिद्धि के लिए व्रत होता है। इस दिन चौक पूर कर एक पान पर सफेद चंदन से एक पुतली बनायी जाती है। पटे पर रखकर चार गाँठ वाली चार कौड़ियाँ रखी जाती हैं इसी की पूजा होती है। नैवेद्य में सात आसें बनायी जाती हैं तो व्रत करने वाली स्री खाती है। इसके बाद घर का सबसे छोटा बच्चा कौड़ियों को पटे पर पारता है। आसमाई की कहानी होती है। ये कौड़ियाँ अपने पास रखती हैं और हर वर्ष पूजा होती है।

अकती --अक्षय तृतीया -- - यह त्यौहार वैशाख शुक्ल तीज को मनाया जाता है। यह पर्व बड़ा महत्वपूर्ण है। कहा जाता है कि आज के दिन से सतयुग का प्रारम्भ हुआ था। आज ही के दिन प्रसिद्ध तीर्थ बद्रीनारायण के कपाट खुलते हैं। 

वैसे बुन्देलखण्ड में इस त्यौहार की अपनी अलग ही रौनक होती है। इसमें लड१कियाँ गुड्डे-गुड़ियों का खेल खेलती हैं। लड़के आज के दिन से पतंग उड़ाते हैं। धैलों --छोटे घड़ों-- के ऊपर पूड़ियाँ, पकौड़ी, सत्तू, गुड़ व कच्ची अमियाँ रखकर दान दी जाती हैं। शाम के समय लड़कियाँ अकती गीत गाती हुई जाती हैं फिर लौटकर सोन बाँटती हैं। --सोन में भीगी हुई चने की दाल व बरगद के पत्ते-- ननद भाभी आपस में मनो-विनोद कर उनके पति के नाम पूछती हैं।

बरा बरसात --बट सावित्री व्रत-- जेठ कृष्ण अमावस को बराबरसात का पर्व होता है। आज के दिन सौभाग्यवती स्रियाँ बट वृक्ष के पास जाकर बट वृक्ष की पूरी विधि-विधान से पूजा करती हैं। अपने पुत्र व पति की आरोग्य व अपने अखण्ड सौभाग्य की कामना करती हैं। बट के मूल में ब्रह्मा, मध्य में विष्णु, ऊपर शिव और समग्र में सावित्री हैं। सती-सावित्री की कहानी कह कर व्रत पूरा करती हैं। सती-सावित्री के सम्मान में यह व्रत मनाया जाता है।

कुनघुसूँ पूनैं - आषाढ़ शुक्ल पूर्णिमा को बुन्देलखण्ड के हर घर में गृह वधुओं का पूजन किया जाता है, जो कुनघुसूँ के नाम से जाना जाता है। इस पर्व पर सास दीवाल पर चार कोनों में चार पुतरियाँ हल्दी से बनाती हैं, उनकी पूजा की जाती है। सास ऐसी बहू की कामना करती है कि परमेश्वरी बहू घर में लक्ष्मी बनकर घर को धन-धान्य तथा सन्तान से भर दें। जहाँ नारियों का सम्मान होता है वहाँ देवता निवास करते हैं। इस त्यौहार से इसी प्रकार की भावना प्रकट होती है।

हरी-जोत - सावन माह की अमावस को यह त्यौहार होता है। इस पर्व को कुनघुसँ पूने की तरह मनाया जाता है, इसमें बेटियों की पूजा कर कन्याओं के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं।

नाग पंचमी - नाग पंचमी श्रावण शुक्ल पंचमी को मनायी जाती है। आज के दिन साँपों की पूजा की जाती है। साँप की बार्मी भी पूजी जाती हैं। साँपों के प्रति भय न रहे, इसीलिए शास्रों में नाग की पूजा का विधान है।

राखी - रक्षा-बन्धन श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह बहुत ही पवित्र भावनाओं का त्यौहार है। आज के दिन सभी बहिनें अपने भाइयों को राखी बाँधती है। इस त्यौहार में भाई भी पूरा उत्साह व स्नेह के साथ बहिनों से राखी बँधवाते हैं तथा राखी के उपलक्ष्य में अपनी बहिनों को रुपये और उपहार देते हैं।

हरछठ - यह त्यौहार भादों कृष्ण पक्ष की छठ को मनाया जाता है। इसी दिन श्री कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था। यह व्रत पुत्रवती स्रियां ही करती हैं। इस व्रत में हल चली हुई जमीन का बोया-जोता अनाज व गाय का घी, दूध आदि खाना मना है। इस व्रत में पेड़ों के फल बिना बोया अनाज आदि खाने का विधान है।

कन्हैया-आठे- "जन्माष्टमी" तो सभी जानते हैं। यह त्यौहार भादों की अष्टमी को मनाया जाता है। इस दिन श्रीकृष्ण भगवान का जन्म हुआ था।

तीजा - यह त्यौहार भादों की शुक्ल पक्ष तृतीया को मनाया जाता है। इस व्रत को निर्जल रखना पड़ता है। सभी सौभाग्यवती स्रियां इस व्रत को करती हैं। इस व्रत में रात्रि जागरण का भी विधान है। बुन्देलखण्ड के सभी घरों में यह व्रत रखकर सभी स्रियां मिलकर भजन आदि गाकर रात भर जागती है।

रिसि पाँचें - यह त्यौहार भादों की शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाया जाता है। यह व्रत भी स्रियाँ ही करती हैं। जाने अनजाने में पाप व गलतियाँ हो जाती हैं, उसी के प्रायश्चित के लिए इस व्रत का विधान है।

महालक्ष्मी - यह पर्व अश्वनि (क्वाँर) कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। यह व्रत भी सौभाग्यवती व पुत्रवती स्रियां ही करती हैं। इसमें महालक्ष्मी के साथ-साथ हाथी की भी पूजा होती है। आज के दिन विशेष प्रकार का पकवान बनाया जाता है जिसको सुरा (ठठेरा) कहते हैं। इस दिन नदी या तालाब में स्नान करने का महत्व है। सोलह बार स्नान करना व सोलह सुरा खाकर पूजा करना होता है। लक्ष्मी जी की पूजा कथा भी होती है।

नौरता - क्वाँर माह की कृष्ण पक्ष में प्रतिपदा से शुरु होकर नौ दिन की विशेष पूजा होती है। बुन्देलखण्ड में नौ दिनों तक सुबह नौरता (सुबटा) खेलती हैं। यह त्यौहार भी लड़कियों का विशेष त्यौहार है। इसमें लड़कियाँ चबूतरों पर तरह-तरह की अल्पना बना गीत गाती हैं। यह बुन्देलखण्ड का महत्वपूर्ण त्यौहार है।

दसरओ - यह त्यौहार भी आश्विन मास की कृष्ण पक्ष की दशमी को मनाया जाता है। कहा जाता है कि दशमी तिथि को संध्या के समय जब आकाश में तारे निकलते हैं तो ""विजय"" नाम मुहूर्त होता है। इस मुहूर्त मे शुरु किया गया कार्य सिद्ध होता है। आज के दिन श्रीराम ने रावण पर विजय पाने का अभियान किया था। आज के दिन सम्पूर्ण बुन्देलखण्ड में नीलकंठ पक्षी के दर्शन एवं मछलियों को देखना शुभ मानते हैं।

शरदर पूनें - आश्विन महीने की पूर्णिमा को शरद पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन से ही बुन्देलखण्ड में कीर्तिक स्नान शुरु हो जाता है।

पुराणों के अनुसार चन्द्रमा में अमृत का वास होता है और शरद पूर्णिमा की रात को यही अमृत पृथ्वी पवर बरसता हैं जो व्यक्ति इन किरणों में आनन्द उठाता है, उसे संजीवनी शक्ति प्राप्त होती है।

शरद पूर्णिमा को खीर बनाकर चन्द्रमा को भोग लगाकर रात को पूरी रात खुली चाँदनी में खुली रख देना चाहिए। इस खीर को खाने से अनेक रोग और व्याधियाँ दूर होती हैं।

धनतेरस - कार्तिक मास की कृष्ण त्रयोदशी को धनतेरस कहते हैं। आज के दिन घर के द्वार पर एक दीपक जलाकर रखा जाता है। आज के दिन नये बर्तन खरीदना शुभ माना जाता है। धनतेरस के दिन यमराज और भगवान धनवन्तरि की पूजा का महत्व है।
नरक-चउदस- कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्दशी को ही नरक चतुर्दशी कहते हैं वैसे इस दिन को "छोटी दीवाली" भी कहते हैं। आज ही के दिन अर्द्धरात्रि को हनुमान जी का जन्म हुआ था। इसलिए आज ही के दिन हनुमान जयन्ती भी मनायी जाती है।

दिवारी - कार्तिक मास की अमावस्या को "दीपावली" का पर्व मनाया जाता है। आज का दिन उत्साह, उल्लास, पवित्रता एवं श्रद्धा के साथ मनाया जाता है। इस दिन लक्ष्मी-गणेश का पूजन व सभी स्थानों पवर दियों का उजाला किया जाता है। घर में नये वस्र, अन्न, फल, मिठाई, मेवा सभी का प्रसाद लगाया जाता है।

सभी त्यौहार और पर्व बड़ी श्रद्धा विश्वास के साथ मनाये जाते हैं, जिनमें किसी न किसी उद्देश्य की भावना अवश्य छिपी रहीत है। चाहे पापों का प्रायश्चित हो, धार्मिक सामाजिक स्नेह, बन्धन की कामना, सुखी जीवन व सौभाग्य की कामना, सुखी जीवन व सौभाग्य की कामना हो, सम्पूर्ण अकांक्षायें इन पर्वों में विद्यमान हैं।

बुन्देलखण्ड है प्राण हिन्द का अमर यहां की संस्कृति है।
ॠषियों की यह तपस्थली है, वीर प्रसूता धरती है।।
विन्ध्यांचल और चित्रकूट कालीं गाता युग गाथा।
पन्ना में हीरा छत्रसाल की, काल्पी गाती व्यास कथा।।
कुंइयां परासन पारासर की कथा गा रही वेदवती।
जैन धर्म की तीर्थ देवगढ़, सांची प्रतीक है बौद्धमती।।
वीरभूमि है नगर महोबा, नृप परमाल का राज्य रहा।
आल्हा ऊदल के पौरुष का कीरत सागर बता रहा।।
जमुना चम्बल और नर्मदा टोंस विन्ध्य की सीमा है।
केन धसान, पहूंज बेतवा अन्य सहायक नदियाँ है।।
लक्ष्मी बाई इसी धरा में क्रान्ति जगाने आयी थी।
जिसके पौरुष से जागी, झांसी वाली तरुणाई थी।।
कहने भर को वह नारी थी पर स्वतन्त्रता चिनगारी थी।
मनु की वही छबीली जन जन में, बन क्रान्ति समाई थी।।

-डॉ० रमाशंकर विश्वकर्मा

 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड का लोक जीवन (Public life of Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड का लोक जीवन (Public life of Bundelkhand)

भारतीय समाज की जीवन शैली न्यूनाध्कि एक जैसी है किन्तु उसमें आंचलिकता और लोकत्व की झलक उसे विशिष्टता प्रदान करती है। लोक जीवन के अध्ययन में सबसे बड़ी कठिनाई उसमें बढ़ती जा रही शिष्ट संस्कृति एवं अपसंस्कृति के पार्थक्य को समझने की है। उसका मूल स्वरुप धुंधलका में खोता जा रहा है। सामान्य जन के मन में यह बात बैठा दी गयी है कि पुराने रीति-रिवाज, लोक-गीतों का गायन गंवारपन है। नये फिल्मी गीत गाना या पश्चिमी संस्कृति को अपनाना, अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग --मम्मी, पापा आदि-- प्रगतिशीलता --आधुनिकता-- है।

लोक-जीवन के सांस्कृतिक पक्ष में लोक संगीत --लोकगीत, लोकनृत्य, लोकवाद्य-- लोककथायें, लोकगाथायें, बुझौअल --पहेली-- लोकोक्तियां रीतिरिवाज, पर्व उत्सव, व्रतपूजन, अनुष्ठान, लोक देवता, ग्रामदेवता, मेले आदि का समावेश है। कला पक्ष के अन्तर्गत भूमि भित्त अलंकरण, मूर्तिकला, काष्ठशिल्प, वेशभूषा, आभूषण, गुदना, आदि दृष्टव्य है। सभ्यता पक्ष के अन्तर्गत दैनिक-चर्या --ब्रह्ममूहुर्त में जागना--, लोकाचार --दादा दादी के पैर स्पर्श--, टोटका, भोजन व्यंजन लोक-रंजन --लोकक्रीड़ा-- तथा उद्यम व्यापार की चर्चा शामिल है। बुन्देलखण्ड के लोक चितन में शाश्वत जीवन मूल्यों का संरक्षण, भारत की चिरंतन संस्कृति का पोषण एवं रागात्मक बोध है। यहाँ की लोकधारा वैदिक, स्मृति, पुराण काल से प्रवाहित होती हुयी अपनी लोक संजीवनी शक्ति के माध्यम से समाज के सभी वर्गों में समरसता बनाए हुई थी। वर्ण व्यवस्था पर आधारित समाज व्यवस्था समन्वयवादी, पारस्परिक स्नेह एवं सम्मानवर्धक है। ब्राह्मण पुत्री के विवाह में नाई का विशिष्ट स्थान है तथा धोबिन से सुहाग मांगा जाता है। सामाजिक एकरुपता में सभी वर्ग अनन्योश्रित हैं। विवाह की लकड़ी काटने हेतु छेई के बुलउवा से अन्त्येष्टि तक का बुलउवा लगता है। मृत्यु के पश्चात भी फेरा डालने में सामाजिक तथा आर्थिक सहयोग की भावना महत्वपूर्ण है। वीरता और जनसेवा जहाँ केवल बखानी ही नहीं जाती है उसे देवत्स की प्रतिष्ठा दी जाती है। हरदौल तथा कारसदेव आदि वह व्यक्तित्व हैं जिसे मानव होकर भी देवत्व की गरिमा प्राप्त है। उनका चबूतरा लोक की आस्था का केन्द्र बन जाता है।

बुन्देलखण्ड के विशिष्ट पर्व यथा कजलियों के मेले में प्रेम से आलिंगनबद्ध होकर मिलना, कजलियां देना तथा बड़ों का चरण स्पर्श करना लोक धर्म है। सुअटा, नौरता, टेसू, अकती, विशिष्ट लोक-पर्व हैं। यह बालक बालिकाओं को जीवन क्षेत्र में उतारने के पूर्व प्रशिक्षण देते हैं। बुन्देली लोक जीवन में अधिकतर शुभकार्य उत्तरायण तथा पंडितों से मुहूरत निकलवा कर किये जाते हैं। पर्वतों नदियों, सरोवरों, और वृक्षों की पूजा की जाती है। पीपल, बरगद, नीम, आंवला, तुलसी, केला, बेलपत्र आदि वनस्पतियों को पूज्य कोटि में रखा गया है। भोजन बनने के पश्चात तुलसी डाल कर ठाकुर जी को प्रसाद लगाकर खाना तथा तुलसी के बिरवे को नित्य जलदान देना नैमितिक कर्तव्य माना गया है। वनस्पतियों का संरक्षण एवं सम्बर्द्धन वातावरण को शुद्ध कीटाणुमुक्त करता है। इसे नयी पीढ़ी मात्र ढकोसला रुढिवादिता, पुरातनपन्थी मानकर उपहास करने लगी है जबकि वे शुद्ध वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर आधारित हैं।

वैदिक-कालीन संस्कृति में बलिवैश्व यज्ञ एक नियमित आचरण था। इसके अन्तर्गत पांच देवता-चींटी, पक्षी, श्वान गाय तथा अग्नि को भोजन प्रथम नैवेद्य समर्पित किया जाता था। आज भी चूल्हे में बने भोजन की प्रथम लोई अग्नि को भेंट करने की परम्परा है। गाय, कुत्ते, पक्षी, को कौरा निकालने की प्रथा जीवसंवर्धन भावना का अंग है। शिशु जन्म के कुछ दिनों बाद उसे घृत मधु चटाने की परम्परा है। यह पदार्थ शोधक, विकार नाशक है तथा देह को पुष्ट करते हैं। मुंडन के पश्चात बेसन की लोई मस्तक पर फेरने या लेपन करने की परम्परा है। मुंडन के कारण से उत्पन्न घाव आदि से बचाव का यह लोक विज्ञान है। प्रसूता को सौर --सोवर-- में अजवाइन का धुंआ देना नीम या लौंग के जल से स्नान कराना, पीपर का अति प्रयोग करना, चरुआ के जल में वनस्पतियां डालकर उसका काढ़ा देने के विधान आयुर्वेद सम्मत हैं। चेचक निकली होने पर घर में सब्जियों का छांका लगाना, नाई से बाल बनवाना, धोबी से कपड़ा धुलाना आदि वर्जित हैं। इस प्रक्रिया से संक्रामक रोग के कीटाणु अन्य स्थान पर फैलने से रोकना लोकहित में है। लोक जीवन का सर्वांग निरुपण करने वाले ग्रन्थों का प्रायः अभाव है, परम्परायें नई पीढ़ी को वाभाविक रुप से हस्तांतरित होती रहती है।

जनमानस अपना उल्लास और कसक लोक गीतों के माध्यम से व्यक्त करता है। किसी को इन गीतों के उत्स --रचनाकार-- का पता नहीं होता है। यदि किसी गीत का रचनाकार ज्ञात हो तो उसे लोक-गीत की श्रेणी में परिगणित नहीं किया जाता है। इन गीतों का लोकत्व यह है कि यह विशिष्ट धुनें यमुना नदीसे नर्मदा नहीं तक और चम्बल से टोंस नदी तक प्रायः एक जैसी गाई जाती हैं। स्वररागिनी तथा केन्द्रीय भाव एक समान रहते हैं। यह गीत लिखित में कम वाचिक परम्परा में अधिक है। यह गीत प्रायः देवी-देवताओं के पूजा विषयक संस्कार गीत, ॠतु विषयक गीत, श्रृंगार गीत, श्रमदान गीत, जातियों के गीत, बालक-बालिकाओं के क्रीड़ात्मक उपासना गीत या शौर्य प्रशस्ति गीत होते हैं। बुन्देली लोक गीत लोक संस्कृति के दपंण हैं। यह प्रदेश आस्था और भक्ति का प्रदेश है। महिषमर्दिनी माँ दुर्गा, शारदा यहां की अधिष्ठात्री भी हैं। कार्तिक स्नान पर्व में महिलायें राम/कृष्ण के चरित्र विषय गीत प्रभात बेला में झुंडों में निकलकर गाती हैं। मांगलिक कार्य में गणेश जी, पवन पुत्र हनुमान आदि को अंधड़ पानी से निवारण हेतु आमंत्रित करती हैं।

शास्रोक्त संस्कार सोलह हैं। विधि विधानपूर्वक जातक --व्यक्ति-- को हस्तांतरित किया जाता है। प्रथम तीन संस्कार, पुन्सवन तथा सीमान्तोन्नयन जन्म पूर्व के हैं। शेष संस्कार जातक के हैं। परिवार में जन्मा बालक राम या नन्दलाल --कौशल्या या यशोदा के कोख से जन्मा-- माना जाता है। उसके जन्म या विवाह में वही उल्लास और हर्ष पाया जाता है जो कभी अवध या ब्रज अथवा जनकपुरी में छाया था। यह लोक-गीत उनकी लोक स्मृतियों में इतने अधिक बस गये हैं कि आप सिर्फ तार छेड़ दीजिये उनके बोल स्वतः अपने आप फूट पड़ेंगे। लोग गीत के गायन के साथ ढोलक मजीरा पर्याप्त वाद्य हैं। अब तो कर्ण-कटु भोंडे फिल्मी गीत --कैसेट-- सुनने का रिवाज बढ़ रहा है।

लोकनृत्य - लोकनृत्य उल्लास पूर्ण अभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम हैं। हर्ष के क्षणों में जब समूह में उमंग की हूक उठती है तो पैर स्वतः ताल लय में थिरकने लगते हैं। यह नृत्य प्रायः तीन प्रकार के होते हैं-सार्वजनिक नृत्य, पारिवारिक नृत्य तथा जातीय या आदिवासियों के लोकनृत्य। करमा और शैला आदिवासियों के लोक नृत्य हैं। सार्वजनिक नृत्य के अंतर्गत दिवारी --अहीर हाथ में डण्डे लिये रहते हैं कमर में घुंघरु बांधे रहते हैं तथा टेर के साथ गाते हैं-- नृत्य ढ़ोलक तथा नगड़िया के साथ समूह में होते हैं। राई नृत्य प्रमुख रुप से बंड़िनी जाति का नृत्य है। झिंझिया क्वांर माह की पूर्णिमा को टेसू के अवसर पर कुंवारी बालिकाओंसे लेकर वृद्ध महिलाओं तक के द्वारा नृत्य किया जाता है। कानड़ा, --धुबियायी-- रावला, --काछी, धोबी, चमार, गड़रिया, मेहतर, कोरी आदि-- में एक पुरुष स्री का वेश रखता है। दूसरा विदूषक बनकर रावला गीत रमतूला सारंगी के साथ गाते नाचते हैं। ढीमरयाही ढीमर जाति द्वारा विवाह के अवसर पर पुरुष तथा महिलाओं द्वारा नृत्य प्रस्तुत किया जाता है। पारिवारिक नृत्य में चंगेल या कलश नृत्य शिशु जन्म के समय बुआ द्वारा लाये गये बधाई के साथ किया जाता है। लाकौर या रास बधावा नृत्य विवाह में भांवर की र पूरी होने के पश्चात कन्या पक्ष की महिलायें द्वारा जब वह डेरों पर जाती हैं तो बहू का टीका पूजन, वर पक्ष के रिश्तेदारों द्वारा किया जाता है। बालिकायें व महिलायें बन्नी गाते हुये नृत्य करती हैं। इसी प्रकार बहू उतराईका नृत्य विवाहोपरान्त वर पक्ष के निवास में होता है। सगुन चिरैया गीत गाये जाते हैं सास देवरानी, जिठानी, बुआ आदि उल्लास में नाचती हैं।

लोक कथायें, लोक गाथायें दादी या नानी द्वारा सुनाई जाती थीं। बहुधा यह पद्यमय होती थीं। लोकोक्तियां व्यवहार तथा नीति सम्बन्धी होती हैं। बुझौअल --पहेली-- बालक, बालिकायें आपस में बूझते हैं। मुहावरों का प्रयोग लेख या मौखिक वार्ता में होता है। लोक देवता, ग्राम्य देवता तथा रीतिरिवाज सामाजिक स्वीकृति के आधार पर जन्मते तथा विकसित होते हैं। लोक कलायें हमारे सामाजिक जीवन को सुसंस्कृत और सम्पन्नता प्रदान करती हैं। भूमिगत अलंकरण में गणेश जी, स्वास्तिक, यक्राकार सातिया --स्वास्तिक--, कलश, कमल, शंख, दीपक, सूर्य चन्द्र आदि गोबर या चावल के घोल तथा गेरु से बनाये जाते हैं। इन पर जौ के दाने चिपकाते हैं। मूर्तिकला की दृष्टि से महालक्ष्मी तथा हस्ति --हाथी-- गनगौर, सुअटा, दीवाली पर गणेश, लक्ष्मी तथा मलमास में काली मिट्टी की शिवप्रतिमायें बनाई जाती हैं। अक्ती के अवसर पर पतुतरी पुतरिया बनाई जाती हैं।

बुन्देली वेशभूषा में महिलाओं में बांड़ --घाघरा-- पहिनने का प्रचलन था। श्रमिक महिलायें कांछ वाली धोती पहिनती हैं। पुरुष साफा, बंडी, मिर्जई, कुर्ता, धोती पहिनते हैं, स्रियां पैरों में पैंजना --दो किलो के वजन तक-- तथा गले में सुतिया --एक किलो वजन तक-- प्रायः चांदी या गिलट के होते हैं। बालक चूड़ा, पैजनिया, करघनी, कड़ा, कठुला पहिनते हैं। आदिवासी तथा ग्रामीण आंचल की महिलायें सौन्दर्य वृद्धि के लिये गुदना गुदवाती हैं। इनमें पशु, पक्षी, फूल, स्वयं का नाम इष्टदेव का नाम आदि होता है। भोजन में "महुवा भलो राम को प्यारो' या "सतुआ लगे लुचई --पूरी- सो प्यारो' प्रमुख था। बरा, बछयावर, फरा, हिंगोरा, ढुबरी, महेरी, सुतपुरी, आदि प्रमुख थे। लोकाचार में सगुन असगुन, टोटका झाड़फूंक पर विश्वास अधिक प्रचलित है। लोक मंच में रामलीला, रास लीला, स्वांग, नौटंकी समय-समय पर आयोजित होते हैं। लोक क्रीड़ाओं में बालिकाओं के खेल चपेटा या गुट्टा लोकप्रिय हैं। मैदानी खेलों में बालक सामान्यतः गुल्ली डंडा, छुआ छुऔअल, ओदबोद, अत्तीपत्तनी, कंचा --गोली--, कबड्डी, खोखो आदि खेलते हैं। यह खेल प्रायः सामग्री विहीन हैं। गांव या नगरों में समय-समय पर दंगल --कुश्ती-- भी आयोजित होते हैं।
पंडित परमानन्द जी "बुन्देलखण्ड धरा को जर्मनी का एक भाग कहते थे। जहां का हर नागरिक शेर है, चाहे साहित्य का क्षेत्र हो या व्यायाम कला, संगीत, हाकी या युद्ध भूमि का। हम हमेशा आगे रहे और रहेंगे।'


नोनौं खण्ड बुन्देल हमारों, नौउंऊ खण्ड को प्यारो।
आला, ऊदल, मधुकर, चम्पत, बैरिन को मद झारो।
बीर वृसिंहदेव, छत्ता भओ, रन में कबहु न हारो।
बाई लक्ष्मी रानी जई में, धारों नगन दुधारौ।
दानी सूर सिरोमन जई में, भये अनगिनत विचारो।
माहुर कवि कहाँ लौ कहियत, जौ है जग उजियारो।
सियाराम ने हू दुरदिन में जईको लओ सहारो।

-नाथूराम माहौर


नर्मदा कालिंदी टोंस चम्बल को पानीदार, धारधरे शुक्तिमती तीरों की वसुंधरा
कालं की समाधि अचल कालं है, पन्ना पन्नग मणि हीरों की वसुंधरा
मातृभूमि आन हेतु, शौर्य स्वाभिमान हेतु, शमशीरों पर सोयें वीरों की वसुंधरा

-कृष्ण गोपाल गौतम 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड का अंग्रेजी साहित्य (English Literature of Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड का अंग्रेजी साहित्य (English Literature of Bundelkhand)

अंग्रेजी सम्पन्न समाज की भाषा है। डॉ. हरी सिंह गौर ने लॉ आफ ट्रॉन्सफर,(Law of Transfers) ट्रांसफर आॅफ प्रापर्टी(Transfer of Property) के अतिरिक्त हिज ओनली लव --उप(His Only Love up)--, रैण्डम राइम्स,(Random Rhymes) रिनैसाँ आॅफ इण्डिया, (Renaissance of India)रैशनलिज्म एण्ड रिलीजन,(Rationalist and Religion) दि स्प्रिट आॅफ फ्रीडम,(The Spirit of Freedom) सेवन लाइव्ज(Seven Lives) --आत्मकथा-- लिखी। डॉ रघुनाथ विनायक धुलेकर ने "पिलर्स आॅफ वेदान्त'(Pillars of Vedanta) पुस्तक लिखी। बांदा निवासी श्री द्वारिका प्रसाद श्रीवास्तव ने "न्यूपिटल आॅफ राम'(Newpitle of ram) श्रवण कुमार आदि रामचरित मानस के प्रसंग पांच खण्ड में छपाये। श्री इन्द्रजीत सिंह सत्संगी --बांदा ने-- उद्धव शतक तथा श्री केदारनाथ अग्रवाल की कविताओं का अंग्रेजी में अनुवाद किया। श्री विन्दा प्रसाद खत्री --बाँदा- ने गोस्वामी तुलसीदास के प्रमुख काव्य ग्रन्थों का अनुवाद अंग्रेजी में किया --प्रकाश्य--। "बाँदा ली लैण्ड आॅफ राम'(Banda Lee Land of the Rama) श्री भटनागर जी ने लिखा। विभिन्न विषयों के शोध प्रबन्ध अंग्रेजी माध्यम में लिखे गये यथा डॉ. हरीराम मिश्र ने "थ्योरी आॅफ रस इन संस्कृत'(Theory of Rasa in Sanskrit)। श्री धुलेकर जी --झांसी-- ने "फ्री इण्डिया'(Free India) कानपुर से प्रकाशित कराया जो चार वर्ष तक छपा। श्री पन्नलाल श्रीवास्तव --दमोह-- ने अनेक वर्षों तक "लीडर',(Leader) "अमृत बाजार पत्रिका', "नार्दन इण्डिया(Nordan India) पत्रिका' के सह सम्पादक के रुप में सराहनीय कार्य किया। अनेक शोधपरक पुस्तकें अंग्रेजी माध्यम से प्रकाशित हुई। अनेक हिन्दी पुस्तकों का अनुवाद भी अंग्रेजी में हुआ यथा श्री दशरथ जैन लिखित "मोनोमेन्ट्स आॅफ खजुराहों'(Monoments of Khajuraho) स्तुति विद्या आदि। बुन्देलखण्ड का अंग्रेजी साहित्य हिन्दी तथा उर्दू साहित्य की तुलना में नगण्य है।

बुन्देलखण्ड

तेरी मिट्टी से प्रकट हुये हरदौल सरिस त्यागी प्रचंड।
ओ वीर देश बुन्देलखण्ड ओ भव्य देश बुन्देलखण्ड।।
अगणित अरि दल में कूद पड़े देवी दुर्गा को मुण्डमाल।
लेकर फिर कर में तीक्ष्ण तेग खुलखुल कर खेली रुण्डमाल।।
रखके स्वतन्त्र ये जन्म भूमि जननी के पय की रखी लाज।
दुश्मन को आंखे बीच कण्ठ तलवार समझ ली पुष्पमाल।।
तेरे थे ऐसे वीरसिंह जिनसे उज्जवल था भरतखण्ड। ओ वीर देश...
पत्थर पत्थर को डुबा चुका है देश भक्त का रक्त लाल।
कंकड़ कंकड़ पर लाख लाख कट मरे विहसते बीर बाल।।
तेरे कांली ने मारा वह शेरशाह सा शहंनशाह।
क्या कोई दुश्मन परखसका बुन्देलों की तलवार ढाल।।
तेरे पूतों का देख तेज निष्तेज हुआ था मार्तण्ड। ओ वीर देश...
मुगलो की छाती चीर-चीर नरसिंह दहाड़ा दत्रसाल।
कण कण काली सा नाच उठा अरि शोणि पीकर लाल लाल।।
अबला का बल भी उबल पड़ा, बन गयी भवानी बाई साब।
कट गयी फिरंगी फौज खड़ी बच गया रोज भी बाल बाल।।
तेरा था ऐसा सत्य न्याय पा गया राज सुत मृत्यु दण्ड। ओ वीर देश...
है स्वाभिमान रंग रगी हुई तेरी बीहड़ की ढाल ढाल।
तेरी जय की है यादगार हरेक दुर्ग हर ताल ताल।।
निर्वासित भाई प्रिया सहित जिस पर आश्रय ले टिके राम।
तेरे पुनीत उस चित्रकूट को तक झुक जाता भाल भाल।।
तेरा जग से इतिहास अलग तेरा जग में है यश अखण्ड।


- लक्ष्मी प्रसाद शुक्ल "वत्स'

 

 

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बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय - बुन्देलखण्ड में उर्दू का विकास (Development of Urdu in Bundelkhand)

बुंदेलखंड : एक सांस्कृतिक परिचय 

बुन्देलखण्ड में उर्दू का विकास (Development of Urdu in Bundelkhand)

खिलजी तथा तुगलक वंश के शासन काल में सैनकों की रसद --खाद्य सामग्री-- की पूर्ति करने वाले व्यापारियों के बीच संबंध रखने के लिये जिस मिश्रित --खिचड़ी-- बोलचाल की भाषा का प्रयोग प्रारंभ हुआ, वह उर्दू का आदि रुप है। इसमें फारसी, आरबी भाषा के शब्दों की बाहुल्यता रहती थी। उर्दू और हिन्दी भाषा का व्याकरण एक है, केवल शब्द बाहुल्यता और लिपि का अंतर है। काल्पी और एरछ मुगलकालीन शासन के प्राच्य विद्या के प्रमुख केन्द्र थे, जिनमें इस्लामी धर्म की शिक्षा प्रदान की जाती थीं। जौनपुर --शीराजे मशरिक-- के अनेक आलिम काल्पी में आकर बस गए। मौलाना ख्वाजगी मुरीद नसीरुद्दीन चिराNो दिल्ली, मौलाना अहमद थानेश्वरी गद्य पद्य --नज्म व नसर-- लेखन में कुशल थे। तारीखे मुहम्मदी के लेखक के पिता बिहामद खां किलेदार ऐरछ थे। "सेन साईं ऐन' बंगश पठानवंशीय रिसालदार ने सन् १८२५ ई. में अजमेर शरीफ में हजरत फिदा हुसैन से रसूलशाही सूफी फकीरी की दीक्षा ली और "इनाएते हुजूर' काव्य लिखा। दतिया के गोस्वामी किशुन दास जी आपके परम भक्त थे।
भाषा के रुप में उर्दू की शुरुआत आगरा तथा दिल्ली से हुई किन्तु साहित्यक मान्यता दकन --निजाम हैदराबाद-- वर्तमान आंध्र में प्राप्त हुई। उर्दू के प्रथम शायर "वली' और गद्यकार गेसूदराज वन्दानबाज़ आदि थे।

बुन्देलखण्ड में उर्दू की मान्यता राजा महाराजों के पत्रों में प्राप्त है, सिरनामें तथा विवरण में मालगुजारी, आवोहवा, खादिम, खिदमत आदि शब्द बहुलता के साथ प्राप्त हैं। महाराज दत्रसाल के जमाने में संत प्राणनाथ के साहित्य में फारसी, अरबी शब्दों की अधिकता दृष्टिगत होती है। खड़ी बोली के गद्य साहित्य का विकास इसी समय प्रारम्भ हो गया। १८वीं शती में बुन्देलखण्ड में दो मुस्लिम रियासतों का उदय हुआ। कदौल --बावनी-- के संस्थापक हैदराबाद के नवाब आसफजाह निजामुल्मुल्क के नाती इमादुलमुल्क गाजीउद्दीन थे। इन्हें पेशवा बाजीराव ने यमुना नदी के दक्षिणी तट पर बावन गाँव प्रदान किये थे। सन् १८०५ ई. में गाजीउद्दीन की मृत्यु हो गई। उनका पुत्र नवाब नसीरुद्दौला --१८०५-१५-- शासक बना, जिसे कम्पनी शासन ने मान्यता प्रदान कर दी। दूसरा इस्लामिक केन्द्र बाँदा था, इसके संस्थापक नवाब अलीबहादुर प्रथम थे जो पेशवा बाजीराव प्रथम और मस्तानी के वंशज शमशेर बहादुर के पुत्र थे। उनका दूसरा विवाह आगरा के सुसंस्कृत परिवार में हुआ, उर्दू के मशहूर शायर मिर्जा गालिब देहलवी की मुमानी हमशीरा थी। उनके पुत्र जुल्फिकार अली विद्वानों के आश्रयदाता थे। नवाब अली बहादुर द्वितीय स्वयं उर्दू के शायर थे। १९वीं तथा बीसवीं शती में बाँदा, झांसी, राठ, जालौन आदि सभी जनपदों में उर्दू अदब के शोअरा और क़दरदान प्रसिद्धि को प्राप्त हैं। बाँदा में वर्ग अकादमी की स्थापना सन् १९८६ में हुई। इस संस्था ने अनेकानेक उर्दू के कलामों को नये रुप में प्रकाशित किया है।

नवाब जुल्फिकारअली बहादुर सन् १८२३ ई. में नवाब बाँदा बने। उन्होंने उर्दू के शायर सादातअली खाँ को बाँदा शहर में बसाया। सन् १८२८ ई में मिर्जा असदुल्ला खां गालिब बाँदा आये व छः मास रुककर कलकत्ता गये। नामी बाँदवी भी मशहूर शायर थे। नवाब जुल्फिकारअली बहादुर के पुत्र नवाब अली बहादि#ुर सानी --द्वितीय-- को मिर्ज़ा नादिर बेग शायरी सिखाते थे। मुनीर शिकोहावादी भी लगभग आठ साल तक बाँदा में रुके। नवाब साहब ने एक मसनवी मेहरो माह सन् १८५१ ई. में लिख कर छपाई। उर्दू की इस परम्परा में अनेक शोअरा भी हुए। कामिल बाँदवी का कलाम "काविलनामा' छपा है। श्री द्वारिका प्रसाद श्रीवास्तव "शौक' का कलाम "शहर ए जनून' प्रकाशित हुआ। "काबिल' के शिष्य श्री शिवप्रसाद "वर्ग' --सन् १९०६-९७ बाँदा-- के कलाम "वर्गे' आवारा, "जुवां वर्गे गुल' भी अकादमी बाँदा द्वारा छप चुके हैं। बाँदा और गालिव पुस्तिका भी प्रकाशित है। श्री गोपी चरण बाजपेयी गोपी --जन्म १७ अगस्त १९९८ और निधन १९ मार्च १९७९ ई.-- ने स्फुट शेर लिखे हैं। उनका कौल था कि "यह जबां उर्दू है मेरी और यही बोलूंगा मैं।' नवाब साउद्दीन कदौरा --बावनी-- का कलाम "चश्म ए फैज' छप चुका है तथा निम्न पुस्तकें भी प्रकाशित हो चुकी हैं। 

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